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BLESSINGS

ॐ ह्रीं अर्हम् नमः

श्रीसद्गुरुभ्यो नमः

ॐ ऐं नमः

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SHREE MATI GYANAY NAMAH

SHREE SHRUT GYANAY NAMAH

SHREE AVADHI GYANAY NAMAH

SHREE MANAH-PARYAV GYANAY NAMAH

SHREE KEVAL GYANAY NAMAH

5 GYAN

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Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 11

10 Trik Part - 2

Inspired by:

Yugpradhan Acharyatulya P.P. Panyas Shree Chandrashekar Vijayji M.S.

P.P. Panyas Shree Yashobhushan Vijayji M.S.

P.P. Panyas Shree Manobhushan Vijayji M.S.

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Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 11

दस त्रिक भाग –

(ख) अग्र पुजा : चामर पूजा, दर्पण पूजा, पंखा, आरति, मंगल दिवो इत्यादि भी

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4-C

Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 11

दस त्रिक भाग –

(ग) भाव पूजा: प्रभुजी के आगे चैत्यवंदन, स्तवन, स्तुति आदि करना यह भाव पूजा है।

नोंध : जैन धर्म में भाव विहीन किसी भी धर्म क्रिया को मृतप्रायः एवं परिणाम शून्य माना गया है। भक्ति, "भाव की उत्कृष्टता" से ही फलती है। उत्तरोत्तर उत्तम भाव से प्रभु भक्ति करने वाला मात्र अन्तर्मुहर्त में स्व आत्म कल्याण करने में सफल हो सकता है।

यानि वह जन से जिनेश्वर बन सकता है।

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IV-A

IV-B

IV-C

Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 11

दस त्रिक भाग –

दुसरा प्रकार :- त्रिकाल पूजा- जो दिन में तीन बार की जाती हैं। क. प्रातः ख. दोपहर के समय ग. शाम के समय की जाती है।

(क) प्रातः : अपनी अंग शुद्धि (हाथ पाँव धोना) करके शुद्ध वस्त्र पहनकर धूप, दीप, अक्षत पूजा, नैवेद्य पूजा एवं फल पूजा (पंचप्रकारी) व चैत्यवंदन किया जाता है।

(ख) दोपहर के समय : अष्ट प्रकारी पूजा व स्नात्र पूजा इत्यादि महोत्सव दुपहर के समय होता है।

(ग) सायंकाल : शाम को आरती, मंगल दीप, धूप पूजा व दीप पूजा एवं चैत्यवंदन किया जाता है।

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Pindasth Avstha- Janma 1

56 Dikkumari

Pindasth Avstha – Janma 2 Panchrupe Indra

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दस त्रिक भाग –

५. अवस्था त्रिक : इसके तीन भेद हैं (अ) पिंडस्थ अवस्था, (आ) पदस्थ अवस्था व (इ) रुपातीत अवस्था।

(अ) पिंडस्थ अवस्था : पिंडस्थ अवस्था के भी तीन भेद हैं जो निम्न प्रकार है:

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Pindasth Avstha – Janma 3

Meru Abhishek

Pindasth Avstha – Janma 4 Janma Badhai - Vrudhi

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दस त्रिक भाग –

  1. जन्म अवस्था : प्रभुजी का स्नात्र महोत्सव करते समय व पक्षाल करते समय हमारा यह चिंतन होना चाहिये कि, हे नाथ! आपका जन्म होते ही ६४ इन्द्र व ५६ दिककुमारियों के सिंहासन चलायमान होते हैं।

तब वे देवलोक से आकर आपका शुचिकर्म करते हुए जन्म महोत्सव करते हैं।

तत्पश्चात् सौधर्म इन्द्र आपको मेरु शिखर पर ले जाते हैं। वहाँ सौधर्म इन्द्र स्वयं का अभिमान त्यागकर ऋषभ (बैल) रुप धारण कर अभिषेक करते हैं तथा एक करोड़ साठ लाख रत्न आदि जड़ित बड़े बड़े कलशों से देवतागण अभिषेक करते हैं तो भी आपको जरा भी अभिमान नहीं हुआ। धन्य है आपकी लघुता।

८ जाति के ८००० कलश ६४,००० X २५० इन्द्र इन्द्राणी आदि देवता = १,६०,००,००० अभिषेक तथा क्षत्रियकुंड़ नगर में धन-धान्य-सोना, रत्न, मणि इत्यादि सभीकी अधिक वृष्टि (वृद्धि) होती है।

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Pindasth Avastha – Rajya 1

Rajya ki Na

Pindasth Avastha – Rajya 2

9 Lokantik dev

Pindasth Avastha

Rajya 3

Varshidan

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दस त्रिक भाग –

(B) राज्य अवस्था : हे नाथ! आपको इतनी बड़ी राज्य संपत्ति और सत्ता मिलने पर भी आपको अंश मात्र राग नहीं हुआ, कमल की तरह निर्लिप्त रहे। ओर राज्य का त्याग कर दिया। धन्य है आपके वैराग्य को।

९ लोकांतिक देव आकर दीक्षा लेने की विनंति करते है।

प्रभुजी १ साल तक वरसीदान देते है, हररोज १ करोड़ ८ लाख सोना महोर दान में देते है।

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10 Trik Part - 2

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