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धूमिल जनवादी कवि

पवन कुमारी

असिस्टेंट प्रोफेसर

स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग

हंसराज महिला महाविद्यालय

जालंधर

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  • धूमिल सातवें और आठवें दशक के सर्वश्रेष्ठ वर्तमान कविता के प्रतिनिधि तथा आधुनिक हिंदी काव्य जगत के अक्कड़ व फक्कड़ कवि रह चुके हैं। धूमिल एक संवेदनशील साहित्यकार रहे। उन्होंने ने अपने काव्य में पूँजीवादी शोषण व्यवस्था और राजनैतिक नेताओं का पर्दाफाश किया है। इन कविताओं में कवि का स्वर और भी बुलंद एवं व्यंग्यात्मक रहा।

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  • सुदामा पाण्डेय धूमिल हिंदी की समकालीन कविता के दौर के मील के पत्थर सरीखे कवियों में एक है। उनकी कविताओं में आजादी के सपनों के मोहभंग की पीड़ा और आक्रोश की सबसे सशक्त अभिव्यक्ति मिलती है। व्यवस्था जिसने जनता को छला है, उसको आइना दिखाना मानों धूमिल की कविताओं का परम लक्ष्य है।

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जीवन परिचय

  • धूमिल का जन्म वाराणसी के पास खेवली गांव में हुआ था। उनका मूल नाम सुदामा पांडेय था। धूमिल नाम से वे जीवन भर कवितायें लिखते रहे। सन् 1958 में आई टी आई (वाराणसी) से विद्युत डिप्लोमा लेकर वे वहीं विद्युत अनुदेशक बन गये। 38 वर्ष की अल्पायु में ही ब्रेन ट्यूमर से उनकी मृत्यु हो गई।

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रचनात्मक विशेषताएं

  • सन 1960 के बाद की हिंदी कविता में जिस मोहभंग की शुरूआत हुई थी, धूमिल उसकी अभिव्यक्ति करने वाले अंत्यत प्रभावशाली कवि हैं । उनकी कविता में परंपरा, सभ्यता, सुरुचि, शालीनता और भद्रता का विरोध है, क्योंकि इन सबकी आड़ में जो हृदय पलता है, उसे धूमिल पहचानते हैं। कवि धूमिल यह भी जानते हैं कि व्यवस्था अपनी रक्षा के लिये इन सबका उपयोग करती है, इसलिये वे इन सबका विरोध करते हैं

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रचनाएं�

  • धूमिल के तीन काव्य-संग्रह प्रकाशित हैं-
  • संसद से सड़क तक-1972
  • कल सुनना मुझे-1976
  • सुदामा पांडे का प्रजातंत्र- 1984
  • धूमिल समग्र (तीन खण्डों में) - 2021
  • उन्हें मरणोपरांत १९७९ में 'कल सुनना मुझे' काव्य संग्रह के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
  • धूमिल की कुछ सबसे लोकप्रिय कविताएँ हैं- मोचीराम, बीस साल बाद, पटकथा, रोटी और संसद, लोहे का स्वाद आदि।

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साठोत्तरी हिन्दी कविता और धूमिल

धूमिल ने समाज में स्थित बेकारी,दारिद्र्यता, सामाजिक अनिष्ट रूढ़ियाँ,नारी विषयक दृष्टिकोण, दलितों की स्थिति अनेक समस्याओं से ग्रस्त ग्रामीण जीवन आदि अनेक समस्याओं को अपने काव्य का विषय बनाया और इसमें परिवर्तन लाने के लिए समाज जागृति करने का प्रयास अपनी कविताओं के माध्यम से किया है।

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  • धूमिल ने जितना भी लेखन किया है,उसका पूरा लेखा-जोखा ‘मोचीराम’ कविता में है। उनकी कविता में पीड़ा और आक्रोश देखा जा सकता है। आम आदमी का आक्रोश कवि धूमिल की वाणी में घुलता है और शब्द का रूप धारण कर कविताओं के माध्यम से कागजों पर उतरता है।

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  • धूमिल मानते थे कि ‘चंद टुच्ची सुविधाओं के लालची/अपराधियों के संयुक्त परिवार’ के लोग एक दिन खत्म हो जाएंगे और इसी विश्वास के बल से उन्होंने ‘अराजक’ होना कुबूल करके भी निष्ठा का तुक विष्ठा से नहीं भिड़ाया। कविताओं में वर्जित प्रदेशों की खोज करने और छलिया व्यवस्था द्वारा पोषित हर परम्परा,सभ्यता, सुरुचि,शालीनता और भद्रता की ऐसी-तैसी करने को आक्रामक धूमिल ने अपना छायावादी अर्थध्वनि वाला उपनाम भी रख लिया था।

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धूमिल के काव्य की विशेषताएँ

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सामान्य मानव का चित्रण

धूमिल का काव्य आम आदमी का काव्य हैं

“कविता घेराव में किसी

बोखलाय आदमी का

संक्षिप्त एकालाप हैं”

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मूल्य चेतना –

“मैंने पहली बार महसूस किया हैं

कि नंगापन अंधा होने के खिलाफ

एक सख्त कार्यवाही हैं”

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विसंगत स्थितियाँ –�

“न कोई बड़ा है ,न कोई छोटा हैं

मेरे लिए हर आदमी एक जोड़ी जूता हैं

यो मेरे सामने मुरम्म्त के लिए खड़ा हैं”

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प्रजातन्त्र का विरोध – �

“क्रांति यहा के असंग

लोगो के लिए किसी

अबोध बचे के हाथों की जूती हैं”

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पीड़ा का चित्रण – �

डॉ रामचंद बिंद

“धूमिल मात्र दिखावे के लिए

युवाओं द्वारा किए जाने वाले

विरोध को निरर्थक मानते हैं”

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नैतिक मूल्य – �

“सड़क के पिछले हिस्से में

छाया रहेगा पीला अंधकार”

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शोषण के प्रति चेतनता – �

“जनता क्या हैं ?

एक भेड़ चल हैं

जो दूसरों को ठंड से बचाने के लिए

अपनी पीठ पीआर ऊब की फसल ढोह रही हैं”

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यथार्थपरक दृष्टिकोण –

“नहीं, अपना कोई हमदर्द जहा नहीं हैं

माइनें एक – एक को परख लिया हैं”

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व्यवस्था का विरोध

आजकल शहर, कोतवाल की नीयत और हथकड़ी का नंबर एक ही हैं

व्यवस्था की खोह में हर तरफ बड़े और रक्तालूप घूम रहे हैं”

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राजनीतिक परिदृश्य का वर्णन

“बीस साल बाद मैं अपने आप से सवाल करता हूँ

जानवर बनने के लिए कितने सब की जरूरत होती हैं”

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सुनहरे भविष्य का स्वप्न

मैंने इंतज़ार किया , अब कोई बच्चा भूखा रह कर स्कूल नहीं जायेंगा ,

अब कोई छत बारिश से नहीं टपकेगी ,

अब कोई आदमी कपड़ो की लाचारी में अपना नंगा चेहरा नहीं पहनेगा”

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अस्तित्वबोध

भूख ने उन्हे जानवर कर दिया हैं

संशय ने उन्हे आग्रहों से भर दिया हैं

फिर भी वर अपने है, अपने हैं, अपने हैं

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धन्यवाद