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भाषा की परिभाषा एवं विविध रूप

पवन कुमारी

असिस्टेंट प्रोफेसर

स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग

हंसराज महिला महाविद्यालय

जालंधर

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  • भाषा वह साधन है, जिसके द्वारा मनुष्य बोलकर, सुनकर, लिखकर व पढ़कर अपने मन के भावों या विचारों का आदान-प्रदान करता है। दूसरे शब्दों में- जिसके द्वारा हम अपने भावों को लिखित अथवा कथित रूप से दूसरों को समझा सके और दूसरों के भावो को समझ सके उसे भाषा कहते है। सार्थक शब्दों के समूह या संकेत को भाषा कहते है।

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  • भाषा वह साधन है जिसके द्वारा हम अपने विचारों को व्यक्त कर सकते हैं और इसके लिये हम वाचिक ध्वनियों का प्रयोग करते हैं।

  • भाषा वह हैं जिसे बोला जाता हैं। भाषा शब्द संस्कृत के ‘भाष्’ धातु से बना हैं जिसका अर्थ होता हैं बोलना या कहना।
  • भाषा हमारे मुख से उच्चारित होने वाले शब्दों और वाक्यों आदि का वह समूह हैं जिनके द्वारा हम अपने मन की बात किसी दूसरे व्यक्ति से बता सकते हैं।
  • जैसे :- बोली, जबान, वाणी विशेष।

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परिभाषा�

  • (1) 'भाषा' शब्द संस्कृत के 'भाष्' धातु से बना है जिसका अर्थ है बोलना या कहना अर्थात् भाषा वह है जिसे बोला जाए।
  • (2) प्लेटो ने सोफिस्ट में विचार और भाषा के सम्बन्ध में लिखते हुए कहा है कि विचार और भाषा में थोड़ा ही अंतर है। विचार आत्मा की मूक या अध्वन्यात्मक बातचीत है और वही शब्द जब ध्वन्यात्मक होकर होठों पर प्रकट होती है तो उसे भाषा की संज्ञा देते हैं

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  • (3) स्वीट के अनुसार ध्वन्यात्मक शब्दों द्वारा विचारों को प्रकट करना ही भाषा है।
  • (4) वेन्द्रीय कहते हैं कि भाषा एक तरह का चिह्न है। चिह्न से आशय उन प्रतीकों से है जिनके द्वारा मानव अपना विचार दूसरों के समक्ष प्रकट करता है। ये प्रतीक कई प्रकार के होते हैं जैसे नेत्रग्राह्य, श्रोत्र ग्राह्य और स्पर्श ग्राह्य। वस्तुतः भाषा की दृष्टि से श्रोत्रग्राह्य प्रतीक ही सर्वश्रेष्ठ है।

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  • (5) ब्लाक तथा ट्रेगर- भाषा यादृच्छिक भाष् प्रतिकों का तन्त्र है जिसके द्वारा एक सामाजिक समूह सहयोग करता है।

  • (6) स्त्रुत्वा – भाषा यादृच्छिक भाष् प्रतीकों का तन्त्र है जिसके द्वारा एक सामाजिक समूह के सदस्य सहयोग एवं समृपर्क करते हैं।

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  • (7) इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका - भाषा को यादृच्छिक भाष् प्रतिकों का तन्त्र है जिसके द्वारा मानव प्राणि एक सामाजिक समूह के सदस्य और सांस्कृतिक साझीदार के रूप में एक सामाजिक समूह के सदस्य संपर्क एवं सम्प्रेषण करते हैं।

  • (8) ए. एच. गार्डिबर का मन्तव्य है-"The common definition of speech is the use of articulate sound symbols for the expression of thought." अर्थात् विचारों की अभिव्यक्ति के लिए जिन व्यक्त एवं स्पष्ट भ्वनि-संकेतों का व्यवहार किया जाता है, उनके समूह को भाषा कहते हैं।

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  • 9) ‘‘भाषा यादृच्छिक वाचिक ध्वनि-संकेतों की वह पद्धति है, जिसके द्वारा मानव परम्परा विचारों का आदान-प्रदान करता है।’’[1] स्पष्ट ही इस कथन में भाषा के लिए चार बातों पर ध्यान दिया गया है-

  • (1) भाषा एक पद्धति है, अर्थात् एक सुसम्बद्ध और सुव्यवस्थित योजना या संघटन है, जिसमें कर्ता, कर्म, क्रिया, आदि व्यवस्थिति रूप में आ सकते हैं।

  • (2) भाषा संकेतात्कम है अर्थात् इसमे जो ध्वनियाँ उच्चारित होती हैं, उनका किसी वस्तु या कार्य से सम्बन्ध होता है। ये ध्वनियाँ संकेतात्मक या प्रतीकात्मक होती हैं

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  • (3) भाषा वाचिक ध्वनि-संकेत है, अर्थात् मनुष्य अपनी वागिन्द्रिय की सहायता से संकेतों का उच्चारण करता है, वे ही भाषा के अन्तर्गत आते हैं।

  • (4) भाषा यादृच्छिक संकेत है। यादृच्छिक से तात्पर्य है - ऐच्छिक, अर्थात् किसी भी विशेष ध्वनि का किसी विशेष अर्थ से मौलिक अथवा दार्शनिक सम्बन्ध नहीं होता। प्रत्येक भाषा में किसी विशेष ध्वनि को किसी विशेष अर्थ का वाचक ‘मान लिया जाता’ है। फिर वह उसी अर्थ के लिए रूढ़ हो जाता है। कहने का अर्थ यह है कि वह परम्परानुसार उसी अर्थ का वाचक हो जाता है। दूसरी भाषा में उस अर्थ का वाचक कोई दूसरा शब्द होगा।

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हिंदी भाषा के विविध रूप�

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1. बोलचाल की भाषा�

  • ‘बालेचाल की भाषा’ को समझने के लिए ‘बोली’ (Dialect) को समझना जरूरी है। ‘बोली’ उन सभी लोगों की बोलचाल की भाषा का वह मिश्रित रूप है जिनकी भाषा में पारस्परिक भेद को अनुभव नहीं किया जाता है। विश्व में जब किसी जन-समूह का महत्त्व किसी भी कारण से बढ़ जाता है तो उसकी बोलचाल की बोली ‘भाषा’ कही जाने लगती है, अन्यथा वह ‘बोली’ ही रहती है। स्पष्ट है कि ‘भाषा’ की अपेक्षा ‘बोली’ का क्षेत्र, उसके बोलने वालों की संख्या और उसका महत्त्व कम होता है। एक भाषा की कई बोलियाँ होती हैं क्योंकि भाषा का क्षेत्र विस्तृत होता है।

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2. मूल भाषा

  •  जिस प्रकार मानव-सृष्टि का मूल (आदि) पुरुष हम मनु को मानते हैं, उसी प्रकार आज विश्व में बोली जाने वाली भाषाओं के मूल में भी कोई एक भाषा रही होगी, उदाहरणार्थ- आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं की मूल भाषा है- मूल भारोपीय भाषा। आज तक जितने भी भाषा-परिवार प्रकाश में आये हैं, उन सबकी आदि-भाषा मूल भाषा कहलाती है। बिना किसी मूल भाषा के किसी भी भाषा-परिवार का अस्तित्व नहीं माना जा सकता है।

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3. मानक भाषा �

  • भाषा के स्थिर तथा सुनिश्चित रूप को मानक या परिनिष्ठित भाषा कहते हैं। भाषाविज्ञान कोश के अनुसार ‘किसी भाषा की उस विभाषा को परिनिष्ठित भाषा कहते हैं जो अन्य विभाषाओं पर अपनी साहित्यिक एवं सांस्कृतिक श्रेष्ठता स्थापित कर लेती है तथा उन विभाषाओं को बोलने वाले भी उसे सर्वाधिक उपयुक्त समझने लगते हैं।��मानक भाषा शिक्षित वर्ग की शिक्षा, पत्राचार एवं व्यवहार की भाषा होती है। इसके व्याकरण तथा उच्चारण की प्रक्रिया लगभग निश्चित होती है। मानक भाषा को टकसाली भाषा भी कहते हैं। इसी भाषा में पाठ्य-पुस्तकों का प्रकाशन होता है। हिन्दी, अंग्रेजी, फ्रेंच, संस्कृत तथा ग्रीक इत्यादि मानक भाषाएँ हैं।

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  • किसी भाषा के मानक रूप का अर्थ है, उस भाषा का वह रूप जो उच्चारण, रूप-रचना, वाक्य-रचना, शब्द और शब्द-रचना, अर्थ, मुहावरे, लोकोक्तियाँ, प्रयोग तथा लेखन आदि की दृष्टि से, उस भाषा के सभी नहीं तो अधिकांश सुशिक्षित लोगों द्वारा शुद्ध माना जाता है। मानकता अनेकता में एकता की खोज है, अर्थात यदि किसी लेखन या भाषिक इकाई में विकल्प न हो तब तो वही मानक होगा, किन्तु यदि विकल्प हो तो अपवादों की बात छोड़ दें तो कोई एक मानक होता है। जिसका प्रयोग उस भाषा के अधिकांश शिष्ट लोग करते हैं। किसी भाषा का मानक रूप ही प्रतिष्ठित माना जाता है। उस भाषा के लगभग समूचे क्षेत्र में मानक भाषा का प्रयोग होता है।�

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4. सम्पर्क भाषा �

  • अनेक भाषाओं के अस्तित्व के बावजूद जिस विशिष्ट भाषा के माध्यम से व्यक्ति-व्यक्ति, राज्य-राज्य तथा देश-विदेश के बीच सम्पर्क स्थापित किया जाता है उसे सम्पर्क भाषा कहते हैं। एक ही भाषा परिपूरक भाषा और सम्पर्क भाषा दोनों ही हो सकती है। आज भारत मे सम्पर्क भाषा के तौर पर हिन्दी प्रतिष्ठित होती जा रही है जबकि अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर अंग्रेजी सम्पर्क भाषा के रूप में प्रतिष्ठित हो गई है। सम्पर्क भाषा के रूप में जब भी किसी भाषा को देश की राष्ट्रभाषा अथवा राजभाषा के पद पर आसीन किया जाता है तब उस भाषा से कुछ अपेक्षाएँ भी रखी जाती हैं।�

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5. राजभाषा �

  • जिस भाषा में सरकार के कार्यों का निष्पादन होता है उसे राजभाषा कहते हैं। कुछ लोग राष्ट्रभाषा और राजभाषा में अन्तर नहीं करते और दोनों को समानाथ्र्ाी मानते हैं। लेकिन दोनों के अर्थ भिन्न-भिन्न हैं। राष्ट्रभाषा सारे राष्ट्र के लोगों की सम्पर्क भाषा होती है जबकि राजभाषा केवल सरकार के कामकाज की भाषा है। भारत के संविधान के अनुसार हिन्दी संघ सरकार की राजभाषा है। राज्य सरकार की अपनी-अपनी राज्य भाषाएँ हैं। राजभाषा जनता और सरकार के बीच एक सेतु का कार्य करती है। किसी भी स्वतंत्र राष्ट्र की उसकी अपनी स्थानीय राजभाषा उसके लिए राष्ट्रीय गौरव और स्वाभिमान का प्रतीक होती है। विश्व के अधिकांश राष्ट्रों की अपनी स्थानीय भाषाएँ राजभाषा हैं। आज हिन्दी हमारी राजभाषा है।

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6. राष्ट्रभाषा �

  • देश के विभिन्न भाषा-भाषियों में पारस्परिक विचार-विनिमय की भाषा को राष्ट्रभाषा कहते हैं। राष्ट्रभाषा को देश के अधिकतर नागरिक समझते हैं, पढ़ते हैं या बोलते हैं। किसी भी देश की राष्ट्रभाषा उस देश के नागरिकों के लिए गौरव, एकता, अखंडता और अस्मिता का प्रतीक होती है। महात्मा गांधी ने राष्ट्रभाषा को राष्ट्र की आत्मा की संज्ञा दी है। एक भाषा कई देशों की राष्ट्रभाषा भी हो सकती है; जैसे अंग्रेजी आज अमेरिका, इंग्लैण्ड तथा कनाडा़ इत्यादि कई देशों की राष्ट्रभाषा है। 

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  • दूसरे शब्दों में राजभाषा के रूप में हिन्दी, अंग्रेजी की तरह न केवल प्रशासनिक प्रयोजनों की भाषा है, बल्कि उसकी भूमिका राष्ट्रभाषा के रूप में भी है। वह हमारी सामाजिक-सांस्कृतिक अस्मिता की भाषा है। महात्मा गांधी जी के अनुसार किसी देश की राष्ट्रभाषा वही हो सकती है जो सरकारी कर्मचारियों के लिए सहज और सुगम हो; जिसको बोलने वाले बहुसंख्यक हों और जो पूरे देश के लिए सहज रूप में उपलब्ध हो। उनके अनुसार भारत जैसे बहुभाषी देश में हिन्दी ही राष्ट्रभाषा के निर्धारित अभिलक्षणों से युक्त है।�

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7. बोली 

  • ‘बोली’ भाषा का वह रूप है, जिसका व्यवहार घर में अर्थात् बहुत ही सीमित क्षेत्र में होता है। यह बोली जरा भी साहित्यिक नहीं होती है और बोलने वाले के मुख. में ही रहती है। डॉ० पी० डी० गुणे ने ए० मीलेट प्रिंज के शब्दों में ‘बोली’ की परिभाषा इस प्रकार दी है- “Dialect is constituted by the speech of all those persons in whose utterances, variations are not sensibly perceived or attended to.” (An Introduction to Comparative Philology) अर्थात् बोली उन सभी लोगों की बोलचाल की भाषा का मिश्रित रूप है, जिनकी भाषा में पारस्परिक भेद को अनुभव नहीं किया जाता है।

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8. विभाषा

  • जब कोई बोली अपना क्षेत्र विस्तृत करके परिमार्जित हो जाती है तथा परिनिष्ठित रूप में प्रयुक्त होने लगती है, तथा एक बड़े क्षेत्र के निवासियों द्वारा बोली जाने लगती है, तब वह विभाषा कहलाती है, जैसे अवधी और ब्रजभाषा।

डॉ० ग्रियर्सन के शब्दों में, “भाषा और विभाषा में वही अन्तर है जो पहाड़ और पहाड़ी में है।”

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9. साहित्यिक भाषा

  •  जिस भाषा में प्रचुर साहित्य की रचना होती है, वह साहित्यिक भाषा कही जाती है अथवा भाषा के उस विशिष्ट रूप को साहित्यिक भाषा कहते हैं जिसमें अलंकार तथा व्याकरण सम्बन्धी नियमों की प्रधानता रहती है और यह भाषा एक विशिष्ट समुदाय के लिए ही होती है। जन-साधारण के लिए यह भाषा नहीं होती है। यह टकसाली भाषा का ही विशिष्ट रूप होती है।

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10. अन्तर्राष्ट्रीय भाषा

  • शासन या अन्य किसी प्रभाव से जब किसी भाषा का प्रयोग एक से अधिक राष्ट्रों में होने लगता है तो उसे अन्तर्राष्ट्रीय भाषा का पद प्राप्त हो जाता है; जैसे अंग्रेजी।

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  • निष्कर्ष- भाषा मानवीय वाणी का वह रूप है, जो भावों एवं विचारों के आदान-प्रदान का माध्यम होती है। प्रारम्भ में वह एक बोली होती है। धीरे-धीरे विकसित होकर वह एक विभाषा या प्रान्तीय भाषा बन जाती है। प्रान्तीय भाषा यदि समृद्ध एवं सशक्त होती है, तो वह भाषा का रूप धारण कर लेती है। अधिक लोकप्रियता एवं जनता का समर्थन प्राप्त करके वह राष्ट्रभाषा के पद पर आसीन हो जाती है।

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  • इस प्रकार हम कह सकते हैं कि स्थानीय भाषा के लिए बोली, प्रान्तीय भाषा के लिए विभाषा और राष्ट्रीय तथा टकसाली भाषा के लिए भाषा का प्रयोग किया जाता है। विभाषा की सीमा बहुत कुछ भूगोल स्थिर करता और भाषा की सीमा सभ्यता, संस्कृति और जातीय भावों के ऊपर निर्भर होती है।

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धन्यवाद