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BLESSINGS

ॐ ह्रीं अर्हम् नमः

श्रीसद्गुरुभ्यो नमः

ॐ ऐं नमः

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SHREE MATI GYANAY NAMAH

SHREE SHRUT GYANAY NAMAH

SHREE AVADHI GYANAY NAMAH

SHREE MANAH-PARYAV GYANAY NAMAH

SHREE KEVAL GYANAY NAMAH

5 GYAN

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Inspired by:

Yugpradhan Acharyatulya P.P. Panyas Shree Chandrashekhar Vijayji M.S.

P.P. Panyas Shree Yashobhushan Vijayji M.S.

P.P. Panyas Shree Manobhushan Vijayji M.S.

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BHAGWAN PARSHWANATH - 2

Learn & turn part – 2 story NO 19

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Picture No. 1

  1. ९ में भव में भगवान का आत्मा १० वें देवलोक में था।

बहुत ही उल्लास से ५०० कल्याणक के महोत्सव में आगेवानी ली, इसलिए उनका पुन्य सभी तीर्थंकरों से ज्यादा है।

अपनी होने वाली माता को देखने देवलोक से वाराणसी नगरी में आये थे।

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Picture No. 2

२) जब प्रभु वामामाता की कुक्षी में आये, माताजीने १४ महास्वप्न देखे। थोडे दिन के बाद माताने मध्य रात्रि में एक काले सर्प को अपने पास से पसार होते हुए देखा, तब तय किया की पुत्र का नाम 'पार्श्व' रखेंगे।

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Picture No. 3

३) प्रभु को जन्म से तीन ज्ञान थे। तीनो लोक को देख सकते थे ।

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PICTURE NO. 4

४) पार्श्वकुमार युवान हुए। एक दिन बहुत लोगो को नगर के बाहर जाते देखा। पंचाग्नि तप करनेवाले उग्र तपस्वी कमठ के समाचार मिलने पर, जलते हुए सर्प को बचाने वहां आए। सेवक द्वारा नवकार सुनाया, सर्प मरकर धरणेन्द्र बना।

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Picture No. 5

५) चित्रशाला में नेमिकुमार द्वारा जीवरक्षा का चित्र देखकर अपनी दीक्षा का निर्णय किया।

नव लोकांतिक देवोने दीक्षा के लिए विनंती की।

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PICTURE NO. 6

६) भगवान ने दीक्षा ली। उनके साथ ३०० पुण्यात्मा ने भी दीक्षा ली।

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Picture No. 7

७) भगवान के पारणा के समय देवो ने ४ दिव्य वृष्टी की और "अहो दानम्" की घोषणा की।

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Picture No. 8

८) एक बार प्रभु सरोवर के पास काउसग्ग ध्यान में थे, तब हाथीओ ने भगवान का प्रक्षाल किया और कमल अर्पण किया। हाथी मरकर देवलोक में गये।

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Picture No. 9

९) एक बार पूर्व भव के वैरी देव मेघमाली ने अतिवृष्टी की, तब घरणेन्द्र और पद्मावती भगवान की सेवा में आये ।

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Picture No. 10

१०) धरणेन्द्र ने मेघमाली को परास्त किया, अंत में मेघमाली को पश्चात्ताप हुआ और सम्यक्त्व की प्राप्ति हुई।

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PICTURE NO. 11

११) भगवान को केवलज्ञान की प्राप्ति हुई और भगवान ने चतुर्विध संघ रुपी तीर्थ की स्थापना की।

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Picture No. 12

१२) सम्मेतशिखर तीर्थ पर १ महिने का अनशन करते हुए प्रभु का निर्वाण हुआ ।

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