JEEVAK AYURVEDIC MEDICAL COLLEGE� AND RESEARCH CENTRE�
Kamlapur, Akauni,
Chandauli, UP
Topic:- Mamsavaha Srotas
Guided By:-
Associate Professor-
Dr. Amit Kumar Singh (H.O.D)
Assistant Professor-
Dr. Varsha Gupta
Presented By:-
Ehtesham Ahmad Ansari
Roll No. 27
B.A.M.S 1ST Prof.
Batch:-2023-24
Department of Rachana Sharira
INDEX
स्रोतस् शारीर:- मांसवह स्रोतस
स्त्रोतस् शारीर��व्याख्या - "स्रवणात् स्रोतांसि
क्योंकि रक्त असंख्य छोटे-छोटे छिद्रों में बँटा हुआ होता है, न कि एक नदी की तरह बहता है, जैसे कि सिराओं के अन्दर बहता है।
स्रोत शब्द की व्युत्पत्ति
स्रोतांसि खलु परिणाममापद्यमानानां धातूनामभिवाहीनीभवन्त्ययनार्थन |
(चरक वि. 5/3)
जिसमें स्रवण क्रिया होती है उन्हें स्रोत कहते हैं। स्रोत परिणाम प्राप्त धातुओं को अन्यत्र ले जाने के लिए वहन करने वाले होते हैं। इनकी व्याख्या में अनेक विद्वानों के मत इस प्रकार हैं-
स्वरूप
स्वधातुसमवर्णानि वृत्तस्थूलान्यणूनि च ।
स्रोतांसि दीर्घाण्याकृत्या प्रतानसदृशानि च ।। च.वि. 5/24
मूलात् खादान्तरदेहे प्रसृतं त्वभिवाहि यत् । स्रोतस्तदिति विज्ञेयं सिराधमनीविवर्जितम् || सु०शा० 9/25
मूल छिद्र में शरीर में फैले हुए रसादि का जो वहन करता है और सिरा धमनी से जो पृथक् है उन अवकाशयुक्त सुषिर भागों को स्रोतस् मानना चाहिए।अर्थात् शरीर में जो बड़ी-बड़ी सिराएं और धमनियां होती हैं उनसे पृथक् अन्य जो अवकाशयुक्त भाग (नालियां) होते हैं तथा जो अन्तः सुषिर अंग से सम्बन्ध रखकर उसमें रसादि तरल पदार्थ का वहन करते हैं वे स्रोतस् कहे जाते हैं।
स्रोतस् की उत्पत्ति एवं भौतिक संगठन-
स्रोतस् की उत्पत्ति में आकाश महाभूत प्रमुख है।
पर्याय
"स्रोतांसि, सिराः, धमन्यः, रसायन्यः, रसवाहिन्यः, नाड्यः, पन्थानः, मार्गाः, शरीरच्छिद्राणि, संवृतासंवृतानि, स्थानानि, आशयाः, निकेताश्चेति, शरीरधात्ववकाशानाँ लक्ष्यालक्ष्याणां नामानि भवन्ति।" (च.वि. ५/९)
स्रोतों की संख्या
चरक एवं सुश्रुत में मान्य स्रोतों की संख्या भिन्न-भिन्न है तथा कुछ लोग असंख्य भी मानते है।“
यावन्तः पुरुषे मूर्तिमन्तो भावविशेषास्तावन्त
एवास्मिन् स्रोतसांप्रकारविशेषाः (च०वि० 5/6)
स्त्रोतस नाम स्थान (चरक वि.५/७-८) (सुश्रुतशा.९/१२)
1 प्राणवह स्त्रोतस हृदय और महास्स्रोतसस्थान हृदय और रसवाहिनी धमनियाँ
(प्राणवाहिनी धमनियाँ)
2. उदकवह स्रोतस् तालू और क्लोम तालु और क्लोम
3. अन्नवह स्रोतस् आमाशय और वामपार्श्व. आमाशय, अत्रवाहिनी धमनि
4. रसवह स्रोतस् हृदीय और दश धमनियाँ. हृदय और रसवाहिनी धमनियाँ
5. रक्तवह स्रोतस् यकृत और प्लीहायकृत, प्लीहा और रक्तवाहिनी धमनियाँ
6. मांसवह स्रोतस् स्नायू, त्वक् , स्नायू त्वक् और रक्तवाहिनी धमनियां
7. मेदोवह स्त्रोतस वृक्कौ और वपावहन वृक्कौ और कटि
8. अस्थिवह स्रोतस् मेद और जघन.
9. मज्जावह स्रोतस् अस्थि और सन्धियाँ.
10. शुक्रवह स्रोतस् वृषण और शेफ (मूत्रेन्द्रिय) वृषणौ और स्तनौ
11. मूत्रवह स्रोतस् वस्तिऔर वंक्षण वस्ति और मेढ़
12. पुरीषवह स्रोतस् पक्वाशय और स्थूलगुद पक्वाशय और गुद
13. स्वेदवह स्रोतस् मेद और लोमकूप (रोमकूप)
14. आर्त्तववह स्रोतस् गुदगर्भाशय और आर्तव वाही धमनियाँ
मूल -
मांसवहानां च स्त्रोतसां स्नायुर्मूलं त्वक् च | च.वि. 5/7
मांसवह स्रोतों का मूल स्नायु और त्वचा है।
मांसवहे वे, तयोर्मूलं स्नायुत्वचं रक्तवहाश्च
धमन्यः। सु.शा.9/11
मांसवह स्रोत दो हैं- उनका मूल स्नायु, त्वचा और रक्तवह धमनियाँ हैं।
MAMSAVAHA SROTAS DESCRIPTION, VITIATION SYMPTOMS, TREATMENT
Muscles are the important structures / tissues of the body which are responsible for all our movements on which almost all our daily activities depend upon. They form the important component of the musculoskeletal system.
Mamsa = muscles, Vaha = carrying,
Srotas = channels/ducts of transportation or conveyance.
b.) Symptoms of damage or injury of muscle carrying channels
According to Charaka.
Roots of the channels
Adhi maamsa - Excessive growth of muscle tissue
Arbudam tumors Keelam – Tonsillitis
Gala shaalooka – Adenoids
Gala shundike elongated uvula
Pooti maamsa - muscle necrosis
Galaganda – Goitre
Gandamala cervical lymphadenitis
Upajihwikaa - Epiglottitis
स्रोतसों की दुष्टि के सामान्य लक्षण�
अतिप्रवृत्तिः सङ्ङ्गो वा सिराणां ग्रन्थयोऽपि च ।
विमार्गगमनं चापि स्रोतसां दुष्टिलक्षणम् ।। च.वि. 5/24
शरीर के स्रोतस् के महत्व का वर्णन था स्रोतसों का महत्व-�
Khadakkar, Radha S., Anand V. Kalaskar, and Ankeeta P. Dahiwale. "COMPREHENSIVE REVIEW OF MAMSAVAHA SROTAS AND ITS IMPORTANCE." (2024).