जवाहर नवोदय विद्यालय�� महुआर-कसारा�� मऊ (उ० प्र०)�
वसंत भाग-3 पाठ-18 टोपी
द्वारा- बीरेंद्र प्रताप
(टी०जी०टी० हिन्दी)
-: टोपी :-
एक गवरइया(मादा गौरेया) और गवरा(नर गौरेया) का संवंध बहुत ही घनिष्ठ था| वे सदैव साथ-साथ उठते-बैठते ,सोत-जागते, हंसते-रोते थे|
एक शाम गवरइया ने गवरे से कहा, देखो, आदमी कैसे रंग बिरंगे कपडे पहनता है? उसपर कितना अच्छा लगता है| गवरे ने तुरंत विरोध करते हुए कहा कि कपडे पहनने से आदमी बदसूरत लगने लगता है|
उलटे उसकी खूबसूरती ढक जरुर जाती है| गवरइया ने कहा, “आदमी , मौसम की मार से बचने के लिए कपडे पहनता है| तब कपडे का विरोध करते हुए गवरे ने कहा,”कपडा पहनने से आदमी की जाड़ा, गर्मी, बरसात सहने की शक्ति जाती रही है|
कपड़ा पहनते ही उसकी हैसियत का पता चल जाता है| आदमी-आदमी में सत्तरिये भेद समझ में आने लगते है|
वह कपड़े पहनकर लाज ही नही ढकता, काम करने वाले हाथ पैर भी ढक लेता है| हम तो नंगे ही सही|
गवरइया बोली ,”आदमियों के सर पर टोपी कितनी अच्छी लगती है| मेरा भी जी टोपी पहनने को करता है| गवरे ने कहा, “टोपी तू पाएगी कंहा से?
टोपी तो आदमियों का राजा पहनता है और अपनी टोपी सलामत रखने के लिए अनेको को टोपी पहनानी पड़ती है| तू इस चक्कर में मत ही पड़|
गवरा तनिक समझदार था, पर गवरइया जिद्दी और धुन की पक्की थी| अगले दिन वे प्रतिदिन की तरह दाना चुगने निकले तो घूरे पर उन्हें रुई का फाहा मिल गया|
टोपी का जुगाड़ मिलते ही गवरइया ख़ुशी से पागल हो उठी| गवरे ने उसे समझाते हुए कहा कि तेरे जैसा ही एक बावरा था, जिसे रास्ते में एक चाबुक मिल गया|
वह बावरा चीखने लगा चाबुक तो मिल गया| बाकी बचा तीन-घोड़ा-लगाम-जीन| गवरे ने उससे कहा कि रुई के फाहे से टोपी तक का सफ़र......तुझे कुछ पता नहीं है|
गवरइया रुई का फाहा लिए धुनिया के पास गई| उसने गवरइया की रुई धुनने से मना कर दिया, पर गवरइया ने उससे कहा कि उसे पूरी मजदूरी मिलेगी| उससे धुनिया को आधी रुई मेहनताने में दी|
तब धुनिये ने ख़ुशी-ख़ुशी रुई धुन दी| वह राजा का काम मुफ्त में करने जा रहा था| गवरइया ने उसे काम के बदले आधा सूत देने की जब बात कही तो कोरी सहर्ष तैयार हो गया| उसने महीन तथा लच्छेदार सूत कात दिया|
कता सूत लेकर गवरइया और गवरा बुनकर के पास गये| तब बुनकर ने दोनों को भगाना चाहा कि इनका काम भी मुफ्त में करना पड़ेगा| गवरइया ने साहस से कहा कि बुनकर भईया, आधा तू ले ले और आधा मुझे दे दे|
हम सेत-मेत का काम नहीं करवाते| उसने तुरंत गफश और दबीज कपडा बुन दिया| उसने आधा कपड़ा अपनी मजदूरी के रूप में लेकर आधा गवरइया को दे दिया| अब तक उनका तीन-चौथाई कम हो चुका था|
उत्साह में भरकर दोनों दर्जी के पास पहुचे, दर्जी उस समय राजा की सातवी रानी से नौ बेटियों के बाद जन्मे दस रतन के लिये झब्बे तैयार करने जा रहा था| दर्जी यह काम बेगार में कर रहा था| उसने गवरइया से कहा, ”कुछ लेना न देना.....भर माथे पसीना|
उसकी बातें सुनते ही गवरइया ने कहा, इस कपड़े की दो टोपियां सिल दे| एक स्वयं ले ले तथा एक मुझे दे दे| उसने अत्यंत मनोयोग से दो टोपियां सिलकर एक गवरइया को दे दी, और मजदूरी पाकर ख़ुशी से उसने गवरइया की टोपी पर पांच फुदने भी जड़ दिए|
गवरइया इतनी सुन्दर टोपी पाकर झूम उठी| गवरे ने कहा, “ वाकई तू तो रानी लग रही है, तो गवरइया ने उससे कहा, “रानी नहीं, राजा कहो मेरे राजा| अब कौन राजा मेरा मुकाबला करेगा|
टोपी पहनकर गवरइया उड़ते-उड़ते राजमहल के कंगूरे पर जा बैठी| राजा अधनंगा होकर अपने टहलुए से तेल की मालिश करा रहा था| उस समय राजा का सिर नंगा था|
गवरइया ने कहा, “यहाँ के राजा के सिर पर टोपी नहीं है, मेरे सिर पर टोपी है| राजा ने गवरइया के सिर पर इतनी सुन्दर टोपी देखी, राजा ने झट अपनी टोपी मंगवा ली और अपने सिर पर रख ली|
अब गवरइया ने कहना शुरु कर दिया कि, मेरी टोपी में पांच फुंदने और राजा की टोपी में एक भी नहीं| राजा को शर्म महसूस होने लगी|
उसने उस जरा-सी चिड़िया की गर्दन मसलने, पंख नोच लेने का आदेश दिया| एक सिपाही ने गुलेल से वह टोपी गिरा दी| दुसरे ने वह टोपी लपककर राजा के सामने हाजिर कर दी|
राजा उसे पैरो से मसलने जा ही रहा था कि उसकी खूबसूरती, कारीगरी का नायाब नमूना देखकर जड़ हो गया| वह सोचने लगा, उसके मुल्क में इतनी सुन्दर टोपी किसने बनाई? राजा ने कारीगरों को खोजने का आदेश दिया|
दर्जी को दरबार में हाजिर किया गया| राजा ने उससे पुछा, हमारे लिए इतनी बढिया टोपी क्यों नही बनाई? दर्जी ने कपडा उम्दा होने की बात कही|
इसी प्रकार बुनकर, कोरी, धुनिया ने भी दलील दी| क्रोधित राजा ने पूछा, “तुम सभी ने मेरे लिए ऐसा काम क्यों नही किया? अभयदान का आश्वासन पाकर धुनिये ने कहा, “महाराज, यह जो भी काम करवाती थी, उसमे आधा हिस्सा दे देती थी|
गवरइया ने कहा, “राजा देख ले, इसके लिए पूरे दाम चुकाए हैं| यह बेगार की नहीं है| यह राजा तो कंगाल है| इससे टोपी भी नही जुरती है| तभी तो इसने मेरी टोपी छीन ली|
राजा सोच रहा था कि इस पक्षी को खजाना खाली होने का कैसे पता चला| मंत्री ने हौले से कहा, “यह मुंहफट तो महाराज को बेपरदा करके ही दम लेगी| घबराए राजा ने तुरंत उसकी टोपी वापस करने का आदेश दे दिया|
गवरइया ने टोपी पहन ली और कहने लगी, “यह राजा to डरपोक है, निरा डरपोक, तभी तो इसने मेरी टोपी लौटा दी| अब राजा ने इस मुंहफट के मुंह न लगने का निश्चय किया और अपनी टोपी संभाल ली|
समाप्त