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WELCOME TO MY PRESENTATION

SUBMITTED BY :- JAYA CHAUHAN

ROLL NO : – 56

GOVERNMENT ( AUTONOMOUS) AYURVEDA COLLEGE AND HOSPITAL, GWALIOR

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TOPIC

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योग

  • तं विदध्यात दुख संयोगो वियोगम योग संज्ञतं ।

( भगवद गीता 6/23 )

  • सभी प्रकार के ( शारीरिक एवं मानसिक ) वेदना के संबंध से विमुक्त होना ही योग कहलाता है ।

  • जब पुरुष अपने मन, बुद्धि, इंद्रियो की चंचलता को स्थिर कर लेता है , तब वह व्यक्ति इस संसार के व्यामोह से उत्पन्न होने वाले सभी प्रकार के दुख से वियोग हो जाने को भगवान श्री कृशन ने योग की संज्ञा दी है ।

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योग: कर्मसु कौशलम ।।� (भ॰गी ॰2/50 )

  • अर्थात कार्य मे कुशलता ही योग है ॰कर्मा ( भौतिक कर्म / आध्यात्मिक कर्म ) ऐसे करना चाहिए जिससे सभी प्रकार के बंधनो (सांसारिक बंधनों) से मुक्त हो ।

कर्मन्येवाधिकारस्ते मा फलेशु कदाचन । ( भ॰गी ॰ 2/47 )

भगवद गीता मे कहा गया है की कर्म ( शारीरिक एवं मानसिक ) फल की इच्छा के बिना , या निसकाम भाव से करना चाहिए

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अष्टांग योग

        • अष्टांग योग मे 8 अंग बताए गए है

1 यम

2 नियम

3 आसन

4 प्राणायाम

5 प्रत्याहार

6 धारणा

7 ध्यान

8 समाधि

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अष्टांग योग को 2 भागों मे बाँटा गया है

बहिरङ्ग योग

  • यम
  • नियम
  • आसन
  • प्राणायाम

अंतरङ्ग योग

  • प्रत्याहार
  • धारणा
  • ध्यान
  • समाधि

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1॰ यम

  • अहिंसासत्यसतेय ब्रहाचर्चापरिग्रह यमः।। (पा॰यो॰सू॰ सा/30 )

यम के 5 भेद होते है ।

  • अहिंसा
  • सत्य
  • अस्तेय
  • ब्राहम्चर्य
  • अपरिग्रह

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अहिंसा

  • अहिंसा प्रतिषठायां तत्सन्निन्धौ वेरत्यागा: ।।

( पा॰ यो॰ सू॰ 2/35 )

  • प्रत्येक प्राणी को प्रति सदेव सभी प्रकार की हिंसाओ का त्याग अहिंसा कहलाता है।

मन वचन कर्म से किसी भी प्राणी को पीड़ा न

देना,सबसे बैर भाव त्यागना ही अहिंसा हैं

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सत्य

  • सत्यप्रतिस्ठायाम क्रियफलश्र्यत्वम ।।

( पा॰यो॰सू॰ साध ।।5/36 )

  • सत्यनिष्ठ व्यक्ति का वचन सदा फलीभूत होता है ।

जैसा देखा गया हो, अनुमान किया गया हो एवं सुनाया गया हो, उसी प्रकार से कथन करना ही सत्य है।

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अस्तेय

  • अस्तेय प्रतिस्ठायाम सर्वरत्नोप्स्थानाम ।। ( पा॰यो॰सू साधानपाद /37)

  • धर्म के विरुद्ध,

अन्यायपूर्वक किसी

दूसरे व्यक्ति के द्रव्य इत्यादि को ग्रहण करना

स्तेय है।

  • पर वस्तु मे राग का प्रतिषेध होना ही अस्तेय है।

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ब्रहंचर्य

  • ब्रहांचर्यप्रतिस्ठायाम वीर्यालाभ: ।। ( पा॰यो॰सू॰ साधवपाद /7 )

  • उप्स्थेंद्रिय ( गुप्तेन्द्रिय )

का संयम,

वीर्य का रक्षण करना ही ब्रह्मचर्य

कहलाता है।

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अपरिग्रह

  • अपरिग्रहस्थेर्ये जन्मकथन्तासम्बोध: ।।

(पा॰यो॰सू॰साधनपद 9/39)

परिग्रह का अर्थ है कि विभिन्न ऊपायों के द्वारा सांसरिक भोग विलास –धन, समपत्ती आदि को आवश्यकता से अधिक इखट्टा करना ।

इस से मनुष्य मे आसक्ति और लोभ कि भावना होती है , जो मानसिक अस्थिरता का कारण बनती है । इस प्रकार कि प्रवर्ती को रोकना/त्यागना ही अपरिग्रह है ।

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नियम

  • नियामन्तर्गत प्रेयन्तिती नियमा: ॥

  • नियम पाँच प्रकार के है –

शौचसंतोषतपस्वधयायेशवरप्रणिधनानी नियम:।।

(पा॰यो॰सू॰साधनपाद 2/32)

  1. शौच
  2. संतोष
  3. तप
  4. स्वाधयाय
  5. ईश्वर प्रणिधान

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शौच

शौचात्स्वांगजुगुप्सा परैसंसर्ग: ।

सत्वशुद्धिसौम्नस्यैकागेन्द्रियजात्म्दर्शन योग्यत्वानि च ।।

(पा॰यो॰सू॰साधनवाद 40-41)

शौच अर्थात पवित्रता ।

यह 2 प्रकार का होता है –

बाहय व आभ्यन्तर ।

उपयोग – सत्वशुद्धि, एकाग्रता, सौमनस्यता,इंद्रिय संयम ,एवं आत्मदर्शन प्राप्त होता है ।

संतोष

संतोषाद्नुत्तम: सुखलाभ: ।

(पा॰यो॰सू॰साधनया।। 2/49)

जितने बाहय पदार्थ योगसाधन के लिए आवश्यक है, उनसे

अधिक को ग्रहण करने की इच्छा न करना संतोष कहलाता है।

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तप

  • काययेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात्तपस: । ।

(पा॰यो॰सू॰। साधनपद 43)

शरीर, प्राण, इंद्रिय एवं मन का उचित रीति स अभ्यास द्वारा संयमन करना तप है ।

द्वंदों को सहन करना ( सुख , दुख, भूख , प्यास आदि) ही, तप है ।

  • शारीरिक तप – अहिंसा , ब्रहंचर्य
  • वाचिक तप – सत्य वचन
  • मानसिक तप – आत्म निग्रहण

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स्वाध्याय

स्वाध्यायदिष्ट देवतसंप्रयोग: ।।

आध्यात्मिक ग्रंथो का अध्ययन करना और ऊंकार, गायत्री मंत्र का जप करना ही स्वध्याय है ।

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ईश्वर प्राणीधान

  • ईश्वर प्रणिधानम सर्वक्रियायम परमगुररवार्पनम

तत्फलमसन्यासो वा।। (पा॰यो॰सू॰साधनपाद 2/1)

शरीर, इंद्रिय, मन, प्राण आदि समस्त करणों

से किए जाने वाले सम्पूर्ण कर्मो और उनके फलो को अर्पित कर देना प्रणिधान कहलाता है।

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आसन

  • स्थिरसुखमासनम ।।

(पा॰यो॰सू॰ साधनपाद 2/46 )

जिस अवस्था मे, शरीर को अपेक्षित काल तक बिना मनो दैहिक कष्ट से शरीर को एक विशेष स्थिति मे रखा जाता है, वह अवस्था आसन कहलाती है ।

यम, नियम का पालन सभी जगह प्रतिक्षण कर सकते है,लेकिन प्राणायाम का अभ्यास,

आसन के बिना संभव नहीं है ।

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उपोयगिता के द्रष्टि से आसनो को तीन भागो मे बांटा जा सकता है ।

  • शरीर संवर्धनातमक आसन – सूर्यनमस्कार, स्वस्तिकासन , सर्व्ङ्गासन

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  • विश्रामात्मक आसन – शवासन

मकरासन

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ध्यानात्मक आसन- पद्मासन,सिद्धासन,सुखासन

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उपयोग

  • शरीर की स्थिरता
  • आरोग्यता
  • लघुतादी का प्राप्त होना ।
  • ध्यानादी का साधन

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प्राणायाम

  • प्राणायाम दो शब्दो से

बना हुआ है – प्राण और आयाम

  • प्राणस्य आयाम: प्राणायाम: ।
  • प्राण जीवन शक्ति है ,

  • सभी प्राणी प्राणवायु से ही

जीवित रहते है ।

  • श्वास प्रशवास की प्रक्रिया का आयाम अर्थात ठहराओ या नियंत्रण करना ही प्राणायाम है ।

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प्राणायाम का काल

प्रात: काल

  • मध्यहन
  • सांयकाल
  • अर्धरात्रि

  • योग्य काल – वसंत,

शरद ऋतु

  • अयोग्य काल – हेमंत ,शिशिर, ग्रीष्म, वर्षा

स्थान

  • शुद्ध वायु का आगमन हो
  • शांत वातवरण हो

  • दीवार पीआर ॐ कार का चिह्न

  • खुले बगीचे मे भी प्राणायाम कर सकते है।

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प्राणायाम के प्रकार

  • बाह्य वृत्ति (रेचक)- प्राणवायु को नासिका द्वारा बाहर निकालकर बाहर ही जितने समय तक सरलतापूर्वक रोका जा सके, उतने समय तक रोके रहना ‘बाह्य वृत्ति’ प्राणायाम है। 

  • आभ्यान्तरवृत्ति (पूरक)- प्राणवायु को अंदर खींचकर अर्थात श्वास लेकर जितने समय आसानी से रूक सके, रोके रहना आभ्यान्तर वृत्ति है, इसका अपर नाम ‘पूरक’ कहा गया है। 

  • स्तम्भ वृत्ति (कुम्भक)- श्वास प्रश्वास दोनों गतियों के अभाव से प्राण को जहाँ-तहाँ रोक देना कुम्भक प्राणायाम है। प्राणवायु सहजतापूर्वक बाहर निष्कासित हुआ हो अर्थात जहाँ भी हो वहीं उसकी गति को सहजता से रोक देना स्तम्भवृत्ति प्राणायाम है।

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 हठयोग के ग्रंथों में प्राणायाम के आठ प्रकार लिते हैं। हठयोग में प्राणायाम को ‘कुम्भक’ कहा गया है। ये आठ प्रकार के प्राणायाम या कुम्भक हैं-

  • (i) हठप्रदीपिका के अनुसार- सूर्यभेदन, उज्जायी,

सीत्कारी, शीतली, भस्त्रिका, भ्रामरी,

मूच्र्छा तथा प्लाविनी

ये आठ प्रकार के कुम्भक हैं।

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  • प्राणायाम का महत्व

  • प्राण के नियंत्रण से मन भी नियंत्रित होता है क्योंकि प्राण शरीर व मन के बीच की कड़ी है। प्राणायाम से चित्त की शुद्धि होती है और चित्त शुद्ध होने से अनेक तर्कों, जिज्ञासुओं का समाधान स्वयमेव हो जाता है। इन्द्रियों का स्वामी मन है और मन पर अंकुश प्राण का रहता है। इसलिए जितेन्द्रिय बनने वाले को प्राण की साधना करनी चाहिए। इस प्रकार प्राणायाम वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से हम प्राणों का नियमन, नियंत्रण, विस्तार एवं शोधन करते हैं। चित्त शुद्ध होता है और चित्त शुद्ध होने पर ज्ञान प्रकट होता है जो योग साधना का प्रमुख उद्देश्य है। प्राणायाम के प्राण का विस्तार एवं नियमन होता है और प्राण मानवीय जीवन में विशेष महत्व रखता है। प्प्राणायाम प्राण नियंत्रण की प्रक्रिया है। अत: प्राणायाम का योग में महत्वपूर्ण स्थान है।

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धारणा

  • देश्बांधिचित्तस्य धारणा।

चित्त की व्रत्तीमात्र (एकाग्रता) से स्थान विशेष मे बांधना धारणा है ।

प्रत्याहार द्वारा विषयो

से इंद्रियो को रोक कर मन को शरीर के विभिन्न प्रदेशों

मे लगाकर स्थित करना ही धारणा है ।

यहाँ देश का अर्थ है शरीर के बहाय्य अथवा आंतरिक स्थान मे जहां व्रत्ती को स्थिर किया जाता है

1 बहाय देश – चन्द्र ,ध्रुव, दीपक ,या गुरुकी मूर्ति

2 आंतरिक देश – नाभि चक्र, हृदय कमल, मूर्धा ज्योति, नासाग्र जीहवा अग्रभाघ

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ध्यान

  • तत्र प्रत्ययैकतनता ध्यानम । ( पा॰यो॰सू॰ विभूतिपाद 3/2 )

  • धारणा किए गए ध्येयविषेय पर ज्ञान की एकतानता ( लगातार चिंतन )ध्यान कहलाता है ।

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समाधि

  • त्देवार्थ मात्रनिभीसंस्वरूप

शून्यमिवसमाधी ।। ( पा॰यो॰ सू॰3/3 )

ध्यान करते समय जब ध्याता,ध्यानेवाम ध्येय, मे से केवल ध्येय मात्र की प्रतीति होती हो, आत्मा परमात्मा के स्वरूप मे निमगन हो जाए अर्थात स्वरूप शून्य जैसा हो जाए तो उसे समाधि कहते है ।

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