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नवोदय विद्यालय समिति
बाल रामकथा
कक्षा 6 के लिए पूरक पाठ्य पुस्तक
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राष्ट्रीय नेतृत्व संस्थान�उदयपुर-राजस्थन
बृजेश सिंह � [प्रशिक्षित स्नातक शिक्षक]
जवाहर नवोदय विद्यालय,हरदौरपुर-सीतापुर -||, (उ.प्र.)
विषय ˗ हिन्दी (कोर्स ‘अ’)
कक्षा 6 के लिए पूरक पाठ्य पुस्तक
एन.सी.ई.आर.टी. पाठ्य पुस्तक
सोने का हिरन
पाठ -7
राम को कुटी से निकलते देखकर मायावी हिरण कुलाचें भरने लगा । राम को बहुत छकाया । झाड़ियों में लुकता - छिपता - भागता वह राम को कुटी से बहुत दूर ले गया । राम जब भी उसे पकड़ने का प्रयास करते , वह भागकर और दूर चला जाता । हिरण चालाक था । वह इतनी दूर कभी नहीं जाता था कि पहुँच से बाहर लगे ।
राम के सारे प्रयास विफल हुए । वे हिरण को पकड़ नहीं पाए । उन्होंने उसे जीवित पकड़ने का विचार त्याग दिया । धनुष उठाया निशाना साधा । और एक बाण उस पर छोड़ दिया । बाण लगते ही हिरण गिर पड़ा । धरती पर गिरते ही मारीच अपने असली रूप में आ गया ।
मारीच ने माया से केवल अपना रूप नहीं बदला था । आवाज़ भी बदल ली थी । अपनी आवाज़ राम जैसी बना ली थी । धरती पर पड़े हुए वह ज़ोर से चिल्लाया , " हा सीते ! हा लक्ष्मण ! " ध्वनि ऐसी थी . जैसे बाण राम को लगा हो । वह सहायता के लिए पुकार रहे हों । बाण का प्रहार गहरा था । मारीच उसे अधिक देर तक सहन नहीं कर पाया । वह छटपटाता रहा । जल्दी ही उसके प्राण - पखेरू उड़ गए ।
रावण एक विशाल वृक्ष के पीछे खड़ा था । वह प्रसन्न था । उसकी चाल सफल हो गई थी । मारीच ने अपनी भूमिका अच्छी तरह निभाई थी । अब तक सब कुछ वैसा ही हुआ , जैसा उसने सोचा था । उसे राक्षस अकंपन की बात याद आई । सीता का हरण हो तो राम के प्राण कल जाएँगे । वह निशक्त हो जाएंगे। वह अगले चरण की तैयारी में जुट
गया ।
मारीच की पुकार राम ने सुनी। वह पास ही थे । उन्हें समझने में देर नहीं लगी कि पुकार की मंशा क्या है ! मायावी मारीच की पूरी चाल उनके सामने खुल गई । हिरण जानबूझकर भागता रहा । उन्हें कुटिया से दूर ले जाने के लिए । वह षड्यंत्र का अगला चरण विफल करना चाहते थे । उनकी चाल में तेजी आ गई ताकि जल्दी कुटिया पहुँच सकें ।
वह मायावी पुकार सीता और लक्ष्मण ने भी सुनी । लक्ष्मण उसका रहस्य तत्काल समझ गए । राम की तरह । उन्होंने बाण चढ़ाकर धनुष दृढ़ता से पकड़ लिया । चौकसी बढ़ा दी । वे राक्षसों की अगली चाल का सामना करने के लिए तैयार थे। साथ ही । राम का आदेश उन्हें याद था । उनके लौटने तक सीता की रक्षा । लक्ष्मण की ओर से इसमें चूक की कोई संभावना ही नहीं थी ।
सीता वह आवाज़ सुनकर विचलित हो गई । घबरा गईं । दौड़कर कुटिया के द्वार पर आईं । उन्होंने लक्ष्मण से कहा , " तुम जल्दी जाओ । जिस दिशा से आवाज़ आई है , उसी ओर । तुम्हारे भाई किसी कठिन संकट में फँस गए
हैं। उन्होंने सहायता के लिए पुकारा है । उनकी
ऐसी कातर आवाज़ मैंने कभी नहीं सुनी । जाओ लक्ष्मण । जल्दी । "
" आप चिंता न करें , माते! " लक्ष्मण ने सीता को आश्वस्त करते हुए कहा । " राम संकट में नहीं हैं । हो ही नहीं सकते । उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता । हमने जो आवाज़
सुनी , वह बनावटी है। मायावी राक्षसों की चाल है। मुझे कुटिया से दूर ले जाने के लिए । आप निश्चित रहें । भाई राम जल्दी ही आते होंगे । "
सीता क्रोध से उबल पड़ी । लक्ष्मण का इस घड़ी में इतना शांत होना उन्हें समझ में नहीं आया । राम की आवाज सुनकर भी वे यहीं खड़े रहे । सहायता के लिए नहीं गए । सीता को इसके पीछे षड्यंत्र दिखाई दिया । लक्ष्मण की चाल । लगा कि लक्ष्मण राम का भला नहीं चाहते । उनके हितैषी नहीं हैं । चाहते हैं कि राम न रहें । मारे जाएँ । ताकि राजपाट उन दोनों का हो जाए । उनके रास्ते का काँटा निकल जाए ।
" तुम्हारा मन पवित्र नहीं है । कलुषित है । पाप है उसमें । मैं समझ सकती हूँ कि तुम अपने भाई की सहायता के लिए क्यों नहीं जा रहे हो ! " सीता ने यहाँ तक कह दिया कि कहीं वे भरत के गुप्तचर तो नहीं हैं।
सीता की बातों से लक्ष्मण को गहरा आघात पहुँचा । उनका हृदय छलनी हो गया । पर उन्होंने पलटकर उत्तर नहीं दिया । संयम बनाए रखा । सिर झुकाकर सब चुपचाप सुन लिया । वे सीता की पीड़ा समझ पा रहे थे । केवल इतना बोले , " हे देवी ! यह राक्षसों का छल है । खर - दूषण के मारे जाने के बाद वे बौखला गए हैं । किसी तरह हमसे बदला लेना चाहते हैं । आप उनकी चाल में न आएँ । वे कुछ भी कर सकते हैं । मुझ पर विश्वास करें। राम को कुछ नहीं होगा । "
सीता का क्रोध और बढ़ गया। क्रोध में आँखों से आँसू बहने लगे । यह भी लग रहा था कि कहीं लक्ष्मण की बात सही न हो । यह डर था कि राम से विछोह न हो । उन्होंने कहा , " राम से बिछुडकर मैं नहीं रह सकती । मैं जान दे दूँगी ।हे लक्ष्मण तुम उन्हें लेकर आओ। " लक्ष्मण राम के लिए राम की आज्ञा का उल्लंघन कर रहे थे । उन्होंने सीता को प्रणाम किया और राम की खोज में निकल पड़े ।
लक्ष्मण के जाते ही रावण आ पहुँचा । तपस्वियो जैसा जटा - जूट । वैसे ही वस्त्र । सीता ने साधु समझकर उसका स्वागत किया । रावण ने सीता के स्वरूप , संस्कार और साहस की प्रशंसा की । उसने सीता का परिचय प्राप्त करने के बाद कहा , " सुमुखी ! मैं रावण हूँ । राक्षसों का राजा । लंकाधिपति । मेरा नाम लेने पर लोग थरथरा उठते हैं । लेकिन तुम सुंदरी हो । सबसे अलग हो । तुम्हारे लिए मैं स्वयं चलकर आया हूँ । मेरे साथ चलो । सोने की लंका में रहो । मेरी रानी बनकर । "
सीता क्रोधित हो उठीं । कहा , " मैं प्राण त्याग दूंगी लेकिन तुम्हारे साथ नहीं जाऊँगी । मैं राम की पत्नी हूँ । वे महाबलशाली हैं । तुम्हें उनकी शक्ति का अनुमान नहीं है । तुम चले जाओ नहीं तो तुम्हारा सर्वनाश हो जाएगा । "
रावण ने सीता की बात अनसुनी का दी । खींचकर उन्हें रथ में बैठा लिया । सीता प्रयास करती रहीं । पर गवण के चंगुल से मुक्त नहीं हो सकीं । स्वयं को असहाय पाकर वे विलाप करने लगीं । " हा राम ! हा लक्ष्मण ! " पुकारती रहीं । रावण का रथ लंका की ओर उड़ चला ।
मार्ग में वे पशओं , पक्षियों , पर्वतों , नदियों से कहती जा रही थीं कि कोई उनके राम को बता दे । रावण ने उनका हरण कर लिया है । गिद्धराज जटायु ने सीता का विलाप सुना । उसने ऊँची उड़ान भरी । रावण के रथ पर हमला कर दिया । वृद्ध गिद्धराज ने रथ क्षत - विक्षत कर दिया । रावण को घायल कर डाला । क्रोध में रावण ने जटायु के पंख काट दिए । जटायु अब उड़ नहीं सकता था । वह सीधे धरती पर आ गिरा ।
रावण का रथ टूट गया था । उड़ान नहीं भर सकता था । उसने तत्काल सीता को अपनी बाँहों में दबाया और दक्षिण दिशा की ओर उड़ने लगा । सीता को लगा कि अब संभवत: कोई उनकी सहायता नहीं कर पाएगा । उनका बचाव केवल एक ही था । राम को किसी तरह समाचार मिल जाए । उन्होंने अपने आभूषण उतारकर फेंकना प्रारंभ कर दिया ।
आभूषण वानरों ने उठा लिए । उन्हें आशा थी कि वानरों के पास ये आभूषण देखकर राम समझ जाएंगे । उन्हें पता चल जाएगा कि सीता किस मार्ग से गई हैं । रावण ने सीता को आभूषण फेंकने से नहीं रोका । उसे लगा कि सीता शोक में ऐसा कर रही हैं ।
कुछ ही समय में रावण लंका पहुँच गया । वह अपने धन - वैभव से सीता को प्रभावित करना चाहता था । उन्हें लेकर वह सीधा अपने अंत:पुर में गया । राक्षसियों को सीता की निगरानी करते रहने को कहा और बाहर निकल गया । थोड़ी देर में वह फिर लौटा । सीता को घूरते हुए उसने कहा , " सुंदरी ! मैं तुम्हें एक वर्ष का समय देता हूँ । निर्णय तुम्हें करना है । मेरी रानी बनकर लंका में राज करोगी या विलाप करते हुए जीवन बिताओगी । "
सीता बार - बार रावण को धिक्कारती रहीं । राम का गुणगान करती रहीं । रावण को क्रोध आ गया , " तुम्हारा राम यहाँ कभी नहीं पहुँच सकता । तुम्हें कोई नहीं बचा सकता । तुम्हारी रक्षा केवल मैं कर सकता हूँ । मुझे स्वीकार करो और लंका में सुख से रहो । "
" पापी रावण राम तुझे अपनी दृष्टि से । जलाकर राख कर सकते हैं । उनकी शक्ति देवता भी स्वीकार करते हैं । मैं उस राम की पत्नी हूँ , जिसके तेज और पराक्रम के आगे कोई नहीं ठहर सकता । तेरा सारा वैभव मेरे लिए अर्थहीन है । तूने पाप किया है । राम के हाथों तेरा अंत निश्चित है । "
राम की इतनी प्रशंसा सुनकर रावण कुछ चिंतित हो गया । उसने सोचा , खर - दूषण को मारने वाला अवश्य शक्तिशाली होगा । उसने तत्काल अपने आठ सबसे बलिष्ठ राक्षसों को बुलाया कहा , " तुम लोग पंचवटी जाओ । राम और लक्ष्मण वहीं रहते हैं । उनका एक - एक समाचार मुझे मिलना चाहिए । दोनों पर निगरानी रखो । मौका मिलते ही उन्हें मार डालो । "
उधर , सीता को पाने के लिए रावण ने अपनी योजना बदली । उन्हें अंत:पुर से निकालकर अशोक वाटिका में बंदी बना दिया गया । पहरा कड़ा कर दिया गया । राक्षसों - राक्षसियों को स्पष्ट निर्देश थे , " सीता को किसी तरह का शारीरिक कष्ट न हो । इसके मन को दु:ख पहुँचाओ । अपमानित करो । लेकिन सीता को कोई हाथ न लगाए । "
रावण ने सब कुछ किया पर सीता का मन नहीं बदला । वे बार - बार राम का नाम लेती थीं । शेरों के बीच हिरणी की तरह बैठी रहती थीं । डरी सहमी । रो रोकर दिन काट रही थी । सोने के हिरण ने उन्हें सोने की लंका में पहुँचा दिया था । यहाँ से उन्हें राम ही बचा सकते थे ।
शब्दार्थ / भाषा की बात
शब्द उपसर्ग + मूलशब्द
भाषा की बात
प्रमुख पात्र / स्थान
सारांश
निम्न बहुविकल्पी प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
1. मारीच कौन था ?
क. कबंध का भाई ख. रावण का मामा
ग. खर –दूषण का भाई घ. बाली का भाई
2. रावण क़ो चुनौती किसने दी ?
क. जटायु ने ख. हनुमान ने
ग. जामवंत ने घ. अंगद ने
3. रावण ने सीता को कहाँ पर रखा ?
क. महल में ख. कैद में ग. विभीषण के घर घ. आशोक वाटिका का में
4. जटायु भाई था ?
क. कबंध का ख. मारीच का
ग. हनुमान का घ. सम्पाती का
5 . सीता ने लक्ष्मण से क्या कहा ?
क. राम की सहायता ख. राम से युद्ध को
ग. कुटी में रेखा खींचने को घ. सेना भजने को
बहुविकल्पी प्रश्न
अतिलघुत्तरीय प्रश्न
प्रश्न-1. सोने का हिरण कौन बना था?
उत्तर- सोने का हिरण मारीच बना था ।
प्रश्न-2. राम को कुटिया से निकलते देख कर मायावी हिरण ने क्या किया?
उत्तर- राम को कुटिया से निकलते देख कर मायावी हिरण कुलाचें भरने लगा ।
प्रश्न-3. राम ने लक्ष्मण को क्या आदेश दिया था?
उत्तर- राम ने लक्ष्मण को उनके लौटने तक सीता की रक्षा का आदेश दिया था ।
प्रश्न-4. सीता क्या सुनकर विचलित हो गई?
उत्तर- सीता मायावी पुकार सुनकर विचलित हो गई ।
प्रश्न-5. सीता जी किसे -किसे अपनी सूचना रामजी तक पहुँचाने को कह रहीं थीं?
उत्तर- सीता जी पशुओं, पक्षियों, पर्वतों, नदियों से अपनी सूचना रामजी तक पहुँचाने को कह रहीं थीं ।
लघुत्तरीय
प्रश्न-1 रथ टूट जाने पर रावण किस प्रकार सीता को ले गया?
उत्तर - रथ टूट जाने पर रावण ने तत्काल सीता को अपनी बाँहों में दबाया और दक्षिण दिशा की ओर उड़ने लगा ।
प्रश्न-2 सीता के कटु शब्दों का लक्ष्मण पर क्या असर हुआ?
उत्तर - सीता की बातों से लक्ष्मण को गहरा आघात पहुँचा । उनका हृदय छलनी हो गया । पर उन्होंने पलटकर उत्तर नहीं दिया । सयम बनाए रखा ।
प्रश्न-3 मारीच की मृत्यु कैसे हुई?
उत्तर - मारीच ने हिरण का रूप धारण किया था । जब राम ने हिरण पर बाण चलाया, हिरण बाण लगने से गिर गया । मारीच अपने असली रूप में आ गया पर जल्दी ही उसके प्राण पखेरू उड़ गए ।
प्रश्न-4 किस डर की आशंका से सीता की आँखों से आँसू बहने लगे?
उत्तर- सीता की आँखों से आँसू बहने लगे क्योंकि उन्हें डर था कि कहिं वह राम से बिछड़ न जाएँ ।
प्रश्न-5 “लक्ष्मण राम के लिए राम की आज्ञा का उल्लंघन कर रहे थे ।” स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर- राम ने लक्ष्मण को सीता की रक्षा करने का आदेश दिया था पर सीता के कहने पर लक्ष्मण को उनको छोड़ कर राम को ढूंढने जंगल में जाना पड़ा ।
प्रश्न-1. राम के सारे प्रयास क्यों विफल हो गए और अंत में उन्होंने क्या किया?
उत्तर- राम के सारे प्रयास विफल हो गए क्योंकि वो हिरण को नहीं पकड़ पाए । अंत में उन्होंने अपना धनुष उठाया और एक बाण उस पर छोड़ दिया । बाण लगते ही हिरण गिर पड़ा ।
प्रश्न-2. मायावी पुकार सुनते ही लक्ष्मण ने क्या किया?
उत्तर- मायावी पुकार का रहस्य लक्ष्मण तत्काल समझ गए इसलिए उन्होंने बाण चढ़ाकर धनुष ढृढ़ता से पकड़ लिया और चौकसी बढ़ा दी । वे राक्षसों की अगली चाल का सामना करने के लिए तैयार हो गए ।
प्रश्न-3. राम की आवाज सुनकर भी लक्ष्मण को शांत खड़े देखकर सीता ने क्या सोचा?
उत्तर- सीता को इसके पीछे लक्ष्मण का षड्यंत्र लगा । सीता को लगा कि लक्ष्मण राम का भला नहीं चाहते हैं । वो चाहते हैं कि राम मारे जाएँ ताकि राजपाठ दोनों भाईयों का हो जाए । भरत के गुप्तचर तो नहीं।
दीर्घ उत्तरीय
किसने किससे कहा ?
प्रश्न- निम्न कथन किसने किससे कहा ?
i. “तुम्हारा मन पवित्र नहीं है । कलुषित है । पाप है उसमें।”
सीता ने लक्ष्मण से कहा ।
ii. “हे देवी! यह राक्षसों का छल है । खर दूषण के मारे जाने के
बाद वे बौखला गए हैं ।”
लक्ष्मण ने सीता से कहा ।
iii. “सुमुखी! मैं रावण हूँ ।राक्षसों का राजा ।लंकाधिपति ।मेरा नाम लेने पर लोग थरथरा उठते हैं ।”
रावण ने सीता से कहा ।
iv. “तुम्हारा राम यहाँ कभी नहीं पहुँच सकता । तुम्हें कोई नहीं बचा सकता ।”
रावण ने सीता से कहा ।
v. “तुमलोग पंचवटी जाओ। राम और लक्ष्मण वहीं रहते हैं । उनका एक-एक समाचार मुझे मिलना चाहिए ।”
रावण ने राक्षसों से कहा ।
स्मरणीय तथ्य
गृहकार्य
प्रश्न-1 राम मारीच की माया समझकर क्या सोच रहे थे?
प्रश्न-2 राम सीता के लिए क्यों चिंतित हो रहे थे ?
प्रश्न-3 लक्ष्मण को राम की सहायता के लिये न जाते देख सीता के मन में किस प्रकार के सवाल उठने लगे?
प्रश्न-4 सीता लक्ष्मण से क्यों क्रोधित थीं ?
प्रश्न-5 प्र ,वि ,उत उपसर्ग से दो –दो नए शब्द बनाओ ?
प्रश्न-6 किसने किससे कहा?
i. “सुंदरी ! मैं तुम्हें एक वर्ष का समय देता हूँ । निर्णय तुन्हे करना है । मेरी रानी बनकर लंका पर राज करोगी या विलाप करते हुए जीवन बिताओगी ।”
धन्यवाद