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फणीश्वर नाथ रेणु

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फणीश्वर नाथ रेणु

संछिप्त जीवन परिचय

जन्म : 4 मार्च, 1921

जिला : पूर्णिया ( बिहार में )औराही हिंगना नामक गाँव में

जीवन परिचय : * 1942 के ‘भारत छोड़ो’ स्वाधीनता आन्दोलन में

भाग लिया |

* राजनीति में प्रगतिशील विचारधारा के समर्थक |

* 1953 से साहित्य सृजन के क्षेत्र में आए आदि

और उन्होंने कहानी, उपन्यास, निबंध आदि विविध

साहित्यिक विधाओं में लेखन कार्य किया |� �प्रमुख रचनाएँ : मैला आँचल, पारती परिकथा, दीर्घतपा, जुलुस, कितने चौराहे (उपन्यास ); ठुमरी, अगिनखोर, आदिम रात्रि की महक, एक श्रावणी दोपहरी की धूप (कहानी संग्रह); ऋणजल धनजल, वनतुलसी की गंध, (संस्मरण); रेणु रचनावली (पांच खण्डों में समग्र) |

निधन : 11 अप्रैल 1977

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साहित्यिक विशेषताएँ

लेखक आंचलिक कथाकार हैं | उनके साहित्य में अभावग्रस्त जनता की बेबसी एवं पीड़ा का सशक्त वर्णन है | इन्होने अपनी रचनाओं में ग्रामीण समाज को नई सांस्कृतिक गरिमा प्रदान की है | आंचलिकता की अवधारणा ने कथा-साहित्य में गाँव की भाषा संस्कृति और वहाँ के लोक जीवन को केंद्र में ला खड़ा किया | लोकगीत, लोकोक्ति, लोकसंस्कृति, लोकभाषा एवं लोकनायक की अवधारणा ने अंचल को ही नायक बना डाला |

भाषाशैली : रेणु जी की भाषा संवेदनशील, संप्रेषणीय, और भाव प्रधान है |आंचलिक शब्दों एवं मुहावरों का सुन्दर प्रयोग है | देशज शब्दों के प्रयोग से मानवीय संवेदना की गहरी अभिव्यक्ति हुई है |

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जाड़े का दिन | अमावस्या की रात ठंडी और काली | मलेरिया और हैजे से पीड़ित गाँव भयार्त शिशु की तरह काँप रहा था | पुरानी और उजड़ी बांस-फूस की झोपड़ियों में अंधकार और सन्नाटे का सम्मिलित साम्राज्य | अँधेरा और निश्तब्धता |

अँधेरी रात चुपचाप आँसू बहा रही थी | निश्तब्धता करूण सिसकियों और आहों को बलपूर्वक अपने ह्रदय में ही दबाने की चेष्टा कर रही थी | आकाश में तारे चमक रहे थे | पृथ्वी पर कहीं प्रकाश का नाम नहीं | आकाश से टूटकर यदि कोई भावुक तारा पृथ्वी पर जाना भी चाहता तो उसकी ज्योति और शक्ति रास्ते में ही शेष हो जाती थी |

अन्य तारे उसकी भावुकता अथवा असफलता पर खिलखिलाकर हँस पड़ते थे |

सियारों का क्रंदन और पेचक की डरावनी आवाज़ कभी-कभी निश्तब्धता को अवश्य भंग कर देती थी | गाँव की झोपड़ियों से कराहने और कै करने की आवाज़, ‘हरे राम! हे भगवान!’ की टेर अवश्य सुनाई पड़ती थी | बच्चे भी कभी-कभी निर्बल कंठों से ‘माँ-माँ’ पुकारकर रो पड़ते थे | पर इससे रात्रि की निस्तब्धता में विशेष बाधा नहीं पड़ती थी |

कुत्तों में परिस्थिति को ताड़ने की एक विशेष बुद्धि होती है | वे दिन-भर राख के घूरों पर गठरी की तरह सिकुड़कर, मन मारकर पड़े रहते थे | संध्या या गंभीर रात्रि को सब मिलकर रोते थे |

रात्रि अपनी भीषणताओं के साथ चलती रहती और उसकी सारी भीषणता को, ताल ठोककर, ललकारती रहती थी- सिर्फ पहलवान की ढोलक ! संध्या से लेकर प्रातःकाल तक एक ही गति से बजती रहती- ‘ चट्-धा, गिड –धा,... चट्-धा, गिड़ धा !’ यानी ‘आ जा भिड़ जा, आ जा, भिड़ जा!’....बीच-बीच में –’चटाक् –चट्-धा!’ यानी ‘उठाकर पटक दे! ‘उठाकर पटक दे!’

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यही आवाज़ मृत गाँव में संजीवनी शक्ति भरती रहती थी |

लुट्टन सिंह पहलवान !

यों तो वह कहा करता था- ‘लुट्टन सिंह पहलवान को होल इंडिया भर के लोग जानते हैं’, किन्तु उसके ‘होल-इंडिया’ की सीमा शायद एक जिले की सीमा के बराबर ही हो | जिले भर के लोग उसके नाम से अवश्य परिचित थे |

लुट्टन के माता-पिता उसे नौ वर्ष की उम्र में ही अनाथ बना कर चल बसे थे | सौभाग्यवश शादी हो चुकी थी, वर्ना वह भी माँ-बाप का अनुसरण करता | विधवा सास ने पाल-पोस कर बड़ा किया | बचपन में वह गाय चराता, धारोष्ण दूध पीता और कसरत किया करता था | गाँव के लोग उसकी सास को तरह-तरह की तकलीफ दिया करते थे; लुट्टन के सिर पर कसरत की धुन लोगों से बदला लेने के लिए ही सवार हुई थी | नियमित कसरत ने किशोरावस्था में ही उसके सीने और बाँहों को सुडौल तथा मांसल बना दिया था | जवानी में कदम रखते ही वह गाँव में सबसे अच्छा पहलवान समझा जाने लगा | लोग उससे डरने लगे और वह दोनों हाथों को दोनों ओर 45 डिग्री की दूरी पर फैलाकर, पहलवानों की भांति चलने लगा | वह कुश्ती भी लड़ता था |

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एक बार वह दंगल देखने श्यामनगर मेला गया | पहलवानों की कुश्ती और दांव-पेंच देखकर उससे नहीं रहा गया | जवानी की मस्ती और ढोल की ललकारती हुई आवाज़ ने उसकी नसों में बिजली उत्पन्न कर दी | उसने बिना कुछ सोचे-समझे दंगल में ‘शेर के बच्चे’ को चुनौती दे दी |

‘शेर के बच्चे का असल नाम था चाँद सिंह | वह अपने गुरु पहलवान बादल सिंह के साथ, पंजाब से पहले-पहल श्यामनगर मेले में आया था | सुन्दर, जवान, अंग-प्रत्यंग से सुन्दरता टपक पड़ती थी | तीन दिनों में ही पंजाबी और पठान पहलवानों के गिरोह के अपनी जोड़ी और उम्र के सभी पट्ठों को पछाड़कर उसने ‘शेर के बच्चे’ की टायटिल प्राप्त कर ली थी | इसलिए वह दंगल के मैदान में लँगोट लगाकर एक अजीब किलकारी भरकर छोटी दुलकी लगाया करता था | देशी नौजवान पहलवान, उससे लड़ने की कल्पना से भी घबराते थे | अपनी टायटिल को सत्य प्रमाणित करने के लिए ही चाँद सिंह बीच-बीच में दहाड़ता फिरता था |

श्यामनगर के दंगल और शिकार प्रिय वृद्ध राजा साहब उसे दरबार में रखने की बातें कर ही रहे थे कि लुट्टन ने शेर के बच्चे को चुनौती दे दी | सम्मान-प्राप्त चाँद सिंह पहले तो किंचित, उसकी स्पर्धा पर मुसकुराया फिर बाज़ की तरह उस पर टूट पड़ा |

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शांत दर्शकों की भीड़ में खलबली मच गई – ‘पागल है पागल, मरा- ऐ! मरा-मरा!’ .... पर वाह रे बहादुर ! लुट्टन बड़ी सफाई से आक्रमण को संभलकर निकलकर उठ खड़ा हुआ और पैंतरा दिखने लगा | राजा साहब ने कुश्ती बंद करवाकर लुट्टन को अपने पास बुलवाया और समझाया | अंत में, उसकी हिम्मत की प्रशंसा करते हुए, दस रुपये का नोट देकर कहने लगे- “जाओ, मेला देखकर घर जाओ !..”

“नहीं सरकार, लड़ेंगे...हुकुम हो सरकार....|”

“तुम पागल हो,...जाओ !...”

मेनेजर साहब से लेकर सिपाहियों तक ने धमकाया – “देह में गोश्त नहीं, लड़ने चला है शेर के बच्चे से ! सरकार इतना समझा रहे हैं...!!”

“दुहाई सरकार, पत्थर पर माथा पटक कर मर जाऊंगा....मिले हुकुम!” वह हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाता रहा था |

भीड़ अधीर हो रही थी | बजे बंद हो गए थे | पंजाबी पहलवानों की जमायत क्रोध से पागल होकर लुट्टन पर गालियों की बौछार कर रही थी | दर्शकों की मण्डली उत्तेजित हो रही थी | कोई-कोई लुट्टन के पक्ष से चिल्ला उठता था – “उसे लड़ने दिया जाए !”

अकेला चाँद सिंह मैदान में खड़ा व्यर्थ मुसकुराने की चेष्टा कर रहा था | पहली पकड़ में ही अपने प्रतिद्वंद्वी की शक्ति का अंदाजा उसे मिल गया था |

विवश होकर राजा साहब ने आज्ञा दे दी- “लड़ने दो!”

बाजे बजने लगे | दर्शकों में फिर उत्तेजना फैली | कोलाहल बढ़ गया | मेले के दुकानदार दुकान बंद करके दौड़े- “चाँद सिंह की जोड़ी – चाँद की कुश्ती हो रही है !!”

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चट्-धा, गिड –धा, चट्-धा, गिड –धा....’

भरी आवाज़ में एक ढोल – जो अब तक चुप था – बोलने लगा-

‘ढाक्-ढिना, ‘ढाक्-ढिना ‘ढाक्-ढिना....’

( अर्थात्- वाह पट्ठे! वाह पट्ठे !! )

लुट्टन को चाँद ने कस कर दबा लिया था | -” अरे गया-गया !!” दर्शकों ने तालियाँ बजाई –

“हलुआ हो जाएगा, हलुआ,! हँसी- खेल नहीं- शेर का बच्चा है...बच्चू !”

‘चट्-गिड़ –धा, चट्-गिड़ –धा, चट्-गिड़ –धा....’

( मत डरना, मत डरना, मत डरना ....)

लुट्टन की गर्दन पर केहुनी डालकर चाँद ‘चित’ करने की कोशिश कर रहा था | “वहीँ दफना दे, बहादुर !” बादल सिंह अपने शिष्य को उत्साहित कर रहा था |

लुट्टन की आँखें बाहर निकल रही थीं | उसकी छाती फटने-फटने को हो रही थी | राजमत, बहुमत चाँद के पक्ष में था | सभी चाँद को शाबाशी दे रहे थे | लुट्टन के पक्ष में सिर्फ़ ढोल की आवाज़ थी, जिसकी ताल पर वह अपनी शक्ति और दांव-पेंच की परीक्षा ले रहा था- अपनी हिम्मत को बढ़ा रहा था | अचानक ढोल की एक पतली आवाज़ सुनाई पड़ी – ‘धाक- धिना, तिरकट- तिना, धाक- धिना, तिरकट- तिना...!!”

लुट्टन को स्पष्ट सुनाई पड़ा, ढोल कह रहा था –”दाँव काटो, बाहर हो जा दाँव काटो, बाहर हो जा !!”

लोगों के आश्चर्य की सीमा न रही, लुट्टन दाँव काटकर बाहर निकला और तुरंत लपककर उसने चाँद की गर्दन पकड़ ली |

“वाह रे मिटटी के शेर !”

“अच्छा! बाहर निकल आया ? इसीलिए तो ...|” जनमत बदल रहा था |

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मोटी और भौड़ी आवाज़ वाला ढोल बज उठा – चटाक्- चट् –धा, चटाक्- चट् – धा...’

( उठा पटक दे ! उठा पटक दे !!)

लुट्टन ने चालाकी से दाँव और जोर लगाकर चाँद को जमींन पर दे मारा |

‘धिना-धिना, धिक्-धिना !” (अर्थात् चित करो, चित करो !!)

लुट्टन ने अंतिम जोर लगाया – चाँद सिंह चारों खाने चित हो रहा|

‘धा-गिड़–गिड़, धा-गिड़-गिड़, धा-गिड़-गिड़,’....(वाह बहादुर! वाह बहादुर !! वाह बहादुर!!)

जनता यह स्थिर नहीं कर सकी कि किसकी जय-ध्वनि की जाए | फलतः अपनी-अपनी इच्छानुसार किसी ने ‘माँ दुर्गा की’, ‘महावीर जी की’, कुछ ने राजा श्यामानंद की जय-ध्वनि की | अंत में सम्मिलित ‘जय!’ से आकाश गूंज उठा |

विजयी लुट्टन कूदता-फाँदता, ताल-ठोंकता सबसे पहले बाजे वालों की ओर दौड़ा और ढोलों को श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया |फिर दौड़कर उसने राजा साहब को गोद में उठा

लिया | राजा साहब के कीमती कपड़े मिटटी में सन गए | मैनेजर साहब ने आपत्ति की- “हें-हें...अरे- रे !” किन्तु राजा साहब ने स्वयं उसे छाती से लगाकर गद्गद् होकर कहा- “जीते रहो, बहादुर! तुमने मिटटी की लाज रख ली !”

पंजाबी पहलवानों की जमायत चाँद सिंह की आँखें पोंछ रही थी | लुट्टन को राजा साहब ने पुरस्कृत ही नहीं किया, अपने दरबार में सदा के लिए रख लिया | तब से लुट्टन राज-पहलवान हो गया और राजा साहब उसे लुट्टन सिंह कहकर पुकारने लगे | राज-पंडितों ने मुँह बिचकाया – “हुज़ूर ! जाति का....सिंह..!”

मैनेजर साहब क्षत्रिय थे | ‘क्लीन-शेव्ड’ चेहरे को संकुचित करते हुए, अपनी शक्ति लगाकर नाक के बाल उखाड़ रहे थे | चुटकी से अत्याचारी बाल को रगड़ते हुए बोले- “हाँ सरकार, यह अन्याय है !”

राजा साहब ने मुसकुराते हुए सिर्फ़ इतना ही कहा- “उसने क्षत्रिय का काम किया है |”

उसी दिन से लुट्टन सिंह पहलवान की कीर्ति दूर-दूर तक फैल गई | पौष्टिक भोजन और व्यायाम तथा राजा साहब की स्नेह-दृष्टि ने उसकी प्रसिद्धि में चार चाँद लगा दिए | कुछ वर्षों में ही उसने एक-एक कर सभी नामी पहलवानों को मिट्टी सुंघाकर आसमान दिखा दिया|

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काला खां के सम्बन्ध में यह बात मशहूर थी कि वह ज्यों ही लँगोट लगाकर ‘आ-ली’ कहकर अपने प्रतिद्वंद्वी पर टूटता है, प्रतिद्वंद्वी पहलवान को लकवा मार जाता है लुट्टन ने उसको भी पटककर लोगों का भ्रम दूर कर दिया |

उसके बाद से वह राज-दरबार का दर्शनीय ‘जीव’ ही रहा | चिड़ियाखाने में, पिंजड़े और जंजीरों को झकझोर कर बाघ दहाड़ता – ‘हाँ- ऊँ, हाँ- ऊँ!!’ सुनने वाले कहते – ‘राजा का बाघ बोला |’

ठाकुरबाड़े के सामने पहलवान गरजता – ‘महावीर!’ लोग समझ लेते

पहलवान बोला | मेलों में वह घुटने तक लम्बा चोगा पहने, अस्त-व्यस्त पगड़ी बाँध कर मतवाले हाथी की तरह झूमता चलता | दुकानदारों को चुहल करने की सूझती | हलवाई अपनी दुकान पर बुलाता- “पहलवान काका! ताज़ा रसगुल्ला बना है, ज़रा नाश्ता कर लो !” पहलवान बच्चों की सी स्वाभाविक हँसी हँसकर कहता- “अरे तनी-मनी काहे! ले आव डेढ़ सेर!” और बैठ जाता |

दो सेर रसगुल्ला को उदरस्थ करके, मुँह में आठ-दस पान की गिलौरियाँ ठूँस, ठुड्डी को पान के रस से लाल करते हए अपनी चाल से मेले में घूमता | मेले से दरबार लौटने के समय उसकी अजीब हुलिया रहती – आँखों पर रंगीन अबरख का चश्मा, हाथ में खिलौने को नचाता और मुँह से पीतल की सीटी बजाता, हँसता हुआ वापस आ जाता | बल और शरीर की वृद्धि के साथ बुद्धि का परिणाम घटकर बच्चों की बुद्धि के बराबर ही रह गया था उसमे |

दंगल में ढोल की आवाज़ सुनते ही वह अपने भारी-भरकम शरीर का प्रदर्शन करना शुरू कर देता था | उसकी जोड़ी तो मिलती ही नहीं थी, यदि कोई उससे लड़ना भी चाहता तो राजा साहब लुट्टन को आज्ञा ही नहीं देते | इसलिए वह निराश होकर, लँगोट लगाकर देह में मिटटी मल और उछालकर अपने को सांड या भैंसा साबित करता रहता था | बूढ़े राजा साहब देख-देखकर मुसकराते रहते |

यों ही पंद्रह वर्ष बीत गए | पहलवान अजेय रहा | वह दंगल में अपने दोनों पुत्रों को लेकर उतरता था | पहलवान की सास पहले ही मर चुकी थी, पहलवान की स्त्री भी दो पहलवानों को पैदा करके स्वर्ग सिधार गई थी | दोनों लड़के पिता की तरह ही गठीले और तगड़े थे | दंगल में दोनों को देखकर लोगों के मुँह से अनायास ही निकल पड़ता – “वाह! बाप से भी बढ़कर निकलेंगे ये दोनों बेटे !”

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दोनों ही लड़के राज-दरबार के भावी पहलवान घोषित हो चुके थे | अतः दोनों का भरण-पोषण दरबार से ही हो रहा था | प्रतिदिन प्रातःकाल पहलवान स्वयं ढोलक बजा-बजाकर दोनों से कसरत करवाता | दोपहर में, लेटे-लेटे दोनों को सांसारिक ज्ञान की भी शिक्षा देता- “समझे! ढोलक की आवाज़ पर पूरा ध्यान देना | हाँ, मेरा गुरु कोई पहलवान नहीं, यही ढोल है, समझे ! ढोलक की आवाज़ के प्रताप से ही मैं पहलवान हुआ | दंगल में उतरकर सबसे पहले ढोलों को प्रणाम करना, समझे!”.......

ऐसी ही बहुत सी बातें वह कहा करता | फिर मालिक को कैसे खुश रखा जाता है, कब कैसा व्यवहार करना चाहिए, आदि की शिक्षा वह नित्य दिया करता था |

किन्तु उसकी शिक्षा-दीक्षा, सब किए-कराए पर एक दिन पानी फिर गया | वृद्ध राजा स्वर्ग सिधार गए | नए राजकुमार ने विलायत से आते ही राज्य को अपने हाथ में ले लिया | राजा साहब के समय शिथिलता आ गई थी, राजकुमार के आते ही दूर हो गई | बहुत से परिवर्तन हुए | उन्हीं परिवर्तनों की चापेटाघात में पड़ा पहलवान भी | दंगल का स्थान घोड़े की रेस ने ले लिया |

पहलवान तथा दोनों भावी पहलवानों का दैनिक भोजन- व्यय सुनते ही राजकुमार ने कहा – “टैरिबुल!”

नए मैनेजर साहब ने कहा- “हौरिबुल !”

पहलवान को साफ़ जवाब मिल गया, राज-दरबार में उसकी आवश्यकता नहीं | उसको गिड़गिड़ाने का भी मौका नहीं दिया गया |

उसी दिन वह ढोलक कंधे से लटकाकर, अपने दोनों पुत्रों के साथ अपने गाँव में लौट आया और वहीँ रहने लगा | गाँव के एक छोर पर, गाँव वालों ने एक झोपड़ी बाँध दी | वहीँ रहकर वह गाँव के नौजवानों और चरवाहों को कुश्ती सिखाने लगा | खाने-पीने का खर्च गाँव वालों की ओर से बंधा हुआ था | सुबह शाम वह स्वयं ढोलक बजाकर अपने शिष्यों और पुत्रों को दाँव-पेंच वगैरा सिखाया करता था |

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गाँव के किसान और खेतिहर-मज़दूर के बच्चे भला क्या खाकर कुश्ती सीखते ! धीरे-धीरे पहलवान का स्कूल खाली पड़ने लगा | अंत में अपने दोनों पुत्रों को ही वह ढोलक बजा-बजाकर लड़ाता रहा-सिखाता रहा | दोनों लड़के दिन भर मज़दूरी करके जो कुछ भी लाते, उसी में गुज़र होती रही |

अकस्मात गाँव पर यह वज्रपात हुआ | पहले अनावृष्टि, फिर अन्न की कमी, तब मलेरिया और हैज़े ने मिलकर गाँव को भूनना शुरू कर दिया |

गाँव प्रायः सूना हो चला था | घर के घर खाली पड़ गए थे | रोज़ दो-तीन लाशें उठने लगीं | लोगों में खलबली मची हुई थी | दिन में तो- कलरव, हाहाकार तथा ह्रदय-विदारक रुदन के बावजूद भी लोगों के चेहरे पर कुछ प्रभा दृष्टिगोचर होती थी, शायद सूर्य के प्रकाश में सूर्योदय होते ही लोग काँखते-कूंखते-कराहते

अपने-अपने घरों से बाहर निकलकर अपने पड़ोसियों और आत्मीयों को ढाढ़स देते थे- “अरे क्या करोगी रोकर, दुलहिन! जो गया सो तो चला गया, वह तुम्हारा नहीं था; वह जो है उसको तो देखो |”

“भैया! घर में मुर्दा रखके कब तक रोओगे? कफ़न? कफ़न की क्या ज़रूरत है, दे आओ नदी में |” इत्यादि |

किन्तु, सूर्यास्त होते ही जब लोग अपनी-अपनी झोपड़ियों में घुस जाते तो चूं भी नहीं करते | उनकी बोलने की शक्ति भी जाती रहती थी | पास में दम तोड़ते हुए पुत्र को अंतिम बार ‘बेटा!’ कहकर पुकारने की भी हिम्मत माताओं की नहीं होती थी |

रात्रि की विभीषिका को सिर्फ़ पहलवान की ढोलक ही ललकारकर चुनौती देती रहती थी | पहलवान संध्या से सुबह तक, चाहे जिस खयाल से ढोलक बजाता हो, किन्तु गाँव के अर्द्धमृत, औषधि-उपचार-पथ्य-विहीन प्राणियों में वह संजीवनी शक्ति ही भरती थी | बूढ़े-बच्चे-जवानों की शक्तिहीन आँखों के आगे दंगल का दृश्य नाचने लगता था | स्पंदन-शक्ति-शून्य स्नायुओं में भी बिजली दौड़ जाती थी | अवश्य ही ढोलक की आवाज़ में न तो बुखार हटाने का कोई गुण था और न महामारी की सर्वनाश शक्ति को रोकने की शक्ति ही, पर इसमें संदेह नहीं की मरते हुए प्राणियों को आँख मूँदते समय कोई तकलीफ़ नहीं होती थी, मृत्यु से वे डरते नहीं थे |

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जिस दिन पहलवान के दोनों बेटे क्रूर काल की चापेटाघात में पड़े, असह्य वेदना से छटपटाते हुए दोनों ने कहा था – “बाबा! उठा पटक दो वाला ताल बजाओ!” चटाक्- चट् –धा, चटाक्- चट् – धा...’ सारी रात ढोलक पीटता रहा पहलवान | बीच-बीच में पहलवानों की भाषा में उत्साहित भी करता था |- “मारो बहादुर!”

प्रातःकाल उसने देखा- उसके दोनों बच्चे ज़मीन पर निस्पंद पड़े हैं | दोनों पेट के बल पड़े हुए थे | एक ने दाँत से थोड़ी मिट्टी खोद ली थी | एक लम्बी साँस लेकर पहलवान ने मुसकराने की चेष्टा की थी- “दोनों बहादुर गिर पड़े !”

उस दिन पहलवान ने राजा श्यामानंद की दी हुई रेशमी जाँघिया पहन ली | सारे शरीर में मिट्टी मलकर थोड़ी कसरत की, फिर दोनों पुत्रों को कन्धों पर लादकर नदी में बहा आया | लोगों ने सुना तो दंग रह गए | कितनों की हिम्मत टूट गई |

किन्तु, रात में फिर पहलवान की ढोलक की आवाज़, प्रतिदिन की भांति सुनाई पड़ी | लोगों की हिम्मत दुगनी बढ़ गई | संतप्त पिता-माताओं ने कहा- “दोनों पहलवान बेटे मर गए, पर पहलवान की हिम्मत तो देखो, डेढ़ हाथ का कलेजा है !”

चार-पाँच दिनों के बाद | एक रात को ढोलक की आवाज़ नहीं सुनाई पड़ी | ढोलक नहीं बोली | पहलवान के कुछ दिलेर, किन्तु रुग्ण शिष्यों ने प्रातःकाल जाकर देखा- पहलवान की लाश ‘चित’ पड़ी है |

आँसू पोंछते हुए एक ने कहा- “गुरु जी कहा करते थे कि जब मैं मर जाऊं तो चिता पर मुझे चित नहीं, पेट के बल सुलाना | मैं ज़िन्दगी में कभी ‘चित’ नहीं हुआ और चिता सुलगाने के समय ढोलक बजा

देना |” वह आगे बोल नहीं सका |