| A | B | C | |
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1 | तिङन्तेषु सन्धि-कार्यम् | कुँ + स्* → क्ष्* | खरि च॥ झलां जश् झशि॥ इण्क्वोः ष्टुत्वम्॥ |
2 | तिङन्तेषु सन्धि-कार्यम् | चुँ + स्* → क्ष्* | (चोः कुः॥ व्रश्चभ्रश्च… षत्वम्॥ षढोः कः सि॥) खरि च॥ इण्क्वोः ष्टुत्वम्॥ ष्टुनाः ष्टुः॥ |
3 | तिङन्तेषु सन्धि-कार्यम् | टुँ + स्* → ट्ष्* | ष्टुनाः ष्टुः॥ |
4 | तिङन्तेषु सन्धि-कार्यम् | तुँ| पुँ + स् → चर् + स् | खरि च |
5 | तिङन्तेषु सन्धि-कार्यम् | य्/व् + स्* → स्* | लोपो व्योर् वलि |
6 | तिङन्तेषु सन्धि-कार्यम् | श्|ष् + स्* → क्ष्* | (व्रश्चभ्रश्च… षत्वम्॥ षढोः कः सि॥) |
7 | तिङन्तेषु सन्धि-कार्यम् | सलोपः | रात् सस्य॥ झलो झलि॥ इट ईटि॥ स्कोः संयोगान्तस्य॥ सस्य आर्धधातुके॥ |
8 | तिङन्तेषु सन्धि-कार्यम् | झष् (- धा) + त्|थ् → जश् + ध् | झलां जश् झशि॥ |
9 | तिङन्तेषु सन्धि-कार्यम् | चुँ + त्|थ्* → (क् + त्|थ्* ) (ष् + ट् | ठ्) | (चोः कुः॥ व्रश्चभ्रश्च… षत्वम्॥ ) खरि च॥ इण्क्वोः ष्टुत्वम्॥ ष्टुनाः ष्टुः॥ |
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