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शिरीष के फूल�

हजारी प्रसाद द्‍विवेदी

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पूरा नाम

डॉ. हज़ारी प्रसाद द्विवेदी

जन्म

19 अगस्त19 अगस्त, 1907 ई.

जन्म भूमि

गाँव 'आरत दुबे का छपरा', बलिया ज़िलागाँव 'आरत दुबे का छपरा', बलिया ज़िला, उत्तर प्रदेश

मृत्यु

19 मई19 मई, 1979

कर्म भूमि

कर्म-क्षेत्र

निबन्धकार, उपन्यासकार, अध्यापक, सम्पादक

मुख्य रचनाएँ

सूर साहित्य, बाणभट्ट, कबीर, अशोक के फूल, हिन्दी साहित्य की भूमिका, हिन्दी साहित्य का आदिकाल, नाथ सम्प्रदाय, पृथ्वीराज रासो

विषय

निबन्ध, कहानी, उपन्यास, आलोचना

भाषा

विद्यालय

शिक्षा

बारहवीं

पुरस्कार-उपाधि

नागरिकता

भारतीय

अन्य जानकारी

द्विवेदी जी कई वर्षों तक काशी नागरी प्रचारिणी सभा के उपसभापति, 'खोज विभाग' के निर्देशक तथा 'नागरी प्रचारिणी पत्रिका' के सम्पादक रहे हैं।

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सन

कृति

1936

सूर साहित्य

1940

हिन्दी साहित्य की भूमिका

1940

प्राचीन भारत में कलात्मक विनोद

1942

कबीर

1947

बाणभट्ट की आत्मकथा

1948

अशोक के फूल

1950

नाथ सम्प्रदाय

1951

कल्पलता

1952

हिन्दी साहित्य

1954

विचार और वितर्क

1957

नाथ सिद्धों की बानियाँ

1957

मेघदूत: एक पुरानी कहानी

1959

विचार प्रवाह

1960

सन्देशरासक

पृथ्वीराज रासो

1967

कालिदास की लालित्य योजना

1970

मध्ययुगीन बोध

1971

आलोक पर्व

1976

अनामदास का पोथा

प्रमुख कृतियाँ

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शिरीष का पेड़

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शिरीष के फूल

शिरीष के फल

शिरीष का तना

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इस पॆड़ का नाम शिरीष है। बोलचाल की भाषा में इसे सिरस कहते हैं। बहुत ही सुंदर गंध वाला... संस्कृत पुष्प ग्रंथों में इसके बहुत सुंदर वर्णन मिलते हैं। अफसोस कि इसे भारत में काटकर जला दिया जाता है। शारजाह में  इसके पेड़ हर सड़क के दोनो ओर लगे हैं। स्व. हजारी प्रसाद द्विवेदी का ललित निबंध शिरीष के फूल है - वैशाख में इनमें नई पत्तियाँ आने लगती हैं और गर्मियों भर ये फूलते रहते हैं... ये गुलाबी, पीले और सफ़ेद होते हैं. इसका वानस्पतिक नाम kalkora mimosa (albizia kalkora) है. गाँव के लोग हल्के पीले फूल वाले शिरीष को, सिरसी कहते हैं। यह अपेक्षाकृत छोटे आकार का होता है। इसकी फलियां सूखकर कत्थई रंग की हो जाती हैं और इनमें भरे हुए बीज झुनझुने की तरह बजते हैं। अधिक सूख जाने पर फलियों के दोनों भाग मुड़ जाते हैं और बीज बिखर जाते हैं। फिर ये पेड़ से ऐसी लटकी रहती हैं, जैसे कोई बिना दाँतो वाला बुजुर्ग मुँह बाए लटका हो।इसकी पत्तियाँ इमली के पेड़ की पत्तियों की भाँति छोटी छोटी होती हैं। इसका उपयोग कई रोगों के निवारण में किया जाता है। फूल खिलने से पहले (कली रूप में) किसी गुथे हुए जूड़े की तरह लगता है और पूरी तरह खिल जाने पर इसमें से रोम (छोटे बाल) जैसे निकलते हैं, इसकी लकड़ी काफी कमजोर मानी जाती है, जलाने के अलावा अन्य किसी उपयोग में बहुत ही कम लाया जाता है।बडे शिरीष को गाँव में सिरस कहा जाता है। यह सिरसी से ज्यादा बडा पेड़ होता है, इसकी फलियां भी सिरसी से अधिक बडी होती हैं। इसकी फलियां और बीज दोनों ही काफी बडे होते हैं, गर्मियों में गाँव के बच्चे ४-५ फलियां इकठ्ठा कर उन्हें खूब बजाते हैं, यह सूखकर सफेद हो जाती हैं, और बीज वाले स्थान पर गड्ढा सा बन जाता है और वहाँ दाग भी पड जाता है ... सिरस की लकड़ी बहुत मजबूत होती है, इसका उपयोग चारपाई, तख्त और अन्य फर्नीचर में किया जाता है ... गाँव में ईंट पकाने के लिए इसका उपयोग ईधन के रूप में भी किया जाता है।गाँव में गर्मियों के दिनों में आँधी चलने पर इसकी पत्ती और फलियां उड़ कर आँगन में और द्वारे पर फैल जाती हैं, इसलिए इसे कूड़ा फैलाने वाला रूख कहकर काट दिया जाता है।

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‘ शिरीष के फूल निबंध की शुरुआत ही एक तीखे संघर्ष चित्रा से होती है, ‘जेठ की तपती धूप में, जब कि धरित्री निर्धूम अग्निकुंड बनी हुई थी, शिरीष नीचे से ऊपर तक फूलों से लद गया था।’ कालिदास के साहित्य में शिरीष के प्रसंग अशोक से कुछ घटकर नहीं हैं, द्विवेदी जी चाहते तो शिरीष के सौंदर्य चित्रों की कलादीर्घा ही सजा देते लेकिन इस निबंध में उनका ध्यान शिरीष की ‘सुषमा’ की ओर कम, ‘संघर्ष’की ओर ज्यादा है। वह सुकुमारता से अधिक ‘जीवन की अजेयता’ का मंत्रा घोष करता है।यहां से द्विवेदी जी के निबंधों में एक नया बिंब शुरू होता है, वह है, ‘अवधूत’ का। ‘अशोक के फूल’ में‘महाकाल’ थे, ‘शिरीष के फूल’ में अवधूत हैं। महाकाल इतिहास की गति को दर्शाते हैं, अवधूतसंघर्ष की फक्कड़पन मस्ती को। शिरीष एक अवधूत है क्योंकि दुःख हो या सुख, वह हार नहीं मानता-सुखम् वा यदि वा दुःखम्। सुख और दुःख में स्थिर रहना-यह एक नया सुर है जो द्विवेदीजीके निबंधों में केवल ‘शिरीष के फूल’ और ‘कुटज’ में मौजूद है। ‘आम फिर बौरा गए’ का सामयिक संदर्भ इसमें भी आता है जब द्विवेदी जी देश विभाजन के वात्याचक्र के भीतर भी स्थिर रह सकने वाले गांधीजी की याद दिलाते हैं, ‘हमारे देश के ऊपर से जो यह मारकाट, अग्निदाह, लूटपाट, खून-खच्चर का बवंडर बह गया है उसके भीतर भी क्या स्थिर रहा जा सकता है? शिरीष रह सका है। अपने देश का एक बूढ़ा रह सका था।’ यह शिरीषधर्मा, बूढ़ा अवधूत गांधीजी हैं। निबंध का मार्मिक अंत इस प्रकार होता है- ‘मैं जब-जब शिरीष की ओर देखता हूं तब-तब हूक उठती है- हाय, वह अवधूतआज कहां है?’ यह निबंध गांधीजी की हत्या से उठने वाली हूक से समाप्त होता है।�

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वह क्या है जो मनुष्य को जिजीविषा या इच्छा शक्ति के स्तर से ऊपर उठाता है, व्यक्तिगत सुख और दुःख की सीमा से ऊपर उठाता है, वह है सर्वात्मबोध से ‘स्व’ का ‘सर्व’ के लिए त्याग, ‘अपने में सब और सबमें आप इस प्रकार की एक समष्टिबुद्धि जब तक नहीं आती तब तक पूर्ण सुख का आनंद भी नहीं मिलता। अपने आपको दलितद्राक्षा की भांति निचोड़कर जब तक सर्व के लिए निछावर नहीं कर दिया जाता�तब तक स्वार्थ खण्ड सत्य है, वह मोह को बढ़ावा देता है।’ स्वार्थ की सीमा से ऊपर उठे बगैर दुःखसे मुक्ति नहीं है। ‘दुःख और सुख तो मन के विकल्प हैं। सुखी वह है जिसका मन वश में है, दुःखी वह है जिसका मन परवश है।’ यह दुःख और सुख की नई समीक्षा है और एक नई जीवन दृष्टि। कुटज इसी नई जीवन दृष्टि का प्रतीक है। वह दुःख में, ताप में, कठोरता, में भी शान से जीता है, उसका जीवन मंत्र है- सुखम् वा यदि वा दुःखम्- ‘चाहे सुख हो दुःख, प्रिय हो या अप्रिय, जो मिल जाए उसे शान के साथ, हृदय से बिल्कुल अपराजित होकर सोल्लास ग्रहण करो। हार मत मानो।’

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यहाँ प्रस्तुत ललित निबंध शिरीष के फूल लेखक के संग्रह कल्पलता से उद्धृत है। इसमें लेखक आँधी, लू और गर्मी की प्रचंडता में भी अवधूत की तरह अविचल रहकर कोमल पुष्पों के सौंदर्य बिखेर रहे शिरीष के माध्यम से मनिष्य की अजेय जिजीविषा और तुमुल कोलाहल के बीच धैर्यपूर्वक, लोक के साथ चिंतारत, कर्त्तव्यशील बने रहने को महान्मानवीय मूल्यों के रूप में स्थापित करता है। ऐसी भावधारा में बहते हुए उसे देह बल के ऊपर आत्मबल का महत्त्व सिद्ध करने वाली इतिहास विभूति गाँधी जी की याद हो आती है तो वह गाँधीवादी मूल्यों के अभाव की पीड़ा से भी कसमसा उठता है। निबंध की शुरुआत में लेखक शिरीष पुष्प की कोमल सुंदरता के जाल बुनता है, फिर उसे भेदकर उसके इतिहास में और फिर उसके ज़्ररिये मध्यकाल के सांस्कृतिक इतिहास में पैठता है; फिर तकालीन जीवन व सांमती वैभव-विलास को सावधानी से उकेरते हुए उसका खोखलापन भी उजागर करता है। लेखक अशोक के फूल के भूल जाने की तरह ही शिरीष को नज़रांदाज़ किए जाने की साहित्यिक घटना से आहत है और इसी में उसे सच्चे कवि का तत्त्व-दर्शन भी होता है। उसके अनुसार योगी की अनासक्त शून्यता और प्रेमी की सरस पूर्णता एक साथ उपलब्ध होना सत्कवि होने की एकमात्र शर्त है। ऐसा कवि ही समस्त प्राकृतिक और मानवीय वैभव में रमकर भी चुकता नहीं और निरंतर आगे बढ़ते जाने की प्रेरणा देता है।

शिरीष के पुराने फलों की अधिकार-लिप्सु खड़खड़ाहट और नए पत्ते-फलों द्वारा उन्हें धकियाकर बाहर निकालने में लेखक साहित्य, समाज व राजनीति में पुरानी और नयी पीढ़ी के द्वंद्व को संकेतित करता है तथा स्पष्ट रूप से पुरानी पीढ़ी और हम सब में नयेपन के स्वागत का साहस देखना चाहता है। इस निबंध का शिल्प इसी में चर्चित इक्षुदंड की तरह है सांस्कृतिक संदर्भों व शब्दावली की भड़कीली खोल के भीतर सहज भावधारा के मधुरस से युक्त। यह हर तरह से आस्वाद्य और प्रयोजनीय है तथा इस प्रकार लेखक के प्रतिनिधि निबंधों में से एक है।

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पाठ में आए कठिन शब्दों के अर्थ :-

  1. कर्णिकार – कनेर या कनियार नामक फूल
  2. आरगव्ध - अमलतास नामक फूल
  3. खंखड़ – ठूँठ / शुष्क
  4. निर्घात – बिना आघात य बाधा के
  5. अवधूत – सांसारिक बंधनों व विषय-वासनाओं ऊपर उठ हुआ संन्यासी
  6. लँडूरे – पूँछ विहीन
  7. हिल्लोल – लहर
  8. अरिष्ठ – रीठा नामक वृक्ष
  9. पुन्नाग – एक बड़ा सदाबहार पेड़
  10. घनमसृण – घना-चिकना
  11. परिवेष्टित – ढँका हुआ
  12. बकुल – मौलसिरी का पेड़
  13. तुंदिल – तोंद वाला . मोटे पेट वाला
  14. मर्मरित – पत्तों की खड़खड़ाहट या सरसराहट से युक्त ध्वनि
  15. उर्ध्वमुखी – प्रगति की दिशा में / ऊपर उठ हुआ
  16. दुरंत – जिसका विनाश होना मुश्किल है
  17. अनासक्त – विषय-भोग से ऊपर उठा हुआ
  18. अनाविल - स्वच्छ
  1. कर्णाट –प्राचीन काल का कर्नाटक राज्य
  2. स्थिरप्रज्ञता – अविचल बुद्धि के अवस्था
  3. विदग्ध – अच्छी तरह से तपा हुआ
  4. कार्पण्य – कंजूसी
  5. गण्डस्थल – गाल
  6. कृषीवल – किसान
  7. निर्दलित – भली-भाँति निचोड़ा हुआ
  8. ईक्षुदण्ड – ईख (गन्ने) का तना
  9. अभ्रभेदी – गगनचुंबी

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जेठ की जलती धूप में, जबकि धरित्री निर्घूम अग्निकुण्ड बनी हुई थी, शिरीष नीचे से ऊपर तक फूलों से लद गया था। कम फूल इस प्रकार की गर्मी में फूल सकने की हिम्मत करते हैं। कर्णिकार और आरग्वध (अमलतास) की बात मैं भूल नहीं रहा हूँ। वे भी आसपास बहुत हैं। लेकिन शिरीष के साथ आरग्वध की तुलना नहीं की जा सकती। वह पन्द्रह-बीस दिन के लिए फूलता है, वसन्त ऋतु के पलाश की भाँति।

कबीरदास को इस तरह पन्द्रह दिन के लिए लहक उठना पसन्द नहीं था। यह भी क्या कि दस दिन फूले और फिर खंखड़-के-खंखड़- ‘दिन दस फूला फूलिके खंखड़ भया पलास’! ऐसे दुमदारों से तो लँडूरे भले। फूल है शिरीष। वसन्त के आगमन के साथ लहक उठता है, आषाढ़ तक तो निश्चित रूप से मस्त बना रहता है। मन रम गया तो भरे भादों में भी निर्घात फूलता रहता है। जब उमस से प्राण उबलता रहता है और लू से हृदय सूखता रहता है, एकमात्र शिरीष कालजयी अवधूत की भाँति जीवन की अजेयता का मन्त्रप्रचार करता रहता है।

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शिरीष के वृक्ष बड़े और छायादार होते हैं। पुराने भारत का रईस, जिन मंगल-जनक वृक्षों को अपनी वृक्ष-वाटिका की चहारदीवारी के पास लगाया करता था, उनमें एक शिरीष भी है (वृहत्संहिता,५५१३) अशोक, अरिष्ट, पुन्नाग और शिरीष के छायादार और घनमसृण हरीतिमा से परिवेष्टित वृक्ष-वाटिका जरूर बड़ी मनोहर दिखती होगी।

यद्यपि पुराने कवि बकुल के पेड़ में ऐसी दोलाओं को लगा देखना चाहते थे, पर शिरीष भी क्या बुरा है! डाल इसकी अपेक्षाकृत कमजोर जरूर होती है, पर उसमें झूलनेवालियों का वजन भी तो बहुत ज्यादा नहीं होता।

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अमलतास

कनेर

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पुन्नाग

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शिरीष का फूल संस्कृत-साहित्य में बहुत कोमल माना गया है। मेरा अनुमान है कि कालिदास ने यह बात शुरू-शुरू में प्रचारित की होगी।

शिरीष पुष्प केवल भौंरों के पदों का कोमल दबाव सहन कर सकता है, पक्षियों का बिल्कुल नहीं- ‘पदं सहेत भ्रमरस्य पेलवं शिरीष पुष्पं न पुनः पतत्रिणाम्।’

शिरीष के फूलों की कोमलता देखकर परवर्ती कवियों ने समझा कि उसका सब-कुछ कोमल है !

इसके फल इतने मजबूत होते हैं कि नये फूलों के निकल आने पर भी स्थान नहीं छोड़ते। जब तक नये फल-पत्ते मिलकर धकियाकर उन्हें बाहर नहीं कर देते तब तक वे डटे रहते हैं। वसन्त के आगमन के समय जब सारी वनस्थली पुष्प-पत्रसे मर्मरित होती रहती है, शिरीष के पुराने फल बुरी तरह खड़खड़ाते रहते हैं। मुझे इनको देखकर उन नेताओं की बात याद आती है, जो किसी प्रकार जमाने का रुख नहीं पहचानते और जब तक नयी पौध के लोग उन्हें धक्का मारकर निकाल नहीं देते तब तक जमे रहते हैं।

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मैं सोचता हूँ कि पुराने की यह अधिकार-लिप्सा क्यों नहीं समय रहते सावधान हो जाती? जरा और मृत्यु, ये दोनों ही जगत् के अतिपरिचित और अति प्रामाणिक सत्य हैं। तुलसीदास ने अफसोस के साथ इनकी सच्चाई पर मुहर लगायी थी- ‘धरा को प्रमान यही तुलसी जो फरा सो झरा, जो बरा सो बुताना!’ मैं शिरीष के फलों को देखकर कहता हूँ कि क्यों नहीं फलते ही समझ लेते बाबा कि झड़ना निश्चित है! सुनता कौन है? महाकालदेवता सपासप कोड़े चला रहे हैं, जीर्ण और दुर्बल झड़ रहे हैं,

जिनमें प्राणकण थोड़ा भी ऊर्ध्वमुखी है, वे टिक जाते हैं। दुरन्त प्राणधारा और सर्वव्यापक कालाग्नि का संघर्ष निरन्तर चल रहा है। मूर्ख समझते हैं कि जहाँ बने हैं वहीं देर तक बने रहें तो कालदेवता की आँख बचा जायेंगे। भोले हैं वे। हिलते-डुलते रहो, स्थान बदलते रहो, आगे की ओर मुँह किये रहो तो कोड़े की मार से बच भी सकते हो। जमे कि मरे!�

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एक-एक बार मुझे मालूम होता है कि यह शिरीष एक अद्भुत अवधूत है। दुःख हो या सुख, वह हार नहीं मानता। न ऊधो का लेना, न माधो का देना। जब धरती और आसमान जलते रहते हैं, तब भी यह हिजरत न-जाने कहाँ से अपना रस खींचते रहते हैं। मौज में आठों याम मस्त रहते हैं। एक वनस्पतिशास्त्री ने मुझे बताया है कि यह उस श्रेणी का पेड़ है जो वायुमण्डल से अपना रस खींचता है। जरूर खींचता होगा। नहीं तो भयंकर लू के समय इतने कोमल तन्तुजाल और ऐसे सुकुमार केसर को कैसे उगा सकता था? अवधूतों के मुँह से ही संसार की सबसे सरस रचनाएँ निकली हैं। कबीर बहुत-कुछ इस शिरीष के समान ही थे, मस्त और बेपरवा, पर सरस और मादक।

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कालिदास भी जरूर अनासक्त योगी रहे होंगे। शिरीष के फूल फक्कड़ाना मस्ती से ही उपज सकते हैं और ‘मेघदूत’ का काव्य उसी प्रकार के अनासक्त अनाविल उन्मुक्त हृदय में उमड़ सकता है। जो कवि अनासक्त नहीं रह सका, जो फक्कड़ नहीं बन सका, जो किये-कराये का लेखा-जोखा मिलाने में उलझ गया, वह भी क्या कवि है?

कहते हैं कर्णाट-राज की प्रिया विज्जिका देवी ने गर्वपूर्वक कहा था कि एक कवि ब्रह्मा थे, दूसरे वाल्मीकि और तीसरे व्यास। एक ने वेदों को दिया, दूसरे ने रामायण को और तीसरे ने महाभारत को। इनके अतिरिक्त और कोई यदि कवि होने का दावा करें तो मैं कर्णाट-राज की प्यारी रानी उनके सिर पर अपना बायाँ चरण रखती हूँ- "तेषां मूर्ध्नि ददामि वामचरणं कर्णाट-राजप्रिया!" मैं जानता हूँ कि इस उपालम्भ से दुनिया का कोई कवि हारा नहीं है, पर इसका मतलब यह नहीं कि कोई लजाये नहीं तो उसे डाँटा भी न जाय। मैं कहता हूँ कि कवि बनना है मेरे दोस्तो, तो फक्कड़ बनो। शिरीष की मस्ती की ओर देखो।

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कालिदास वजन ठीक रख सकते थे, क्योंकि वे अनासक्त योगी की स्थिर प्रज्ञता और विदग्ध-प्रेमी का हृदय पा चुके थे।

इस शिरीष के फूल का ही एक उदाहरण लीजिए। शकुन्तला बहुत सुन्दर थी। सुन्दर क्या होने से कोई हो जाता है? देखना चाहिए कि कितने सुन्दर हृदय से वह सौन्दर्य डुबकी लगाकर निकला है। शकुन्तला कालिदास के हृदय से निकली थी। विधाता की ओर से कोई कार्पण्य नहीं था, कवि की ओर से भी नहीं। राजा दुष्यन्त भी अच्छे-भले प्रेमी थे। उन्होंने शकुन्तला का एक चित्र बनाया था, लेकिन रह-रहकर उनका मन खीझ उठता था। उहूँ, कहीं-न-कहीं कुछ छूट गया है। बड़ी देर के बाद उन्हें समझ में आया कि शकुन्तला के कानों में वे उस शिरीष पुष्प को देना भूल गये हैं, जिसके केसर गण्डस्थल तक लटके हुए थे, और रह गया है शरच्चन्द्र की किरणों के समान कोमल और शुभ्र मृणाल का हार।

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कालिदास ने यह न लिख दिया होता तो मैं समझता कि वे भी बस और कवियों की भाँति कवि थे, सौन्दर्य पर मुग्ध, दुख से अभिभूत, सुख से गद्गद! पर कालिदास सौन्दर्य के बाह्य आवरण को भेदकर उसके भीतर तक पहुँच सकते थे, दुख हो कि सुख, वे अपना भाव-रस उस अनासक्त कृषीवल की भाँति खींच लेते थे जो निर्दलित ईक्षुदण्ड से रस निकाल लेता है। कालिदास महान् थे, क्योंकि वे अनासक्त रह सके थे। कुछ इसी श्रेणी की अनासक्ति आधुनिक हिन्दी कवि सुमित्रानन्दन पन्त में है।

कविवर रवीन्द्रनाथ में यह अनासक्ति थी। एक जगह उन्होंने लिखा है- ‘राजोद्यान का सिंहद्वार कितना ही अभ्रभेदी क्यों न हो, उसकी शिल्पकला कितनी ही सुन्दर क्यों न हो, वह चाह नहीं कहता कि हममें आकर ही सारा रास्ता समाप्त हो गया। असल गन्तव्य स्थान उसे अतिक्रम करने के बाद ही है, यही बताना उसका कर्तव्य है।’ फूल हो या पेड़, वह अपने-आपमें समाप्त नहीं हैं। वह किसी अन्य वस्तु को दिखाने के लिए उठी हुई अँगुली है। वह इशारा है।

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शिरीष तरु सचमुच पक्के अवधूत की भाँति मेरे मन में ऐसी तरंगें जगा देता है जो ऊपर की ओर उठती रहती हैं। इस चिलकती धूप में इतना सरस वह कैसे बना रहता है? क्या ये बाह्य परिवर्तन- धूप, वर्षा, आँधी, लू- अपने-आपमें सत्य नहीं हैं? हमारे देश के ऊपर से जो यह मार-काट, अग्निदाह, लूट-पाट, खून-खच्चर का बवण्डर बह गया है, उसके भीतर भी क्या स्थिर रहा जा सकता है ? शिरीष रह सका है। अपने देश का एक बूढ़ा रह सका था। क्यों मेरा मन पूछता है कि ऐसा क्यों सम्भव हुआ? क्योंकि शिरीष भी अवधूत है। शिरीष वायुमण्डल से रस खींचकर इतना कोमल और इतना कठोर है। गाँधी भी वायुमण्डल से रस खींचकर इतना कोमल और इतना कठोर हो सका था। मैं जब-जब शिरीष की ओर देखता हूँ तब तब हूक उठती- हाय, वह अवधूत आज कहाँ है!

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प्रस्तुति:-

श्री प्रभुलाल बैरवा

स्नातकोत्तर हिन्दी शिक्षक

जवाहर नवोदय विद्यालय

जटनंगला, करौली

राजस्थान