व्युत्पत्ति-
सरणात् सिरा। च•सू•30/12
जिनमें सरणा होता हैं उन्हें सिरा कहा जाता है।
मूलस्थान (प्रभाव स्थान)-
यावत्यस्तु सिराः काये सम्भवन्ति शरीरिणाम्।
नाभ्यां सर्वा निबद्धास्ताः प्रतन्वन्ति समन्ततः ।॥च..30/12शु शा.7/4
शरीर में जितनी सिराये हैं वे सब नाभि में ही लगी हुई हैं। उसी जगह से सर्वत्र फैलती हैं।
(यह वर्णन गर्भावस्था का है)।
नाभिस्थाः प्राणिनां प्राणाः प्राणान्नाभिर्युपाश्रिता।
सिराभिरावृता नाभिश्चक्रनाभिरिवारकैः ।। सु.शा.7/5
नाभि में प्राणियों के प्राण रहते हैं और प्राणों से नाभि आश्रित है। सिराओं से नाभि घिरी है जैसे पहिये की (चक्र की) अरों द्वारा घिरी रहती है।
दशमूलसिराहृतस्थास्ताः। अ.ह.शा.3/18
वाग्भट के अनुसार सिराओ का मूल हृदय हैं।
संख्या- 700सिराये
मूल सिरा- 40
वात वह -10
पित्त वह -10
कफ वह -10
रक्त वह -10
षडंगानुसार विभाजन – 700
शाखागत = 400
मध्य = 136
जत्रु के ऊपर = 164
यहाँ पर जत्रु के ऊपर की सिराओं की जो कुल संख्या बतलाई है, उससे पृथक् पृथक् अंगों की संख्या का कुल योग अधिक आता है। अष्टांगसंग्रह में दोनों का योग मिलता है। इसलिए नीचे दोनों का तुलनात्मक कोष्ठक दिया गया है-
जत्रुर्ध्व सिरासंख्या का कोष्ठक
प्रत्यंग नाम सुश्रुत अष्टांगसंग्रह
ग्रीवा 56 24
हनु 16 16
जिह्वा 16 16
नासा 24 24
नेत्र 38 56
कर्ण 10 16
सिर 12 12
जत्रू कुल संख्या 192 164
प्रकार-
2. नीला
3. गौरी
4. रोहिणी-
1. अरुणा - तत्रारुणा वातवहाः पूर्यन्ते वायुना सिराः। सु.शा7/19
तत्रारुणा वातवहाः पूर्यन्ते वायुना सिराः। सु.शा.7/19
बातवह सिरायें कुछ रक्तवर्ण की और वायु से भरी होती हैं। वात प्रधान स्थानों में पोषक रस पहुंचाती है।
2. नीला-
पित्तादुष्णाश्च नीलाश्च। सु•शा•7/19
पित्त से पित्तवह सिरा उष्ण और नील वर्ण की होती हैं। ये पित्तप्रधान स्थानों में पोषक रस पहुंचाती हैं उससे पित्त की पुष्टि होती है।
3. गौरी-
शीता गौर्यः स्थिराः कफात्। सु.शा.7/19
कफवह सिरायें गौरवर्ण, शीतल और स्थिर होती हैं। ये कफप्रधान स्थानों में रसू पहुंचाती हैं। जिससे कफ की पुष्टि होती है।
4. रोहिणी-
असृग्वहास्तु रोहिण्यः सिरा नात्युष्णशीतलाः। सु.शा.7/19
रक्तवह सिराएं रक्तवर्ण, न बहुत शीतल और न उष्ण होती हैं। ये रक्तप्रधान स्थानों में-यकृत् और प्लीहा में पोषक रस पहुंचाती है जिससे रक्त की पुष्टि होती है।
सिराओं के प्राकृतिक और वैकृतिक कार्य
सिराओं के प्राकृतिक और वैकृतिक कार्य
वातवहा सिराओं के प्राकृतिक कार्य
"क्रियाणामप्रतीघातममोहं बुद्धिकर्मणाम्।“ सु०शा० 7/7
जब शुद्ध वायु अपनी सिराओं में संचारित होती है तब सभी क्रियायें बिना बाधा के होती है।
कुपित वातवहा सिराओं के कर्म
यदा तु कुपितो वायुः स्वाः सिराः प्रतिपद्यते। सु•शा•7/8
जब कुपित हुआ वात अपनी सिराओं में संचार करता है तब शरीर में अनेक प्रकार के वातजन्य रोग पैदा होते हैं। जैसे जोड़ों में बेदना, पेटे में अफारा आदि। इन्ही विकृत सिराओं के द्वारा ही कई बार गर्भ, गर्भाशय में ही मर जाता है।
प्राकृत पित्तवहा सिराओं के कर्म
भ्राजिष्णुतामन्नरुचिमग्निदीप्तिमरोगताम्। सु•शा•7/9
प्राक्तिक्क पित्त के अपनी सिराओं में संचार करने में निम्नलिखित कार्य होते हैं।
1 शरीर में कान्ति उत्पन्न करना। 2. अन्न मे रुचिउत्पन्न करना।
3. जठराग्नि की प्रखरता करना। 4. निरोगता को उत्पन्न करना।
5. पाचन क्रिया को समान रखना।
विकृत पित्तवहा सिराओं के कर्म
यदा तु कुपितं पित्तं सेवते स्ववहा सिराः।
तदाऽस्य विविधा रोगा जायन्ते पित्तसंभवाः॥ सु•शा•7/12
जब कुपित हुआ पित्त अपनी सिराओं का आश्रय लेता है तब शरीर की अन्नपावर संस्थान सम्बन्धित क्रियाएं विकृत हो जाती है। साथ ही अनेक प्रकार के अ पित्तजन्य रोग भी उत्पन्न हो जाते हैं। जैसे अम्लपित्त, कैण्डू, त्वचा का फटना आदि ।
प्राकृत कफवहा सिराओं के कार्य
स्नेहमङ्गेषु सन्धीनां स्थैर्य बलमुवीर्णताम्। सु•शा•7/11
1. शरीर के प्रत्येक अंग में चिकनाई उत्पन्न करता है।
2. सन्धियों मे रहता हुआ उनको स्थिर रखता है व घर्षण से बचाता है।
3. शक्ति प्रदान करता है।
4. उत्साह उत्पन्न करता है।
विकृत कफवहा सिराओं के कार्य
यदा तु कुपितः श्लेष्मा स्वाः सिराः प्रतिपद्यते।
तदाऽस्य विविधा रोगा जायन्ते श्लेष्मसम्भवाः ॥ सु.शा.7/12
जब कुपित हुआ कफ अपनी सिराओं में संचार करता है तब शरीर में अनेक प्रकार के कफजन्य विकार उत्पन्न हो जाते है। जैसे निद्रा का अधिक आना, अरुचि, भारीपैन एवं उपर्युक्त सभी क्रियाओं में बाधाएं आ जाती हैं।
प्राकृतिक रक्तवहा सिराओं के कार्य
धातूनां पूरणं वर्णं स्पर्शज्ञानमसंशयम्। सु•शा•7/15
1• धातुओं का पोषण करता है। 2. शरीर की वृद्धि करता है।
3. वर्ण को दर्शाता है। 4. स्पर्श ज्ञान को उत्पन्न करता है।
5. शक्ति प्रदान करता है।
विकृत रक्तवहा सिराओं के कार्य
यदा तु कुपितं रक्तं सेवते स्ववहाः सिराः।
तदाऽस्य विविधा रोगा जायन्ते रक्तसम्भवाः॥ सु.शा.7/14
विकृत हुआ रक्त जब अपनी सिराओं में संचार करता है तब शरीर की सभी क्रियाओं में बाधायें आ जाती हैं। अनेक प्रकार के रक्तजन्य रोग पैदा हो जाते हैं। जैसे रक्त-पित्त, फोड़े, रक्तचाप का बढ़ जाना आदि।
न हि वातं सिराः काश्चिन्न पित्तं केवलं तथा।
श्लेष्माणं वा बहन्त्येता अतः सर्ववहाः स्मृताः ।।
प्रदुष्टानां हि दोषाणां मूर्च्छितानां प्रधावताम्।
ध्रुवमुन्मार्गगमनमतः सर्ववहाः स्मृताः। सु०शा०17/18
सिराओं का सर्ववहत्व
कोई भी सिरा केवल बात, पित्त अथवा कफ का संवहन नहीं करती, किन्तु तीनों दोषों का वहन करती हैं। अतः वे सर्ववहा कही जाती हैं। दूषित हो कर दौड़ने वाले दोष अपने स्थान या मार्ग को छोड़कर गलत मार्ग में जरूर जाते हैं। अतः सिरायें सब दोषों को वहन करने वाली होती हैं और सर्ववहा कहलाती हैं।
|| अवेध्य सिराये ||
वैकल्यं मरणं चापि व्यधात्तासां ध्रुवं भवेत्॥ सु•शा•7/20
अवेध्य सिराओं का वेध होने पर विकलता अथवा मरण निश्चय ही होता हैं इसलिए इसका ज्ञान होना आवश्यक होता हैं।
अवेध्य सिराओ का परिगणन –
शाखासु षोडश सिराः कोष्ठे द्वात्रिंशदेव तु।
पञ्चाशज्जत्रुणश्चोर्ध्वमव्यध्याः परिकीर्तिताः ॥सु.शा.7/22
शाखा = 16
मध्य = 32
उर्ध्व = 50
कुल = 98
शाखागत अवेध्य सिराये -16
शाखासु षोडश सिराः कोष्ठे द्वात्रिंशदेव तु। पञ्चाशज्जत्रुणश्चोर्ध्वमव्यध्याः परिकीर्तिताः ॥
उर्वी -2×4
जालधरा-1×4
लोहिताक्ष-1×4
डनीला-4
कोष्ठगत अवेध्य सिराये
श्रोणी - 8 (कटीकतरुण-4, विटप-4)
पाश्च - 4 (पार्च-2, पार्श्व सन्धि-2)
पृष्ठ -2 (वृहत्ती - 2)
उदर - 4 (रोमराजी 4)
वक्ष -14 (हृदय-2, स्तनमूल-4, स्तनरोहित- 4,
अपलाप-2, अपस्तम्भ-2)
उर्ध्वगत अवेध्य सिराये – 50
शंख -2 (शंख सन्धि-2)
मुर्धा-8 (उत्क्षेप-2, सीमन्त-5, अधिपति-1)
नेत्र-1 (अपांग-1)
नासिका - 5 (नासिका-4, तालु-1)
नासानेत्र गतास्तु ललाटे-7 (केशान्त-4, आवर्त-2, स्थपनी-1)
कर्ण -2 (शब्द-2)
जिल्ह्वा- 4 (रसवह-2, वागवह-2)
हनु-4
ग्रीवा-16(मर्म-12 डनीला-4, मान्या-4, मातृका-4.कृकाटिका-2, विधुर-2)
सिरा वेध प्रमाण-
मांसल = 1 यव
अस्थि =अन्य = 1/2 यव-कुठारिका से
अन्य=1/2 यव /ब्रीहि मात्र - ब्रिहिमुखेन से
तत्र उपवेश्यासने व्यध्यसिरं पुरुषं •••••••••••••••••••सिराणां व्यधने यन्त्रणविधिः।
सु.शा.8/8
जिस पुरुष का सिरावेधन करना हो उसका सूर्य की ओर मुख रहे, फिर अरत्निमात्र ऊँची चौकी पर बैठे, सक्थियाँ (पैर) सिकुड़ी हुई हों, दोनों संधियों पर केहुनियों को रखे, अंगूठों को मुड्डियों पर दबावे और उन मुट्ठियों को मन्याओं के ऊपर रखे, फिर गर्दन और मुट्ठियों पर यन्त्रण - शाटक डाले, पीछे की ओर कोई दूसरा व्यक्ति खड़ा हो और वह अपना बायां हाथ उठाकर शाटक के दोनों सिरों को पकड़ा कर, (वैद्य) पुरुष से कहे कि 'दाहिने हाथ से सिराओं का उत्थान होने के लिये, न बहुत जोर से और न बहुत धीमे, यन्त्र का आवेष्टन करो, रक्त का निर्हरण होने के लिये यन्त्र को पृष्ठमध्य में दबाओ' और जिसका सिरावेघ करना हो उसको मुख में हवा भर कर बैठाये।
सिरा वेध वर्णन-
सिरा वेध काल –
आयुर्वेदीय रचना शारीरव्यभ्रे वर्षासु विध्येत्तु ग्रीष्मकाले तु शीतले।
हेमन्तकाले मध्याहे शस्त्रकालास्त्रयः स्मृताः ।। सु.शा.8/10
वर्षा ऋतु में व्यत्र (बादल जब न हों ऐसे) काल में, ग्रीष्मत्रऋतु में, ठण्डे समय में, हेमन्तऋतु में मध्याह्न में शस्त्रकर्म करना चाहिये।
सिरावेध कब न करे –
नैवातिशीते नात्युष्णे न प्रवाते न चाधिते ।
सिराणां व्यधनं कार्यमरोगे वा कदाचन ।। सु.शा.8/7
कड़े शीतकाल में, अधिक गरमी में, जोर की बहती हुई हवा में, आकाश के मेघाच्छन्त्र रहते तथा जब कोई रोग न हो, सिरावेध न करना चाहिये।
सुविध्य के लक्षण -
सम्यक्शस्त्रनिपातेन धारया या स्त्रवेदसृक्।
मुहूर्त रुद्धा तिष्ठेच्च सुविद्धां तां विनिर्दिशेत्॥ सु.शा.8/11
अच्छे प्रकार शस्त्र चलने से धारा के साथ कुछ काल खून बहे, बाद रुक जावे तो सुविद्ध समझना चाहिये।
अशुद्ध रक्त प्रथम आने में दृष्टान्त –
यथा कुसुम्भपुष्पेभ्यः पूर्व स्त्रवति पीतिका।
तथा सिरासु विद्धासु दुष्टमग्रे प्रवर्तते ॥ सु.शा.8/12
जिस प्रकार कुसुम्भ के फूलों से प्रथम पीला-सा रंग निकलता है, उसी प्रकार सिराओं का वेध करने से दुष्ट रक्त पहले बाहर आता है।
सिराओं के न बहने के कारण –
मूर्च्छितस्यातिभीतस्य श्रान्तस्य तृषितस्य च।
न वहन्ति सिरा विद्धास्तथाऽनुत्थितयन्त्रिताः ।।मु.शा.8/13
मूच्छित (बेहोश), अतिभीत (खूब डरे हुए), श्रान्त (थके हुए), तृषित (प्यासे), उसी प्रकार अनुत्थित (न उठे हुए) और अयन्त्रित (न बाँधे हुए) की दशाओं में सिराओं का वेधन करने पर रक्त भले प्रकार नहीं बहता।
रक्त-निर्हरण का प्रमाण –
बलिनो बहुदोषस्य वयः स्थस्य शरीरिणः।
परं प्रमाणमिच्छन्ति प्रस्थं शोणितमोक्षणे ॥सु.शा.8/16
बलिष्ठ, विपुल दोष वाले और तरुण व्यक्ति का रक्त अधिक से अधिक एक प्रस्थ निकलना चाहिये।
सिरावेध का महत्व –
स्नेहादिभिः क्रियायोगैर्न तथा लेपनैरपि।
यान्त्याशु व्याधयः शान्तिं यथा सम्यक् सिराव्यधात्।।
सिराव्यधश्चिकित्सार्थ शल्यतन्त्रे प्रकीर्तितः।
यथा प्रणिहितः सम्यग्बस्तिः कायचिकित्सिते ॥सुशा8/22-23
सिरावेध अच्छे प्रकार करने पर जैसे व्याधियाँ शान्त होती हैं, वैसे स्नेहन-स्वेदनों से अथवा लेपों से शान्त नहीं होतीं। कायचिकित्सा में जैसे अच्छे प्रकार दिया हुआ बस्ति का महत्व है वैसे ही शल्यतन्त्र (शस्वकर्म) में सिरावेध चिकित्साऽर्थ है।
ISO 9001:2015 Certified Journal
60
Vol 9, Issue 1, 2023.
Kumawat et al. World Journal of Pharmaceutical and Medical
Research
A COMPREHENSIVE STUDY OF SIRA SHARIR W.S.R. to URDA ADHO SHAKHAGAT AVEDHYA SIRA BASED ON CADAVERIC DISSECTION
Mahesh Kumawat1*, Himanshu Chaturvedi2, Jannu Manohar3 and Sakshi4
M.D. Scholar1, M.D. Scholar2, Professor3, Assistant Professor4
P.G. Dept.of Rachana Shareer, Sri Ganganagar College of Ayurvedic Science and Hospital Sri Ganganagar Rajasthan (335001).
Article Received on 10/11/2022 Article Revised on 30/11/2022 Article Accepted on 20/12/2022
INTRODUCTION
"ग्रंथादौग्रन्थमध्येग्रंथान्तेचमंगऱाचरणीयममततमिष्टचार:”
हहताहहतंसुखंदु्खमायुस्तस्यहहताहहतम।् मानंचतच्चयत्रोक्तमायुर्वेद; सउच्यते॥ (च.सू.1/41)”
The word Ayurveda in Sanskrit is made up of two words AYUH+VEDA which means the science of life or mother of healing.
Ayurveda is holistic and one of the oldest branches of medicine that imparts complete knowledge about one's health. In this science various methods are described to treat diseases.
SushrutSamhita” is of great historical importance because it includes historically unique chapters describing surgical instruments, training and procedures which are still followed by modern science of surgery.
``तत्रमसराितमेकस्स्मन्सस्क्थन:भर्वतततासांजाऱधरात्र्वेका,;
ततस्त्रश्चाभ्यंतरा:-
तत्रोर्र्विसंऻेद्र्वेऱोहहताऺसंऻाचैकाएतास्त्र्वव्याध्या:, एतेनेतरसस्क्थबाहुचव्याख्यातौ;
एर्वमिस्त्रकृ त्या:षोड्ििाखासु॥ (सु.िा. 7/23)”
It was the first time in human history to suggest that a student of surgery should learn about human body and its organs by dissecting dead body. In ``SushrutSamhita” total of 700 Siras are described. Out of these 40 Siras are marked out as Moolsira, which are- Vatavaha, Pittavaha, Kaphavaha and Raktavaha.
Total 98 Siras are mentioned as AVEDHYA SIRA by
``AcharyaSushrut” in ``Sira Varna Vibhakti Sharir Adhyaya.” These AVEDHYA SIRAS are categorized
Each Shakha has 4 ``AvedhyaSiras.” So that total 8 Siras will be counted in URDAAdhoshakha. These are JaldharaSira (1) and on the medial side, Urvi two in number and Lohitaksha one in number.
The Anatomical structure considered with particular Avedhyasira Number of four in the extremities 5-4 in each total 16.
1- ``Jaldhara”- one in number in each extremities in The upper limb we can consider cephalic vein in lower limb it can be considered as great Saphenus vein these both veins drained blood from dorsal venus arch.
wjpmr, 2023, 9(1), 60-61
SJIF Impact Factor: 5.922
Review Article ISSN 2455-3301 WJPMR
WORLD JOURNAL OF PHARMACEUTICAL AND MEDICAL RESEARCH
*Corresponding Author: Dr. Mahesh Kumawat
M.D. Scholar P.G. Dept.of Rachana shareer, Sri Ganganagar College of Ayurvedic Science and Hospital Sri Ganganagar Rajasthan (335001).
ABSTRACT
The science of healthy living known as Ayurveda contains concise descriptions of the human bodys anatomical stuctures. one of ayurveda s three great treatises.the Sushruta Samhita primarily represents the school of surgery in the order given our Acharya described the Sira in classical Literature. for example Acharya Sushruta described the sira in Sharir Sthana Chapter 7, where Sushruta classified the details such as conflict between the Sira dhamani and Srotas. Aruna, Neela , Lohita and Sweta are the four forms of Sira that Susruta mentions these are pertinent to the doshas Vatta,Pitta,Kapha and Rakta respectively. in all our bodies contain 700 Sira. these Sira are mostly of the vedhya and avedhya varieties.there are 602 vedhya Sira or Sira that can be punctured to treat aliments Avedhya Sira are 98 in number and are categorically forbidden to be punctured .out of a total of 700 Sira there are 40 moola Sira which are further divided into four regions these are Vatvaha, pittavaha, kaphavaha and Raktavaha which are each 10,10,10, and 10 correspondingly.
KEYWORDS: Sira, Vedhya sira, Avedhya sira, Siravedhan.
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ISO 9001:2015 Certified Journal
61
Vol 9, Issue 1, 2023.
Kumawat et al. World Journal of Pharmaceutical and Medical Research
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According to ``ShadangSharir.” In which Acharya
marked out 16 Siras in Shakha(Limbs).
In the literature written by father of surgery
``AcharyaSushrut“has described the treatment of diseases as "SHASTRA PRADHAN" (weapon oriented) where the description of “SIRAVEDHAN" is mainly mentioned. According to ``Siravedhan Karma” one should not pierce these ``AvedhyaSira” in any condition because penetration of these veins can lead to harmful effect to that person. There are 16 ``AvedhyaSira” in limbs.
In the same context of ``AvedhyaSira, AcharyaVagbhat”
also described: -
LFkwyewyk: lqlw{ekuk: i=js[kkizrkuor~AA fHk4Ursrkjrr: lIr 'krkU;klkaHkoafrrqAA ¼v-â-3@19½ r=SdSda p 'kk[kk;ka 'krarfLeUuos/k;sr~AA
fljkatkyU/kjkuke: frL=JPkkH;arjkfJr:AA ¼v-â-3@20½
Need of study
In present times there are many diseases which are treated surgically mainly. For any surgery, it is necessary to know the anatomical structures present at that particular region. Regarding this, our ``Acharya”has mentioned ``Avedhyasira” which should not be punctured during any procedure or surgery.
So, it is very important to study these veins described by
``Acharya” in the modem context so that they can be protected at the time of surgical work in modern era. That's why this topic is selected for study.
AIMS AND OBJECTIVES
MATERIALS AND METHODS
``AvedhyaSira” will be done
Cadeveric study
``URDAAdhoshakhagatSira” will be done by doing dissection of cadaver.
found in cadaveric dissection of
``URDAAdhoshakhagatAvedhyaSira.”
``URDAAdhoshakhagatSira” Will Be Done In P.G. Department Of Rachana Sharir Sri Ganganagar College Of Ayurveda Science & Hospital Sri Ganganagar.
P.G. Department Of RachanaSharir For Studying
The Specific reason Of
``URDAAdhoshakhagatSira”.
CONCLUSION
Siravedhan is a method of treatment which is frequently used in Ayurveda. the diseases which are cured by
siravedhan con not recur thats why it is a useful by methods of treatment .Avedhya sira are the anatomical
stractures which are either deep vessels or the vessels which can lead to harmful effects by puncturing them. so
there are the perfect guidelines for physician to avoid vedhan of these avedhya sira.
RFERENCES