Jeevak Ayurveda Medical �college and hospital Reasearch Centre
Guided by –
Dr Amit Kumar Singh Present by –
Sanjana Patel
(Associate Professor and HOD) Roll no - 09 Present by – Batch- 2023- 2024
Dr Varsha Gupta
( Associate Professor)
INDEX
मर्म शब्द की व्युत्पत्ति
मृ-मनिन्-जीवस्थाने,संधिस्थाने, तात्पर्ये च । (शब्दस्तोम)
यह मर्मन् शब्द के प्रथमा के एकवचन का रूप है जो जीव स्थान, मन्धि स्थान और तात्पर्य के अर्थ में व्यवहार में लाया जाता है तथा मृ-धात में मनिन प्रत्यय करने से बनता है।
मर्म स्वरूप
मारयन्तीति मर्माणि (डल्हण)
शरीर के वे स्थान जहां या चोट कारण मृत्यु हो जाए मर्म कहलाते हैं।
प्रत्येक मर्म अपने विशेष आकार प्रकार का होता है। इनके आकार, स्वरूपादि भेद से अनेक प्रकार के हैं। जिनका वर्णन मर्म के विभिन्न नामों सहित पृथक से वर्णन किया गया है। इसके स्वरूप को अंगुली प्रमाण रूप में दिया गया है।
मर्मों की संख्या
आयुर्वेद ग्रन्थों में मर्मों की संख्या 107 बताई है।
सप्तोत्तरं मर्मशतं शरीरे, भवन्ति तानि पञ्चात्मकानि ।
मांससिरास्नायुतथास्थिसन्धि नान्यानि मर्माणि भवन्ति देहे ॥.
) घडंगों में मर्मों की संख्या-संख्या-सम्पूर्ण शरीर में मर्म 107 है ये पांच प्रकार के��मांस,��सिरा, स्नायु, अस्थि एवं सन्धि मर्म।��षडंगों में प्रमुख 4 शाखायें हैं। इसी प्रकार शरीर के अन्य स्थल जैसे छाती, उदर��ग्रीवा के ऊपर होने वाले मर्मों की गणना इस प्रकार की गई है-
एकादशं प्रतिशाखं त्रीणि कोष्ठे नवोरसि ।
पृष्ठे चतुर्दशः प्रोक्ताः सप्तत्रिंशत् ग्रीवोपरि ॥ (ले०)
प्रत्येक शाखा में ।। मर्म, इस प्रकार चारों शाखाओं में = 11 ×4 = 44
उदर कोष्ठ में =3
उरस् (छाती) में = 9
पृष्ठ भाग में = 14
ग्रीवा के ऊपर भाग में मर्म = 37
शरीर के कुल मर्मों की संख्या अन्तराधि = 107
मर्मों के प्रकार-रचना के अनुसार-��lसप्तोत्तरं मर्मशतं, तानि पञ्चात्मकानि भवन्ति I��ये मर्म पांच प्रकार की आत्म वाले हैं। इनकी व्याख्या इस प्रकार है-� “पञ्चविध आत्मा येषां तानि�“��अर्थात् मर्मों का आकार जिनसे बनता है वे वस्तुए पांच प्रकार की होती हैं एवं उन्हीं के नाम से उनका नामकरण किया गया है- (1) मांस मर्म (2) सिरा मर्म (3) स्नायु मर्म�(4) सन्धि मर्म�(5) अस्थि मर्म।
परिणाम के अनुसार प्रकार एवं संख्या-
इन मर्म स्थानों पर आघात होने से जो परिणाम होता है उसके अनुसार इनके 5 प्रकार बताये गए हैं तथा इनकी संख्याओं का भी निर्देश किया गया है।�� विकल्पानि भवन्ति पंच सद्यानि कालान्तरप्राणहराणि I
विशल्यघ्नवैकल्यकरो तथैव रूजाकराणीति वदन्ति तज्ज्ञाः।
परिणाम के अनुसार मर्म पांच प्रकार के होते हैं I
1. सद्यः प्राणहर मर्म. 19
2. कालान्तर प्राणहर 33
3.वैकल्यकर मर्म. 44
4.विशल्यघ्न मर्म. 3
5.रुजाकर मर्म. 8
कुल 10
विशल्यघ्न मर्म
इन मर्मो की संख्या 3 बताई गई है I
उत्क्षेप =2
स्थपनी = 1
उत्क्षेपो स्थपनी चैव चिवल्यघ्नानि निर्दिशेत्। सु०शा 6/17
विशल्यघ्न मर्म परिमाण-
परिमाण-ये मर्म वायव्य होते हैं। यह मांस अदि तीन रचना का संयोग है। जब तक शल्य के द्वारा मार्ग अवरुद्ध रहता है, वायु अन्दर ही रहती है तब तक मर्म से पीड़ित मनुष्य जीता रहता है I परन्तु शल्य के निकलते ही मर्म स्थान में आश्रित वायु बाहर निकलती है अतः मृत्यु हो जाती है I.
विशल्यघ्न मर्मों केविद्ध होने पर लक्षण- इनके सामान्य लक्षणों में शोथ, वेदना एवं शल्य के निकल जाने पर तीव्र रक्तस्राव भी होता है। वायु बढ़ जाती है। शून्यता, , बेहोशी, मूर्च्छा, चक्कर आना आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं।
उत्क्षेप मर्म
इस स्नायु एवं विशल्यघ्न मर्म में शंखस्थान की सावरण पेशी (Temporalis Muscle) का बोध होता है।
इस मर्म की रचना में (Superficial Temporal Artery, Zygomatic Temporal Nerve) तथा Deep Temporal Artery and Vein होती हैं
मस्तिष्क व उसके आवरण शंखास्थि के निम्न प्रदेश में जुड़े रहते हैं।
इस मर्म पर शल्य चुभे रहने पर जीवित रहता है किन्तु तुरन्त शल्य निकालने पर यह मारक है।�
स्थपनी मर्म-
यह सिरा, विशल्यघ्न मर्म है और दोनों भौहों के बीच स्थित होता है।
इस मर्म स्थान पर ललाटिका (Frontal Vein) सिरा और दोनों ओर की इनको जोड़ने वाली सिरा (Nasal Arch) होती है
। स्थपनी के पीछे Frontal Sinus होता है
जो उत्क्षेप मर्म पर विद्ध होने के समान परिणाम वाला होता है।
यह भ्रूमध्य में होता है यहां पर Superior Sagittal Sinus तथा Supratochlear Vessels होती हैं।