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सूतिका
परिभाषा –
सुतायाश्चापि तत्र स्यादपरा चेन्न निर्गता |
प्रसूताअपि न सूता स्त्री भवत्येवं गते सति ||
(का. सं. खिल. ११/६)
सूतिका काल
आचार्य चरक | विशिष्ठ अवधि वर्णित नही |
सुश्रुत | अध्यर्ध मास |
| अध्यर्ध मास |
| अध्यर्ध मास, पुनरार्तव दर्शन |
काश्यप | षड मास |
भाव प्रकाश | अध्यर्ध मास, पुनरार्तव दर्शन,४ मास |
योग रत्नाकर | अध्यर्ध मास, पुनरार्तव दर्शन |
प्रसवोपरान्त पुनः रजोदर्शन हेतु
तथैव गर्भः सूतायाः सध: स्तन्याय कल्पते ।
शेषं तु रुधिरीभूतं कायं योनिं च सर्पति ॥
धातुषु प्रतिपू्र्णेषु शरीरे समवस्थिते ।
संचितं रुधिरं योनि: पुन: कालेन मुञ्चति॥
(का. सं. खिल. १/२१,२२)
सूतिका परिचर्या
1. आचार्य चरक अनुसार :
- उष्ण जल परिषेक
- स्नेहपान(पिप्पल्यादि औषधि से युक्त)
- घृत व तैल से अभ्यंग
- उदरवेष्टन
- पिप्पल्यादि औषधि व घृत युक्त यवागू पान
- आप्यायन चिकित्सा
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2.आचार्य सुश्रुत के अनुसार:
- बला तैल से अभ्यंग
- वातहर कषाय पान एवं परिषेक
- पंचकोल से युक्त उष्ण गुडोदक पान - २/३
रात्रि तक
- विदारिगन्धादि से साधित स्नेह यवागू या क्षीर
यवागू
- यव कोल तथा कुलत्थ से साधित जांगल मांसरस व शालि
ओदन (अग्नि व बल अनुसार)
- परिपूर्ण काल में प्रसव होने पर - स्वेदन
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3.आचार्य वाग्भट्ट के अनुसार:
- बला तैल से अभ्यंग
- उष्ण जल से परिषेक
- पंचकोल व सैन्धव चूर्ण के साथ स्नेहपान
- अभ्यंग एवं उदरवेष्टन
- आप्यायन चिकित्सा
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4. महर्षि काश्यप के अनुसार:
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5. महर्षि हारीत के अनुसार:
6. भावप्रकाश अनुसार:
- हित आहार विहार
- व्यायाम, मैथुन, क्रोध, एवं शीत सेवन – परित्याग
- 1 मास तक- स्निग्ध, पथ्य, अल्प भोजन,
नित्य स्वेदन, अभ्यंग प्रयोग
7.योगरत्नाकर अनुसार:
- प्रसव पश्चात योनि को दबाने का निर्देश
- शेष भावप्रकाश सदृश
8.शार्गंधर अनुसार :
– प्रसव पश्चात स्वेदन व बला तैल प्रयोग प्रशस्त
विशिष्ट सूतिका परिचर्या
--आनूप देश
आनूपदेशे भूयिष्ठं वात्श्लेष्मात्मका गदा: ।
तत्राभिष्यन्दभूयस्त्वादादौ स्नेहौ विगर्हित: ।।
मण्डादिरत्र कर्तव्य: संसर्गोअग्निबलावह: ।
स्वेदो निवातशयनं सर्वमुष्णं च शस्यते ।।
(का.सं. खि.११/२८-३०)
--जांगल देश
नियतं जांगले देशे वातपित्तात्मका गदा: ॥
तदत्र स्नेह्सात्म्यत्वात् स्नेहादि: स्यादुपक्रम:।
कार्य: प्रजातमात्राया विशेषाश्चात्र बुध्यते ॥
(का.सं. खि.११/३०-३१)
--साधारणदेश
देशे साधारणे चास्या हित: साधारणी विधि: |
(का.सं. खि.११/३३)
कुमारप्रसवे तैलं कुमारीप्रसवे घृतम्।
पिबेज्जीर्णे यवागूं च दीपनीयोपसंस्कृताम्॥
पन्चाहं सप्तरात्रं वा ततो मण्डाद्युपक्रम:।।
(का.स.खिल.११/३२-३३)
- विदेशी एवं म्लेच्छ जाति – रक्त, मांसनिर्यूह, कन्द, मूल,
फ़ल का प्रयोग | (का.स.खिल.११/३४)
सूतिका के लिये निषेध
सूतिका परिचर्या से लाभ
एवं हि गर्भवृद्धिक्षपितशिथिलसर्वशरीरधातुप्रवाहण-
वेदनाक्लेदरक्तनिस्त्रुतविशेषशून्यशरीराच्च पुनर्नवीभवति ॥
(अ.सं.शा. ३/३९)
10/12th day – गौत्र नियमानुसार
प्रसूता स्नान
NORMAL PUERPERIUM
What is puerperium?
Involution of the Uterus
Anatomical consideration
Physiological Consideration
Steroid hormones withdrawn
Inc Collagenase & Proteolytic enzymes
Autolysis
Myometrial cell size reduced
Endophlebitis
Thrombosis
Fibrinoid end arteritis
Hyalinisation
Blood Vessels
Clinical assessment of Involution of uterus
Vagina
4-8 weeks;
Does not revert to original state
Broad/round ligaments
Long time d/t stretching during parturition
Pelvic floor & Fascia
Long time d/t stretching during parturition
Involution of other Pelvic structures
Lochia
Lochia Rubra
Lochi Serosa
Lochia Alba
Malodorous
Scanty/absent
Excessive
Red color persist
L.Alba beyond 3 wks
Clinical importance
CHANGES IN BREAST & LACTATION
Mamogenesis
Lactogenesis
�Galactopoiesis
Galactokinesis
General Physiological Changes
Management of normal Puerperium
Treatment of minor ailments
Abnormal Puerperium
Thank you