Jeevak Ayurvedic Medical
College and hospital
research centre
Topic – Srotas,
with special reference to
Udakwah Srotas
Guided By –
Dr Amit Singh
Associate professor & HOD
Dr Varsha Gupta
Assistant professor
DEPARTMENT OF RACHANA SHARIR
Presented by-
Anjum
Roll No-23
BAMS lst prof
Batch -2023
स्रोतस
WITH SPECIAL REFERENCE TO UDAKWAH SROTAS
INDEX :
श्रोतस की निरुक्ति
व्युत्पत्ति
परिभाषा
पर्याय
पांचभौतिक संगठन
स्वरूप
कार्य
संख्या
मनोवाही श्रोत
श्रोतवगुण्य
उदकवाह स्रोत के मूल
दुष्टि के हेतू
दुष्टि के लक्षण
व्याधि
श्रोत गत व्याधि
औषधी
निरूक्ति:� � स्रोतस –'स्रवणात् स्रोतांसि (च.सू. ३०/१२) � जिनसे स्रवण होता है, �उसे स्त्रोतस कहते हैं। ���आ० चक्रपाणि :- 'स्रवण' शब्द से स्रोतस रसादि धातुओं में � से पोषक तत्त्वों का स्थाई धातुओं में स्रवण होना ।
शब्द 'स्त्रोत' संस्कृत मूल 'स्त्रोत' से उत्पन्न हुआ है।
सृ का अर्थ है स्रावित करना, व्याप्त होना या बहना।
व्युत्पत्ति:
*सौतासि खलु परिणाममापद्यमानानां धातूनामभिवाहीनी
भवन्त्ययनार्थेन (चरक वि० 5/3)
जिसमें स्रवण क्रिया होती है उन्हें स्रोत कहते हैं। स्रोत परिणाम प्राप्त धातुओं को अन्यत्र ले जाने के लिए वहन करने वाले होते हैं।
स्रोतस 'परिणाममापद्यमान' धातुओं का अभिवहन करते हैं'।
इनकी व्याख्या में अनेक विद्वानों के मत इस प्रकार हैं-
1. चक्रपाणि- स्रवणादिति रसादेरेव पोष्यस्य स्रवणात्।
स्रवण कर्म में पोष्य धातुओं में पोषक रसादि का स्पन्दन
(शीघ्र गमन) होता है।
2. कविराज गंगाधर जी- स्रवणाद्रसादिस्रावपथत्वात् स्रोतांस्युच्यन्ते ।
3. कविराज गणनाथ जी- श्रवणं स्यन्दनं।
4. आचार्य डल्हण- प्राणान्नवारिरसशोणितमांसमेदोवाहित्वं स्रोतसाम्।
प्राण, अन्न, जल, रस रक्तादि पदार्थों का जिन मागों से स्रवण
होता है उन माग को स्रोतस् कहा जाता है।
परिभाषा:
मूल छिद्र से देह में प्रसृत (फैला) I
रस आदि का वहन (transport) स्त्रोतस कहते हैं
*मूलात् खादान्तरं देहे प्रसृतं त्वभिवहि यत् ।
स्त्रोतस्तदिति विज्ञेयं सिरा धमनिवर्जितम् ।।
हृदयादि मूल छिद्र से सम्पूर्ण शरीर में प्रसार करते हुए, आकाश महाभूत की प्रधानता वाले, भीतर से अवकाश युक्त, दृश्य या अदृश्य शरीरावयव, जो उत्तरोत्तर परिवर्तनशील धातुओं, दोषों, मलों, जल, अन्न आदि का स्रवण या वहन करते हैं, वे स्रोतस कहलाते हैं, परन्तु सिरा या धमनी स्रोतस नहीं हैं।
#. रन्ध्र, सिरा एवं धमनियों से स्रोत भिन्न है।
तीनों में अन्तर इस प्रकार है-
1. कार्य विशेषता- तीनों ही दोष धातुओं को वहन करते हैं
फिर भी कर्म में भिन्नता बताई गई है।
2. शास्त्र प्रमाण- शास्त्रों में भी इनका पृथक-पृथक् वर्णन है।
3. लक्षण भिन्नता- तीनों के अलग-अलग लक्षण बताते हुए चरक
में लिखा है-
*ध्मानाद्धमन्यः,स्रवणात् स्रोतांसि,सरणात् सिराः। च०सू०(30/12)
4. मूलसंनियमात्- मूल सिरा, मूल धमनी और मूल स्रोतों की संख्या . में भी अन्तर है।
पञ्चभौतिक संगठन:
1. स्रोतस् की उत्पत्ति में आकाश महाभूत प्रमुख है।
2. सृष्टि की उत्पत्ति में वाले एकाधिक भौतिक सिद्धान्त के
अनुसार स्रोत पंचमहाभूतों से बने हैं।
3. उनकी उत्पत्ति के समय आकाश महाभूत का आधिक्य होता
है।
4. इसलिए स्रोतों का संगठन आकाश (प्रमुख) तथा अन्य
पृथ्वी, आप, तेज, वायु (गौण) महाभूत हैं।
स्वरूप:
*स्वधातुसमवर्णानि वृत्तस्थूलान्यणूनि च ।
स्त्रोतांसि दीर्घाण्याकृत्या प्रतानसदृशानि च ।। (च.वि. 5/25)
1. जिन धातुओं को वहन करते हैं उनके वर्ण के
समान आकृति धारण करते हैं। अर्थात् अनेक वर्ण
के होते हैं।
2. ये गोल, चपटे और सूक्ष्म होते हैं।
3. पत्र के प्रतान के समान फैले रहते हैं।
4. स्रोतस् शरीरगत नाली के समान या अवकाशयुक्त
अवयव हैं।
5. स्रोतों में रस का स्रवण भी होता है।
1. संश्लेषणसी
2. धातु के पोषक तत्वों का परिवहन
3. धातु के पोषक तत्वों का रूपांतरण
4. अपशिष्ट उत्पादों का उत्सर्जन स्रोतस का मुख्य
कार्य है।
कार्य:
धातु
चरक(13) एवं सुश्रुत(22) में मान्य स्रोतों की संख्या भिन्न-
भिन्न है, कुछ लोग असंख्य भी मानते हैं।
*यावन्तः पुरुषे मूर्तिमन्तो भावविशेषास्तावन्त एवास्मिन्
स्रोतसां प्रकारविशेषाः" (च०वि० 5/6)
विशेष-पुरुषों में जितने मूर्तिमान भाव हैं = इस पुरुष में
स्रोतों के प्रकारभेद
इस प्रकार स्रोतों की संख्या असंख्य मानते हुए पुरुष को स्रोतों का समुदाय हो मानते हैं
संख्याः
संख्याः
चरकानुसार (13)="प्राण-उदक-अन्नरस-रुधिर-मांस-मेद-अस्थि
मज्जा-शुक्र-मूत्र-पुरीष-स्वेद" (च.वि.)
सुश्रुतानुसार (11x2 = 22)= प्राण-उदक-अन्न-रस-रक्त-मांस-मेद
मूत्र-पुरीष-शुक्र-आर्तव (सु. शा.)
आचार्य वाग्भट्ट (37)=(1)बाह्य(दृष्य)-पुरुषों में(9)-स्त्रियों में
(9+3=12)-(2)आभ्यान्तर(अदृश्य)-(13)जो चरक
ने माने हैं।
आचार्य सुश्रुतानुसार बर्हिमुख श्रोतस-
1. पुरुषों में कान-आँख-मुख-नासा-गुद-मेद्र (9)
2. स्लियों में- 9+3=12 (दो स्तन एक आर्तववह स्रोतस)
मनोवाही स्रोत:
*मनोवहानां पूर्णत्वाद्दौषैरतिबलैस्त्रिभिः । स्रोतसां दारुणांन् स्वप्नान् काले पश्यति
दारुणे। (च०३० 5/41)
मृत्यु काल में अति बलवान् वात, पित्त और कफ इन तीनों दोषों से जब मनोवाही स्रोत पूर्ण हो जाते हैं तब मनुष्य भयंकर मृत्युदायक स्वप्नों को देखता है।
चक्रपाणिदत्त-"मनोवहानि स्रोतांसि यद्यपि पृथक् नोक्तानि......... दशधमन्यो
मनोवहा अभिधीयन्ते।"
यद्यपि मनोवाही स्रोतों का पृथक् कहीं वर्णन नहीं किया गया है फिर भी मन सम्पूर्ण शरीर में गति करते हुए ज्ञानेन्द्रियों एवं कर्मेन्द्रियों के विषय को ग्रहण करता है अतः इनके मत में आत्मा की तरह मन भी सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त है। आत्मा+मन का भी स्थान हृदय ही है। यह मन हृदय से निकलने वालो धमनियों में से होकर इन्द्रियों के विषयों को ग्रहण करता है। इस अर्थ में हृदय से निकलने वाली 10 धमनियों को मनोवह स्रोत कहना चाहिए
गयदास-मन ही धमनियों द्वारा इन्द्रियों के विषयों को प्राप्त कर आत्मा
तक पहुंचता है। अतः 10 धमनियां ही मनोवाही स्रोत हैं।
*मदयन्त्युद्गता दोषा यस्मादुन्मार्गमाश्रिताः ।
मानसोऽयमतो व्याधिरुन्माद इति कीर्तितः ॥ सु०४०अ० 62/3
मनोवह धमनियों में दोष उत्पन्न होने पर उन्माद होता है। इस रोग में
मनोवाही स्रोतों में विकृति आती है। इसी कारण यह मानस रोग कहा .
जाता है। (मधुकोष नि० 20/1)
भेल संहिता-भेल संहिता में वातापस्मार के निदान का वर्णन करते हुए
"रुद्ध्वा" चेतोवहां मार्ग संज्ञा भ्रंशयते ततः इन्हीं मनोवह स्रोतों का . .
चेतोवह नाम दिया है।
सुश्रुत- शारीर अध्याय 9 में धमनियों का महत्व बताते हैं कि पांचों
इन्द्रियों में फैली आत्मा को पांचों इन्द्रियों से मिलाकर विनाश के समय
पंचत्व को प्राप्त होती है।
श्रोतवैगुण्य:
-स्रोतों का वितरण•
दोषों के बिगड़ने का कारण व्यक्ति द्वारा भोजन, पेय और गतिविधियों का अनुचित उपयोग है।
यदि दोषों में गड़बड़ी हो, तो यह स्त्रोतों के कार्य और
शारीरिक अखंडता को भी बाधित करने के लिए
जिम्मेदार है।
दोषों की मात्रा बढ़ने पर वे अन्य दोषों को भी दूषित करते हैं।
मात्रा कम होने पर वे दूसरों को नुकसान पहुंचाने में असमर्थ होते हैं।
चक्रपाणिदत्त-
चरकानुसार-
स्रोताओं की स्वस्थ अवस्था का महत्व:
2. एक स्त्रोत के दूषित होने से अन्य स्त्रोत और धातु भी .
दूषित हो सकते हैं
उदाहरण- लीवर (रक्तवाह स्त्रोत) के विकार से सदैव रक्त
धातु में विकार उत्पन्न होता है
स्रोता का नैदानिक महत्व:
विशेष स्रोत के विकार में स्रोत की जड़ों को आसानी से
पहचाना जा सकता है।
उदाहरण - पेट की जांच में, संक्रामक हेपेटाइटिस (पीलिया)
आप पेट की जांच में संक्रमित यकृत की सीमाओं
को आसानी से महसूस कर सकते हैं।
आयुर्वेद के अनुसार-
कामला पित्त दोष और रक्त धातु का रोग है, इसलिए कामला
में रक्त धूलि के लक्षण रक्त वाहिका स्त्रोत के मूल में
हेपेटोमिगेली के रूप में प्रकट होते हैं।
दूषित नलिकाओं के सामान्य संकेत और लक्षण:
अतिप्रवृत्ति -सामग्री का प्रवाह बढ़ना
संग -प्रवाह में बाधा
सिरग्रन्थि। -सख्त होने के साथ फैलाव
विमार्गगमन -सामग्री का अपने से भिन्न मार्ग या
दिशा में असामान्य पथ या दिशा में
प्रवाह।
उदाहरण –प्रमेह में बहुमूत्रता (पॉलीयूरिया) मुत्रवाह
श्रोतों की अतिप्रवृत्ति के रूप में।
उदकवह स्रोत______
मूल:
सुश्रुत -
*"उदकवहे द्वे, तयोर्मूलं तालु क्लोम च"
उदकवह स्रोत दो हैं उनका मूल तालु और क्लोम है।
चरक-
*'उदकवहानां स्रोतसां तालु मूलं क्लोम च'
स्रोतों के विषय में विद्वानों के मत:
श्री घाणेकर जी -
उदक से यहां पीने के जल से अभिप्रेत नहीं है परन्तु शरीरगत जल अर्थात् लसीका (Lymph) से अभिप्रेत है। उदर की उदर गुहा में जब यही जल इकट्ठा हो जाता है तब दकोदर कहलाता है।
इन उदकवह स्रोतसों का सम्बन्ध अधिकतर उदर रोग में आता है।
सुश्रुत -"पिबेज्ञ्जलं शीतलमाशु तस्य स्रोतांसि दुष्यन्ति हि तद्व हानि"
डल्हण - तद्वहानि तोयवहानि।
मधुकोष - "तद्वहानि उदकवहानि“
अर्थात् जल स्रोतों के दुष्ट होने पर शीघ्र शीतल जल पीना
चाहिए।
पारिषद्यं शब्दार्थ शारीरम् में उदकवाही स्रोतों पर विचार करते हुए लिखा है-
अम्बु, अप, उदक, जलवाही स्रोत या स्रोतांसि का सम्बन्ध शरीर के Water balance के साथ होता है, इनके दूषित होने से तृष्णा की उत्पत्ति होती है।
अवरुद्ध हो जाते हैं तो उदर रोगों में विशेषकर जलोदर हो जाता है।
Practice of Medicine by EW. Price में लिखा है-
"Ascites is very common in heart Failure. It is also in Part caused by Portal congestion and by obstruction to the lymph flow from thoracic duct.........
प्यास का अनुभव केवल गले के आस-पास के भागो में होता है इसलिए पिपासा के समय हमेशा गला तालु इत्यादि मुख्य प्रत्यंगों का उल्लेख किया जाता है।
इसका उल्लेख 'Halliburton's Physiology' में इस प्रकार किया है-
"Thirst is a sensation referred to the Pharyngeal region rather than to the stomach."
श्री रणजीतराय जी लिखते हैं कि शरीरगत द्रव के दो विभाग किये गए हैं।
2. कोषबहिर्गत द्रव (Extracellular Fluid)
कोषबहिर्गत द्रव के दो भेद हैं-
1. रक्तरस (Plasma)
2. कोषमध्यगत (Interstitial Fluid)
उदकवाही स्रोत दो होने पर भी अनेक बताये गए हैं।
इन दो का विशेषकर वाम और दक्षिणी रस कुल्या (Lymphatics Especially Thoracic Duct and Right Lymphatic Duct) का ग्रहण
उदकवह स्रोत की दुष्टि के हेतु:
चरक -
1. उष्ण आहार-विहार से,
2. आम दोष से, भय से,
3. मदिरा आदि के सेवन से,
4. अधिक भूखे रहकर अन्न के सेवन से
5. प्यास के अधिक रोकने से जलवाही स्रोत दुष्ट हो
जाते हैं।
उदकवह स्रोत दुष्टि के लक्षण:
चरक -
इन स्रोतों के दुष्ट होने पर जिह्वा, तालु, ओष्ठ, कण्ठ और क्लोम नलिका सूख कर पिपासा अधिक अधिक बढ़ जाती है।
सुश्रुत –
इनके वेध होने पर या दुष्ट होने से प्यास उत्पन्न होती है तथा मृत्यु तक हो जाती है।
उदकवह स्रोता दुष्टिजन्य व्याधियाँ :
1. तृष्णा
2. अतिसार
3. प्रवाहिका
4. विसूचिका
5. जलोदर
6. दाह
उदकवह श्रोतो गत व्याधि :
1. त्रिशना [ प्यास]
2. शोफ
3. जलोदर
4. जल एवं इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन
स्वस्थ स्त्रोतो दुष्टि औषधि:
*प्रसोदकनवाहनं दुष्टानां चासिकी क्रिया
कायोन तृष्णोपशमनि तवेवमप्रदोगिकी
उदकवाह श्रोतोदुष्टि उपचार:
प्यास उपचारपित्त बढ़ाने वाले कारकों
(कटु, आंवला, उष्ण, विदाही, तीक्ष्ण, लवण
आहार, क्रोध, उपवास, अताप, ग्रीष्म ऋतु, मध्यान, अर्ध रात्रे) से बचावऔषधि- सर्पी पान, स्वादु भोजन, तिक्त-कषाय रस आदि