BLESSINGS
ॐ ह्रीं अर्हम् नमः
श्रीसद्गुरुभ्यो नमः
ॐ ऐं नमः
SHREE MATI GYANAY NAMAH
SHREE SHRUT GYANAY NAMAH
SHREE AVADHI GYANAY NAMAH
SHREE MANAH - PARYAV GYANAY NAMAH
SHREE KEVAL GYANAY NAMAH
5 GYAN
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 31
9th Vrat : Samayik Vrat
10th Vrat : Deshavagasik Vrat
Inspired by:
Yugpradhan Acharyatulya P.P. Panyas Shree Chandrashekar Vijayji M.S.
P.P. Panyas Shree Yashobhushan Vijayji M.S.
P.P. Panyas Shree Manobhushan Vijayji M.S.
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 31
9th Vrat : Samayik Vrat
शिक्षा का अर्थ-जैसे विद्यार्थी पुनः पुनः अभ्यास करता है, उसी प्रकार श्रावक को जिन व्रतों का पुनः पुनः अभ्यास करना चाहिये, उन व्रतों को शिक्षाव्रत कहा है।
अणुव्रत और गुणव्रत जीवन में एक ही बार ग्रहण किये जाते हैं किन्तु शिक्षाव्रत बार-बार ग्रहण किये जाते हैं तथा वे व्रत कुछ समय के लिए ही होते हैं
उनके नाम ये है :
(1) सामायिक
(2) देशावकाशिक
(3) पौषधोपवास
(4) अतिथिसंविभाग
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 31
9th Vrat : Samayik Vrat
एक मुहूर्त के लिए श्रावक दो करण (करना - कराना), तीन योग (मन-वचन-काया) से साधु जैसा जीवन स्वीकार कर लेता है।
गृहस्थ सामायिक का कालमान एक मुहूर्त का होता है। साधु की सामायिक जीवन पर्यन्त की होती है।
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 31
9th Vrat : Samayik Vrat
सामायिक के पाँच धर्मोपकरण :
(१) स्थापनाचार्य - गुरु की अनुपस्थिति में स्थापनाचार्य को सम्मुख रखकर वन्दना आदि करे और उनकी साक्षी से आत्मालोचन करे।
(३) जपमाला नवकार वाली (माला) - नवकार मंत्र आदि का जाप करने के लिए।
(४) चरवला - भूमि आदि का प्रमार्जन करने के लिए इसका उपयोग होता है।
(५) कटासणा - कम्बल का आसन बिछाकर उस पर बैठकर सामायिक की जाती है।
इन पाँचों को सामायिक के धर्मोपकरण कहा गया है।
(२) मुहपत्ती - पाठ आदि का उच्चारण करते समय थूक आदि नहीं उछले, शास्त्र आदि की आशातना न हो, वायुकाय के सूक्ष्म जीवों की विराधना न हो इसलिए मुँहपत्ती रखना।
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 31
9th Vrat : Samayik Vrat
Thinking immorally
in samayik
(१) मन दुष्प्रणिधान - सामायिक में मन को चंचल बनाकर इधर-उधर दौड़ना । सांसारिक विचार करना।
Speaking immorally
in samayik
Misbehaviouring in samayik
(२) वचन दुष्प्रणिधान - वचन का दुरुपयोग कर सावध भाषा बोलना ।
(३) काय दुष्प्रणिधान - शरीर से सावद्य प्रवृत्ति करना ।
शरीर को बारबार हिलाना।
हाथ-पाँव मरोड़ना, नींद आदि लेना।
नौवा व्रत के पाँच अतिचार
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9th Vrat : Samayik Vrat
Disrespect towards
samayik
Forgetful in samayik
(४) अनवस्थितता - विधिपूर्वक सामायिक नहीं करना ।
चित्त की अस्थिरता रखना। समय पूरा होने से पहले ही सामायिक पारना । अनादर पूर्वक सामायिक करना
श्रावक उक्त बत्तीस दोषों को तथा पाँच अतिचारों को टालता हुआ शुद्ध भावपूर्वक सामायिक करे तो उसका महान फल है। श्रावक को प्रतिदिन कम से कम एक सामायिक तो अवश्य ही करना चाहिए।
(५) स्मृत्यकरण - सामायिक करके भूल जाना कि मैं सामायिक में हूँ अथवा निश्चित समय पर सामायिक नहीं करना। सामायिक करते समय उबाहट महसूस करना ।
काया सम्बन्धी 12 दोष, वचन सम्बन्धी 10 दोष, मन सम्बन्धी 10 दोष बत्तीस दोषों से रहित शुद्ध सामायिक करना चाहिए।
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 31
10th Vrat : Deshavagasik Vrat
छठे दिशा परिमाण व्रत में दिशाओं में जाने-आने की मर्यादा जीवनभर का, एक वर्ष, चार मास आदि के लिए की जाती है।
देशावकाशिक व्रत में कुछ घंटों के लिए मर्यादा की जाती है।
यह व्रत जीवन में संयम व त्याग का क्रमिक अभ्यास करने की कला सिखाता है।
इसमें मन पर अनुशासन करने व भोग-वृत्तियों व शरीर की प्रवृत्तियों पर नियंत्रण करने का अभ्यास भी होता है।
पूर्व में ग्रहण किये हुए सभी अणुव्रतों व गुणव्रतों में ली गई मर्यादा को और अधिक संक्षिप्त सीमित करना इस व्रत का उद्देश्य है।
इससे श्रावक जीवन के प्रत्येक क्षण में जागरूक रहकर आरम्भ समारम्भ व भोगोपभोग से बचता है।
पूर्व में बताये 14 नियमों का प्रतिदिन चिन्तन व उनको धारण करना यह इस व्रत में भी माना जाता है।
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 31
10th Vrat : Deshavagasik Vrat
To bring something
out of bounds
To send something
out of bounds
To make noise
(१) मँगाना - मर्यादा की हुई दिशा व क्षेत्र सीमा से बाहर किसी को भी भेजकर कोई वस्तु मँगाना
(२) भेजना - मर्यादित क्षेत्र के बाहर नौकर आदि को भेजकर देना।
(३) शब्दानुपात - जिस देश में स्वयं नहीं जाने की मर्यादा हो, वहाँ से शब्द आदि का संकेत करके वस्तु मंगाना
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10th Vrat : Deshavagasik Vrat
Show off Oneself
To Throw Stones
(४) रूपानुपात - मर्यादित क्षेत्र के बाहर रही वस्तु को कोई रूप (वस्तु) आदि दिखाकर मँगाना या स्वयं उस सीमा से बाहर देखने का प्रयास करना
(५) पुद्गल प्रक्षेप - मर्यादित क्षेत्र के बाहर कंकर, पत्थर आदि कोई वस्तु फेंककर किसी का ध्यान आकृष्ट करना।