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हे भूख मत मचल

कवयित्री:-अक्क महादेवी

प्रस्तुतकर्ता:- अभय सिंह यादव

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अक्क महादेवी का जीवन परिचय:-

  • बारहवीं शताब्दी की प्रख्यात कन्नड़ कवियत्री- अक्क महादेवी एक परम शिव भक्त थीं। पिता निर्मल शेट्टी और माता सुमति की सुपुत्री महादेवी जी का जन्म शिवमोग्गा जिले के शिकारिपुर तालुक के गाँव में लगभग सन ११३० ई. में हुआ। इनके माता- पिता शिव भक्त थे। १० वर्ष की आयु में महादेवी ने शिवमंत्र की दीक्षा प्राप्त की। इन्होंने अपने द्वारा रचित अनेक कविताओं में भगवान शिव का सजीव चित्रण किया है। यह प्रभु की सगुण भक्ति करती। भक्ति भाव के चार प्रकार (दास्य, सखा, वात्सल्य, और माधुर्य भाव ) में, महादेवी जी की अपने इष्ट के प्रति माधुर्य भक्ति थी। यह भगवान शिव को “चेन्नमल्लिकार्जुन” अर्थात “सुन्दर चमेली के फूल के समान श्वेत, सुन्दर प्रभु !” कहकर संबोधित करतीं। इन्होंने भगवान शिव को ही अपना पति माना। उत्तर भारत की भक्तिमति मीराबाई के कृष्ण-प्रेम के समान ही महादेवी जी की भगवान शिव में प्रीति थी। इनका वैवाहिक जीवन भी कुछ-कुछ मीराबाई के जीवन के समान ही था।

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अक्क महादेवी का विवाह:-

  • युवावस्था में महादेवी अत्यन्त सौंदर्यवती थीं। स्थानीय जैन राजा कौशिक इनके रुप पर मुग्ध हो गये। उन्होंने इनसे विवाह का प्रस्ताव रखा। माता पिता महादेवी जी को भक्ति-मार्ग पर ही बढ़ाना चाहते थे और वे इनका विवाह नहीं करना चाहते थे। राजा की धमकियों से डरकर व विवश होकर, वे इनका विवाह राजा कौशिक से करा देते हैं। अक्का महादेवी का पूरा मन तो सिर्फ अपने “चेन्नमल्लिकार्जुन” की आराधना में ही रहता, जिनको यह अपना पति मान चुकी थीं।महादेवी जी का यह आचार राजा को बिल्कुल पसंद नहीं आता। अपनी पत्नी के मुख से किसी और को पति का सम्बोधन उनको क्रोधित कर देता। उस समयकाल में ऐसे आचार-विचार अपराधजनक थे। इस विषय पर निर्णय करने के लिये राज्य-सभा बुलायी गई।

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अक्क महादेवी द्वारा राजभवन का त्याग:-

महादेवी जी यही कहतीं रहतीं कि “मेरे पति तो चेन्नमल्लिकार्जुन ही हैं। राजा ने क्रोध में आकर उनका परित्याग करते हुए महादेवी जी को राज्य छोड़कर चले जाने को कहा। महादेवी जी को बड़ी सहजता से इस निर्णय को स्वीकारता देखकर राजा को और क्रोध आ गया। उसने उनको सभी वस्त्र-आभूषण जो कि राजा के दिये थे- वे सब उतारने के बाद राजमहल छोड़कर जाने को कहा। महादेवी जी ने अपने प्रभु का ध्यान करके पूरे शांत भाव से राजा का कहा माना और फिर उस दिन के पश्चात् कभी कोई भी वस्त्र-आभूषण धारण न किये। अपने चेन्नमल्लिकार्जुन की प्रिया महादेवी ने देह को लम्बे केशों से ढका और राजमहल से चल दीं।

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आध्यात्मिक यात्रा:-

निर्वस्त्र महादेवी को समाज से बहुत दुत्कार मिली। लोगों ने बहुत प्रकार से इनको समझाने की कोशिश करी, पर ये ना डिगीं और यही कहतीं कि भगवान से मिलन में वस्त्रों की क्या आवश्यकता। जंगलों से गुजरते हुए, अनेक प्रकार के संघर्ष करते हुए, समाज का निर्भीकता व दृढ़ता से सामना करते हुए, ये कल्याण पहुँची।उस युग में महादेवी जी निर्वस्त्र सन्यासी होकर आध्यात्मिक ज्ञान की गोष्ठि में चर्चा करने का प्रयास कर रही थीं। इनकी आध्यात्मिक विचारधारा को सराहना मिली। बासव, अल्लमप्रभु, आदि अन्य सन्त जो पहले महादेवी जी को समर्थन नहीं दे पा रहे थे और इनकी निर्वस्त्र अवस्था से परेशान थे, महादेवी जी की विचारधारा से प्रभावित होकर उन सभी ने इनको आध्यात्मिक पथ पर सहमति दी और “अनुभव-मण्डप” में प्रवेश दिया। इनकी सादगी, ईश्वर-निष्ठा , प्रेम, दृढ़ता व नम्रता ने सबको प्रभावित किया और इनको नये सम्बोधन- “अक्क” अर्थात “बड़ी दीदी” से सम्मानित किया गया। इस प्रकार इनका नाम हुआ- “अक्क महादेवी”।

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  • हे भूख ! मत मचलप्यास, तड़प मत हे नींद ! मत सता क्रोध, मचा मत उथल-पुथल हे मोह ! पाश अपने ढील

लोभ, मत ललचा�हे मद ! मत कर मदहोशईर्ष्या, जला मत�ओचराचर ! मत चूक अवसरआई हूँ सदेश लेकर चन्नमल्लिकार्जुन का

शब्दार्थ:-

मचल-पाने की जिद।

तड़प-छटपटाना।

पाश-बंधन।

ढील-ढीला करना।

मद-नशा।

मदहोश-नशे में उन्मत या होश खो बैठना।

चराचर-जड़ व चेतन।

चूक-छोड़ना, भूलना। चन्नमल्लिकार्जुन-शिव।

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हे भूख ! मत मचल

प्यास, तड़प मत

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हे नींद ! मत सता

क्रोध, मचा मत उथल-पुथल 

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हे मोह ! पाश अपने ढील

लोभ, मत ललचा

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हे मद ! मत कर मदहोश

ईर्ष्या, जला मत

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चराचर ! मत चूक अवसर

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आई हूँ संदेश लेकर चन्नमल्लिकार्जुन का

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व्याख्या-

  • अक्क महादेवी इंद्रियों से आग्रह करती हैं। वे भूख से कहती हैं कि तू मचलकर मुझे मत सता। सांसारिक प्यास को कहती हैं कि तू मन में और पाने की इच्छा मत जगा। हे नींद ! तू मानव को सताना छोड़ दे, क्योंकि नींद से उत्पन्न आलस्य के कारण वह प्रभु-भक्ति को भूल जाता है। हे क्रोध! तू उथल-पुथल मत मचा, क्योंकि तेरे कारण मनुष्य का विवेक नष्ट हो जाता है। वह मोह को कहती हैं कि वह अपने बंधन ढीले कर दे। तेरे कारण मनुष्य दूसरे का अहित करने की सोचता है। हे लोभ! तू मानव को ललचाना छोड़ दे। हे अहंकार! तू मनुष्य को अधिक पागल न बना। ईष्या मनुष्य को जलाना छोड़ दे। वे सृष्टि के जड़-चेतन जगत् को संबोधित करते हुए कहती हैं कि तुम्हारे पास शिव-भक्ति का जो अवसर है, उससे चूकना मत, क्योंकि मैं शिव का संदेश लेकर तुम्हारे पास आई हूँ । चराचर को इस अवसर का लाभ उठाना चाहिए।

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अर्थग्रहण संबंधी प्रश्न:-

  • कवयित्री ने किन-किन को संबोधित किया है ?

  • कवयित्री क्या प्रार्थना करती है तथा क्यों ?

  • कवयित्री चराचर जगत् को क्या प्रेरणा देती है ?

  • कवयित्री किसकी भक्त है ? अपने आराध्य को प्राप्त करने का उसने क्या उपाय बताया है ?

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प्रस्तुतकर्ता:-

अभय सिंह यादव

पीजीटी (हिंदी)

जवाहर नवोदय विद्यालय सरदारशहर

जिला चूरु ( राजस्थान )