BLESSINGS
ॐ ह्रीं अर्हम् नमः
श्रीसद्गुरुभ्यो नमः
ॐ ऐं नमः
SHREE MATI GYANAY NAMAH
SHREE SHRUT GYANAY NAMAH
SHREE AVADHI GYANAY NAMAH
SHREE MANAH-PARYAV GYANAY NAMAH
SHREE KEVAL GYANAY NAMAH
5 GYAN
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 39
NAVTATTVA PART - 1
Inspired by:
Yugpradhan Acharyatulya P.P. Panyas Shree Chandrashekar Vijayji M.S.
P.P. Panyas Shree Yashobhushan Vijayji M.S.
P.P. Panyas Shree Manobhushan Vijayji M.S.
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 39
नव तत्त्व पार्ट - १
नव तत्त्व पार्ट - १ नाव का दृष्टांत
नव तत्त्व को सुगम रीति से समझाने के लिए प्राचीन आचार्यों ने सागर और नाव का दृष्टान्त दिया है।
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नव तत्त्व पार्ट - १
१. जीव
जिस प्रकार समुद्र में नौका की स्थिति होती है।
उसी प्रकार संसार-सागर में जीव की स्थिति समझो। नौका यानी कि जीव
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नव तत्त्व पार्ट - १
२. अजीव (पानी)
२. अजीव (पानी) - समुद्र में पानी रहता है, जिसमें नाव चलती है।
इस संसार में अजीव तत्त्व रुपी पानी चारों तरफ भरा है।
इसमें सशरीरी जीव नौका के समान है।
पानी के अभाव में नाव नहीं चल सकती, इसी प्रकार संसार में अजीव तत्त्व के सहयोग के बिना अकेला जीव कुछ नहीं कर सकता।
नाव रात-दिन पानी में रहती है।
सशरीरी जीव भी संसार में सतत जड़ पदार्थों के सम्पर्क में रहता है।
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नव तत्त्व पार्ट - १
३. पुण्य (अनुकूल पवन)
३. पुण्य (अनुकूल पवन) - समुद्र में नाव को सुखपूर्वक चलने के लिए अनुकूल पवन की जरुरत रहती है।
पवन के रुख के सहारे नाव निर्विघ्न चल सकती है।
जीव अपने शुभ कर्मरुपी पुण्यों के सहारे संसार में सुखपूर्वक निर्विघ्न जीवन यात्रा चला सकता है।
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नव तत्त्व पार्ट - १
४. पाप (प्रतिकूल पवन)
४. पाप (प्रतिकूल पवन) - कभी-कभी समुद्र में प्रतिकूल हवा चलती है तो नाव चलाना बहुत कठिन हो जाता है।
नाव डगमगाने लगती है।
कभी-कभी भँवर में भी फँस जाती है।
इसी प्रकार पाप के उदय से जीव संसार में कष्ट पूर्वक यात्रा करता है।
कभी-कभी तो उसका जीवन ही जोखिम में पड़ जाता है।
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नव तत्त्व पार्ट - १
५. आस्रव (छिद्र)
५. आस्रव (छिद्र) - नाव में जब कहीं पर छिद्र हो जाते है, नाव नीचे से टूट-फूट जाती है तो उसके भीतर पानी भरने लगता है।
जिस कारण नाव के डूबने का खतरा हो जाता है।
पाँच आस्रव रुपी छिद्रों द्वारा जीव रूपी नाव में कर्म रुपी पानी भरने से वह संसार में डूबने लगता है।
जीव राग-द्वेष रूपी दोषों का सेवन करता है, इन दोष रूपी छिद्रों की जितनी अधिकता होगी, उतना ही कर्मरूपी पानी अधिक आयेगा।
उस भार से आत्मा संसार में गहरा डूबता है।
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नव तत्त्व पार्ट - १
६. संवर (रोक)
६. संवर (रोक) - कुशल नाविक नाव के छिद्रों को शीघ्र ही बन्द करने का प्रयत्न करता है। इसी प्रकार ज्ञानी, सम्यक्त्वी जीव आस्रव रूपी छिद्रों को रोकने के लिए संवर की रोक लगाता है।
व्रत, प्रत्याख्यान, त्याग, संयम आदि से छिद्रों पर रोक लगती है तो आता हुआ कर्म रूपी जल रुक जाता है।
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नव तत्त्व पार्ट - १
७. निर्जरा (जल निकासी)
७. निर्जरा (जल निकासी) - छिद्रों से नाव में जो पानी भर चुका है, उसे बाहर निकालकर नाव को खाली करना भी जरूरी होता है।
तभी उसका भार हलका होता है।
निर्जरा तत्त्व आत्मा में प्रवेश पाये कर्मरूपी पानी को व्रत, प्रत्याख्यान, तपस्या रूपी बाल्टियों में भर-भरकर बाहर फेंकने का प्रयत्न करता है।
इससे आत्मा रूपी नाव हलकी होकर सुरक्षित चल सकती है।
बाह्य-आभ्यन्तर तप से कर्म-निर्जरा होती है।
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नव तत्त्व पार्ट - १
८. बंध (पानी का संग्रह)
८. बंध (पानी का संग्रह) - नौका दिन-रात पानी में रहती है।
इस कारण उसके सूक्ष्म छिद्रों में भी पानी भरा रहता है।
वह पानी काष्ठ के साथ एकमेक हुआ लगता है।
परन्तु उससे भी काष्ठ के गलने का व भारी होने का भय बना ही रहता है।
इसी प्रकार जो कर्म आत्मा में प्रवेश कर चुके हैं, वे दूध और पानी की तरह या लोहा और अग्नि की तरह आत्मा के प्रत्येक प्रदेश के साथ घुले-मिले रहते हैं।
आत्मा और कर्म का मिले रहना बंध है।
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नव तत्त्व पार्ट - १
९. मोक्ष (मंजिल)
९. मोक्ष (मंजिल) - अपनी नाव की पूर्ण सुरक्षा रखता हुआ कुशल नाविक प्रयत्न करके नाव को शीघ्र ही मंजिल रूपी किनारे पर लगाने का पुरुषार्थ करता है। किनारे पर पहुँचने पर वह अपने लक्ष्य को पा लेता है। आत्मा रुपी नौका तप, संयम से सुरक्षित रहता हुआ समुद्र में अपनी यात्रा पूरी करके संसार के समस्त दुखों व भयों से मुक्त होकर मोक्षरूपी सुरम्य तट पर पहुँचकर अपनी यात्रा पूर्ण करता है।
९ चित्र के माध्यम से बताया है कि संसार रूपी समुद्र में शुभ-अशुभ कर्म रूपी जल आस्रव रूपी छिद्रों द्वारा नाव में प्रतिक्षण प्रविष्ट होता रहता है और उन छिद्रों में एकाकार हुआ रहता है। छिद्रों को रोकना संवर है, बाल्टी आदि से पानी उलीचना तथा सूर्य की किरणों के ताप से पानी का सूखना निर्जरा है। नाव का कुशल क्षेम पूर्वक किनारे लगना लोकाग्र भाग पर स्थित सिद्धक्षेत्र पर स्थित होना मोक्ष है।
१. जीव (नौका)
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नव तत्त्व पार्ट - १
सारांश
२. अजीव
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नव तत्त्व पार्ट - १
सारांश
३. पुण्य
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नव तत्त्व पार्ट - १
सारांश
४. पाप
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नव तत्त्व पार्ट - १
सारांश
५. आस्रव
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नव तत्त्व पार्ट - १
सारांश
६. संवर
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नव तत्त्व पार्ट - १
सारांश
७. निर्जरा
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नव तत्त्व पार्ट - १
सारांश
८. बंध
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नव तत्त्व पार्ट - १
सारांश
९. मोक्ष
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नव तत्त्व पार्ट - १
सारांश
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