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हिन्दी "अ" पाठ्यक्रम कक्षा-नवम्

पाठ्य पुस्तक - क्षितिज

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शीर्षक – सवैये -रसखान (1548-1628)

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समान्य उद्देश्य :-

  • साहित्यिक अभिरुचि |
  • भाषिक विकास |
  • मानक भाषा का प्रयोग |
  • व्यवहारिक ज्ञान |
  • अध्यात्म के प्रति लगाव |
  • ईश्वर भक्ति |
  • एकनिष्ठ श्रीकृष्ण प्रेम |
  • अभीष्ट के प्रति आसक्ति |
  • आराध्य के प्रति अगाध प्रेम

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  • ब्रज महिमा का वर्णन |
  • पर्यावरण प्रेम |
  • अलंकारिक भाषा शैली |
  • त्रिकालदर्शी श्रीकृष्ण के प्रति उलाहना |
  • उलाहना में भी लगाव और अपनत्व |
  • भगवान श्रीकृष्ण के मधुर मुस्कान का वर्णन |
  • इंद्र के प्रकोप का परोक्ष वर्णन |
  • शब्दभंडार |

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शीर्षक का मूल उद्देश्य :-

  • 1. शीर्षक के बारे में विस्तार पूर्वक बताना |
  • 2.जन्म-जन्मांतर तक भगवान श्रीकृष्ण के सानिध्य को प्राप्त करना |
  • 3. एक जन्म में नहीं बल्किप्रत्येक जन्म में भगवान के श्रीचरण में व्यतीत करना चाहते हैं

  • कवि परिचय एवं शीर्षक व्याख्या:-
  • रसखान भक्तिकाल के अग्रणी साहित्यकार हैं |
  • भक्तिकाल को हिन्दी साहित्य का स्वर्ण-युग माना जाता है |
  • रसखान का जन्म मुसलमान परिवार में हुआ |
  • उनका मूल नाम सैयद इब्राहिम था

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  • भक्त कवि रसखान का जन्म 1548 में एक प्रतिष्ठित पठान परिवार में दिल्ली में हुआ |
  • कवि रसखान मूलतः मुसलमान होते हुए भी आजीवन कृष्ण भक्ति में आकंठ डूबे रहे |
  • उन्होंने एकनिष्ठ भाव से कृष्ण भक्ति किया |
  • उनके हृदय में भगवान कृष्ण और उनकी लीला भूमि से अगाध लगाव है |
  • रसखान ने गोस्वामी विट्ठलनाथ को अपना गुरु बनाया |
  • एक मान्यता के अनुसार उन्हें श्रीनाथजी के मंदिर में त्रिकालदर्शी श्रीकृष्ण के साक्षात दर्शन हुए |
  • अपने अभीष्ट के प्रति अनन्य प्रेम को व्यक्त करते हुए रसखान ने अपना शेष जीवन बराक भूमि में व्यतीत किया |
  • रसखान की दो प्रमुख काव्य रचनायें हैं :-
  • 1.सुजान रसखान
  • 2. प्रेम वाटिका

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  • सुजान रसखान में श्रीकृष्ण पर आधारित कवित्त और सवैये हैं |
  • कवि रसखान को आराध्या श्रीकृष्ण और उनसे संबंधित प्रत्येक सजीव और निर्जीव सामग्रियां बेहद प्रिय है |
  • उन्हें श्रीकृष्ण की जन्मभूमि, ब्रज का यमुना तट, वहां के वन-बाग, पशु-पक्षी,पर्वत, नदी, ग्वाल-बाल और नंद बाबा की गायों से अगाध प्रेम है |
  • रसखान उसी व्यक्ती का जीवन धन्य मानते हैं जो कृष्ण भक्ति में डूबा हो |
  • उनका भगवत प्रेम अत्यंत पवित्र, निश्चल, निष्कपट और अनुग्रह प्रधान है |
  • रसखान की दृष्टि में भगवान श्रीकृष्ण ही उनके लिए सर्वस्व हैं |
  • रसखान की भाषा सहज, सरल और सरस है |
  • रस खान ब्रजभाषा के हस्ताक्षर साहित्यकार हैं |

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  • इनकी रचनाओं में यथा-स्थान अलंकार, आरोह-अवरोह, यति-गति और रसों का प्रयोग हुआ है |
  • रसखान की रचनाओं में गेयता की विशेषता है |
  • उनके शब्द संचयन और प्रयोग में झरने सा मधुर प्रवाह है |
  • भक्ति कवि रसखान को दोहा, कवित्त और सवैया, तीनों छन्दो पर पूरा-पूरा अधिकार है |
  • संत कवि रसखान द्वारा रचित सवैये में सत्यम-शिवम-सुन्दरम की भावना है |
  • रसखान वास्तव में विविध रसों के खान हैं |
  • उनके काव्य में वर्णित परत्व में भी असीम अपनत्व है |
  • सवैये में चित्रित उलाहना में भी अपनापन है क्योंकि जहां अपनत्व होता है वहीं शिकायत की जाती है |
  • रसखान की गोपियां श्रीकृष्ण के रूप-सौंदर्य को देखकर सुध-बुध खो देती हैं |
  • रसखान के अभीष्ट त्रिकालदर्शी श्रीकृष्ण का मन मोहिनी स्वरूप चित्ताकर्षक और अह्लादमयी है |

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  • इनकी रचनाओं में यथा-स्थान अलंकार, आरोह-अवरोह, यति-गति और रसों का प्रयोग हुआ है |
  • रसखान की रचनाओं में गेयता की विशेषता है |
  • उनके शब्द संचयन और प्रयोग में झरने सा मधुर प्रवाह है |
  • भक्ति कवि रसखान को दोहा, कवित्त और सवैया, तीनों छन्दो पर पूरा-पूरा अधिकार है |
  • संत कवि रसखान द्वारा रचित सवैये में सत्यम-शिवम-सुन्दरम की भावना है |
  • रसखान वास्तव में विविध रसों के खान हैं |
  • उनके काव्य में वर्णित परत्व में भी असीम अपनत्व है |
  • सवैये में चित्रित उलाहना में भी अपनापन है क्योंकि जहां अपनत्व होता है वहीं शिकायत की जाती है |
  • रसखान की गोपियां श्रीकृष्ण के रूप-सौंदर्य को देखकर सुध-बुध खो देती हैं |
  • रसखान के अभीष्ट त्रिकालदर्शी श्रीकृष्ण का मन मोहिनी स्वरूप चित्ताकर्षक और अह्लादमयी है |

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कविता पाठ एवं भावार्थ

  • मानुष हौं तो वही रसखानि बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन
  • जौ पसु हौं तो कहा बस मेरो चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥
  • पाहन हौं तो वही गिरि को जो कियो हरिछत्र पुरंदर धारन।
  • जौ खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिंदी कूल कदंब की डारन।

  • या लकुटी अरु कामरिया पर राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।
  • आठहुँ सिद्धि नवौ निधि के सुख नंद की गाइ चराइ बिसारौं॥
  • रसखान कबौं इन आँखिन सौं, ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं।
  • कोटिक ए कलधौत के धाम करील के कुंजन ऊपर वारौं॥

  • मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं, गुंज की माल गरें पहिरौंगी।
  • ओढ़ि पितंबर लै लकुटी बन गोधन ग्वारनि संग फिरौंगी॥
  • भावतो वोहि मेरो रसखानि सों तेरे कहे सब स्वांग करौंगी।
  • या मुरली मुरलीधर की अधरान धरी अधरा न धरौंगी॥

  • काननि दै अँगुरी रहिबो जबहीं मुरली धुनि मंद बजैहै।
  • मोहनी तानन सों रसखानि अटा चढ़ि गोधन गैहै तौ गैहै॥
  • टरि कहौं सिगरे ब्रजलोगनि काल्हि कोऊ कितनो समुझैहै।
  • माइ री वा मुख की मुसकानि सम्हारी न जैहै, न जैहै, न जैहै॥

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  • मानुष हौं तो वही रसखानि बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।
  • जौ पसु हौं तो कहा बस मेरो चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥
  • पाहन हौं तो वही गिरि को जो कियो हरिछत्र पुरंदर धारन।
  • जौ खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिंदी कूल कदंब की डारन।

  • भावार्थ :- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि रसखान के श्री कृष्ण एवं उनके गांव गोकुल-ब्रज के प्रति लगाव का वर्णन हुआ है। रसखान मानते हैं कि ब्रज के कण-कण में श्री कृष्ण बसे हुए हैं। इसी वजह से वे अपने प्रत्येक जन्म में ब्रज की धरती पर जन्म लेना चाहते हैं। अगर उनका जन्म मनुष्य के रूप में हो, तो वो गोकुल के ग्वालों के बीच में जन्म लेना चाहते हैं। पशु के रूप में जन्म लेने पर, वो गोकुल की गायों के साथ घूमना-फिरना चाहते हैं।
  • अगर वो पत्थर भी बनें, तो उसी गोवर्धन पर्वत का पत्थर बनना चाहते हैं, जिसे श्री कृष्ण ने इन्द्र के प्रकोप से गोकुलवासियों को बचाने के लिए अपनी उँगली पर उठाया था। अगर वो पक्षी भी बनें, तो वो यमुना के तट पर कदम्ब के पेड़ों में रहने वाले पक्षियों के साथ रहना चाहते हैं। इस प्रकार कवि चाहे कोई भी जन्म लें, वो रहना ब्रज की भूमि पर ही चाहते हैं।

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  • या लकुटी अरु कामरिया पर राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।
  • आठहुँ सिद्धि नवौ निधि के सुख नंद की गाइ चराइ बिसारौं॥
  • रसखान कबौं इन आँखिन सौं, ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं।
  • कोटिक ए कलधौत के धाम करील के कुंजन ऊपर वारौं॥

  • भावार्थ :- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि रसखान का भगवान श्री कृष्ण एवं उनसे जुड़ी वस्तुओं के प्रति बड़ा गहरा लगाव देखने को मिलता है। वे कृष्ण की लाठी और कंबल के लिए तीनों लोकों का राज-पाठ तक छोड़ने के लिए तैयार हैं। अगर उन्हें नन्द की गायों को चराने का मौका मिले, तो इसके लिए वो आठों सिद्धियों एवं नौ निधियों के सुख को भी त्याग सकते हैं। जब से कवि ने ब्रज के वनों, बगीचों, तालाबों इत्यादि को देखा है, वे इनसे दूर नहीं रह पा रहे हैं। जब से कवि ने करील की झाड़ियों और वन को देखा है, वो इनके ऊपर करोड़ों सोने के महल भी न्योछावर करने के लिए तैयार हैं।

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  • मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं, गुंज की माल गरें पहिरौंगी।
  • ओढ़ि पितंबर लै लकुटी बन गोधन ग्वारनि संग फिरौंगी॥
  • भावतो वोहि मेरो रसखानि सों तेरे कहे सब स्वांग करौंगी।
  • या मुरली मुरलीधर की अधरान धरी अधरा न धरौंगी॥

  • भावार्थ :- प्रस्तुत पंक्तियों में रसखान ने कृष्ण से अपार प्रेम करने वाली गोपियों के बारे में बताया है, जो एक-दूसरे से बात करते हुए कह रही हैं कि वो कान्हा द्वारा उपयोग की जाने वाली वस्तुओं की मदद से कान्हा का रूप धारण कर सकती हैं। मगर, वो कृष्ण की मुरली को धारण नहीं करेंगी। यहाँ गोपियाँ कह रही हैं कि वे अपने सिर पर श्री कृष्ण की तरह मोरपंख से बना मुकुट पहन लेंगी। अपने गले में कुंज की माला भी पहन लेंगी। उनके सामान पीले वस्त्र पहन लेंगी और अपने हाथों में लाठी लेकर वन में ग्वालों के संग गायें चराएंगी।
  • गोपी कह रही है कि कृष्ण हमारे मन को बहुत भाते हैं, इसलिए मैं तुम्हारे कहने पर ये सब कर लूँगी। मगर, मुझे कृष्ण के होठों पर रखी हुई मुरली अपने होठों से लगाने के लिए मत बोलना, क्योंकि इसी मुरली की वजह से कृष्ण हमसे दूर हुए हैं। गोपियों को लगता है कि श्री कृष्ण मुरली से बहुत प्रेम करते हैं और उसे हमेशा अपने होठों से लगाए रहते हैं, इसीलिए वे मुरली को अपनी सौतन या सौत की तरह देखती हैं।

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  • काननि दै अँगुरी रहिबो जबहीं मुरली धुनि मंद बजैहै।
  • मोहनी तानन सों रसखानि अटा चढ़ि गोधन गैहै तौ गैहै॥
  • टेरि कहौं सिगरे ब्रजलोगनि काल्हि कोऊ कितनो समुझैहै।
  • माइ री वा मुख की मुसकानि सम्हारी न जैहै, न जैहै, न जैहै॥

  • भावार्थ :- रसखान ने इन पंक्तियों में गोपियों के कृष्ण प्रेम का वर्णन किया है, वो चाहकर भी कृष्ण को अपने दिलो-दिमाग से निकल नहीं सकती हैं। इसीलिए वे कह रही हैं कि जब कृष्ण अपनी मुरली बजाएंगे, तो वो उससे निकलने वाली मधुर ध्वनि को नहीं सुनेंगी। वो सभी अपने कानों पर हाथ रख लेंगी। उनका मानना है कि भले ही, कृष्ण किसी महल पर चढ़ कर, अपनी मुरली की मधुर तान क्यों न बजायें और गीत ही क्यों न गाएं, जब तक वो उसे नहीं सुनेंगी, तब तक उन पर मधुर तानों का कोई असर नहीं होने वाला।
  • लेकिन अगर गलती से भी मुरली की मधुर ध्वनि उनके कानों में चली गई, तो फिर हम अपने वश में नहीं रह पाएंगी। फिर चाहे हमें कोई कितना भी समझाए, हम कुछ भी समझ नहीं पाएंगी। गोपियों के अनुसार, कृष्ण की मुस्कान इतनी प्यारी लगती है कि उसे देख कर कोई भी उनके वश में आए बिना नहीं रह सकता है। इसी कारणवश, गोपियाँ कह रही हैं कि श्री कृष्ण का मोहक मुख देख कर, उनसे ख़ुद को बिल्कुल भी संभाला नहीं जाएगा। वो सारी लाज-शर्म छोड़कर श्री कृष्ण की ओर खिंची चली जाएँगी।

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शब्दार्थ

  • गिरी - पर्वत |
  • कालिंदी - यमुना |
  • पाहन - पत्थर |
  • पुरंदर - इंद्र |
  • लकुठी- लाठी |
  • पितंबर- पीला |
  • टेरि- पुकारकर बुलाना |
  • तानन- तानों से |
  • सिगरे- सारे |

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वस्तुनिष्ठ प्रश्न

  • 1. रसखान अगले जन्म में कहाँ निवास करना चाहते हैं और क्यों?
  • 2. रसखान पक्षी के रूप में क्या कल्पना करते हैं?
  • 3. कवि नंद की गाय चाराने के लिया क्या मुल्य चुकाने को प्रस्तुत है?
  • 4. गोपी श्रीकृष्ण की वेश-भूषा क्यों धारण करना स्वीकार करती हैं?
  • 5. ब्रजभूमि के प्रति कवि का प्रेम किन-किन रूपों में अभिव्यक्त हुआ है?
  • 6.'कालिंदी कूल कदंब की डारन' में कौन-सा अलंकार है?
  • 7. एक लकुटी और कामरिया पर कवि सब कुछ न्यौछावर करने को क्यों तैयार है?
  • 8. कवि का ब्रज के वन, बाग और तालाब को निहारने के पीछे क्या कारण है?
  • 9. चौथे सवैये के अनुसार गोपियां अपने आप को क्यों विवश पाती हैं?
  • 10.काव्य सौंदर्य स्पष्ट कीजिए :-
  • या मुरली मुरलीधर की अधरन धरी अधरा न धरौंगी|

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धन्यवाद |