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Jeevak Ayurvedic Medical College And� Hospital Research Centre

Guided By-

Dr.Amit singh

(HOD) Associate Professor Department of Rachna Sharir)

Dr.Varsha Gupta

(Assistant Professor Department of Rachna Sharir )

Presented By-

Ankita Maurya

Roll no. 38

1st Prof BAMS Student

Batch-2023-2024

परिभाषा शारीर

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Index

3rd slide 12th slide

4th slide 15th slide

6th slide 16th slide

8th slide 18th slide

कूर्च

कण्डरा

जाल

संघात

सीमन्त

सेवनी

मांसरज्जु

परिचय

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परिचय

  • प्रस्तुत प्रकरण में अस्थि, सन्धि, सिरा, स्नायु, धमनी, पेशी, रसायनी एवं लसीका आदि के साथ-साथ उन विषयों का परिभाषा के रूप में सामान्य वर्णन किया जा रहा है जो किसी न किसी रूप में इनके साथ रहते हुए या इन्हीं का भाग होते हुए भी स्वरूप, स्थान तथा कार्य की दृष्टि से भिन्न प्रतीत होते हैं। ये सभी शरीर के प्रमुख घटकों को दृढ़ बनाते हैं। इनमें प्रमुख इस प्रकार हैं-कूर्च, कण्डरा, जाल, संघात, रज्जू, सेवनी तथा सीमन्त ।

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कूर्च

  • कूर्चा अपि शिरास्नायुमांसास्थिप्रभवाःस्मृताः। भा०पू० 2/319

  • पेशी, स्नायु, धमनी, सिरा, मांसपेशी एवं अस्थियों के सन्निपात कूंची (Brush) के समान दिखाई देते हैं उसे कूर्च कहते हैं। अर्थात् कुशापुंज के समान पदार्थ को कूर्चा कहते हैं। ये लाल तेजस्वी होते हैं।

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कूर्च संख्या

  • षद् कूर्चाः ते हस्तपादग्रीवामेद्रेषु, हस्तयोर्दों, पादयोर्दों, ग्रीवामेढ्योरेकैकः। सु०शा० 5/12

आचार्य सुश्रुत ने इनकी कुल संख्या 6 बताई गई है।

  • 1. हस्त में दो (Palmer aponeuroses)
  • 2. पाद में दो (Planter aponeuroses)
  • 3. ग्रीवा में एक (Ligamentum nuchae)
  • 4. मेढ़ में एक (Suspensory ligament of penis)

  • अष्टाङ्गसंग्रह के टीकाकार इन्दु का कहना है कि कूर्च की आकृति वाले स्नायु आदि रचनाविशेष कूर्च हैं। महर्षि कश्यप ने 42 कूर्च माने हैं। हाराणचन्द्र का कथनहै कि कुचे स्नायु एवं धमनियों के सन्निपात हैं। ग्रीवा में एक, कक्षा में दो तथा वंक्षण में दो स्नायु सन्निपात है, जबकि मेढू में एक धमनी सन्निपात है।

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कण्डरा

  • महत्यः स्नायवः प्रोक्ताः कण्डरा । प्रसारणाकुञ्चनयोर्दृष्टं तासां प्रयोजनम्॥ भा०पू० (2/312)

  • अंगो का संकोच विस्तार करने वाली बड़ी स्नायुओं को कण्डरा कहते हैं।

  • सुश्रुत ने इसकी 16 संख्या कही है। डल्हणका कथन है कि कण्डरा महास्नायु है । भावमिश्र का कथन है कि महती स्नायु को कण्डरा कहते हैं । इनसे प्रसारण और आकुंचन क्रिया सम्पन्न होती है।

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उत्पत्ति एवं निवेश

1.हस्तकण्डरा (4) - इनका निवेश हाथ की अंगुलियों में नखों के पास होता है।

2. पाद कण्डरा (4)- इनका निवेश (अग्र प्ररोह) पाद की अंगुलियों में नखो के पास होता है।

3. ग्रीवा निबन्धनी (4)- ये कण्डराएँ ग्रीवा एवं हृदय का बन्धन कर इनका निवेश मेद्र प्रदेश (Pubic region) में होता है।

4. पृष्ट निबन्धनी (4)- ये कण्डरा पृष्ठ प्रदेश और श्रोणि प्रदेश का बन्धन कर इनका निवेश बिम्व (Pelvis) में होता है।

  • ये कण्डरा जो ऊपर की ओर जाती है उनका निवेश मूर्धा, ऊरु, वक्ष और अंसपिण्ड है।
  • डल्हण ने ग्रीवाश्रित कण्डराओं का उपरिगत प्ररोह मस्तक (मस्तिष्क के पीछे ग्रीवा का ऊर्ध्व भाग); हस्तगत कण्डराओं का उपरिगत प्ररोह बाहुसिर, पाद की कण्डराओं का उपरिगत प्ररोह श्रोणिमण्डल और पृष्ठाश्रित कण्डराओं का उपरिगत प्ररोह वक्षमण्डल माना है।

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जाल

परिभाषा-

  • शरीर के जिस विशेष स्थान पर मांसपेशी, सिराएं, स्नायु तथा अस्थियां आपस में इस प्रकार अनुप्रविष्ट हाँ या मिली हुई हों जहां इनका संयोग होता है वह स्थान छिद्रित हो जाता जालीदार रचना के कारण जाल कहा जाता है एवं है।

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जाल संख्या

  • शरीर में जाल की संख्या भी 16 है। प्रत्येक मणिबन्ध (Wrist) तथा गुल्फ (Ankle) में मांसजाल,' शिराजाल, स्नायुजाल तथा अस्थिजाल - प्रत्येक चार-चार होते हैं। इस प्रकार चार शाखाओं के मणिबन्ध और गुल्फ में 16 जाल होते हैं। ये परस्पर निबद्ध हैं और इनमें जालक रचना के बीच में छिद्र होते हैं। मणिबन्ध में 8 अस्थियों का और गुल्फ में 7 अस्थियों का संगम होता है। यहाँ पर सिरा-स्नायु आदिक इस प्रकार अनुप्रविष्ट रहते हैं कि वह स्थान जालीदार हो जाता है।'

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मांस

सिरा

स्नायु

अस्थि

संधि

स्थान

मणिबन्ध-Wrist

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गुल्फ –Ankle

स्थान

सिरा

स्नायु

अस्थि

संधि

मांस

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संघात

व्याख्या-

  • अस्थियों के परस्पर मेल का नाम संघात हैं। यह अस्थि सन्धियों का एक विशिष्ट रूप हैं। प्रायः दो या दो से अधिक अस्थियों के मेल को संघात कहा जाता है।

स्थान:मणिबंध, कर्पर, कक्ष इन्हें मिलाकर उध्वं शाखा के 3 प्रत्येक

गुल्फ, जानु वंक्षण इन्हें मिलाकर अधो शाखा के 3 प्रत्येक

भंग, नितंब, त्रिकास्थि इन्हें मिलाकर त्रिकसंघात

इसी प्रकार से शिर की अस्थिया मिलाकर शिर संपुट यह एक संघात बनता है।

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संख्या

  • गुल्फ-इनमें गुल्फ सन्धि तथा इसके समीप अस्थियों का संघात है यथा पैर की tarsal तथा जंघा (पिण्डलियों) की दो, इस प्रकार 9 अस्थियां होती है।
  • जानु- इसमें जंघा को 2 उरु की एक तथा जानुकपाल 1 इस प्रकार कुल 4 अस्थिया होती हैं। अर्थात् Tibia, Fibula Patella और Femur का मेल
  • वंक्षण- इसमें उरू की 1 तथा श्रोणिफलक की 3 इस प्रकार चार अस्थियां होती हैं। प्राचीन दृष्टि से श्रोणिफलक की 3 अस्थियां इस प्रकार बताई हैं-जघनकपाल Ilium, कुकुन्दरास्थि Ischium तथा भगास्थि Pubis, चौथी Femur है।
  • मणिबन्ध - इसमें कलाई को 8 (Carpal Bone) तथा अग्रबाहु की 2 (Ulna, Radius) कुल 10 अस्थियां होती है।

सुश्रुत में इनकी संख्या 14 मानी है

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  • कूर्पर-इस संघात में अग्रबाहु की 2 और वाहु की एक, इस प्रकार कुल 3 अस्थियों का संघात है (Ulna, Radius and Humerus)
  • कक्षा- इसमें दो अस्थियां होती हैं।
  • त्रिक-पृष्ठवंश के नीचे की अस्थि है। यह पांच मोहरों से मिलकर बनती है।यह Sacrum है।
  • शिर- इसमें 15 अस्थियों का संघात होता है।
  • कुछ आचार्य संघात की संख्या 18 कहते हैं, उनके मत से-
  • 15. श्रोणिकाण्ड के ऊपर (Ilio-lumbosacral region) एक ।
  • 16. वक्ष के ऊपर (Middle of thorox) एक ।
  • 17. उदरोर:सन्धान (Costal arch) एक ।
  • 18. अंसकूट के ऊपर (Acromian region) एक ।

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सीमन्त

  • दो या दो से अधिक अस्थियों के प्रान्त या किनारे जहां आकर मिलते हैं वह सीमन्त कहलाता है

  • सीमन्त भी अस्थिसंघात के समान 14 होते हैं क्योंकि अस्थिसंघातों से युक्त सीमन्त होते हैं। आचार्य वाग्भट्ट ने इनकी संख्या 18 बताते हैं।

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सेवनी

  • दो भागों को मिलाकर सोने के समान रचना को सेवनी कहते हैं। सेवनी त्वचा, श्लेष्मल कला अथवा अस्थि में मिलती है।

  • इनकी संख्या सात है

  • मस्तक में 5 हैं, लिंग में 1 तथा जीभ में 1 है। इनका कभी भी वेध नहीं करना चाहिए।

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  • 1.जिह्वा सेवनी (Frenulum linguae) - यह सेवनी जिह्वा के अधःस्तल पर उसके अग्र से मूल तक होती है।
  • 2. शेफस् सेवनी (Perineal raphae) - यह सेवनी शिश्न के नीचे उसके मूल से होकर वृषण कोष से गुद द्वार को जाती है। गुद द्वार का पूर्व भाग वृषण सेवनी ( Scrotum raphae) और पीछे का अनुत्रिक (Cocyx) के अग्र तक का भाग गुदानुत्रिकसेवनी (Anococcygeal raphe) कहलाता है।

  • सिर में कपालास्थियों के संयोग से पाँच सेवनी बनती है

3. किरीटी सेवनी (Coronal suture) - ललाटास्थि (Frontal) और दोनों पार्श्वकपालास्थि (Parietal bone) के बीच में अनुप्रस्थ दिशा में स्थित है।

  • 4. अग्र-पश्च सेवनी (Sagittal suture) - यह पार्श्वकपालास्थि और ललाटास्थि ● संगम से पीछे पश्चकपालास्थि (Occipital bone) तक चली गयी है। यह दोनों र्श्वकपालास्थि के मध्य का संगम है।
  • 5. लेम्डा सेवनी (Lambdoidal suture) - यह पीछे की ओर दोनों पार्श्व-गलास्थि और पश्चकपालास्थि के बीच रहती है।
  • 6-7. पार्श्विक सेवनी (Temporo parietal suture) - यह सेवनी कपाल के में दोनों ओर पार्श्वकपालास्थि और शंखास्थि के मध्य रहती है।

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मांसरज्जु

  • पेशियों की डोरी के समान जो रचनाएं पृष्ठ में होती है उन्हें रज्जू कहते हैं। इन्हें मासंरज्जू भी कहते हैं।

  • महर्षिसुश्रुत के अनुसार पृष्ठवंश के दोनों ओर चार बड़ी मांसरज्जुएँ है जो पेशी को बाँधने के लिए हैं। इनमें दो भीतर की ओर है और दो बाहर की ओर हैं'। एक-एक मांसरज्जु पृष्ठवंश के पश्चिम में तथा एक-एक मांसरज्जु पृष्ठवंश के पूर्व में रहती है। मांसरज्जु पृष्ठवंश के कशेरुकों की सन्धियों को बाँधने वाले स्नायु को कह सकते है अथवा पृष्ठवंश के दोनों ओर स्थित बड़ी, दृढ, लम्बी पेशियाँ लॉगिस्मस स्पाइनेलिस (Longissimus spinalis) और इलियोकास्टेलिस(Iliocostalis) को कह सकते हैं।

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