श्रीः �केन्बरासंस्कृतवर्गः�१७.११.२०२१
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मया पात्रे जलं पूरितम्। तया पात्रं रिक्तम्। तेन पुस्तकं वेष्टितम्। देवदत्तेन रसं पात्रात् पातितम्। सीतया पात्रं खण्डितम्।
युधिष्ठिरस्तमासाद्य सर्पभोगेन वेष्टितम्। दयितं भ्रातरं वीरमिदं वचनमब्रवीत्॥ १॥
धातुः | क्त-रूपम् | क्तवतु - रूपम् |
पूर् पूरीँ आप्यायने स॰ चु॰ | पूरित | पूरितवान् / वती |
रिच् रिचिँर् विरेचने स॰ रुधा॰ | रिक्त | रिक्तवान् / वती |
वेष्ट् वेष्टँ वेष्टने स॰ भ॰ | वेष्टित | वेष्टितवान् / वती |
पत् पतॢँ गतौ अ॰ णिच् | पातित | पातितवान् / वती |
खण्ड् खडिँ भेदने स॰ | खण्डित | खण्डितवान् / वती |
पतॢँ गतौ (भ्वादिः परस्मैपदी अकर्मकः सेट् ज्वलादिः)
पत(ऌ)पतॢ
r. 1st. cl. (पतति)
r. 10th cl. (पतयति-ते or पातयति-ते)
1. To go, to move, but especially downwards, as, to fall, to descend, to alight.
2. To possess supreme or superhuman power.
r. 4th cl. (पत्यते) To be rich or powerful.
With अति prefixed. To excel or surpass.
With अभि or अव, To descend.
With आङ्, To arrive, to come.
With उत्, To ascend.
With नि
1. To gain or get. 2. To happen.
With निर, To abscond.
With परि,
1. To go fast.
2. To be valuable.
With प्र and नि, To fall prostrate, to salute, to worship.
With वि and निर, To turn, to turn back.
With सम्,
1. To go with.
2. To gain.
With आङ्, To purify or cleanse.
With सम् and उन्, To fly.
With सम् and नि, To go forth or out. गतौ अद० चु० उभ० सक० ऐश्ये० अक सेट् । ऐश्ये दि० आ० अक० सेट् । गतौ भ्वा० पर० सक० ऐश्ये अक० ज्वला० सेट् ।
॥श्रीरामोदन्तम् – युद्धकाण्डः ९-१० ॥
ततो वानरसङ्घांश्च भक्षयन्तं निशाचरम्।
ऐन्द्रेणास्त्रेण रामोऽपि निजघान रणे भृशम्॥६.९॥
सम् हनँ हिंसागत्योः अप् सुँ = सङ्घः समूहः। निजघान अभ्यासाच्च (७.३.५५)। भक्षँ अदने चुरादिः शतृँ अम् = भक्षयन्तम्।
ततो रावणसंदिष्टौ देवान्तकनरान्तकौ।
हनूमदङ्गदाभ्यां तु निहतौ रणमूर्धनि॥६.१०॥
दिशँ अतिसर्जने + क्त + औ = संदिष्टौ। मूर्धनि प्रमुखभागे।
देवान्तकनरान्तकौ इत्यनयोः माता गन्धर्वी पिता रावणः।
॥श्रीरामोदन्तम् – युद्धकाण्डः ११-१२॥
अथातिकायमायान्तं रथमारुह्य वाहिनीम्।
अर्दयन्तं महाकायं लक्ष्मणश्चावधीच्छरैः॥६.११॥
रुहँ बीजजन्मनि प्रादुर्भावे च ल्यप्। अर्दँ हिंसायां शतृ अम्।
हनँ हिंसागत्योः लुङ्॰ प्र॰ एक॰ = अवधीत्। वाहिनी सेना।
ततो रावणसंदिष्टः शक्रजिद्राघवौ रणे।
ब्रह्मास्त्रेण च तौ बध्वा वानरांश्चावधीच्छरैः॥६.१२॥
बन्धँ बन्धने + क्त्वा = बध्वा। अनिदितां हल उपधायाः क्ङिति (६.४.२४)। बध्नाति, बद्धः, बन्धनम्, बन्धः।
गृहकार्यम् – २७.११.२०२१
जालपत्राणि अदृष्टम् अनुवादं करोतु। शब्दकोषे शब्दार्थाः विचेतुं शक्यन्ते।
संहिता
तत्स॑वि॒तुर्वरे॑ण्यं॒ भर्गो॑ दे॒वस्य॑ धीमहि ।
धियो॒ यो नः॑ प्रचो॒दया॑त् ॥
पदपाठः
तत् । स॒वि॒तुः । वरे॑ण्यम् । भर्गः॑ । दे॒वस्य॑ । धी॒म॒हि॒ ।
धियः॑ । यः । नः॒ । प्र॒ऽचो॒दया॑त् ॥
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नामप्रकरणम् - ३
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नामप्रकरणम् - ४
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सार्वधातुकम् - आर्द्धधातुकम्
तिङः – तिप्तस्झिसिप्थस्थमिब्वस्मस् तातांझथासाथांध्वमिड्वहिमहिङ् (३.४.७८)
तिप् तस् झि सिप् थस् थ मिप् वस् मस् त आताम् झ थास् आथाम् ध्वम् इट् वहि महिङ्
शित् – शप्, श्यन्, शतृ, शानच् इत्यादयः।
णिच्, उ, क्त, क्तवतु, इत्यादयः।
लिट्-लकारस्य तिङ्-प्रत्ययाः साक्षात् आर्द्धधातुकाः।
आहीर्लिङ्-लकारस्य तिङ्-प्रत्ययाः साक्षात् आर्द्धधातुकाः।
Sowmya Krishnapur for Vyoma-samskrta-pathashala, ©2014
इडागमः
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अङ्गकार्यम् - गुणः
Sowmya Krishnapur for Vyoma-samskrta-pathashala, ©2014
अङ्गकार्यम् - गुणः
Sowmya Krishnapur for Vyoma-samskrta-pathashala, ©2014
गुणवृद्ध्योः निषेधः
Sowmya Krishnapur for Vyoma-samskrta-pathashala, ©2014
डुकृञ् करणे तनादिः उभयपदी सकर्मकः अनिट् (to do)
| एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | उ तिप् | उ तस् | उ झि |
म॰ | उ सिप् | उ थस् | उ थ |
उ॰ | उ मिप् | उ वस् | उ मस् |
लृट् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | करिष्यति | करिष्यतः | करिष्यन्ति |
म॰ | करिष्यसि | करिष्यथः | करिष्यथ |
उ॰ | करिष्यामि | करिष्यावः | करिष्यामः |
लोट् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | करोतु | कुरुताम् | कुर्वन्तु |
म॰ | कुरु | कुरुतम् | कुरुत |
उ॰ | कर्वाणि | करवाव | करवाम |
लङ् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | अकरोत् | अकुरुताम् | अकुर्वन् |
म॰ | अकरोः | अकुरुतम् | अकुरुत |
उ॰ | अकरवम् | अकुर्व | अकुर्म |
लिङ् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | कुर्यात् | कुर्याताम् | कुर्युः |
म॰ | कुर्याः | कुर्यातम् | कुर्यात |
उ॰ | कुर्याम् | कुर्याव | कुर्याम |
लट् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | करोति | कुरुतः | कुर्वन्ति |
म॰ | करोषि | कुरुथः | कुरुथ |
उ॰ | करोमि | कुर्वः | कुर्मः |
डुलभँष् प्राप्तौ भ्वादिः आत्मनेपदी सकर्मकः अनिट् (to get)
| एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | शप् त | शप् आताम् | शप् झ |
म॰ | शप् थास् | शप् आथाम् | शप् ध्वम् |
उ॰ | शप् इट् | शप् वहि | शप् महिङ् |
लृट् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | लप्स्यते | लप्स्येते | लप्स्यन्ते |
म॰ | लप्स्यसे | लप्स्येथे | लप्स्यध्वे |
उ॰ | लप्स्ये | लप्स्यावहे | लप्स्यामहे |
लोट् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | लभताम् | लभेताम् | लभन्ताम् |
म॰ | लभस्व | लभेथाम् | लभध्वम् |
उ॰ | लभै | लभावहै | लभामहै |
लङ् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | अलभत | अलभेताम् | अलभन्त |
म॰ | अलभथाः | अलभेथाम् | अलभध्वम् |
उ॰ | अलभे | अलभावहि | अलभामहि |
लिङ् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | लभेत | लभेयाताम् | लभेरन् |
म॰ | लभेथाः | लभेयाथाम् | लभेध्वम् |
उ॰ | लभेय | लभेवहि | लभेमहि |
लट् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | लभते | लभेते | लभन्ते |
म॰ | लभसे | लभेथे | लभध्वे |
उ॰ | लभे | लभावहे | लभामहे |
शकॢँ शक्तौ स्वादिः परस्मैपदी अकर्मकः अनिट् (to be able)
| एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | श्नु तिप् | श्नु तस् | श्नु झि |
म॰ | श्नु सिप् | श्नु थस् | श्नु थ |
उ॰ | श्नु मिप् | श्नु वस् | श्नु मस् |
लृट् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | शक्ष्यति | शक्ष्यतः | शक्ष्यन्ति |
म॰ | शक्ष्यसि | शक्ष्यथः | शक्ष्यथ |
उ॰ | शक्ष्यामि | शक्ष्यावः | शक्ष्यामः |
लोट् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | शक्नोतु | शक्नुताम् | शक्नुवन्तु |
म॰ | शक्नुहि | शक्नुतम् | शक्नुत |
उ॰ | शक्नवानि | शक्नवाव | शक्नवाम |
लङ् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | अशक्नोत् | अशक्नुताम् | अशक्नुवन् |
म॰ | अशक्नोः | अशक्नुतम् | अशक्नुत |
उ॰ | अशक्नवम् | अशक्नुव | अशक्नुम |
लिङ् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | शक्यात् | शक्यास्ताम् | शक्यासुः |
म॰ | शक्याः | शक्यास्तम् | शक्यास्त |
उ॰ | शक्यासम् | शक्यास्व | शक्यास्म |
लट् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | शक्नोति | शक्नुतः | शक्नुवन्ति |
म॰ | शक्नोषि | शक्नुथः | शक्नुथ |
उ॰ | शक्नोमि | शक्नुवः | शक्नुमः |
कृदन्तप्रत्ययाः – डुदाञ् दाने जुहोत्यादिः उभयपदी सकर्मकः अनिट्
१. ण्वुल् (वु → अक) – दायकः
२. तृच् (तृन्) (तृ) – दाता
३. शतृँ/शानच् (अत्/आन) – ददत् ददानः
४. स्य + शतृँ/शानच् (अत्/आन) – दास्यन्
५क. णिच् (इ) + शतृँ (अत्) – दापयन्
५ख. णिच् (इ) + शानच् (आन) – दापयमानः
६. यक् (य) + शानच् (आन) – दीयमानः
७. क्त (त) – दत्तः
८. क्तवतुँ (तवत्) – दत्तवान् दत्तवती
९. तव्यत् (तव्य) – दातव्यम्
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१०. अनीयर् (अनीय) – दानीयम्
११. ण्यत्/यत् (य) – देयम्
१२. घञ्/अच् (अ) – दायः
१३. क्तिन् (ति) – दत्ति
१४. सन् (स) + अ – दित्सा
१५. ल्युट् (यु → अन) (भावे) – दानम्
१६. तुमुँन् (तुम्) – दातुम्
१७. क्त्वा (त्वा) – दत्त्वा
१८. ल्यप् (य) – प्रदाय
१९. णमुँल् (अम्) – दायम् दायम्
नदी – ईकारान्त स्त्रीलिङ्गः (River)
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतम् च यत्। असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह॥गीता १७.२८॥
| एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
प्रथमा | नदी | नद्यौ | नद्यः |
द्वितीया | नदीम् | नद्यौ | नदीः |
तृतीया | नद्या | नदीभ्याम् | नदीभिः |
चतुर्थी | नद्यै | नदीभ्याम् | नदीभ्यः |
पञ्चमी | नद्याः | नदीभ्याम् | नदीभ्यः |
षष्ठी | नद्याः | नद्योः | नदीनाम् |
सप्तमी | नद्याम् | नद्योः | नदीषु |
सम्बोधनम् | हे नदि | हे नद्यौ | हे नद्यः |
मित्रलाभः – प्रथमा कथा – २१
अतस्त्वं मां मैत्र्येणानुग्रहीतुम् अर्हसि । एतच्छ्रुत्वा हिरण्यकोऽपि विवराभ्यन्तराद् आह – कस्त्वम्। स ब्रूते – लघुपतनकनामा वायसोऽहम्। हिरण्यको विहस्याह का त्वया सह मैत्री।
यतः –
यद् येन युज्यते लोके बुधस्तत् तेन योजयेत्।
अहम् अन्नं भवान् भोक्ता कथं प्रीतिर्भविष्यति॥५४॥
अपरं च –
भक्ष्यभक्षकयोः प्रीतिर्विपत्तेः कारणं मतम्।
शृगालात् पाशबद्धोऽसौ मृगः काकेन रक्षितः॥५५॥
वायसोऽब्रवीत्कथम् एतत्। हिरण्यकः कथयति –
मित्रलाभः – द्वितीया कथा – १
अस्ति मगधदेशे चम्पकवती नाम अरण्यानी । तस्यां चिरात् महता स्नेहेन मृगकाकौ निवसतः। स च मृगः स्वेच्छया भ्राम्यन् हृष्टपुष्टाङ्गः केनचित् शृगालेनावलोकितः। तं दृष्ट्वा शृगालोऽचिन्तयत् – कथम् एतन्मांसं सुललितं भक्षयामि। भवतु। विश्वासं तावद् उत्पादयामि। इति आलोच्य उपसृत्याब्रवीत् – मित्रं ! कुशलं ते। मृगेणोक्तम् – कस्त्वम्। स ब्रूते क्षुद्रबुद्धिनामा जम्बुकोऽहम्। अत्रारण्ये बन्धुहीनो मृतवत् एकाकी निवसामि। इदानीं त्वां मित्रम् आसाद्य पुनः सबन्धुर्जीवलोकं प्रविष्टोऽस्मि। अधुना तवानुचरेण मया सर्वथा भवितव्यम् इति । मृगेणोक्तम् - एवम् अस्तु।
मित्रलाभः – द्वितीया कथा – २
ततः पश्चाद् अस्तं गते सवितरि भगवति मरीचिमालिनि तौ मृगस्य वासभूमिं गतौ। तत्र चम्पकवृक्षशाखायां सुबुद्धिनामा काको मृगस्य चिरमित्रं निवसति। तौ दृष्ट्वा काकोऽवदत् – सखे चित्राङ्ग ! कोऽयं द्वितीयः। मृगो ब्रूते – जम्बुकोऽयम्। अस्मत्सख्यमिच्छन्नागतः। काको ब्रूते - मित्र ! अकस्माद् आगन्तुना सह मैत्री न युक्ता। तन्न भद्रम् आचरितम्। तथा चोक्तम् –
अज्ञातकुलशीलस्य वासो देयो न कस्यचित् ।
मार्जारस्य हि दोषेण हतो गृध्रो जरद्गवः॥५६॥
तौ आहतुः – कथम् एतत्। काकः कथयति –
गृहकार्यम् – १८.११.२०२१
जालपत्राणि अदृष्टम् अनुवादं करोतु। शब्दकोषे शब्दार्थाः विचेतुं शक्यन्ते।
संहिता
अ॒ग्निमी॑ळे पु॒रोहि॑तं य॒ज्ञस्य॑ दे॒वमृ॒त्विज॑म्।
होता॑रं रत्न॒धात॑मम्॥
पदपाठः
अ॒ग्निम्। ई॒ळे॒। पु॒रःऽहि॑तम्। य॒ज्ञस्य॑। दे॒वम्। ऋ॒त्विज॑म्। होता॑रम् । र॒त्न॒ऽधात॑मम् ॥
अग्निनामकं देवमीळे। स्तौमि। ईड स्तुतौ।
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