श्रीः �योगिनां केन्बरासंस्कृतवर्गः�३०.०९.२०२१
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केयूरा न विभूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्ज्वला
न स्नानं न विलेपनं न कुसुमं नालङ्कृता मूर्धजाः।
(सा) वाण्येका समलङ्करोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते
क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणम् भूषणम्॥
भूषँ अलङ्करणे (चुरादिः उभयपदी सकर्मकः सेट्)
अलँ भूषणपर्याप्तिवारणेषु क्षि क्षये
केयूरम् – के बाहुशिरसि भूषणतां याति, केयूरः, पुं, रतिबन्धविशेषः
केयूराणि न भूषयन्ति
गृहकार्यम् – २३.०९.२०२१
अति + अन्त = अत्यन्त, अति + आचार = अत्याचार, इति आदिशत् = इत्यादिशत्, यदि + एवम् = यद्येवम्, अपि + एतेषु = अप्येतेषु, प्रति + उवाच = प्रत्युवाच।
अनु + अगच्छत् = अन्वगच्छत्, आगच्छतु + अत्र = आगच्छत्वत्र, खलु + अहम् = खल्वहम्, पचतु + ओदनम् = पचत्वोदनम्, वधू + आदेश = वध्वादेश, गुरु + आदेश = गुर्वादेश, भू + आदि = भ्वादि।
भ्रातृ + आज्ञा = भ्रात्राज्ञा, पितृ + अनुग्रह = पित्रनुग्रह, मातृ + इच्छा = मात्रिच्छा, सवितृ + उदय = सवित्रोदय।
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सारांशः – Summary so far
सुप्तिङन्तं पदम् (१.४.१४)॥ रामः रामौ रामाः पठति, खेलति।
छन्दः – अ = लघुः वर्णः (।), आ अं अः = गुरुः वर्णः (ऽ)
दश (Ten) लकाराः - लँट्, लिँट्, लुँट्, लृँट्, लेँट्, लोँट्, लँङ्, लिँङ्, लुँङ्, लृँङ्
Present – वर्तमाने लँट् (३.२.१२३) Future – लृँट् शेषे च (३.३.१३)
स्वतन्त्रः कर्त्ता (१.४.५४) तिङ्समानाधिकरणे प्रथमा, अभिहिते प्रथमा।
कर्तुरीप्सिततमं कर्म (१.४.४९) कर्मणि द्वितीया (२.३.२) (अनभिहिते)।
साधकतमं करणम् (१.४.४२) कर्तृकरणयोस्तृतीया (२.३.१८)
कर्मणा यमभिप्रैतिः स सम्प्रदानम् (१.४.३२) चतुर्थी सम्प्रदाने (२.३.१३)
ध्रुवमपायेऽपादानम् (१.४.२४) अपादाने पञ्चमी (२.३.२८)
अकः सवर्णे दीर्घः (६.१.१०१) इको यण् अचि (६.१.७७)
श्लोकाः – पञ्चमी विभक्तिः
अन्नाद् भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः।
यज्ञाद् भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्।
तस्मात् सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्॥
अज्ञेभ्यो ग्रन्थिनः श्रेष्ठा ग्रन्थिभ्यो धारिणो वराः। घारिभ्यो ज्ञानिनः श्रेष्ठा ज्ञानिभ्यो व्यवसायिनः॥
पापात् त्रस्यति यः स एव पुरुषः स्यादुत्तमो भूतले।
पापात्मा च बिभेति योऽपयशसः स ज्ञायते मध्यमः॥
त्रासतस्य न पातकादपि न वा लज्जापवादादपि (बिभेति)।
प्रज्ञावद्भिरुदाहृतोऽयमधमः सर्वत्र निन्दास्पदम्॥
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करणकारकम् – पञ्चमी विभक्तिः
आधारोऽधिकरणम् (१.४.४५) – कर्तृकर्मद्वारा तन्निष्ठक्रियाया आधारः कारकमधिकरणसंज्ञः स्यात्॥ कटे आस्ते॥ A karaka which serves as locus of action is termed adhikaraṇa.
सप्तम्यधिकरणे च २.३.३६ – सप्तमी विभक्तिर्भवत्यधिकरणे कारके। स्थाल्यां पचति। A saptamī occurs after a nominal stem when adhikaraṇa `locus’ is not expressed otherwise.
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सन्धिप्रकरणम्
एचोऽयवायावः (६.१.७८) अयादिचतुष्टयम् अयादिसन्धिः वा
एचः – षष्ठी;
एच् – ए ओ ऐ औ
अय् अव् आय् आव् – प्रथमा;
अचि – सप्तमी (अनुवृत्तिः ६.१.७७)
हरे + अः = हर् अय् अः = हरयः
साधो + अः = साध् अव् अः = साधवः
ने + अनम् = न् अय् अनम् = नयनम्
नै + अकः = न् आय् अकः = नायकः
भो + अति = भ् अव् अति = भवति
पौ + अकः = प् आव् अकः = पावकः
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पठँ व्यक्तायां वाचि भ्वादिः परस्मैपदी सकर्मकः सेट् (to read)
| एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | शप् तिप् | शप् तस् | शप् झि |
म॰ | शप् सिप् | शप् थस् | शप् थ |
उ॰ | शप् मिप् | शप् वस् | शप् मस् |
लृट् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | पठिष्यति | पठिष्यतः | पठिष्यन्ति |
म॰ | पठिष्यसि | पठिष्यथः | पठिष्यथ |
उ॰ | पठिष्यामि | पठिष्यावः | पठिष्यामः |
लोट् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | पठतु | पठताम् | पठन्तु |
म॰ | पठ | पठतम् | पठत |
उ॰ | पठानि | पठाव | पठाम |
लङ् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | अपठत् | अपठताम् | अपठन् |
म॰ | अपठः | अपठतम् | अपठत |
उ॰ | अपठम् | अपठाव | अपठाम |
लिङ् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | पठेत् | पठेताम् | पठेयुः |
म॰ | पठेः | पठेतम् | पठेत |
उ॰ | पठेयम् | पठेव | पठेम |
लट् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | पठति | पठतः | पठन्ति |
म॰ | पठसि | पठथः | पठथ |
उ॰ | पठामि | पठावः | पठामः |
षेवृँ सेवने भ्वादिः आत्मनेपदी सकर्मकः सेट् (to serve)
| एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | शप् त | शप् आताम् | शप् झ |
म॰ | शप् थास् | शप् आथाम् | शप् ध्वम् |
उ॰ | शप् इट् | शप् वहि | शप् महिङ् |
लृट् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | सेविष्यते | सेविष्येते | सेविष्यन्ते |
म॰ | सेविष्यसे | सेविष्येथे | सेविष्यध्वे |
उ॰ | सेविष्ये | सेविष्यावहे | सेविष्यामहे |
लोट् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | सेवताम् | सेवेताम् | सेवन्ताम् |
म॰ | सेवस्व | सेवेथाम् | सेवध्वम् |
उ॰ | सेवै | सेवावहै | सेवामहै |
लङ् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | असेवत | असेवेताम् | असेवन्त |
म॰ | असेवथाः | असेवेथाम् | असेवध्वम् |
उ॰ | असेवे | असेवावहि | असेवामहि |
लिङ् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | सेवेत | सेवेयाताम् | सेवेरन् |
म॰ | सेवेथाः | सेवेयाथाम् | सेवेध्वम् |
उ॰ | सेवेय | सेवेवहि | सेवेमहि |
लट् | एक॰ | द्वि॰ | ब॰ |
प्र॰ | सेवते | सेवेते | सेवन्ते |
म॰ | सेवसे | सेवेथे | सेवध्वे |
उ॰ | सेवे | सेवावहे | सेवामहे |
मति – इकारान्त स्त्रीलिङ्गः (Mind)
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतम् च यत्। असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह॥गीता १७.२८॥
| एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
प्रथमा | मतिः | मती | मतयः |
द्वितीया | मतिम् | मती | मतीः |
तृतीया | मत्या | मतिभ्याम् | मतिभिः |
चतुर्थी | मतये, मत्यै | मतिभ्याम् | मतिभ्यः |
पञ्चमी | मतेः, मत्याः | मतिभ्याम् | मतिभ्यः |
षष्ठी | मतेः, मत्याः | मत्योः | मतीनाम् |
सप्तमी | मतौ, मत्याम् | मत्योः | मतिषु |
सम्बोधनम् | हे मते | हे मती | हे मतयः |
गृहकार्यम् – ३०.०९.२०२१
सन्धिः क्रियताम् –
ने + अति, चे + अन, ते + आगतः ये + इह ।
गै + अक, नै + अक, कस्मै अददात्, श्रियै + इच्छा, श्रियै + औत्सुक्यम्, गै + अति।
पो + अन, भो + अन, भो + अति, पो + इत्र, गो + एषणा, भो + इता।
पौ + अक, भौ + उक, नौ + इक, द्वौ + इमौ, तौ + उभौ, तौ + एतौ, रात्रौ + अहनि, रात्रौ + आगतौ, रवौ + उदेति।
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