JEEVAK AYURVEDIC MEDICAL COLLEGE AND RESEARCH CENTRE
Kamlapur,Akauni Chandauli,up
Subject –रचना शारीर
Topic-शारीर,शरीर,शरीरि
Guided by-
Dr.Amit Kumar Singh(H.O.D)
Associate Professor
Dr. Varsha Gupta
Assistant Professor
Department of rachna sharir
Presented By-
Shreya Tiwari
Roll no-39
Bams 1st prof
Batch-2023 24
Index �Sharir �shaarir�Shariri�and it’s importance
शरीर परिभाषा
चेतना अधिष्ठान
पंचमहाभूत
विकार समुदाय
संयोगवाही
शरीर की व्याख्या��शरीर शब्द की व्याख्या करने से पहले शरीर की उत्पत्ति के सम्बन्ध में ज्ञान करना आवश्यक हो जाता है। यथा-��“शुक्र शोणितं जीव संयोगे तु खलु कुक्षिगते गर्भ संज्ञा भवति ।” (च.शा. ४/५)��पुरुष शुक्र (spermatozoa) और स्त्री शोणित (ovum) इनका स्त्री के गर्भाशय (कुक्ष, uterus) में संयोग होने पर जब जीवात्मा प्रवेश करती है, तब ही मनुष्य शरीर के अंकुर को उत्पत्ति होती है। और उसे गर्भ (Embryo) की संज्ञा दी जाती है।��आयुर्वेद शास्त्र के अनुसार संसार में उपलब्ध सभी पदार्थ, सभी वस्तुएँ, सभी प्राणी पंचमहाभूतों द्वारा निर्मित हुए है। इसलिए मनुष्य के गर्भ की निर्मिति भी पांचभौतिक ही होती है।
शुक शोणितं गर्भाशयस्थं आत्म प्रकृति विकार संमूच्छितं ‘गर्भ’ इति उच्यते।��तं चेतनावस्थितं वायुर्विभजति, तेज एनं पचति, आपः क्लेदयन्ति, पृथिवी संहन्ति, आकाशं विवर्धयतिः एवं विवर्धितः स यदा हस्तपादजिह्वाप्राणकर्णनितम्बादिभिरंगैरूपेतः तदा ‘शरीर’ इति संज्ञां लभते ।��तच्च षडङ्ग शाखाचतस्रो, मध्यं पंचमं षष्ठं शिर इति ।।” (सु.शा. ५/३)��शुक्र (Spermatozoa) और शोणित (Ovum) का गर्भाशय (Uterus) में संयोग होने पर उसमें आत्मा, आठ प्रकृतियों (अव्यक्त, महान्न, अहंकार, पंच तन्मात्रा) और विकारों (एकादश इन्द्रियाँ, पंचमहाभूत) इन सबका संयोग होता है। तब उसे गर्भकहते हैं। उसमें चेतना का वास हो तो वायु (वात) उसे विभाजित करती है, तेज (पित्त) इसे पचाता है, जल क्लिनता पैदा करता है अर्थात् जल तत्त्व द्वारा द्रवीभवन होता है, पृथ्वी तत्व से संहनन और घनता उत्पन्न होती है, और आकाश तत्व द्वारा रिक्तता निर्माण होकर उसका आकार बढ़ता है।
इस प्रकार पाँचों महाभूतों द्वारा गर्भ पर कार्य होने से जब उसे हाथ, पैर, जिल्हा, नाक, कर्ण, नितम्ब आदि अंग-प्रत्यंग निर्माण होते हैं, तब ही उसे शरीर कहा जाता है।��यह शरीर षडंग होता है। जैसे चार शाखाएँ, पाँचवा मध्य शरीर और छठा सिर। इस प्रकार प्रथम इसे गर्भ और अंग-प्रत्यंग निर्माण के बाद शरीर कहा जाता है।�� “तत्र शरीरं नाम चेतनाधिष्ठानभूतं पञ्चमहाभूतविकार समुदायात्पर्क समयोगवाहि ।”��चेतना (आत्मा) का अधिष्ठान और पंचमहाभूत रुपी विकारों का समुदाय शरीर कहलाता है। यह शरीर समयोगवाही होता है, अर्थात् सप्तधातु, तीन दोष एवं मलों के समावस्था में रहने पर ही गति करता है। (च.शा. ६/४)�� “दोषधातुमल मूलं हि शरीरम्।” (सु.सू. १५/३)��दोष-धातु तथा मल ही शरीर के मूल कारण है।��तीन दोष, सप्त धातुएँ और तीन मल ये प्राकृतावस्था में शरीर का धारण करते हैं, इसलिए इन तेरह तत्वों के समूह को शरीर कहते हैं।
शारीर की व्याख्या��१. “शरीरं चिन्त्यते सर्व दैव मानुष सम्पदा। सर्वभावैः यतः तस्मात् शारीरं स्थानं उच्यते ।।”��(च.शा. ८/६९)��समस्त शरीर का दैव (अलौकिक) और मानवीय साधनों द्वारा किया गया चिन्तन (विचार) और उसके सभी भावों को जहाँ पर व्यक्त किया जाता है, उसे शारीर स्थान कहते हैं।
शारीरिकभावं अधिकृत्य कृतो अध्यायः शारीरः ।” (डल्हण)��शरीर के सभी भावों को ग्रहण करके जो अध्याय या ग्रन्थ लिखा जाए, वह शारीर है। ये भाव दो प्रकार के होते हैं- १. रचनाकर भाव (Structural)- अंग-प्रत्यंग आदि का ज्ञान। २. क्रियाकारक भाव (Functional)- दोष-धातु-मल आदि का ज्ञान।��४. शरीरं अधिकृत्य कृतो ग्रन्थः शारीरः ।” (अरुणदत्त)��शरीर को आधार मानकर लिखे गए ग्रन्थ को शारीर कहते हैं।
शरीर शब्द के पर्याय
1.शरीर
2. देह
3.काय
4.पुरुष
शरीरि की व्याख्या��“पंचमहाभूत शरीरि समवायः पुरूष इतिः स एष कर्मपुरुगः चिकित्सा अधिकृतः ।”��(सु.शा. १/२१)
शरीरि का अर्थ है- आत्मा। “शरीरं अस्य अस्तीति शरीरि ।”��अतः पंचमहाभूत और आत्मा इनका समुदाय ही पुरुष कहलाता है। इसे कर्म पुरुष कहते है। यही पुरुष चिकित्सा करने के लिए योग्य माना है।��जीवात्मा��चिकित्सा का अधिकरण पुरुष, कर्मपुरूष आदि शब्दों से जीवात्मा को जाना जाता है। यह परमात्मा का ही अंशा है। परमात्या अनादि है क्योंकि इसकी किसी से उत्पत्ति नहीं होती है। इसका अस्तित्व सदैव रहता है। अनादि और कारणरहित होने के कारण वह नित्य हो उसे अव्यक, आत्मा, क्षेत्रज्ञ, शाश्वत, विभु कहा गया है। जीवात्मा प्राणियों को जीवित रखता है। जब तक शरीर में यह रहता है, उतने ही काल तक यह प्राणी जीवित रहता है। जीवन का आधार होने के कारण इसे जीवात्मा कहते हैं। यह जीवात्मा, आत्मज्ञान, इन्द्रियव्यापार, प्राण-अपान, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, चेतना, धृति, बुद्धि, स्मृति तथा अहंकार आदि का मूल कारण है
शरीर विषय की उपयोगिता-
शरीरं सर्वथा सर्वं सर्वदा वेद यो भिषक् । आयुर्वेदं स कात्स्न्र्येन वेद लोकसुखप्रदम् ।।�(च.शा. ६/१९)
जो चिकित्सक सदैव सम्पूर्ण रूप से शरीर शास्त्र को जानता है। वही चिकित्सक संसार को सुख देने वाले आयुर्वेद शास्त्र को पूर्ण रुप से जानता है।��शरीरे चैव शास्त्रे च दृष्टार्थः स्याद् विशारदः । दृष्ट श्रुताभ्यां सन्देहमवापोह्य चरेत् क्रियाः ।।��(सु.शा. ५/६३)��यदि कोई चिकित्सक आयुर्वेद चिकित्सा में निपुण होना चाहे, तो शरीर तथा शास्त्र दोनों में दक्ष होना चाहिए। और दर्शन तथा अध्ययन (देखा हुआ और सुना हुआ) के द्वारा अपनी शंकाओं को दूर करके उसके बाद चिकित्सा या शस्त्र कर्म कर��आयुर्वेदीय शरीर में दार्शनिक और प्रत्यक्ष दोनों विषयों का ही समावेश होता है। आयुर्वेद के अनुसार उत्तम चिकित्सक (Physician) या शल्यहर्त्ता (Surgeon) वह समझा जाता है, जो दार्शनिक तथा प्रत्यक्ष दोनों विषयों का ज्ञाता हो।
शारीर ज्ञान की उपयोगिता ��१. विकृति के ज्ञान से पहले प्रकृति का ज्ञान होना आवश्यक है- विकार शरीर में उत्पन्न होते हैं। अतः विकृति के ज्ञान से पहले प्रकृति का ज्ञान होना आवश्यक है। शरीर के अंग-प्रत्यंगों की प्राकृतिक संरचना का ज्ञान शारीर स्थान से प्राप्त होता है। अतः चिकित्सा के लिए इसका अध्ययन अत्यन्त आवश्यक है।��२. आयुर्वेदीय शारीर में गर्भावक्रान्ति शारीर (Embryology), रचना शारीर (Anatomy), क्रिया शारीर (Physiology) तीनों का वर्णन किया गया है- अतः चिकित्सा की दृष्टि से शारीर विषय का ज्ञान आवश्यक है।��३. स्थूल शरीर के ज्ञान से पहले सूक्ष्म शरीर का ज्ञान आवश्यक है- आयुर्वेदीय शारीर में सृष्टि की उत्पत्ति का विस्तार से वर्णन किया गया है। सूक्ष्म शरीर का ज्ञान इसी से प्राप्त होता है। अतः शरीर का ज्ञान होना आवश्यक है।��४. किसी भी अवयव की पांचभौतिक रचना के ज्ञान के लिए शारीर का ज्ञान आवश्यक है
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