नवोदय विद्यालय समिति,नोएडा
संचयन भाग 2
पाठ का नाम - टोपी शुक्ला
लेखक का नाम –राही मासूम रज़ा
शिक्षक का नाम -पंकज कुमार सिन्हा
स्नातकोत्तर हिन्दी शिक्षक
राही मासूम रज़ा(1927-1992)
राही मासूम रज़ा का जन्म गाजीपुर जिले के गंगौली गांव में हुआ था और प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा गंगा किनारे गाजीपुर शहर के एक मुहल्ले में हुई थी। बचपन में पैर में पोलियो हो जाने के कारण उनकी पढ़ाई कुछ सालों के लिए छूट गयी, लेकिन इंटरमीडियट करने के बाद वह अलीगढ़ आ गये और यहीं से एम॰ए॰ करने के बाद उर्दू में `तिलिस्म-ए-होशरुबा' पर पीएच.डी. की। पीएच.डी. करने के बाद राही अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़ के उर्दू विभाग में प्राध्यापक हो गये और अलीगढ़ के ही एक मुहल्ले बदरबाग में रहने लगे। अलीगढ़ में रहते हुए ही राही ने अपने भीतर साम्यवादी दृष्टिकोण का विकास कर लिया था और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के वे सदस्य भी हो गए थे। अपने व्यक्तित्व के इस निर्माण-काल में वे बड़े ही उत्साह से साम्यवादी सिद्धान्तों के द्वारा समाज के पिछड़ेपन को दूर करना चाहते थे और इसके लिए वे सक्रिय प्रयत्न भी करते रहे थे।
१९६८ से राही बम्बई में रहने लगे थे। वे अपनी साहित्यिक गतिविधियों के साथ-साथ फिल्मों के लिए भी लिखते थे जो उनकी जीविका का प्रश्न बन गया था। राही स्पष्टवादी व्यक्ति थे और अपने धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय दृष्टिकोण के कारण अत्यन्त लोकप्रिय हो गए थे। यहीं रहते हुए राही ने आधा गाँव, दिल एक सादा कागज, ओस की बूँद, हिम्मत जौनपुरी उपन्यास व १९६५ के भारत-पाक युद्ध में शहीद हुए वीर
अब्दुल हमीद की जीवनी छोटे आदमी की बड़ी कहानी लिखी। उनकी ये सभी कृतियाँ हिंदी में थीं। इससे पहले वह उर्दू में एक महाकाव्य १८५७ जो बाद में हिन्दी में ‘क्रांति कथा’ नाम से प्रकाशित हुआ तथा छोटी-बड़ी उर्दू नज़्में व गजलें लिखे चुके थे। आधा गाँव, नीम का पेड़, कटरा बी आर्ज़ू, टोपी शुक्ला, ओस की बूँद और सीन ७५ उनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं।पिछले कुछ वर्षों से प्रसिद्धि में रहीं हिन्दी पॉप गायिका पार्वती खान का विवाह इनके पुत्र नदीम खान, हिन्दी फिल्म निर्देशक एवं सिनेमैटोग्राफर से हुआ था।
टोपी शुक्ला
टोपी और इफ्फ़न
पाठ प्रवेश
टोपी शुक्ला’कहानी के लेखक ‘राही मासूम रजा’हैं। इस कहानी के माध्यम से लेखक बचपन की बात करता है। बचपन में बच्चे को जहाँ से अपनापन और प्यार मिलता है वह वहीं रहना चाहता है।
यह नामों का जो चक्कर होता है वह बहुत ही अजीब होता है। परन्तु खुद देख लीजिए कि केवल नाम बदल जाने से कैसी-कैसी गड़बड़ हो जाती है। यदि नाम कृष्ण हो तो उसे अवतार कहते हैं और अगर नाम मुहम्मद हो तो पैगम्बर (अर्थात पैगाम देने वाला)। कहने का अर्थ है यह है कि एक को ईश्वर और दूसरे को ईश्वर का पैगाम देने वाला कहा जाता है। नामों के चक्कर में पड़कर लोग यह भूल जाते हैं कि दोनों ही दूध देने वाले जानवरों को चराया करते थे। दोनों ही पशुपति, गोवर्धन और ब्रज में रहने वाले कुमार थे।
प्रस्तुत पाठ में भी लेखक ने दो परिवारों का वर्णन किया है जिसमें से एक हिन्दू और दूसरा मुस्लिम परिवार है। दोनों परिवार समाज के बनाए नियमों के अनुसार एक दूसरे से नफ़रत करते हैं परन्तु दोनों परिवार के दो बच्चों में गहरी दोस्ती हो जाती है। ये दोस्ती दिखाती है कि बच्चों की भावनाएँ किसी भेद को नहीं मानती।
आज के समाज के लिए ऐसी ही दोस्ती की आवश्यकता है। जो धर्म के नाम पर खड़ी दीवारों को गिरा सके और समाज का सर्वांगीण विकास कर सके।
टोपी शुक्ला पाठ समाज को सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश देता है। इस पाठ में टोपी और इफ़्फ़न अलग-अलग धर्म और जाति से संबंध रखते हैं लेकिन फिर भी दोनों के बीच एक अटूट संबंध है।
हिंदुस्तान में हिंदू और मुसलमानों के बीच प्रेम और भाईचारे से भरे एक वातावरण की चाह रखने वालों के लिए है एक प्रेरणा पद है।
पाठ व्याख्या
सांप्रदायिक एकता से लोग एक दूसरे के प्रति भाईचारे का संबंध रख सकते हैं।
संप्रदाय की एकता से देश में इंसानियत का खून बहने से रोका जा सकता है |
दरअसल टोपी शुक्ला कहानी दो अलग-अलग धर्मों से जुड़े बच्चों की है। इस कहानी में एक बच्चे और एक बूढ़ी दादी के बीच प्यार को दिखाया गया है।
टोपी शुक्ला और इफ़्फ़न एक-दूसरे के बहुत पुराने और गहरे मित्र थे। दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे थे। टोपी शुक्ला हिंदू धर्म को मानता था, वहीं उसके दोस्त इफ़्फ़न और उसकी दादी मुस्लिम धर्म से थे और दोनों के दिलों में प्यार की प्यास थी। लेकिन जब भी टोपी शुक्ला अपने दोस्त इफ़्फ़न के घर जाता था तो वह दादी के पास ही बैठता।
पाठ सार
इफ़्फ़न की बूढ़ी दादी की मीठी पूरबी बोल उसके मन को बहुत भाता था। दादी पहले रोज़ टोपी शुक्ला की अम्मी के बारे में पूछती थी और फिर उसे रोज़ कुछ खाने को देती थीं। टोपी शुक्ला को बूढ़ी दादी का हर शब्द गुड़ की डली-सा लगता था। इसीलिए दोनों का रिश्ता बहुत ही खास और गहरा था। इफ़्फ़न की दादी जितना उसे प्यार करती थीं उतना ही टोपी शुक्ला को भी करती थीं, ना ही उससे कम ,ना ही उससे ज्यादा। वहीं एक दिन ऐसा हुआ जब बूढ़ी दादी का मृत्यु हो गई उसके बाद टोपी शुक्ला को ऐसा लगने लगा कि उसकी ज़िंदगी में दादी की छत्रच्छाया ही नहीं रही और उसको अपने दोस्त इफ़्फ़न का घर खाली लगने लगा।इस कहानी को पढ़ने के बाद हमें यह सीख मिलती है कि प्यार किसी धर्म और जात को नहीं देखता बस हो जाता है।
गृह कार्य
धन्यवाद!