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JEEVAK AYURVED MEDICAL COLLEG HOSPITAL AND RESEARCH CENTER

KAMLAPUR AKAUNI CHANDAULI UP

PRESENTED BY :-

SUDHANSHU RANJAN

ROLL NO. - 26

B.A.M.S. 1ST PROFF

BATCH :- 2023 -24

GUIDED BY :-

ASSOCIATE PROFFESOR – DR. AMIT KUMAR SINGH

( HOD )

ASSISTANT PROFESSOR - DR. VARSHA GUPTA

( LECTURER )

DEPARTMENT OF RACHANA SHARIRA

TOPIC :- RAKTVAHA SROTAS

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INDEX

स्रोतस् शारीर:- रक्तवह स्रोतस

  • स्रोत शब्द की व्युत्पत्ति
  • स्वरूप
  • पर्याय
  • स्रोतो की संख्या
  • स्रोतसों के स्थान
  • स्रोतसों की दुष्टि के सामान्य लक्षण
  • स्रोतसों का महत्व
  • Research Articles

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स्त्रोतस् शारीर

1.शरीर के वे सभी भाग जहॉँ स्रवण (गति) क्रिया होती है, वे स्त्रोतस् हैं।

2.जिससे स्राव निकलता हो, वही स्त्रोतस् हैं।

3. स्रोत शब्द का अर्थ एक मिट्टी के घड़े (मटके) के उदाहरण से समझा जा सकता है।जिस प्रकार घड़े के अन्दर से पानी रिसकर बाहर निकलता है।

उसी प्रकार हमारे शरीर मैं कोशिकाओं के अन्दर पदार्थों की स्त्रवण क्रिया होती है।

4. जिस प्रकार अंगुलि को सूई द्वारा चुभाने से रक्त बाहर निकलता है,क्योंकि रक्त असंख्य छोटे-छोटे छिट्रं में बॅटा हुआ होता है, न कि एक नदी की तरह बहता है, जैसे कि सिराओं के अन्दर बहता है।

व्याख्या - "स्रवणात् स्रोतांसि "

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स्त्रोत शब्द की व्युत्पति

स्रोतो की व्युत्पति के विषय में विदवानों के मत इस प्रकार हैं -

स्रोतांसि खलु परिणाममापद्यमानानाम

धातूनामाभिवाहीनीभवन्त्ययनार्थन। (चरक वि.5/3)

जिसमें स्वण क्रिया होती है उन्हें स्रोत कहते हैं। स्रोत परिणाम प्रप्तधातओं को अन्यत्र ले जाने के लिए वहन करने वाले होते हैं।

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स्वरुप

स्वधातुसमवर्णानि वृत्तस्थूलान्यणूनि च

स्रोतांसि दीर्घण्याकृत्याप्रतानसदृशानि च।

च.वि.5/24

जिसमें स्वण क्रिया होती है उन्हें सोत कहते हैं। सोत परिणाम प्रप्तधातओं को अन्यत्र ले जाने के लिए वहन करने वाले होते हैं।

मूलात् खादान्तरदेहे प्रसृतम त्वभिवाहि यत |

स्रोतस्तदिति विज्ञेयं सिराधमनीविवर्जितम|।

सु०शा०९२५

मूल छिद्र में शरीर में फैले हुए रसादि का जो वहन करता है और सिराधमनी से जो पृथक् है उन अवकाशयुक्त सुषिर भागों को स्रोतस् मानना चाहिए ।

अर्थात शरीर में जो बड़ी-बडी सिराएं और धमनियां होती हैं उनसे पृथक् अन्य जो अवकाशयुक्त भाग (नालियां) होते हैं तथा जो अन्तः सुषिर अंग से सम्बन्ध रखकर उसमें रसादि तरल पदाथं का वहन करते हैं वे स्रोतस् कहे जाते हैं।

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स्रोतस की उत्पत्ति एवं भौतिक संगठन

स्रोतस् की उत्पत्ति में आकाश महाभूत प्रमुख है।

पर्याय

स्रोतांसि, सिरा: धमन्यः,

रसायन्यः;, रसवाहिन्य:, नाड़य: पन्थानः

मार्गाः शरीरच्छद्राणि, संवृतासंवृतानि

स्थानानि, आशया: निकेताश्चेति,

शरीरधात्ववकाशाना, लक्ष्यालक्ष्याणां, नामानि भवन्ति।" (च.वि. ५९)

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स्रोतों की संख्या

चरक एवम सुश्रुत में मान्य स्रोतों की संख्या भिन्न-भिन्न है तथा कुछ लोग असंख्य भी मानते हैं |

"यावन्तः पुरुषे मूर्तिमन्तोभावविशेषास्तावन्त

एवास्मिन् स्रोतसंप्रकारविशेषा:" च०वि० 5/6

आचार्य चरक के अनुसार स्रोतसों की संख्या 13 हैं |

तथा गर्भ प्रकरण मे आर्तवह नामक एक स्रोत और माना है इस प्रकार चरक ने कुल 14 स्रोत माने हैं |

सुश्रुत के अनुसार शल्यतंत्र में 11 स्रोत माने गए हैं

तथा 'इनकी दो-दो सख्या मानी हैं।

इस प्रकार कुल २२ स्रोत हो जाते हैं।

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आचार्य चरक के अनुसार स्त्रोतों की संख्या

1.प्राणवह 2. उदकवह 3.अन्नवह

4.रसवह 5.रुधिरवह 6. मासवह

7. मेदोवह 8. अस्थिवह 9. मज्जावह

10. शुक्रवह 11. मूत्रवह 12. पुरीषवह

13.स्वेदवह 14. आर्तववह

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आचार्य सुश्रुत के अनुसार स्त्रोतों की संख्या

1. रसवह 7. रक्तवह

2. मांसवह 8. मेदवह

3. शुक्रवह 9. मूत्रवह

4. आर्तववह 10.पुरीषवह

5. अन्नवह 11.प्राणवह 6. उदकवह

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स्त्रोतस नाम स्थान (चरक वि.५/७-८) (सुश्रुतशा.९/१२)

1 प्राणवह स्त्रोतस हृदय और महास्स्रोतसस्थान हृदय और रसवाहिनी धमनियाँ

(प्राणवाहिनी धमनियाँ)

2. उदकवह स्रोतस् तालू और क्लोम तालु और क्लोम

3. अन्नवह स्रोतस् आमाशय और वामपार्श्व. आमाशय, अत्रवाहिनी धमनि

4. रसवह स्रोतस् हृदय और दश धमनियाँ. हृदय और रसवाहिनी धमनियाँ

5. रक्तवह स्रोतस् यकृत और प्लीहायकृत, प्लीहा और रक्तवाहिनी धमनियाँ

स्रोतसों के स्थान (मूल)

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  1. मांसवह स्रोतस् स्नायू, त्वक् , स्नायू त्वक् और रक्तवाहिनी धमनियां

  • मेदोवह स्त्रोतस वृक्कौ और वपावहन वृक्कौ और कटि

  • अस्थिवह स्रोतस् मेद और जघन.

  • मज्जावह स्रोतस् अस्थि और सन्धियाँ.

10. शुक्रवह स्रोतस् वृषण और शेफ (मूत्रेन्द्रिय) वृषणौ और स्तनौ

11. मूत्रवह स्रोतस् वस्तिऔर वंक्षण वस्ति और मेढ़

12. पुरीषवह स्रोतस् पक्वाशय और स्थूलगुद पक्वाशय और गुद

13. स्वेदवह स्रोतस् मेद और लोमकूप (रोमकूप)

14. आर्त्तववह स्रोतस् गुदगर्भाशय और आर्तव वाही धमनियाँ

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रक्तवह स्त्रोत

मूल - "शोणितवहाना स्रोतसां यकृन्मूलं प्लीहा च।"च.वि.५19

रक्तवह स्रोत का मूल यकृत और प्लीहा हैं।

रक्तवहे दवे तयोर्मूलं यकृप्लीहानौ रक्तवाहिन्यश्च धमन्यः। सु.श.9१11

रक्तवह स्रोत दो हैं इनके मूल यकृत, प्लीहा और रक्त को वहन करनेवाली धमनियॉ है।

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रक्तवह स्त्रोत दूष्टि के विशेष हेतु

दाह़ पैदा करने वाले, स्निग्ध, उष्ण और द्रव भोजन से तथा अधिक धूप एव

वायु के सेवन से रक्तवाही स्रोत दूषित होते हैं।

रक्तवह स्त्रोत दूष्टि के विशेष लक्षण

कुष्ठ, वीसर्प, पिडका,रक्तपित,

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रक्तवह स्त्रोत के विध्द होने के विशेष लक्षण

रक्तवह स्रोतो के विदध होने से शरीर सफेद हो जाता है, रक्त निकलता है और ऑँखे लाल होती हैं।

कार्य

रस से रक्त बनाना। शरीर का वर्ण, आभा तथा प्रभा का निर्माण करना।

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स्त्रोतस दूष्टि के सामान्य लक्षण

अतिप्रवृतिः सङ्गो वा सिराणां ग्रन्थयो पि च।

विमार्गमनं चापि स्त्रोतसां दुष्टिलक्षणम् च.वि. 5/24

1.धातुओं का अधिक निकलना

2. या बिल्कल रूक जाना।

3. सिराओं में ग्रन्थि का पइ जाना।

4 धातुओं का विमार्गगमन हो जाना।

ये सभी स्त्रोतों की दुष्टि के लक्षण है।

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शरीर के स्रोतस् के महत्व का वर्णन तथा स्रोतसों का महत्व

* प्राकृत शरीर में - प्रत्येक पातु की प्राकृत क्षय-वृद्धि इन्ही स्रोतस के द्वारा होती है

* विकृत शरीर में- कोई भी विकृति स्रोतो की दूष्टि के बिना सम्भव नहीं है । इन् स्रोतो में दोष,धातु एव मलों का वहन रुक जाने से, अत्यधिक हो जाने से, विकृति दिखाई देती है

* चिकित्सा में- प्रत्येक स्रोत का मलस्थान है, जिनके दवारा उनका नियन्त्रण होता है स्रोतो में होने वाले रोग अन्त में अपने मूल

स्थान को ग्रस्त करने लगते हैं।

* औषध कार्य में - आयुर्वेद में भी शरीर को स्रोतों में बाटकर औषधियों का प्रभाव लिखा है।

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  • Research Articles

Devpal, Harvendra, Shaifali Sharma, and Purushottam Das Sharma. "A CONCEPTUAL STUDY OF RAKTVAHA SROTAS WITH SPECIAL REFERENCE OF IT’S MOOL STHANA." (2022).

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