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(जन्म: सन 1398, मृत्यु: 1518, विक्रम संवत् 1455-1575)

*कबीर दास उत्तरी भारत में संत परंपरा के प्रवर्तक माने जाते हैं।

*कबीर दास जी के बारे में अनेक किंवदंतियां और आख्यायिकाएं प्रचलित है।

कहते हैं कि एक विधवा ब्राह्मणी ने उन्हें जन्म दिया था और उनका लालन-पालन नीरू नामक मुसलमान जुलाहे के यहां हुआ

कबीरदास

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कबीर दास जी पढ़े-लिखे पंडित तो थे नहीं।

उन्होंने स्वयं कहा है-

'मसी कागद छुओ नहीं कलम गहयो नहीं हाथ।'

*कबीरदास जी अनुभव के धनी थे।

*भक्ति और साधना के बल पर उन्होंने अध्यात्मिक ऊंचाई पायी थी।

*काशी में रहते हुए भी काशी के पंडितों को ललकार कर कहते थे-

'तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता अंखियन की देखी।'(तू पुस्तक में लिखी हुई बात बताता है, किंतु मैं तो प्रत्यक्ष अनुभव की हुई बात बताता हूं)

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*कबीर दास जी ने जीवन भर समाज को सच्ची राह दिखाने का अनमोल कार्य किया है।

*कबीर दास जी की वाणी में दार्शनिक विचार, भक्ति भाव का प्रकाशन, सामाजिक उपदेश और भक्ति साधना में प्राप्त अलौकिक अनुभूति या मिलती हैं।

*उन्होंने धर्म के नाम पर आडंबर फैलाकर मनुष्य को गुमराह करने वाली, मनुष्य- मनुष्य में भेदभाव पैदा करने वाली बातों का निषेध किया है।

*हिंदू मुसलमान दोनों को फटकारा है।

*जात- पात, छुआछूत, मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा, व्रत, रोजा, अजान आदि बातों पर कठोर प्रहार किया है।

*जीवन के अंतिम समय में वे काशी छोड़कर मगहर गए, क्योंकि लोगों में यह अंधविश्वास था कि काशी में मरने पर स्वर्ग और मगहर में मरने पर नरक मिलता है।

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*कबीर की वाणी के तीन अंग हैं-

पद, साखी तथा रमैनी।

*कबीर की भाषा को सधुक्कड़ी भाषा कहते हैं क्योंकि,

उनकी वाणी में बहुजन समाज में प्रचलित विविध भाषाओं और बोलियों के प्रयोग मिलते हैं।

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धन्यवाद...