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Jeevak Ayurvedic Medical College And Hospital Research Centre

Marma sharira with special reference to.

Sadhya Pranahara marma

TOPIC

Guided By-

Dr.Amit singh

(Associate Professor& HOD Department of Rachna Sharir) Dr.Varsha Gupta

(Assistant Professor Department of Rachna Sharir

Presented By-

Sakshi Verma. 1st Prof BAMS Student Batch-2023-2024. Roll no. - 06

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INDEX

  • Introduction
  • Marma Paribhasha.
  • Marma Sankhya.
  • Pramanansur Marma.
  • Sadhya Pranahara Marma.
  • Shringatika Marma.
  • Adhipati Marma.
  • Shankha Marma
  • Matrika Marma.
  • Guda Marma.
  • Hridayam Marma.
  • Basti Marma.
  • Nabhi Marma.
  • Sadhya Pranahara Marma lakshan.
  • Marma Chikitisa.
  • Marma Chikitisa Ke Fadhye

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  • INTRODUCTION
  • मर्म आयुर्वेद का एक अहम घटक है और सुश्रुत संहिता में इनके बारे में बताया गया है. मर्म बिंदु, शरीर में मौजूद वे बिंदु हैं जहां मांसपेशियां, हड्डियां, नसें, स्नायुबंधन, और जोड़ एक साथ मिलते हैं. इन्हें जीवन ऊर्जा का केंद्र माना जाता है. �मर्म बिंदुओं की खास बातें:�मर्म बिंदुओं को पूरे शरीर में प्राण (जीवन शक्ति) के प्रवाह के लिए मार्ग माना जाता है. �मर्म बिंदुओं को दबाने से शरीर, मन, और चेतना में ऊर्जा और उपचार आता है. �मर्म बिंदुओं को उत्तेजित करने से प्राण या ऊर्जा प्रवाह को बढ़ाया जा सकता है. �मर्म बिंदुओं को सही तरीके से दबाने से बीपी, डायबिटीज़, और तनाव जैसी समस्याएं कम होती हैं. �मर्म बिंदुओं को उत्तेजित करने से याददाश्त भी बढ़ती है.

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मर्म शब्द की व्युत्पत्ति

मर्म शब्द का अर्थ जीव स्थान है। अंग्रेजी में इन्हें Vital Parts कहते हैं। दोनों ही शब्दों का योगार्थ एक ही है। इस मर्म शब्द की व्युत्पत्ति अनेक विद्वानों ने इस प्रकार बताई है-

मारयन्तीति मर्माणि (डल्हण)

  • शरीर के वे स्थान जहां आघात या चोट के कारण मृत्यु हो जाए मर्म कहलाते हैं।

मर्माणि नाम मांस सिरा स्नायु अस्थि सन्धि सन्निपाताः ।

तेषु स्वभावत एव विशेषेण प्राणाः तिष्ठन्ति ।। (सु.शा. ६/१६)

• मर्म वह है, जहाँ पर मांस-सिरा-स्नायु-अस्थि और सन्धि इनका सन्निपात (संगम) होता है अर्थात् ये पाँचों मिल जाते हैं।• यहाँ पर स्वाभाविक (प्राकृतिक) रूप से ही प्राण रहते हैं।

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"सप्तोत्तरं मर्मशतम् ।”

कुल मर्म = 107

मुख्य मर्म= 3

मर्मों के भेद एवं संख्या तालिका

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श्रृंगाटकान्यधिपतिः शंखौ कण्ठः सिरा गुदम्। हृदय बस्तिनाभि च घ्नन्ति सद्यो हतानि तु।।

सु०शा० 6/15

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  • संख्या.

4

संरचनात्मक आधार

सिरा मर्म धमानी मर्म

षडंगानुसार

उर्ध्वजात्रु गता मर्म

प्रभाव

साध्य प्राणाहार मर्म

माप

4 अंगुल

विद्धा लक्षणा

तत्काल मृत्यु

श्रृंगाटक मर्म

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संख्या

1

संरचनात्मक आधार

संधि मर्म

षडंगानुसार

उर्ध्वजात्रु गता मर्म

प्रभाव

साध्य प्राणाहार मर्म

माप

½ कोण

विद्धा लक्षणा

तत्काल मृत्यु

अधिपति मर्म

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संख्या

2

संरचनात्मक आधार

अस्थि मर्म

षडंगानुसार

उर्ध्वजात्रु गता मर्म

प्रभाव

साध्य प्राणाहार मर्म

माप

½ कोण

विद्धा लक्षणा

तत्काल मृत्यु

शंख मर्म

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संख्या

8

संरचनात्मक आधार

सिरा

षडंगानुसार

उर्ध्वजात्रु गता मर्म

प्रभाव

साध्य प्राणाहार मर्म

माप

4 अंगुल

विद्धा लक्षणा

तत्काल मृत्यु

कंठ सिरा

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संख्या

1

संरचनात्मक आधार

ममसा मर्म, धामनी मर्म

षडंगानुसार

मध्य शरीरा मर्म

प्रभाव

साध्य प्राणाहार मर्म

माप

4 कोने

विद्धा लक्षणा

तत्काल मृत्यु

गुदा मर्म

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संख्या

1

संरचनात्मक आधार

सिरा मर्म

षडंगानुसार

मध्य शरीरा मर्म

प्रभाव

साध्य प्राणाहार मर्म

माप

4 कोने

विद्धा लक्षणा

तत्काल मृत्यु

हृदय मर्म

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संख्या

1

संरचनात्मक आधार

स्नायु मर्म

षडंगानुसार

मध्य शरीरा मर्म

प्रभाव

साध्य प्राणाहार मर्म

माप

· 4 अंगुल

विद्धा लक्षणा

तत्काल मृत्यु

बस्ती मर्म

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संख्या

1

संरचनात्मक आधार

सिरा मर्म

षडंगानुसार

मध्य शरीरा मर्म

प्रभाव

साध्य प्राणाहार मर्म

माप

4 अंगुल

विद्धा लक्षणा

तत्काल मृत्यु

नाभि मर्म

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सद्यः प्राणहर मर्म के लक्षण

  • हृदय, फुफ्फुस और मस्तिष्क इन स्थानों पर आघात होने से शीघ्र मृत्यु हो जाती है. इनमें भी हृदय प्रधान है। इसको अनेक रूप से सिद्ध किया जा सकता है। जब हृदय स्वस्थ होता है तब भी मर्म स्थान पर आघात होने से संबंदनिक नाड़ी सूत्रों के द्वारा उसका परिणाम Cardiac Centre के ऊपर होने से हृदय का कार्य बन्द हो जाता है।

मर्मों का कार्य करने का काल

सद्यः प्राणहर मर्म सात दिन के अन्दर मारते है। • कालान्तर-प्राणहर मर्म पन्द्रह दिन अथवा एक महिने में मार डालते है। • कालान्तर-प्राणहर मर्मों में भी क्षिप्र नामक मर्म कभी-कभी शीघ्र ही मार हा. • विशल्य-प्राणहर तथा वैकल्यकर मर्मों पर कभी-कभी विशेष आघात होने है। मार देते हैं।

सद्यः प्राणहर मर्म- •कालान्तर प्राणहर मर्म-पन्द्रह दिन या एक मास

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मर्म चिकित्सा के सामान्य नियम एवं सावधानियां

1. सामान्यतया लेटी अवस्था में (शवासन की स्थिति में) मर्म चिकित्सा करना है,! 2. रोगी की वय, बल, वेदना सहन करने की शक्ति, मनः स्थिति व मर्म के प्रकार को ध्यान में रखकर मर्म चिकित्सा की जानी चहिये। 3. प्रारम्भ में मर्म बिन्दुओं पर हल्का दबाव देना हैं, बाद में शारीरिक क्षमता के अनुरुप दबाव बढ़ाया जा सकता हैं। 4. मर्म चिकित्सा के दौरान कसे हुये कपड़े, टाई, बेल्ट, जुराब, नी कैप, आदि हटा देना चाहिये। 5. चिकित्सा के दौरान रोगी को लम्बा श्वास प्रश्वास लेने को कहते हैं।. 6. चिकित्सा के दौरान होने वाली वेदना को आश्वासन व मन को हटाकर दूर किया जा सकता है।. 7. अत्यधिक रोगावस्था में मर्म चिकित्सा को प्रभावित भाग से सुदूरवर्ती मर्म स्थानों से प्रारम्भ करना चाहिये। बाद में प्रभावित की चिकित्सा की जानी चाहिये। सूजन की अवस्था में उसके समापवर्ती मर्म स्थानों को उपचारित करने से लाभ मिलता है।

8. स्त्रियों में मासिक धर्म व गर्भावस्था के दौरान चिकित्सा नहीं दी जानी है। वह स्त्री स्वयं 'स्व मर्म चिकित्सा' कर सकती है। 9. स्त्रियों में मर्म चिकित्सा बाईं ओर से व पुरुषों में दाईं ओर से करनी चाहिये। 10. मर्म चिकित्सा की समाप्ति पर मर्म बिन्दुओं को चिह्नित कर देना चाहिये, ताकि रोगी बाद में उन बिन्दुओं को स्वतः उपचारित करता रहे।

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मर्म चिकित्सा के फायदे

1.यह पुराने और असहनीय दर्द से राहत दिलाती है. 2.यह सभी स्तरों पर शरीर की आंतरिक सफाई करती है. 3.यह शरीर तथा शरीर के सभी अंगों की कार्य क्षमता बढ़ाती है. 4.प्रतिरोधक क्षमता, पाचनतंत्र, श्वसन प्रणाली, स्नायुतंत्र तथा मानसिक स्वास्थ्य में सुधार लाती हैइससे त्वचा स्वस्थ एवं कांतिमय होती है. 5.यह शरीर के तापमान तथा त्रि दोषों में संतुलन बनाये रखती है. 6.यह स्नायु रसायन जैसे सेरोटिन और मेलाटोनिन को स्रावित करती है. 7.इससे बोध क्षमता और गहरी निद्रा में सुधार आता है

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