BLESSINGS
ॐ ह्रीं अर्हम् नमः
श्रीसद्गुरुभ्यो नमः
ॐ ऐं नमः
SHREE MATI GYANAY NAMAH
SHREE SHRUT GYANAY NAMAH
SHREE AVADHI GYANAY NAMAH
SHREE MANAH - PARYAV GYANAY NAMAH
SHREE KEVAL GYANAY NAMAH
5 GYAN
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 38
10 Pran & 6 Paryapti
Inspired by:
Yugpradhan Acharyatulya P.P. Panyas Shree Chandrashekar Vijayji M.S.
P.P. Panyas Shree Yashobhushan Vijayji M.S.
P.P. Panyas Shree Manobhushan Vijayji M.S.
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 38
१० प्राण ६ पर्यार्याप्ति
१० प्राण ६ पर्यार्याप्ति
प्राण का अर्थ है जीवनी शक्ति। इस प्राणशक्ति के बल पर ही प्राणी जीवित रहता है और उसके अंग-उपांग कार्य करने में सक्षम रहते हैं।
यह शक्ति जैसे-जैसे क्षीण होती हैं, वैसे-वैसे शरीर क्षीण, जर्जर होता जाता है।
पूर्ण रूप में प्राण शक्ति जब नष्ट हो जाती है तो शरीर मृत अवस्था को प्राप्त हो जाता हैं।
इसलिए कहा जाता है प्राण का संयोग जीवन है, प्राण का वियोग मृत्यु है।'
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 38
१० प्राण ६ पर्यार्याप्ति
श्रोत्रेन्द्रिय प्राण
जैन दर्शन में प्राण के दस भेद हैं
(१) श्रोत्रेन्द्रिय प्राण
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 38
१० प्राण ६ पर्यार्याप्ति
चक्षु इन्द्रिय प्राण
(२) चक्षु इन्द्रिय प्राण
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 38
१० प्राण ६ पर्यार्याप्ति
घ्राणेन्द्रिय प्राण
(३) घ्राणेन्द्रिय प्राण
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 38
१० प्राण ६ पर्यार्याप्ति
रसनेन्द्रिय प्राण
(४) रसनेन्द्रिय प्राण
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 38
१० प्राण ६ पर्यार्याप्ति
स्पर्शनेन्द्रिय प्राण
(५) स्पर्शनेन्द्रिय प्राण। कानों से सुनने की, आँखों से देखने की, नाक से सूंघने की, जीभ से चखने की तथा त्वचा (चमडी) में ठंडा-गर्म स्पर्श अनुभव करने की जो शक्ति है, उसे ही यहाँ प्राण कहा गया है।
जिसकी प्राणशक्ति जितनी प्रखर होती है, उसकी इन्द्रिय शक्ति भी उतनी ही प्रखर होती है।
मन की मनन करने की शक्ति, वाणी द्वारा बोलने करने की शक्ति तथा शरीर की क्रिया करने की शक्ति को क्रमशः
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 38
१० प्राण ६ पर्यार्याप्ति
मनोवल प्राण
(६) मनोवल प्राण
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 38
१० प्राण ६ पर्यार्याप्ति
वचन बल प्राण
(७) वचन बल प्राण
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 38
१० प्राण ६ पर्यार्याप्ति
कायवल प्राण
(८) कायवल प्राण कहा गया हैं। मानसिक श्रेष्ठता होना, वाणी प्रभावशाली होनी, शरीर का हृष्ट-पुष्ट बलशाली होना, इनमें मनोबल प्राण, वचन वल प्राण तथा कायवल प्राण की स्पष्ट झलक मिलती हैं।
वायु को श्वासोच्छ्वास के रूप में ग्रहण करने और छोड़ने की शक्ति को
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 38
१० प्राण ६ पर्यार्याप्ति
श्वसोच्छ्वास प्राण
(९) श्वसोच्छ्वास प्राण कहा जाता है। जिन जीवों के नाक (घ्राणेन्द्रिय) नहीं होती, वे भी श्वास लेते हैं।
अतः उनमें भी यह प्राण विद्यमान हैं।
अमुक भव में अमुक काल तक जीवित रहने की शक्ति का नाम है
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 38
१० प्राण ६ पर्यार्याप्ति
आयुष्य प्राण
(१०) आयुष्य प्राण। आयुष्य प्राण जब तक शेष रहता है, प्राणी जीवित रहता हैं।
अन्य अंगोपांग किसी बीमारी आदि के कारण भले ही अपना काम करना बन्द कर दें, परन्तु यदि आयुष्य प्राण शेष हैं, तो वे अंगोपांग पुनः ठीक होकर अपना कार्य कर सकते हैं।
आयुष्य प्राण समाप्त होते ही सभी अंगोपांग अपना काम करना बन्द कर देते हैं।
कभी-कभी हम देखते हैं कि भयंकर दुर्घटना होने पर या असाध्य बीमारी होने पर भी व्यक्ति आश्चर्य ढंग से जीवित रहता है और कभी-कभी हृष्ट-पुष्ट, स्वस्थ व्यक्ति बैठा-बैठा ही अचानक मर जाता हैं।
इसका बाह्य कारण कुछ भी हो सकता है, परन्तु मुख्य कारण आयुष्य प्राण ही हैं।
जैन ग्रंथो के अनुसार आयुष्य दो प्रकार के हैं-
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 38
१० प्राण ६ पर्यार्याप्ति
आयुष्य प्राण
(१) अपवर्तनीय आयु - तीव्र शस्त्र घात, विष भक्षण आदि बाह्य निमित्तों से जो अकाल मृत्यु हो जाती हैं, उसे अपवर्तनीय आयु कहा गया हैं।
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 38
१० प्राण ६ पर्यार्याप्ति
आयुष्य प्राण
(२) अनपवर्तनीय आयु - अनेक प्रकार के बाह्य निमित्त मिलने पर भी जो आयु अपने निश्चित समय से पहले समाप्त नहीं होती वह अनपवर्तनीय हैं।
देव, नारक तथा तीर्थंकर, चक्रवर्ती, बलदेव वासुदेव, प्रति वासुदेव, असंख्यात वर्ष जीवी मनुष्य और तिर्यंच तथा चरम शरीरी (उसी भव में मोक्ष जाने वाले) अनपवर्तनीय आयु वाले होते हैं।
इन दोनों प्रकार की आयु स्थिति में' आयुष्य प्राण' मुख्य आधार हैं।
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 38
१० प्राण ६ पर्यार्याप्ति
आयुष्य प्राण
यहाँ ध्यान रखने की बात है, प्राण और पर्याप्ति इन दोनों का सम्बन्ध हमारी शरीर रचना के साथ है।
किन्तु इनमें अन्तर है।
प्राण जीव की आध्यात्मिक शक्ति हैं।
जीव अपने शरीर को कार्यक्षम रखने के लिए बाह्य पुद्गलों को ग्रहण करके अंगोपांगो का निर्माण तथा उनको कार्य करने में सक्षम रखता है।
यह बाहर से ग्रहण की हुइ पौद्रङ्गलिक शक्ति पर्याप्ति कहलाती हैं।
जीव या प्राण खाना-पीना, बोलना आदि क्रियाएँ करता है, यह प्राण शक्ति है।
इन क्रियाओं को करने में पौद्रगलिक शक्ति की सहायकता ली जाती है, उसे पर्याप्ति कहा गया है।
प्राण और पर्याप्ति में यह मुख्य अन्तर है।
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 38
१० प्राण ६ पर्यार्याप्ति
आयुष्य प्राण
यहाँ यह भी समझ लेना चाहिए कि पाँचों इन्द्रियों की प्राण शक्ति का कारण हैं इन्दिय पर्याप्ति।
मन, वचन, काय की शक्ति का कारण है मनः पर्याप्ति, भाषा पर्याप्ति तथा शरीर पर्याप्ति। थोसोच्छ्वास प्राण का कारण है श्वासोच्छ्वास पर्याप्ति तथा आयुष्य प्राण का कारण है आहार पर्याप्ति।
क्योंकि बिना आहार के शरीर नहीं टिक पाता।
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 38
१० प्राण ६ पर्यार्याप्ति
आहार पर्याप्ति
(१) आहार पर्याप्ति - शरीर धारण करते ही सबसे पहले सूक्ष्म आहार की जरूरत होती हैं। फिर क्रमशः जल, दूध, फल, अन्न आदि स्थूल आहार लिया जाता है।
बिना आहार के शरीर नहीं टिकता।
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 38
१० प्राण ६ पर्यार्याप्ति
शरीर पर्याप्ति
(२) शरीर पर्याप्ति - शरीर के अंगों का ठीक प्रकार से निर्माण होना शरीर पर्याप्ति है।
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 38
१० प्राण ६ पर्यार्याप्ति
इन्द्रिय पर्याप्ति
(३) इन्द्रिय पर्याप्ति - शरीरधारी जीव आँख, कान, नाक, जीभ व त्वचा आदि के सहारे ही अपनी क्रियाएँ करता है। इन्द्रियों का निर्माण इन्द्रिय पर्याप्ति कहा जाता है।
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 38
१० प्राण ६ पर्यार्याप्ति
श्वासोच्छवास पर्याप्ति
(४) श्वासोच्छवास पर्याप्ति - इन्द्रियों की तरह जीवन के लिए श्वासोच्छवास भी अनिवार्य है। श्वास-उच्छवास की शक्ति श्वासोच्छवास पर्याप्ति है।
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 38
१० प्राण ६ पर्यार्याप्ति
भाषा पर्याप्ति
(५) भाषा पर्याप्ति - शरीरधारी जीव को अपनी भावना प्रकट करने के लिए वाणी रूप, भाषा की जरूरत पड़ती है। वचन शक्ति का विकास होना भाषा पर्याप्ति हैं।
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 38
१० प्राण ६ पर्यार्याप्ति
मनः पर्याप्ति
(६) मनः पर्याप्ति - मनन -चिन्तन करने की शक्ति मन की है।
मनः शक्ति का निर्माण व विकास होना मनः पर्याप्ति है।
जब तक इन शक्तियों का निर्माण व विकास नहीं होता, तब तक जीव अपर्याप्त अवस्था में रहता है।
इनकी पूरी योग्यता प्रकट होने से जीव 'पर्याप्त 'कहा जाता है। इन पर्याप्तियों का निर्माण सभी जीवों में एक समान नहीं होता। किसी में कम व किसी में अधिक अपने क्षयोपशम के अनुसार होता है। पर्याप्तियों के आधार पर ही एकेन्द्रिय, पंचेन्द्रिय, संज्ञी असंज्ञी आदि भेद होते है।
ज्ञान, दर्शन, चारित्र, तप, वीर्य (शक्ति) तथा उपयोग ये छह गुण अल्प या विशेष मात्रा में सभी जीवों में रहते हैं।
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 38
१० प्राण ६ पर्यार्याप्ति
इसलिए ये छह गुण जीव की अभिन्न पहचान होने से जीव के लक्षण कहे जाते है।
(१) ज्ञान - सूक्ष्म अपर्याप्त निगोद जीवों में भी मति-श्रुतज्ञान का अनन्तवाँ भाग प्रकट होता हैं। कोई भी जीव ज्ञान शून्य नहीं होता। ज्ञान शून्य होना अजीव का चिन्ह हैं। सभी जीवों में कम अधिक ज्ञान का प्रकाश रहता ही है। शास्त्र-स्वाध्याय, श्रुत अध्ययन, पुस्तक पढ़ना आदि ज्ञान प्राप्ति के उपाय हैं।
(२) दर्शन - सामान्य बोध दर्शन हैं। सामने रखी वस्तु को सामान्य रूप में देखना चक्षु दर्शन है। बिना आंख के वस्तु का बोध करना अचक्षु अचक्षु दर्शन हैं। यह सुनकर, स्पर्श द्वारा, सुंघकर और चखकर बकर भी हो सकता हैं। सभी जीवों में कुछ न दर्शन शक्ति होती है। इन कुछ
(३) चारित्र - ज्ञान-दर्शन की तरह चारित्र गुण का अल्पतम अंश तो सभी आत्माओं में होता हैं। जिनमें यह गुण विकसित हो जाता है वे देश विरति या सर्वविरति अंगीकार भी करते हैं।
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 38
१० प्राण ६ पर्यार्याप्ति
(४) तप - कष्ट आदि सहना 'तप' के अन्तर्गत होने से प्रत्येक जीव में 'तप' गुण की सत्ता विद्यमान रहती है। विशेष रूप में गुरुजनो की सेवा, विनय तथा प्रायश्चित्त लेना आदि तप है।
(५) वीर्य - शक्ति, उद्यम या प्रयत्न करने का नाम वीर्य है। प्रत्येक जीव में कुछ न कुछ वीर्य रूप शक्ति विद्यमान रहती ही है।
(६) उपयोग - ज्ञान, दर्शन, आदि को काम में लेना उपयोग है। सूक्ष्म से सूक्ष्म जीव में भी उपयोग गुण विद्यमान रहती ही है।
मन से विचार करना, ध्यान आदि में प्रवृत्त होना, चारित्र का पालन करना, श्रुत अध्ययन करना आदि व्यावहारिक प्रवृत्तियाँ उपयोग हैं। ये छह गुण सत्ता (बीज) रूप में सभी जीवों में विद्यमान रहते है। क्षयोपशम के आधार पर इनका क्रमिक विकास - नाश होता रहता है।