नवोदय विद्यालय समिति
जवाहर नवोदय विद्यालय, फतेहाबाद
कक्षा-11 विषय- हिन्दी, कोर अ
प्रस्तुतकर्ता- तेज पाल
स्नातकोत्तर शिक्षक- हिन्दी
भारत माता
अकसर जब मैं एक जलसे से दूसरे जलसे में जाता होता,
और इस तरह चक्कर काटता रहता होता था, तो इन जलसों में
मैं अपने सुनने वालों से अपने इस हिंदुस्तान या भारत की चर्चा करता।
भारत एक संस्कृत शब्द है
और इस जाति के परंपरागत संस्थापक के नाम से निकला हुआ है।
मैं शहरों में ऐसा बहुत कम करता, क्योंकि वहाँ के सुनने वाले कुछ ज्यादा सयाने थे
और उन्हें दूसरे ही किस्म की गिज़ा की जरुरत थी।
लेकिन किसानों से, जिनका नज़रिया महदूद था,
मैं इस बड़े देश की चर्चा करता, जिसकी आज़ादी के
लिए हम लोग कोशिश कर रहे थे और बताता कि किस तरह देश का एक हिस्सा दूसरे से जुदा होते हुए भी
हिंदुस्तान एक था। मैं उन मसलों का जिक्र करता,
जो उत्तर से लेकर दक्खिन तक और पूरब से लेकर पच्छिम तक,
किसानों के लिए यक-साँ थे, और स्वराज्य का भी जिक्र करता,
जो थोड़े लोगों के लिए नहीं, बल्कि सभी के फ़ायदे के लिए हो सकता था।
मैं उत्तर-पच्छिम में खैबर के दर्रे से
लेकर धुर दक्खिन में कन्याकुमारी तक
की अपनी यात्रा का हाल बताता और
यह कहता कि सभी जगह किसान
मुझसे एक-से सवाल करते,
क्योंकि उनकी तकलीफ़ें एक-सी थीं-यानी गरीबों, कर्ज़दारों, पूँजीपतियों के शिकंजे, जमीदार,
महाजन, कड़े लगान और सूद,
पुलिस के ज़ुल्म, और ये सभी बातें गुँथी हुई थीं,
उस ढढ्ढे के साथ, जिसे के विदेशी सरकार
ने हम पर लाद रखा था और इनसे
छुटकारा भी सभी को हासिल करना था।
मैंने इस बात कोशिश की कि लोग
सारे हिंदुस्तान के बारे में सोचें और कुछ हद तक इस बड़ी दुनिया के बारे में भी,
जिसके हम एक जुज़ हैं। मैं अपनी
बातचीत में चीन, स्पेन, अबीसिनिया,
मध्य यूरोप, मिस्र और पच्छिमी एशिया
में होने वाले कशमकशों का ज़िक्र भी ले आता।
मैं उन्हें सोवियत यूनियन में होने वाली
अचरज-भरी तब्दीलियो का हाल भी
बताता और कहता कि अमरीका ने
कैसे तरक्की की है। यह काम आसान
न था, लेकिन जैसा मैंने समझ रखा था,
वैसा मुश्किल भी न था। इसकी वजह
यह थी कि हमारे पुराने महाकाव्यों ने और
पुराणों की कथा-कहानियों ने, जिन्हें वे खूब
जानते थे, उन्हें इस देश की कल्पना
करा दी थी, और हमेशा कुछ लोग
ऐसे मिल जाते थे, जिन्होंने हमारे
बड़े-बड़े तीर्थों की यात्रा कर रखी थी,
जो हिंदुस्तान के चारों कोनों पर हैं।
या हमें पुराने सिपाही मिल जाते,
जिन्होंने पिछली बड़ी जंग में या
और धावों के सिलसिले में विदेशों
में नौकरियाँ की थीं। सन्तीस के
बाद जो आर्थिक मंदी पैदा हुई थी,
उसकी वजह से दूसरे मुल्कों के
बारे में मेरे हवाले उनकी समझ में
आ जाते थे।
कभी ऐसा भी होता कि जब मैं
किसी जलसे में पहुँचता,
तो मेरा स्वागत “भारत माता की जय!”
इस नारे से ज़ोर के साथ किया जाता।
मैं लोगों से अचानक पूछ बैठता कि
इस नारे से उनका क्या मतलब है?
यह भारत माता कौन है, जिसकी वे जय चाहते हैं।
मेरे सवाल से उन्हें कुतूहल और ताज्जुब होता
और कुछ जवाब न बन
पड़ने पर वे एक-दूसरे की तरफ़ या
मेरी तरफ़ देखने लग जाते।
मैं सवाल करता ही रहता। आखिर एक
हट्टे-कट्टे जाट ने, जो अनगिनत
पीढ़ियों से किसानी करता आया था,
जवाब दिया कि भारत माता से उनका
मतलब धरती से है। कौन-सी धरती? खास
उनकी गाँव की धरती या ज़िले की या
सूबे की या सारे हिंदुस्तान की धरती से
उनका मतलब है? इस तरह सवाल-जवाब
चलते रहते, यहाँ तक कि वे ऊबकर
मुझसे कहने लगते कि मैं ही बताऊँ।
मैं इसकी कोशिश करता और बताता कि
हिंदुस्तान वह सब कुछ है, जिसे उन्होंने
समझ रखा है, लेकिन वह इससे भी बहुत
ज्यादा है। हिंदुस्तान के नदी और पहाड़,
जंगल और खेत, जो हमें अन्न देते हैं, ये
सभी हमें अज़ीज़ हैं। लेकिन आखिरकार जिनकी
गिनती है, वे हैं हिंदुस्तान के लोग, उनके
और मेरे जैसे लोग, जो इस सारे देश में फैले हुए हैं।
भारत माता दरअसल यही करोड़ों लोग हैं,
और “भारत माता की जय! से मतलब हुआ
इन लोगों की जय का।
मैं उनसे कहता कि तुम इस भारत
माता के अंश हो, एक तरह से
तुम ही भारत माता हो, और
जैसे-जैसे ये विचार उनके मन
में बैठते, उनकी आँखों में चमक
आ जाती, इस तरह, मानो उन्होंने
कोई बड़ी खोज कर ली हो।