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JEEVAK AYURVEDIC MEDICAL COLLEGE AND HOSPITAL RESEARCH CENTRE �

SUBMITTED TO-

DR. AMIT KUMAR SINGH

(ASSOCIATE PROFESSOR AND HOD)

DR. VARSHA GUPTA

(ASSISTANT PROFESSOR)

SUBMITTED BY

SANIA SULTAN

BAMS BATCH (23-24)

Roll no.-16

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कला शरीर परिचय

यह एक पतला स्निग्ध, चमकदार व क्लेदयुक्त आवरण होता है। यह आवरण शरीर में स्थित विभिन्न प्रकार के प्रत्यङ्गों, कोष्ठाङ्गों, आशयों, धमनियों, पेशियों आदि को आच्छादन करता है। कहा भी है, यथा -

‘’कला खल्वपि सप्त संभवन्ति धात्वाशयान्तरमर्यादाः।�यथाहि सारः काष्ठेषु छिद्यमानेषु दृश्यते।�तथा धातुर्हि मांसेषु छिद्यमानेषु दृश्यते।�स्नायुभिश्च प्रतिच्छन्नान् संततांश्च जरायुणा।�श्लेष्मणा वेष्टितांश्चापि कला भागांस्तु तान् विदुः॥”�(सु०शा० 4/4-6)

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  • शरीर में सात कलाएँ होती हैं। ये कलाएँ धातु व आशय इनके बीच की मर्यादा होती हैं । अर्थात् काष्ठ (लकड़ी) को तोड़ने से जैसे उसमें से सार निकलता है। उसी प्रकार मांस का छेदन करने से उसमें स्थित धातु दिखती है। यही कला होती है। ये कलाएँ स्थान-स्थान पर स्नायु, जरायु या श्लेष्मा से आच्छादित रहती हैं।
  • आयुर्वेद के विभिन्न शास्त्रीय ग्रंथों में , कला को एक शारीरिक संरचना के रूप में वर्णित किया गया है, जो धातु और आशा को अलग करती है , अर्थात यह धातु और आशा के बीच सीमा प्रदान करती है।
  • इसे धातुशयंतरमर्यादा भी कहा जाता है L

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कला शरीर के भेद

  • आयुर्वेद के अनुसार कला शरीर की संख्या सात होती है, जो कि निम्न प्रकार से हैं –
  • 1. मांसधरा कला
  • 2. रक्तधरा कला
  • 3. मेदोधरा कला
  • 4. श्लेष्मधरा कला
  • 5. मलधरा या पुरीषधरा कला
  • 6. पित्तधरा कला
  • 7. शुक्रधरा कला

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पित्तधरा कला �

षष्ठी पित्तधरानाम,�या चतुर्विधमनपानमुपभुक्तमामाशयात्प्रच्युत पक्वाशयोपस्थितं धारयति�अशितं खादितं पीतं लीढं कोष्ठगते नृणाम्।�तज्जीर्यति यथाकालं शोषितं पित्ततेजसा। (सु०शा० 4/17-18)

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पित्तधरा कला –

  • यहाँ पर पित्त से तात्पर्य पाचक पित्त से है। पाचक पित्त से ग्रहणी व लघ्वान्त्र के स्रावों से मान सकते हैं। यह पित्त चतुर्विध आहार का पाचन करता है। यह पित्त पित्तधरा कला में रहता है। इसे DUODENUM A SMALL INTESTINE को MUCOUS MEMBRANE मान सकते हैं। यह आहार का पाचन करने में सहायक होती है।

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�पित्तधारा कला�यह छठी कला है । इसमें चार प्रकार के भोजन होते हैं अशिता , खादित , पित्त और लीध । इन चार प्रकार के भोजन का पाचन अग्नि की सहायता से पित्तधारा कला में होता है और पचा हुआ भोजन इसमें अवशोषित होता है। [7] पित्तधारा कला वह भाग है जो पाकवाशया और अमाशय के बीच में स्थित होता है जिसे ग्रहणी कहा जाता है और इसका उचित कार्य प्राकृत अग्नि पर निर्भर करता है । [8] अगर हम इसे आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार देखें तो यह पेट के पाइलोरिक भाग से लेकर इलियोसीकल जंक्शन तक का भाग है। इस भाग में म्यूकोसा में मौजूद ग्रंथियों द्वारा कई एंजाइम स्रावित होते हैं जो पाचन के लिए आवश्यक होते हैं। दल्हना ने कहा है कि पित्तधारा कला को मज्जधर कला भी कहा जाता है |

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  • । [3] पेट और छोटी आंत कई पोषक तत्वों जैसे विटामिन बी 12, आयरन और फोलिक एसिड आदि को अवशोषित करते हैं। पित्तधारा कला स्नायुओं से बनी होती है जो पेशी तंतुओं के साथ सह-संबंधित हो सकती है, श्लेष्मा श्लेष्म झिल्ली के साथ सह-संबंधित हो सकती है और जरायु सीरस झिल्ली के साथ सह-संबंधित हो सकती है।�आंत में एंटरोक्रोमैफिन कोशिकाएँ मौजूद होती हैं। ये कोशिकाएँ सेरोटोनिन का उत्पादन करती हैं। LRP5 सेरोटोनिन के उत्पादन को नियंत्रित करता है। यदि अधिक सेरोटोनिन का उत्पादन होता है तो हड्डियों का निर्माण कम हो जाता है। यदि सेरोटोनिन का उत्पादन बाधित या कम हो जाता है तो हड्डियों का निर्माण बढ़ जाता है। [9]

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�काल एक संरचना है जो स्नायु , जरायु और श्लेष्मा से बनी है । [6] स्नायु को मांसपेशी फाइबर या पेशी कोट के साथ सह-संबंधित किया जा सकता है, श्लेष्मा को श्लेष्म झिल्ली के साथ सह-संबंधित किया जा सकता है और जरायु को सीरस झिल्ली के साथ सह-संबंधित किया जा सकता है। पित्तधारा काल पक्वा-अमशय मध्यस्थ है जो ग्रहण है । यह पेट के पाइलोरिक भाग से इलियोसेकल जंक्शन तक शुरू होने वाली संरचना के साथ सह-संबंधित हो सकता है।

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। अगर हम संरचना को देखें झिल्ली में ग्रंथियां होती हैं। इन ग्रंथियों के स्राव पाचन के लिए आवश्यक हैं। यह पचा हुआ भोजन पित्तधारा कला द्वारा भी अवशोषित किया जाता है । दल्हण के अनुसार , पित्तधारा कला को मज्जधरकला कहा जाता है । [3] मज्ज छठी धातु है । मज्जक्षय के लक्षण अस्थिसौशिर्य , भ्रम , तिमिर्दर्शन हैं । [10] अस्थिसौशिर्य को ऑस्टियोपोरोसिस से सह-संबंधित किया जा सकता है

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  • आंत में एंटरोक्रोमैफिन कोशिकाएं मौजूद होती हैं जो आंत में सेरोटोनिन का उत्पादन करती हैं और फिर इसे रक्त में छोड़ती हैं। यह हड्डियों तक पहुंचता है और ओस्टियोब्लास्ट की सतह पर HTR1B रिसेप्टर के साथ बंध जाता यदि पित्तधारा कला का सामान्य कार्य बिगड़ जाता है तो इसके परिणामस्वरूप सेरोटोनिन का अधिक उत्पादन हो सकता है जिससे ऑस्टियोपोरोटिक परिवर्तन होता है जो कि मज्जाक्षय का लक्षण है । इसलिए हम कह सकते हैं कि पित्तधारा कला सा एव मज्जाधर कला । ऑस्टियोपोरोसिस के रोगियों के इलाज के लिए यह अध्ययन अधिक लाभकारी होगा। हमें पहले पित्तधारा कला का इलाज करने पर विचार करना चाहिए ।

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KALA

  • KALA ARE VERY MUCH NEGLECTED IN THE CLINICAL MEDICINE�KALA POSSESS MAJOR IMPORTANCE IN THE BODY�MANY DISEASES OF PRESENT DAY ARE SPECIFICALLY�KALA CONCERN, SUCH AS – O GRAHANI (PITTADHARAKALA)�• DURMEDAS (MEDODHARA KALA)�O INFERTILITY (SUKRA DHARA KALA)�• MUSCULO SKELETAL PROBLEMS (MAMSADHARA KALA)�OI.B.S ( PUREESHADHARA KALA) ETC.

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  • MANY A TIMES WE NEVER THINK OF UNDERSTANDING THE STRUCTURAL DISTURBANCES IN THE BODY AND RECTIFICATION OF THE STRUCTURAL INTEGRITY DISTURBED BY THE DOSHA IN THE BODY�APART FROM THE RECTIFICATION AND PACIFICATION OF THE DOSHA OUT OF SROTODUSTI LAKSHANA – ATIPRAVRUTTI & APRAVRUTTI (SANGA) – SIRA GRANTHI & VIMARGAGAMANA ARE ESSENTIAL TO EXAMINE IN DETAIL�RECTIFY THE STRUCTURAL AND FUNCTIONAL DISTURBANCES OF KALA WITH SPECIAL REFERENCE TO KAYACHIKITSA

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  • KALA DIVISION�1) MAMSADHARA KALA��2) RAKTADHARA KALA��3) MEDODHARA KALA��4) SHLESHMADHARA KALA��5) PUREESHADHARA KALA��6) PITTADHARA KALA��7) SHUKRADHARA KALA

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  • PITTADHARA KALA�O PITTADHARA KALA IS 6TH IN ORDER O RECEIVES WHEN THE FOOD IS PROPELLED FROM AMASHAYA HOLDS IN THE PAKWASHAYA – THE FOUR VERITIES OF FOOD INGESTED
  • • FUNCTIONS OF PITTADHARAKALA ARE ENUMERATED BY – O GRAHANA – COLLECTION (GRAHANA�PITTADHARAKALA – AMASHAYASTHA)�O PACHANA – DIGESTION (PACHANA�PITTADHARAKALA – PACHYAMANASHAYASTHA)�O VIVECHANA & MUMUNCHANA – SEPARATION & ABSORPTION (VIVECHANA PITTADHARAKALA�- PAKWASHAYASTHA)