कक्षा – दस ��स्पर्श भाग -२��विषय : हिंदी ‘ब’ पाठ्यक्रम ��पाठ : पतझर में टूटी पत्तियाँ��
नवोदय विद्यालय समिति
नोएडा – ई- सामग्री
प्रस्तुत कर्ता : रमेश नायक
पी. जी. टी हिंदी
जवाहर नवोदय विद्यालय मैसूरु
पतझर में टूटी पत्तियाँ ��लेखक ��रवीन्द्र केलेकर
रवीन्द्र केलेकर ( 1925-2010)
7 मार्च 1925 को कोंकण क्षेत्र में जन्म हुआ
पाठ प्रवेश�
लेखक के लेखन कार्य
पाठ प्रवेश
पहला प्रसंग
(गिन्नी का सोना)
जीवन में अपने लिए सुख-साधन जुटाने वालों से नहीं बल्कि उन लोगो से परिचित
करवाता है जो इस संसार को सब के लिए जीने और रहने योग्य बनाए हुए हैं।
दूसरा प्रसंग
(झेन की देन)
बौद्ध दर्शन में वर्णित ध्यान की उस पद्धति की यादलाता है जिसके कारण जापान
के लोग आज भी अपनी व्यस्ततम दिन भर के कामों के बीच भी कुछ चैन भरे
या सुकून के पल हासिल कर ही लेते हैं।
प्रसंग 1- गिन्नी का सोना�
शुद्ध सोना अलग है और गिन्नी सोना अलग। गिन्नी के सोने में थोड़ा-सा ताँबा मिलाया हुआ होता है, इसलिए वह ज्यादा चमकता है और शुद्ध सोने से मज़बूत भी होता है। औरतें अकसर इसी सोने के गहने बनवा लेती हैं। फिर भी होता तो वह है गिन्नी का ही सोना।� शुद्ध आदर्श भी शुद्ध सोने के जैसे ही होते हैं। चंद लोग उनमें व्यवहारिकता का थोड़ा-सा ताँबा मिला देते हैं और चलाकर दिखाते हैं। तब हम लोग उन्हें 'प्रेक्टिकल आइडियलिस्ट' कहकर उनका बखान करते हैं।
गाँधी और आदर्शवाद
हाँ, पर गाँधी जी कभी आदर्शों को व्यावहारिकता के स्तर पर उतरने नहीं देते थे। बल्कि व्यवहारिकता को आदर्शों के स्तर पर चढ़ाते थे। वे सोने में ताँबा नहीं बल्कि ताँबे में सोना मिलाकर उसकी कीमत बढ़ाते थे।�इसलिए सोना ही हमेशा आगे आता रहता था।
व्यवहारवादी लोग हमेशा सजग रहते हैं। लाभ-हानि का हिसाब लगाकर ही कदम उठाते हैं। वे जीवन में सफल होते हैं, अन्यों से आगे भी जाते हैं पर क्या वे ऊपर चढ़ते हैं। खुद ऊपर चढ़ें और अपने साथ दूसरों को भी ऊपर लें चलें, यही महत्व की बात है। यह काम तो हमेशा आदर्शवादी लोगों ने ही किया है। समाज के पास अगर शाश्वत मूल्यों जैसा कुछ है तो वह आदर्शवादी लोगों का ही दिया हुआ है। व्यवहारवादी लोगों ने तो समाज को गिराया ही है।
प्रसंग 2 – झेन की देन
जापान में मैंने अपने एक मित्र से पूछा, "यहाँ के लोगों को कौन सी बीमारियाँ अधिक होती हैं ?" "मानसिक", उसने जवाब दिया,"यहाँ के अस्सी फीसदी लोग मनोरुग्ण हैं।"�"इसकी क्या वजह है ?"�कहने लगे ,"हमारे जीवन की रफ़्तार बढ़ गई है। यहाँ कोई चलता नहीं, बल्कि दौड़ता है। कोई बोलता नहीं, बकता है। हम जब अकेले पड़ते हैं तब अपने आपसे लगातार बड़बड़ाते रहते हैं। .......
अमेरिका से हम प्रतिस्पर्धा करने लगे। एक महीने में पूरा होने वाला काम एक दिन में ही पूरा करने की कोशिश करने लगे। वैसे भी दिमाग की रफ़्तार हमेशा तेज़ ही रहती है। उसे 'स्पीड' का इंजन लगाने पर वह हजार गुना अधिक रफ्तार से दौड़ने लगता है। फिर एक क्षण ऐसा आता है जब दिमाग का तनाव बढ़ जाता है और पूरा इंजन टूट जाता है। ...... यही कारण है जिससे मानसिक रोग यहाँ बढ़ गए हैं। .... "
शाम को वह मुझे एक 'टी-सेरेमनी' में ले गए। चाय पीने की यह एक विधि है। जापानी में उसे चा-नो-यू कहते हैं।�वह एक छः मंजिली इमारत थी जिसकी छत पर दफ़्ती की दीवारोंवाली और तातामी (चटाई) की ज़मीनवाली एक सुंदर पर्णकुटी थी। बाहर बेढब-सा एक मिट्टी का बर्तन था। उसमें पानी भरा हुआ था। हमने अपने हाथ-पाँव इस पानी से धोए। तौलिए से पोंछे और अंदर गए। अंदर 'चानीज़' बैठा था।
हमें देखकर वह खड़ा हुआ। कमर झुका कर उसने हमें प्रणाम किया। दो....झो...(आइए, तशरीफ़ लाइए) कहकर स्वागत किया। बैठने की जगह हमें दिखाई। अँगीठी सुलगाई। उस पर चायदानी रखी। बगल के कमरे में जाकर कुछ बरतन ले आया। तौलिए से बरतन साफ किए। सभी क्रियाएँ इतनी गरिमापूर्ण ढंग से कीं कि उसकी हर भंगिमा से लगता था मानो जयजयवंती के सुर गूँज रहे हों। वहाँ का वातावरण इतना शांत था कि चायदानी के पानी का खदबदाना भी सुनाई दे रहा था।
उसने दो... झो..अर्थात आइए, तशरीफ़ लाइए ऐसा कह कर उनका स्वागत किया। उसने उन्हें बैठने की जगह दिखाई। अँगीठी को जलाया और उस पर चाय बनाने वाला बरतन रख दिया। वह साथ वाले कमरे में गया और कुछ बरतन ले कर आया। फिर तौलिए से बरतन साफ किए। ये सारा काम उस व्यक्ति ने बड़े ही सलीके से पूरा किया और उसकी हर एक मुद्रा या काम करने के ढंग से लगता था कि जैसे जयजयवंती नाम के राग की धुन गूँज रही हो। उस जगह का वातावरण इतना अधिक शांत था कि चाय बनाने वाले बरतन में उबलते हुए पानी की आवाज़ें तक सुनाई दे रही थी।
चाय तैयार हुई। उसने वह प्यालों में भरी। फिर वे प्याले हमारे सामने रख दिए गए। वहाँ हम तीन मित्र ही थे। इस विधि में शांति मुख्य बात होती है। इसलिए वहाँ तीन से अधिक आदमियों को प्रवेश नहीं दिया जाता। प्याले में दो घूँट से अधिक चाय नहीं थी। हम ओठों से प्याला लगाकर एक-एक बूँद चाय पीते रहे।
करीब डेढ़ घंटे तक चुसकियों का यह सिलसिला चलता रहा। पहले दस-पंद्रह मिनट तो मैं उलझन में पड़ा। फिर देखा दिमाग की रफ़्तार धीरे-धीरे धीमी पड़ती जा रही है। थोड़ी देर में बिलकुल बंद भी हो गई। मुझे लगा, मानो अनंतकाल में मैं जी रहा हूँ। यहाँ तक की सन्नाटा भी मुझे सुनाई देने लगा।
लेकिन धीरे -धीरे लेखक ने महसूस किया कि उनके दिमाग की रफ़्तार कम होने लेगी है। और कुछ समय बाद तो लगा कि दिमाग बिलकुल बंद ही हो गया है। लेखक को लगा जैसे वह कभी न ख़त्म होने वाले समय में जी रहा है। यहाँ तक की लेखक का मन इतना शांत हो गया था की बाहर की शांति भी शोर लग रही थी।
अकसर हम या तो गुज़रे हुए दिनों की खट्टी-मीठी यादों में उलझे रहते हैं या भविष्य के रंगीन सपने देखते रहते हैं। हम या तो भूतकाल में रहते हैं या भविष्यकाल में। असल में दोनों काल मिथ्या हैं। एक चला गया है, दूसरा आया नहीं है। हमारे सामने जो वर्तमान क्षण है, वही सत्य है। उसी में जीना चाहिए। चाय पीते-पीते उस दिन मेरे दिमाग से भूत-भविष्य दोनों काल उड़ गए थे। केवल वर्तमान क्षण सामने था। और वह अनंतकाल जितना विस्तृत था।जीना किसे कहते है, उस दिन मालूम हुआ।झेन परंपरा की यह बड़ी देन मिली है जापानियों को!
गृह कार्य
१ पाठ का सही उच्चारण के साथ उच्च स्वर मेँ पठन करे।
२ पाठ के प्रश्न – अभ्यास कीजिए ।
३ लेख की प्रमुख घटनाओीं की संक्षेप में सूची तैयार करो।
४ पाठ में आए कठिन शब्दों का अपने वाक्यों में प्रयोग कीजिए ।
धन्यवाद