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��जवाहर नवोदय विद्यालय, खूँटी�शीर्षक:- “जहाँ पहिया है” �

विषय दृ हिन्दी

वर्ग:- अष्टम् लेखक:- पी॰ साईनाथ

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�लेखक परिचय:�

पी॰ साईनाथ का पूरा नाम पालागम्मी साईनाथ है इनका जन्म सन् 1957 में मद्रास ( चेन्नई) के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। ये एक भारतीय पत्रकार है जिन्होंने अपनी पत्रकरिता को सामाजिक समस्याओं, ग्रामीण हलातों, गरीबी और किसानों की समस्या के घातक प्रभावों पर, केन्द्रित किया है। वे स्वयं को ग्रामीण संवाददाता कहते है। वे अंग्रेजी अखबार द - हिन्दु और द - वेबसाईट इण्डिया के ग्रामीण मामलों के संपादक हैं। ये एक स्वतंत्रता सेनानी है। साईनाथ ने अपनी शिक्षा लोयला महाविद्यालय से प्राप्त की है और दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से स्नातक किया है।

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�लेखक परिचय:�

पुस्तकें: Everybody Loves a Good Drought : Stories from India’s Poorest Districts

पुरस्कार/सम्मान:

1. 2005 में हैरी छपी मीडिया अवार्डस

2. 2007 में रेमन मैगसेसे अवार्ड

3. 2009 में रामनाथ गोयनका जेर्नालिस्ट आॅफ दि इयर

4. राजा लक्ष्मी पुरस्कार से भी इन्हे सम्मानित किया गया है।

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शब्दार्थ:- �

  • नवसाक्षर - जिसने अभी जल्दी में पढ़ना सीखा हो
  • लात मारना - त्यागना
  • अजीबों गरीब - विचित्र
  • सार्वजनिक - सभी लोगों के लिए
  • कौशल - विशेष गुण
  • प्रशिक्षण - शिविर - जहाँ कुछ नया कौशल शिखाया जाता है
  • रूढ़िवादी - पुरानी बातों को अपनाए रखने वाला
  • फब्तियां कसना - उपहास करना या मजाक उड़ाना
  • तराशना - सुन्दर अकार तथा रूप देना
  • अगुआ - आगे चलने वाला
  • आवेग - उत्तेजना
  • निहीतार्थ - छिपा हुआ अर्थ

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पाठ परिचय:-

प्रस्तुत पाठ जहां पहिया है के लेखक पी॰ साईनाथ जी ने तामिलनाडु राज्य के सर्वाधिक पिछड़े जिले में गिने जाने वाले पुडुकोट्टई की महिलाओं के विषय में बताया है। वहां महिलाओं ने साइकिल चलाना सिखने को एक अंदोलन के रूप में अपनाया और समाज के रूड़िवादी बंधनों तथा पुरूष वर्ग द्वारा बोझ स्वरूप दी गई दिनचर्या से बाहर निकलकर दिखाया। लेखक ने पहिये को विकास तथा उन्नतिस्वरूप प्रस्तुत किया है। संक्षेपतः “ जहाँ चाह है वहीं राह है” कहावत को चरितार्थ करता हुआ यह पाठ हमें प्रतिपल आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देता है।

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�पाठ का सार �

तामिलनाडु के पुडुकोट्टई की महिलाओं ने साइकिल चलाने को एक समाजिक अंदोलन के रूप में माना। नवसाक्षर ग्रामीण महिलाओं ने इसके लिए विशेष पहल करते हुए आगे बढ़ने की ठानी। इस आन्दोलन को उन्होंने अपना, पिछड़ापन भगाने, विरोध व्यक्त करने तथा अपने लिए बाधा बनी रूड़ि रूपी जनजीरों को, तोड़ने के लिए किया।

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  • सबसे ज्यादा पिछड़ा यह जिला, उस समय सामने आया जब वहां की महिलाओं ने अपनी स्वधीनता, आजादी और गतिशीलता को अभिव्यक्ति के प्रतीक के रूप में चुना। यदि इन नवसाक्षरों की संख्या को देखा जाए तो लगभग यहाँ एक चैथाई महिलाओं ने साइकिल चलाना सीख लिया है। इसी में से 70 हजार महिलाओं ने प्रदर्शन एवं प्रतियोगिता जैसे स्थलों पर पूरे गर्व के साथ नई कलाओं के साथ प्रदर्शन भी किया। यहां साइकिल चलाना सिखाने के लिए बहुत सारे प्रशिक्षण शिविर भी चल रहे हैं।

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�पाठ का सार �

  • इसी जिले के रूड़िवादी पृष्टभूमि की युवा मुस्लिम लड़कियों ने साइकिल चलाना सीखा जिससे उनकी आत्मनिर्भता तो बढ़ी ही साथ ही साथ पुरूषों तथा दूसरों पर से अपनी निर्भरता का समापन किया। वहीं की जमीला बीवी का कहना है कि अब उन्हें बसों का इंतजार नहीं करना पड़ता है। आरंभ में जब जमीला बीवी नामक महिला ने सइकिल चलाना सीखा तो लोगों ने उनका मजाक उड़ाया पर उन्होंने ध्यान नहीं दिया।

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  • इसी गाँव की फातीमा नामक अन्य महिला ने जो स्कूल की अध्यापिका थीं वे प्रति दिन शाम को साइकिल चलाना सीखने के लिये, साइकिल किराये पर लिया करती थीं। वे साइकिल नहीं खरीद सकती थी और उनका मानना है कि साइकिल के कारण किसी पर निर्भर नहीं रहना पड़ता है। इसे वे अपनी अजादी मानती थी। लगभग 20 की उम्र की अवकन्नी नामक महिला ने अपने समुदाय की अनेक महिलाओं को साइकिल चलाना सीखा दिया।

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�पाठ का सार �

  • वहाँ पर साइकिल चलाना सीखने वाली और प्रशंसा करने वाली महिलाओं में मजदूर वर्ग की महिला अधिक हैं। साइकिल चलाने की बड़ाई करने वाली महिलाओं में बालवाड़ी, आँगनबाड़ी कार्यकत्र्ता, अध्यापिकायें, ग्रामसेविकायें तथा दोपहर का खाना पहुँचाने वाली महिलायें भी है। इसे ये महिलायें अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता बताती है।

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  • इस अंदोलन की एक अगुआ बताती है। कि इससे उनके अत्मविश्वास में वृद्धि हुई है और वे अपना सामान बेचने तथा कई छोटे-छोटे कार्यों के लिये दूर तक बिना खर्च के जा - आ सकती हैं। शुरू में लोगों में इन महिलाओं की आलोचना की, ताने मारे पर अंत में इसे समाजिक तौर पर स्वीकार लिया गया। महिलाओं के आवेग को देखकर लोग हैरान थे, उनमें एक नया जोश और उल्लास था क्योंकि वे एक घिसी - पिटी जिंदगी से बाहर आ रही थी।

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  • साइकिल चलाते वक्त वे प्रोत्साहन के लिए गीत भी गाती थी। जो महिलायें साइकिल चलाना सीख चुकी थी वे दुसरों को सिखाती थीं। इस कार्य के लिए प्रशिक्षण शिविर बनाए गए और उसमें महिलाओं ने अत्यंत उत्साह से कार्य किया। साइकिल सवार लगभग 1500 महिलाओं ने 1992 के अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर हलचल मचा दी थी जिसे देखकर वहाँ रहने वाले आश्चर्यचकित रह गये थे।

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�पाठ का सार �

  • उस समय के पुरूषों का यह कहना था कि महिलाओं में साइकिल चलाना सीखने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। वहाँ के एक साइकिल डीलर ने यह माना की यहाँ साइकिल की बिक्री बढ़ी है और लेडिज साइकिल की कमी होने पर महिलाओं ने पुरूष - साइकिल खरीदना शुरू कर दीया है।

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  • अन्नामलाई की 22 वर्षीय मनोरमनी ने बताया कि शहर से कटे इस इलाके में साइकिल चलाना सीखने से गतिशीलता बढ़ गई है और आर्थिक लाभ भी हुए हैं। कुछा महिलाएँ अगल - बगल के गाँवों में जाकर कृषि या अन्य उत्पाद बेंच आती हैं इससे समय की बचत होती है। इस समय में महिलायें अराम कर लेती हैं। अपने बच्चों को स्कूल पहुँचाना, लकड़़ी लाना, पानी लाना, घरेलु सामान की व्यवस्था करना इस तरह के अनेकों कार्य वे स्वयं कर लेती है।

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�पाठ का सार �

  • यहाँ की महिलाओं को आर्थिक पहलू से ज्यादा अपने अंदर आये आत्म सम्मान की भावना महत्त्वपूर्ण लगती है। फतीमह के अनुसार, अपनी मर्जी से साइकिल चलाने पर अजादी और संतुष्टि का अनुभव होता है। वे किराये की साइकिल लेकर अजादी का अनुभव करती हैं।

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  • वहीं की एक महिला का कथन है कि साइकिल चलाना उन्हे हवाई जहाज चलाने जैसा लगता है और अपूर्व खूशी मिलती है। पुरूष वर्ग इस बारे में चाहे जो सोचे, समझे, कहे और करे पर साइकिल चलाने के मामले में पुरूष वर्ग वहाँ महिलाओं की बराबरी नहीं कर सकता है। साइकिल चलाना सीखकर पुडुकोट्टई की महिलाओं ने एक आपूर्व अनुभूति प्राप्त की है जो पूर्ण रूप से उनकी लगन, अथक परिश्रम तथा क्रियाशीलता का परिचय देता है।

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� शिक्षा:-�

लक्ष्य प्राप्त करने के मार्ग में बाधाएँ आतीं ही हैं किन्तु आत्मविश्वास यदि शसक्त हो तो हम नदी की भाँती रास्ता ढुँढ लेते हैं अतः निरंतर आगे बढ़ते रहना ही हमारा कत्र्तव्य होना चाहिए।

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�बहुविकल्पीय प्रश्न:-�

1. “जहाँ पहिया है” पाठ के लेखक कौन है?

(क) प्रेमचंद (ख) पी॰ साईनाथ (ग) कामता नाथ (घ) अरविंद कुमार सिंह

2. पुडुकोट्टई किस राज्य का जिला है?

(क) केरल (ख) महाराष्ट्र (ग) तमिलनाडु (घ) आन्ध्र प्रदेश

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3. सनृ 1992 में निम्नलिखित में से किस दिवस के अवसर पर साइकिल सीखने वाली महिलाओं ने लोगों को हक्का-बक्का कर दिया था?

(क) अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस (ख) अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (ग) अंतर्राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस (घ) इनमें से कोई नहीं

4. पुडुकोट्टई की गणना भारत के सर्वाधिक कैसे जिलों में की जाती है?

(क) संपन्न (ख) अगड़े (ग) खनिज से भरपूर (घ) पिछड़े

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5. पुडुकोट्टई की नवसाक्षर महिलायें साइकिल चलाने को निम्न में से किसके बीच सीधा संबंध बताती है?

(क) व्यक्तिगत अजादी (ख) आर्थिक समृद्धि (ग) सुविधा जनक साधन (घ) इनमें से कोई नहीं

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�अति लघुउत्तरीय पश्न:-�

1. जहाँ पहीया है पाठ में किस स्थान विशेष की बात की गई है?

उ. इस पाठ में पुडुकोट्टई स्थान विशेष की बात की गई है ।

2. इस पाठ में किसकी धुम मची है?

उ. इस पाठ में साइकिल चलाने की धुम मची है ।

3. नवसाक्षर का क्या अर्थ है?

उ. नवसाक्षर का अर्थ है . जिसने अभी जल्दी में पढ़ना सीखा हो ।

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4. फतीमा प्रत्येक शाम किराये पर साइकिल क्यों लेती थी?

उ. आर्थिक कमी के कारण फतीमा प्रत्येक शाम किराये पर साइकिल लेती थी ।

5. महिलायें जेन्टस साइकिल क्यों खरीदने लगीे?

उ. बाजार में महिला साइकिल की कमी के कारण महिलायें जेन्टस साइकिल खरीदने लगी ।

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�लघु उत्तरीय प्रश्न:-�

1 शुरूआत में पुरुषों ने इस आंदोलन का विरोध किया परंतु आरण् साइकिल्स के मालिक ने इसका समर्थन किया क्यों घ्�� उ. शुरूआत में पुरुषों ने इस आंदोलन का विरोध किया क्योंकि उन्हें डर था इससे नारी समाज में जागृति आ जाएगी। आरण् साइकिल्स के मालिक गाँव के एकमात्र लेड़ीज साइकिल डीलर थे । इस आंदोलन से उसकी आय में वृद्धि होना स्वभाविक था। इसलिए उसने स्वार्थवश आंदोलन का समर्थन किया।

� अपने मन से इस पाठ का कोई दूसरा शीर्षक सुझाइए। अपने दिए हुए शीर्षक के पक्ष में तर्क दीजिए।�� उ. ष्साइकिल करेंगी.महिलाओं को आत्मनिर्भरष् भी इस पाठ के लिए उपयुक्त नाम हो सकता था चूँकि साइकिल आंदोलन से महिलाएँ अपनी स्वाधीनता व आज़ादी के प्रति जागृत हुई। कृषि उत्पादों को समीपवर्ती गाँवों में बेचकर उनकी आर्थिक स्थिति सुधरी व आत्मनिर्भर हो गई।

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3 फातिमा ने कहा३श्मैं किराए पर साइकिल लेती हूँ ताकि मैं आज़ादी और खुशहाली का अनुभव कर सकूँ।श्�साइकिल चलाने से फातिमा और पुडुकोट्टई की महिलाओं को आज़ादी का अनुभव क्यों होता होगा ।�� उ. फातिमा के गाँव में पुरानी रूढ़िवादी परम्पराएँ थीं। वहाँ औरतों का साइकिल चलाना उचित नहीं माना जाता था। इन रुढियों के बंधनों को तोड़कर स्वयं को पुरुषों की बराबरी का दर्जा देकर फातिमा और पुडुकोट्टई की महिलाओं को ष्आज़ादीष् का अनुभव होता होगा।

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�दीर्घ उत्तरीय प्रष्न:-�

�1 साइकिल आंदोलन से पुडुकोट्टई की महिलाओं के जीवन में कौन.कौन से बदलाव आए हैंघ्�� उ. साइकिल आंदोलन से पुडुकोट्टई की महिलाओं के जीवन में निम्नलिखित बदलाव आए .

महिलाएँ अपनी स्वाधीनता व आज़ादी के प्रति जागृत हुई।

कृषि उत्पादों को समीपवर्ती गाँवों में बेचकर उनकी आर्थिक स्थिति सुधरी व आत्मनिर्भर हो गई।

 समय और श्रम की बचत हुई।

स्वयं के लिए आत्मसम्मान की भावना पैदा हुई।

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2 प्रारंभ में इस आंदोलन को चलाने में कौन.कौन सी बाधा आई घ्� उ. फातिमा ने जब इस आंदोलन की शुरूआत की तो उसको बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उसे लोगों की फ़ब्तियाँ ;गंदी टिप्पणियाँ सुननी पड़ी। फातिमा मुस्लिम परिवार से थी। जो बहुत ही रूढ़िवादी थे। उन्होंने उसके उत्साह को तोड़ने का प्रयास किया। पुरुषों ने भी इसका बहुत विरोध किया। दूसरी कठिनाई यह थी कि लेड़ीज साइकिल वहाँ पर्याप्त संख्या में उपलब्ध नहीं थी।

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�बौद्धिक क्षमता के प्रष्न:-�

�1 आपके विचार से लेखक ने इस पाठ का नाम जहाँ पहिया है क्यों रखा होगा घ्

� उ. तमिलनाडु के रूढ़िवादी पुडुकोट्टई गाँव में महिलाओं का पुरुषों के विरूद्ध खड़े होकर साइकिल को अपनी जागृति के लिए चुनना बहुत बड़ा कदम था। पहिए को गतिशीलता का प्रतीक माना जाता है और इस साइकिल आंदोलन से महिलाओं का जीवन भी गतिशील हो गया। लेखक ने इस पाठ का नाम जहाँ पहिया है तमिलनाडु के पुडुकोट्टई गाँव के साइकिल आंदोलन के कारण ही रखा होगा।

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�प्रस्तुतकत्र्ताः. डॉ॰ निधि निष्चल�