BLESSINGS
ॐ ह्रीं अर्हम् नमः
श्रीसद्गुरुभ्यो नमः
ॐ ऐं नमः
SHREE MATI GYANAY NAMAH
SHREE SHRUT GYANAY NAMAH
SHREE AVADHI GYANAY NAMAH
SHREE MANAH - PARYAV GYANAY NAMAH
SHREE KEVAL GYANAY NAMAH
5 GYAN
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 34
10 Aasharya
Inspired by:
Yugpradhan Acharyatulya P.P. Panyas Shree Chandrashekar Vijayji M.S.
P.P. Panyas Shree Yashobhushan Vijayji M.S.
P.P. Panyas Shree Manobhushan Vijayji M.S.
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 34
१० आश्चर्य
१० आश्चर्य
ऐसी घटनाएँ जो कभी-कभी घटती है, सामान्य रूप से सदा नहीं होती।
किन्तु किसी विशेष कारण से अनन्तकाल के पश्चात होती है. आश्चर्य कहलाती है। भगवान ऋषभदेव से लेकर भगवान महावीर के समय तक ऐसी दस आश्चर्यजनक घटनायें हुई है।
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१० आश्चर्य
१. उपसर्ग
केवलज्ञान होने के पश्चात् तीर्थकरों को कोई उपसर्ग नहीं होते।
परन्तु भगवान महावीर को केवलज्ञान होने के बाद भी गौशालक ने अपनी तेजोलेश्या से पीड़ित किया।
यह एक आश्चर्य ही है।
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१० आश्चर्य
२. गर्भसंहरण
२. गर्भसंहरण - आषाढ़ शुक्ल ६ को भगवान महावीर स्वर्ग से च्यवकर देवानन्दा की कुक्षी में आये।
गर्भ अवतरण के ८२ दिन पश्चात् सौधर्म कल्प के इन्द्र के सेनापति हरिनैगमेषी ने उनको माता देवानन्दा के गर्भ से संहरण कर त्रिशला माता के गर्भ में रख दिया।
तीर्थकर सदैव ही उग्र, भोग, क्षत्रिय, इक्ष्वाकु ज्ञात आदि विशाल कुलों में ही जन्म लेते हैं। अपने पूर्वकृत अशुभ कर्मों के फलस्वरूप भगवान के जीव को देवानन्दा ब्राह्मणी के गर्भ में आना एक आश्चर्य है।
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१० आश्चर्य
३. स्त्री तीर्थकर
३. स्त्री तीर्थकर - सामान्यतः तीर्थंकर पद पुरुष को ही प्राप्त होता है।
परन्तु मिथिला नगरी के राजा कुम्भराज की पुत्री मल्लीकुमारी ने तीर्थकर पद को प्राप्त किया।
वे इस अवसर्पणि के १९ वें तीर्थकर हुए।
स्त्री का तीर्थकर होना एक आश्चर्य है।
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१० आश्चर्य
४. अभावित परिषद
४. अभावित परिषद - तीर्थकर पद पाने के पश्चात् वैशाख शुक्ल दशमी के दिन भगवान महावीर ने अपनी प्रथम धर्म देशना दी।
देशना सुनकर किसी भी श्रोता ने चारित्र ग्रहण नहीं किया।
तीर्थकरों की देशना कभी विफल नहीं जाती, यह एक आश्चर्य है।
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१० आश्चर्य
५. कृष्ण का धातकी खण्ड की
अपरकंका नगरी में गमन राजा
५. कृष्ण का धातकी खण्ड की अपरकंका नगरी में गमन राजा - पद्मनाभ घातकी खण्ड में स्थित अपरकंका नगरी का राजा था। नारद द्वारा द्रौपदी के रूप लावण्य की प्रशंसा सुनकर उसने द्रौपदी का अपहरण कर लिया। कृष्ण को पता चला तो वे अपरकंका नगरी पहुंचे और उनसे युद्ध किया, उन्हे हराकर, द्रौपदी को छुडाकर वापस द्वारिका की ओर चल दिये। संग्राम विजयी होने पर उन्होंने शंखनाद किया। उस क्षेत्र के कपिल वासुदेव ने शंखनाद सुनकर उस क्षेत्र के तीर्थकर मुनिसुव्रत स्वामी से शंखनाद के बारे में पूछा, तो मुनिसुव्रत स्वामी ने कृष्ण के बारे में बताते हुये कहा कि एक ही क्षेत्र में, एक समय में दो तीर्थकर, दो चक्रवर्ती, दो बलदेव और दो वासुदेव नहीं होते।
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१० आश्चर्य
५. कृष्ण का धातकी खण्ड की
अपरकंका नगरी में गमन राजा
यह सुनकर कपिल वासुदेव को कृष्ण से मिलने की तीव्र इच्छा जाग्रत हुई।
वह सीधा समुद्र तट पर पहुंचा।
परन्तु कृष्ण वहाँ से जा चुकेथे।
दूर जाते उनके विमान को देखकर उसने शंखनाद करके मिलने की इच्छा प्रकट की। प्रत्युत्तर में कृष्ण ने वापस शंखनाद करके बहुत दूर निकल आने पर वापस लौटने में असमर्थता जताई, यो शंखनाद के माध्यम से दोनों का मिलन होना एक आश्चर्य है।
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६. सूर्य चन्द्र का अपने मूल
विमान सहित पृथ्वी पर आना
६. सूर्य चन्द्र का अपने मूल विमान सहित पृथ्वी पर आना - कौशाम्बी नगरी में विराजित भगवान महावीर के समवसरण में चन्द्र और सूर्य देव अपने-अपने मूल विमानों सहित भगवान के वन्दन दर्शन के लिये आये। यह एक आश्चर्य है।
अन्यथा वे उत्तर वैक्रिय द्वारा निर्मित विमानों में ही आते हैं।
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७. हरिवंश कुल की उत्पत्ति
७. हरिवंश कुल की उत्पत्ति - सौधर्म देवलोक के किल्विषिक देव ने हरिवर्ष क्षेत्र से हरि नाम के युगल का अपहरण कर लिया और भरत क्षेत्र की चम्पा नगरी में ले आये।
वहाँ के राजा चन्द्रकीर्ति की मृत्यु हो गई थी। किल्विषिक देव ने देववाणी की।
उसे सुनकर वहाँ के मंत्री आदि ने हरि को अपना राजा बना दिया।
सप्त व्यसन शीखा के पापी बनाया, मरके नरक में गये, उससे हरिवंश कुल की उत्पत्ति हुई। युगलियों का वंश चलाना यह सब आश्चर्य है।
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१० आश्चर्य
८. चमरेन्द्र का सौधर्मकल्प में जाना
८. चमरेन्द्र का सौधर्मकल्प में जाना - असुरों की नगरी चमरचंपा के इन्द्र 'चमरेन्द्र ने एक बार अपने अवधिज्ञान से सौधर्मावतंसक विमान में सौधर्मेन्द्र को देखा तो क्रोधित हो कर सोचने लगा-'यह सौधर्मेन्द्र मेरे सिर पर बैठा है।
इसे सबक सिखाना चाहिए।
वह उससे युद्ध करने सौधर्मकल्प की ओर चल दिया।
सौधर्मेन्द्र की सभा में पहुँचकर उसने अपने शस्त्र से सौधर्मेन्द्र पर प्रहार किया।
सौधर्मेन्द्र ने प्रतिकार में वज्र फेंका।
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१० आश्चर्य
८. चमरेन्द्र का सौधर्मकल्प में जाना
चमरेन्द्र वज्र से डरकर भागता हुआ सीधा भगवान महावीर के पास आया और भगवान के पैरों के पास जाकर छिप गया।
सौधर्मेन्द्र ने जब ध्यानस्थ भगवान को देखा तो वज्र को वापस खींच लिया।
चमरेन्द्र बच गया। चमरेन्द्र का सौधर्म कल्प में प्रवेश करना एक आश्चर्य है।
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९. एक सो आठ सिद्ध
९. एक सो आठ सिद्ध - इस अवसर्पिणी काल के सुषम दुःषम नामक तीसरे आरे में एक साथ एक सौ आठ जीव (९९ पुत्र, आठ पौत्र एवं स्वयं भगवान ऋषभदेव) सिद्ध हुये।
इसे आश्चर्य इसलिये माना जाता है कि उत्कृष्ट अवगाहना में एक साथ अमुक ही व्यक्ति सिद्धगति प्राप्त कर सकते हैं।
परन्तु एक साथ १०८ व्यक्ति सिद्धगति को प्राप्त हुये यह आश्चर्य है।
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१०. असंयमी की पूजा (असंयति पूजा)
१०. असंयमी की पूजा (असंयति पूजा) - नवमे तीर्थंकर सुविधिनाथ के निर्वाण के कुछ समय पश्चात् साधु परम्परा का विच्छेद हो गया। लोगों ने स्थविर श्रावकों को ही धर्म का ज्ञाता समझ लिया।
ये श्रावक अपनी अल्प बुद्धि अनुसार धर्म की अलग-अलग व्याख्या करने लगे।
लोग इन श्रावकों को ही ज्ञानी साधु समझकर इनकी पूजा करने लगे, पूजा प्रतिष्ठा से उनके मन में अभिमान उत्पन्न हो गया और वे धर्म के नये-नये नियम रचने लगे।
सोना, चाँदी, गौ, कन्या, हाथी, घोड़ा आदि दान में लेने लगे।
धर्म के नाम पर पाखण्ड चलने लगा। इस तरह असंयती पूजा हुई यह आश्चर्य है।