1 of 33

सहर्ष स्वीकारा है

- गजानन माधव ‘मुक्तिबks’ 

आरोह भाग –दो कक्षा-बारहवीं

2 of 33

जीवन परिचयप्रयोगवादी काव्यधारा के प्रतिनिधि कवि गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’ का जन्म मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले के श्योपुर नामक स्थान पर 1917 ई० में हुआ था। इनके पिता पुलिस विभाग में थे। अत: निरंतर होने वाले स्थानांतरण के कारण इनकी पढ़ाई नियमित व व्यवस्थित रूप से नहीं हो पाई। 1954 ई. में इन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से एम०ए० (हिंदी) करने के बाद राजनादगाँव के डिग्री कॉलेज में अध्यापन कार्य आरंभ किया। इन्होंने अध्यापन, लेखन एवं पत्रकारिता सभी क्षेत्रों में अपनी योग्यता, प्रतिभा एवं कार्यक्षमता का परिचय दिया।

मुक्तिबोध को जीवनपर्यत संघर्ष करना पड़ा और संघर्षशीलता ने इन्हें चिंतनशील एवं जीवन को नए दृष्टिकोण से देखने को प्रेरित किया। 1964 ई० में यह महान चिंतक, दार्शनिक, पत्रकार एवं सजग लेखक तथा कवि इस संसार से चल बसा।

कवि परिचय

3 of 33

रचनाएँ

(i) कविता-संग्रह- चाँद का मुँह टेढ़ा है, भूरी-भूरी खाक-धूल।�(ii) कथा-साहित्य- काठ का सपना, विपात्र, सतह से उठता आदमी।�(iii) आलोचना- कामायनी-एक पुनर्विचार, नई कविता का आत्मसंघर्ष, नए साहित्य का सौंदर्यशास्त्र, समीक्षा की समस्याएँ एक साहित्यिक की डायरी।�(iv) भारत-इतिहास और संस्कृति।

4 of 33

भाषा-शैली

 इनकी भाषा उत्कृष्ट है। भावों के अनुरूप शब्द गढ़ना और उसका परिष्कार करके उसे भाषा में प्रयुक्त करना भाषा-सौंदर्य की अद्भुत विशेषता है।

इन्होंने तत्सम शब्दों के साथ-साथ उर्दू, अरबी और फ़ारसी के शब्दों का भी प्रयोग किया है।

5 of 33

कविता का प्रतिपादय

 मुक्तिबोध की कविताएँ आमतौर पर लंबी होती हैं। इन्होंने जो भी छोटी कविताएँ लिखी हैं उनमें एक है ‘सहर्ष स्वीकारा है‘ जो ‘भूरी-भूरी खाक-धूल‘ काव्य-संग्रह से ली गई है। एक होता है-‘स्वीकारना’ और दूसरा होता है-‘सहर्ष स्वीकारना’ यानी खुशी-खुशी स्वीकार करना। यह कविता जीवन के सब सुख-दुख, संघर्ष-अवसाद, उठा-पटक को सम्यक भाव से अंगीकार करने की प्रेरणा देती है। कवि को जहाँ से यह प्रेरणा मिली, कविता प्रेरणा के उस उत्स तक भी हमको ले जाती है।�उस विशिष्ट व्यक्ति या सत्ता के इसी ‘सहजता’ के चलते उसको स्वीकार किया था-कुछ इस तरह स्वीकार किया था कि आज तक सामने नहीं भी है तो भी आस-पास उसके होने का एहसास है-

मुस्काता चाँद ज्यों धरती पर रात-भरमुझ पर त्यों तुम्हारा ही खिलता वह चेहरा है!

6 of 33

कविता का मूल

प्रतिपाद्य

. कवि कहता है कि मेरे जीवन में जो कुछ भी है, वह मुझे सहर्ष स्वीकार है। मुझे जो कुछ भी मिला है, वह तुम्हारा दिया हुआ है तथा तुम्हें प्यारा है। मेरी गरबीली गरीबी, विचार-वैभव, गंभीर अनुभव, दृढ़ता, भावनाएँ आदि सब पर तुम्हारा प्रभाव है। तुम्हारे साथ मेरा न जाने कौन-सा नाता है कि मैं जितनी भी भावनाएँ बाहर निकालने का प्रयास करता हूँ, वे भावनाएँ उतनी ही अधिक उमड़ती रहती हैं। तुम्हारा चेहरा मेरी ऊपरी धरती पर चाँद के समान अपनी कांति बिखेरता रहता है।� कवि कहता है कि “मैं तुम्हारे प्रभाव से दूर जाना चाहता हूँ क्योंकि मैं भीतर से दुर्बल पड़ने लगा हूँ। तुम्हीं मुझे दंड दो ताकि मैं दक्षिण ध्रुव की अंधकारमयी अमावस्या की रात्रि के अँधेरों में लुप्त हो जाऊँ। मैं तुम्हारे उजालेपन को अधिक सहन नहीं कर पा रहा हूँ। तुम्हारी ममता की कोमलता भीतर से चुभने-सी लगी है। मेरी आत्मा कमजोर पड़ने लगी है।” वह स्वयं को पाताली अँधेरों की गुफाओं में लापता होने की बात कहता है, किंतु वहाँ भी उसे प्रियतम का सहारा है।

7 of 33

  • 1.जिंदगी में जो कुछ हैं, जो भी है� सहर्ष स्वीकार है
  • इसलिए कि जो कुछ भी मेरा हैं�वह तुम्हें प्यारा हैं।�गरबीली गरीबी यह, ये गंभीर अनुभव सब�यह विचार-वैभव सब
  • द`ढ़ता यह, भीतर की सरिता यह अभिनव सब�मौलिक है, मौलिक है�इसलिए कि पल-पल में�जो कुछ भी जाग्रत हैं अपलक हैं-�संवेदन तुम्हारा हैं!! 

सरिता

8 of 33

 सरिता – नदी

भीतर की सरिता – भावनाओं की नदी

  अभिनव– नया

 मौलिक– नया

 जाग्रत– जागा हुआ

 अपलक –निरंतर

 संवेदन – अनुभूति

हर्ष - खुशी

 स्वीकारा – स्वीकार करना

 गरबीली – स्वाभिमान से युक्त

 गंभीर – गहरा

 अनुभव – व्यावहारिक ज्ञान

 विचार-वैभव – विचारों की सम्पदा

द`ढ़ता– मजबूती

 

शब्दार्थ

9 of 33

कवि कहता है कि मेरी जिंदगी में जो कुछ है, जैसा भी है, उसे मैं खुशी से स्वीकार करता हूँ। इसलिए मेरा जो कुछ भी है, वह उसको (माँ या प्रिया) अच्छा लगता है। मेरी स्वाभिमानयुक्त गरीबी, जीवन के गंभीर अनुभव, विचारों का वैभव, व्यक्तित्व की दृढ़ता, मन में बहती भावनाओं की नदी-ये सब मौलिक हैं तथा नए हैं। इनकी मौलिकता का कारण यह है कि मेरे जीवन में हर क्षण जो कुछ घटता है, जो कुछ जाग्रत है, उपलब्धि है, वह सब कुछ तुम्हारी प्रेरणा से हुआ है।

व्याख्या

10 of 33

विशेष

(i) कवि अपनी हर उपलब्धि का श्रेय उसको (माँ या प्रिया) देता है।�(ii) संबोधन शैली है।�(iii) ‘मौलिक है’ की आवृत्ति प्रभावी बन पड़ी है।�(iv) ‘विचार-वैभव’ और ‘भीतर की सरिता’ में रूपक अलंकार

(v) ‘पल-पल’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।�(vi) ‘सहर्ष स्वीकारा’, ‘गरबीली गरीबी’, ‘विचार-वैभव’ में अनुप्रास अलंकार की छटा है।�(vii) खड़ी बोली है।�(viii) काव्य की रचना मुक्तक छंद में है, जिसमें ‘गरबीली’, ‘गंभीर’ आदि विशेषणों का सुंदर प्रयोग है।

11 of 33

2.जाने क्या रिश्ता हैं, जाने क्या नाता हैं�जितना भी ऊँड़ेलता हूँ भर-भर फिर आता हैं�दिल में क्या झरना है?�मीठे पानी का सोता हैं

भीतर वह, ऊपर तुम�मुसकता चाँद ज्यों धरती पर रात-भर�मुझ पर त्यों तुम्हारा ही खिलता वह चेहरा हैं!

12 of 33

शब्दार्थ

रिश्ता  रक्त संबंध। 

नाता  संबंध।

 ऊँड़ेलना - प्रकट करना |

सोता झरना।

13 of 33

व्याख्या-

कवि कहता है कि तुम्हारे साथ न जाने कौन-सा संबंध है या न जाने कैसा नाता है कि मैं अपने भीतर समाये हुए तुम्हारे स्नेह रूपी जल को जितना बाहर निकालता हूँ, वह फिर-फिर चारों ओर से सिमटकर चला आता है और मेरे हृदय में भर जाता है। ऐसा लगता है मानो दिल में कोई झरना बह रहा है। वह स्नेह मीठे पानी के स्रोत के समान है जो मेरे अंतर्मन को तृप्त करता रहता है। इधर मन में प्रेम है और उधर तुम्हारा चाँद जैसा मुस्कराता हुआ चेहरा अपने अद्भुत सौंदर्य के प्रकाश से मुझे नहलाता रहता है। कवि का आंतरिक व बाहय जगत-दोनों उसी स्नेह से युक्त स्वरूप से संचालित होते हैं।

14 of 33

(i) कवि अपने प्रिय के स्नेह से पूर्णत: आच्छादित है।�(ii) ‘दिल में क्या झरना है’ में प्रश्न अलंकार है।�(iii) ‘भर-भर’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है,’जितना भी उँड़ेलता हूँ भर-भर फिर आता है’ में विरोधाभास अलंकार है, ‘मीठे पानी का सोता है’ में रूपक अलंकार है, प्रिय के मुख की चाँद के साथ समानता के कारण उपमा अलंकार है।�(iv) मुक्तक छंद है।�(v) खड़ी बोली युक्त भाषा में लाक्षणिकता है।

विशेष

15 of 33

3. सचमुच मुझे दंड दो कि भूलूँ मैं भूलूँ मैंतुम्हें भूल जाने कीदक्षिण ध्रुवी अंधकार-अमावस्याशरीर पर, चेहरे पर, अंतर में पा लूँ मैंझेलूँ मैं, उसी में नहा लूँ मैंइसलिए कि तुमसे ही परिवेटित आच्छादितरहने का रमणीय यह उजेला अबसहा नहीं जाता हैं।नहीं सहा जाता है।                                                  .

16 of 33

 दंड– सजा। 

दक्षिण ध्रुवी अंधकार- दक्षिण ध्रुव पर छाने वाला गहरा औधेरा। 

अमावस्या- चंद्रमाविहीन काली रात।

 अंतर- हृदय, अंत:करण। 

परिवेटित- चारों ओर से घिरा हुआ। 

आच्छादित- छाया हुआ, ढका हुआ।

 रमणीय- मनोरम। उजेला- प्रकाश। 

शब्दार्थ

17 of 33

- कवि अपने प्रिय स्वरूपा को भूलना चाहता है। वह चाहता है कि प्रिय उसे भूलने का दंड दे। वह इस दंड को भी सहर्ष स्वीकार करने के लिए तैयार है। प्रिय को भूलने का अंधकार कवि के लिए दक्षिणी ध्रुव पर होने वाली छह मास की रात्रि के समान होगा। वह उस अंधकार में लीन हो जाना चाहता है। वह उस अंधकार को अपने शरीर, हृदय पर झेलना चाहता है। इसका कारण यह है कि प्रिय के स्नेह के उजाले ने उसे घेर लिया है। यह उजाला अब उसके लिए असहनीय हो गया है।

व्याख्या

18 of 33

(i) कवि अत्यधिक मोह से अलग होना चाहता है।�(ii) संबोधन शैली है।�(iii) खड़ी बोली में सशक्त अभिव्यक्ति है, जिसमें तत्सम शब्दों की बहुलता है।�(iv) अंधकार-अमावस्या निराशा के प्रतीक हैं।�(v) ’, ‘दक्षिण ध्रुव अंधकार-अमावस्या’ में रूपक अलंकार,

(vi)’छटपटाती छाती’ मWaडराती कोमलता में अनुप्रास अलंकार, तथा ‘बहलाती-सहलाती’ में स्वर मैत्री अलंकार है।�(vii) कोमलता व आत्मीयता का मानवीकरण किया गया है।�(viii) ‘सहा नहीं जाता है’ की पुनरुक्ति से दर्द की गहराई का पता चलता है।

विशेष

19 of 33

ममता के बदल की माँडराती कोमलताभीतर पिरती हैकमज़ोर और अक्षम अब हो गई है आत्मा यहछटपटाती छाती को भवित व्यता डराती हैबहलाती – सहलाती आत्मीयता बरदाश्त नहीं होती है ! 

20 of 33

शब्दार्थ

  • ममता- अपनापन, स्नेह। 
  • माँडराती- छाई हुई।
  • पिरातादर्द करना।
  • अक्षम- अशक्त। 
  • भवितव्यता- भविष्य की आशंका।
  •  बहलाती- मन को प्रसन्न करती।
  • सहलाती- दर्द को कम करती हुई।
  • आत्मीयता- अपनापन।

21 of 33

-  प्रिय की ममता या स्नेह रूपी बादल की कोमलता सदैव उसके भीतर मैंडराती रहती है। यही कोमल ममता उसके हृदय को पीड़ा पहुँचाती है। इसके कारण उसकी आत्मा बहुत कमजोर और असमर्थ हो गई है। उसे भविष्य में होने वाली अनहोनी से डर लगने लगा है। उसे भीतर-ही-भीतर यह डर लगने लगा है कि कभी उसे अपनी प्रियतमा (माँ या प्रिया) प्रभाव से अलग होना पड़ा तो वह अपना अस्तित्व कैसे बचाए रख सकेगा। अब उसे उसका बहलाना, सहलाना और रह-रहकर अपनापन जताना सहन नहीं होता। वह आत्मनिर्भर बनना चाहता है।

व्याख्या

22 of 33

(i) कवि अत्यधिक मोह से अलग होना चाहता है।�(ii) संबोधन शैली है।�(iii) खड़ी बोली में सशक्त अभिव्यक्ति है, जिसमें तत्सम शब्दों की बहुलता है।�(iv) Hkk’kk fu>Zj ds leku fdlh Hkh ca/ku ls eqDr gSA(v) ‘ममता के बादल’, ‘’ में रूपक अलंकार,

(vi)’छटपटाती छाती’ मWaडराती कोमलता में अनुप्रास अलंकार, तथा ‘बहलाती-सहलाती’ में स्वर मैत्री अलंकार है।�(vii) कोमलता व आत्मीयता का मानवीकरण किया गया है।�(viii) ‘सहा नहीं जाता है’ की पुनरुक्ति से दर्द की गहराई का पता चलता है।

विशेष

23 of 33

सचमुच मुझे दंड दो कि हो जाऊँपाताली अँधेरे की गुहाओं में विवरों मेंधुएँ के बादलों मेंबिलकुल मैं लापतालापता कि वहाँ भी तो तुम्हारा ही सहारा है !!

इसलिए कि जो कुछ भी मेरा हैया मेरा जो होता-सा लगता हैं, होता-सा संभव हैंसभी वह तुम्हारे ही कारण के कार्यों का घेरा है, कार्यों का वैभव हैअब तक तो जिंदगी में जो कुछ था, जो कुछ हैसहर्ष स्वीकार हैइसलिए कि जो कुछ भी मेरा हैवह तुम्हें प्यारा हैं।  

24 of 33

शब्दार्थ

पाताली आँधेरा- धरती की गहराई में पाई जाने वाली धुंध। 

गुहा- गुफा।

 विवर- बिल। 

लापता- गायब। 

कारण- मूल प्रेरणा। 

घेरा- फैलाव। 

वैभव-समृद्ध।

25 of 33

कवि कहता है कि मैं अपनी प्रियतमा (सबसे प्यारी स्त्री) के स्नेह से दूर होना चाहता हूँ। वह उसी से दंड की याचना करता है। वह ऐसा दंड चाहता है कि प्रियतमा के न होने से वह पाताल की अँधेरी गुफाओं व सुरंगों में खो जाए। ऐसी जगहों पर स्वयं का अस्तित्व भी अनुभव नहीं होता या फिर वह धुएँ के बादलों के समान गहन अंधकार में लापता हो जाए जो उसके न होने से बना हो। ऐसी जगहों पर भी उसे अपने सर्वाधिक प्रिय स्त्री का ही सहारा है।

उसके जीवन में जो कुछ भी है या जो कुछ उसे अपना-सा लगता है, वह सब उसके कारण है। उसकी सत्ता, स्थितियाँ भविष्य की उन्नति या अवनति की सभी संभावनाएँ प्रियतमा के कारण हैं। कवि का हर्ष-विषाद, उन्नति-अवनति सदा उससे ही संबंधित हैं। कवि ने हर सुख-दुख, सफलता-असफलता को प्रसन्नतापूर्वक इसलिए स्वीकार किया है क्योंकि प्रियतमा ने उन सबको अपना माना है। वे कवि के जीवन से पूरी तरह जुड़ी हुई हैं। 

व्याख्या-

26 of 33

विशेष

(i) कवि ने अपने व्यक्तित्व के निर्माण में प्रियतमा के योगदान को स्वीकार किया है।�(ii) ‘पाताली औधेरे’ ‘धुएँ के बादल’ आदि उपमान विस्मृति के लिए प्रयुक्त हुए हैं।�(iii) ‘दंड दो’ में अनुप्रास अलंकार है।�(iv) ‘लापता कि . सहारा है!’ में विरोधाभास अलंकार है।�(v) काव्यांश में खड़ी बोली का प्रयोग है।�(vi) मुक्तक छंद है।

vii) संबोधन शैली है।�(viii) खड़ी बोली में सशक्त अभिव्यक्ति है, जिसमें तत्सम शब्दों की बहुलता है।�

27 of 33

1टिपण्णी कीजिए :

गरबीली गरीबी,

भीतर की सरिता, बहलाती – सहलाती आत्मीयता,

ममता के बादल। 

उत्तर-�गरबीली गरीबी-इससे तात्पर्य है कि गरीबी में भी स्वाभिमान को बचाए रखना, किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना। अपने को दीन रूप में प्रस्तुत न करना। अपने कर्म पर विश्वास करना। भीतर की सरिता-से अभिप्राय मानवीय संवेदना से है। जिस व्यक्ति के मन में संवेदनाओं की नदी नहीं होगी वह मानव हो ही नहीं सकता। वह तो स्वार्थी और अहंकारी होगा। बहलाती सहलाती आत्मीयता-कवि कहता है कि सर्वहारा वर्ग के प्रति मेरी सहानुभूति ही मुझे बहलाती और सहलाती है कि मैं स्वार्थी न बनें। इसी सहानुभूति ने मुझे इस वर्ग से जोड़ रखा है। ममता के बादल-इससे कवि का तात्पर्य है कि मेरे मन में ममता रूपी बादल उँमड़ते रहते हैं। इन्हीं के कारण मेरा मन सर्वहारा वर्ग से जुड़े रहना चाहता है। कवि कहता है कि ममता के बादलों ने ही मुझे इस वर्ग से रिश्ता बनाए रखने को प्रेरित किया।

अभ्यास

प्रश्न

28 of 33

2. इस कविता में और भी टिप्पणी-योग्य पद-प्रयोग है। एसे किसी एक प्रयोग का अपनी ओर से उल्लेख करके उस पर टिप्पणी करें।

इस कविता में अनेक पद टिप्पणी योग्य हैं। ऐसा ही एक पद है-दिल में क्या झरना है?-इसका अर्थ यह है कि जिस प्रकार झरने में चारों तरफ की पहाड़ियों से पानी इकट्ठा हो जाता है, उसे आप जितना चाहे खाली करने का प्रयास करें, वह खाली नहीं होता यह झरना पर्वत या पहाड़ी के दिल के पानी से बनता है, उसी प्रकार कवि के हृदय में भी प्रियतमा के प्रति स्नेह उमड़ता है। वह बार-बार अपनी भावनाएँ व्यक्त करता है, परंतु भावनाएँ कम होने की बजाय और अधिक उमड़कर आ जाती हैं। कवि कहना चाहता है कि उसके मन में प्रियतमा के प्रति अत्यधिक प्रेम है। वह झरने के समान है, जो कभी समाप्त नहीं होता।

29 of 33

3. व्याख्या कीजिए :जाने क्या रिश्ता है, जाने क्या नाता हैजितना भी उँडेलता हूँ, भर-भर फिर आता है।दिल में क्या झरना है?मीठे पानी का सोता हैभीतर वह, ऊपर तुममुझ पर त्यों तुम्हारा ही खिलता वह चेहरा हैं!

उपर्युक्त पंक्तियों की व्याख्या करते हुए यह बताइए कि यहाँ चाँद की तरह आत्मा पर झुका चेहरा भूलकर अंधकार- अमावस्या में नहाने की बात क्यों की गई है ?

कवि सर्वहारा वर्ग के दुख देख देखकर परेशान हो गया है। उनके अंतहीन दुख उसे अब दुख देते हैं। इस कारण वह�चाहता है कि किसी तरह इनसे मुक्ति पा ली जाए। वह इन दुखों को उसी तरह भूल जाना चाहता है जिस प्रकार दक्षिण ध्रुवी अमावस्या में चाँद दिखाई नहीं देता। कवि कहता है कि चाँद भी तभी दिखाई देना बंद करता है जब वह बादलों से�ढक जाए। इसी तरह मैं भी तभी इस वर्ग से दूर होऊँगा

जब मैं स्वार्थी बन जाऊँगा।

30 of 33

तुम्हें भूल जाने कीदक्षिण ध्रुवी अधिकार-अमावस्याशरीर पर, चेहरे पर, अंतर में पा लूँ मैंझेलूँ मैं, उसी में नहा लूँ मैंइसलिए की तुमसे ही परिवेष्टित आच्छादितरमणीय यह उजेला अबसहा नहीं जाता है रहने का ।

क) यहाँ अंधकार-अमावस्या के लिए क्या विशेषण इस्तेमाल किया गया है और उससे विशेष्य में क्या अर्थ जुड़ता हैं ।�(ख) कवि ने व्यक्तिगत संदर्भ में किस स्थिति को अमावस्या कहा हैं?�(ग) इस स्थिति से ठीक  वाले शब्द का व्याख्यापूवक उल्लेख करें�(घ) कवि अपने संबोध्य (जिसको कविता संबोधित हैं कविता का ‘तुम) को पूरी तरह भूल जाना चाहता है। इस बात को प्रभावी तरीके से व्यक्त करने के लिए कवि ने क्या युक्ति

अपनाई हैं? रेखांकित अंशों को ध्यान में रखकर उत्तर दें।

31 of 33

क) यहाँ ‘अंधकार-अमावस्या’ के लिए ‘दक्षिण ध्रुवी’ विशेषण का इस्तेमाल किया गया है। इसके प्रयोग से अंधकार का घनत्व और अधिक बढ़ जाता है।�(ख) कवि व्यक्तिगत संदर्भ में अंधकार को अपने शरीर व हृदय में बसा लेना चाहता है ताकि वह प्रियतमा के स्नेह से स्वयं को दूर कर सके। वह एकाकी जीवन जीना चाहता है। इसे ही उसने अमावस्या कहा है।

(ग) इस स्थिति से ठीक विपरीत ठहरने वाली स्थिति निम्नलिखित है ‘तुमसे ही परिवेष्टित आच्छादित रहने का रमणीय यह उजेला’ कवि ने प्रियतमा की आभा से सदैव घिरे रहने की स्थिति को उजाले के रूप में व्यक्त किया है। उजाला मनुष्य को मार्ग दिखाता है। इसी तरह प्रिया का स्नेह रूपी उजाला उसे जीवन-पथ पर चलने के लिए प्रोत्साहित करता है।�(घ) कवि अपने संबोध्य को पूरी तरह भूल जाना चाहता है। अपनी बात को प्रभावी ढंग से व्यक्त करने के लिए वह प्रियतमा को भूल जाने, उसके प्रभाव को शरीर और हृदय में उतार लेने, झेलने और नहा लेने की युक्ति अपनाता है। वह अंधकार में इस प्रकार लीन होना चाहता है कि प्रियतमा की स्मृति रूपी प्रकाश की किरण उसे छू न सके।

32 of 33

5. ‘बहलाती-सहलाती आत्मीयता बरदाश्त नहीं होती है‘ और कविता के’ शीर्षक ‘सहर्ष स्वीकारा है ‘  में आप कैसे अंतर्विरोध पाते हैं। चर्चा

कीजिए।

एक ओर तो कवि सर्वहारा वर्ग के दुखों के प्रति सहानुभूति जताता है। वह कहता है कि उनके यही दुख मुझे बहला लेते हैं और सहला लेते हैं। लेकिन दूसरी ओर वह यह कहता है कि मैंने अपने जीवन के सभी दुखों को सहर्ष स्वीकार किया है। वास्तव में यह अंतर्विरोध दुखों की अधिकता के कारण है। जब दुखों ने कवि को ज्यादा दुखी कर दिया तो वह उससे उकता गया।

33 of 33