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मगध का उत्थान

प्रो.सुरेश देवड़ा

शासकीय महाविद्यालय सुवासरा

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मगध का उत्थान

  • छठी शताब्दी ई. पू. में भारत में 16 महाजनपदों का अस्तित्व था । इन महाजनपदों में आपसी संघर्ष था तथा ये अपनी शक्ति की वृद्धि में प्रयासरत थे| इसमें मगध राज्य अपनी शक्ति के विस्तार करने में सफल रहा और एक शक्तिशाली राज्य बनकर उभरा |
  • मगध के उत्थान के कारण:-
  • भौगोलिक स्थिति :- मगध की भौगोलिक स्थिति उसे प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान करती थी | इसके दोनों राजधानियाँ राजगीर एवं पाटलिपुत्र सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान पर थी | राजगीर चारों ओर से पहाड़ियों से घिरा तथा लम्बे एक परकोटे से इसकी किलेबंदी कर ली गई थी|पाटलिपुत्र गंगा,सोन गंडक के संगम पर स्थित सुरक्षित जल दुर्ग था |
  • सैनिक कारक :- सैनिक दृष्टि से मगध काफी सुरक्षित था। सुदृढ़ राज्य के लिए एक सशक्त सेना एवं अच्छे अस्त्र-शस्त्रों की आवश्यकता होती है | मगध के शासक बिम्बसार को सेनिया की उपाधि दी गई थी। उसने एक स्थायी सेना रख रखी थी। मगध में हाथियों की उपलब्ध थी जोकिलों को ध्वस्त करने एवं दलदलीय मार्गों पर चलने में उपयुक्त थे| लोहे की उपलब्धता ने हथियारों से लेस होने में सहयोग किया था।
  • लोहे की पर्याप्त उपलब्धता:- मगध क्षेत्र में लोहे की पर्याप्त उपलब्धता थी |जिसके कारण वहां सनिक एवं कृषि विकास संभव हो सका | जिसके आधार पर सशक्त मगध साम्राज्य का निर्माण हुआ |उज्जयनी में भी लोहा मौजूद था इस कारण मगध को इसे अधीन करने में 100 वर्ष लगे |

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4. उर्वर भूमि :- मगध राज्य गंगा के मैदानी इलाके में स्थित था जहाँ की मिट्टी उपजाऊ थी | जिसके कारण कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई और साम्राज्य आर्थिक रूप से समृद्ध हुआ |

5. नए बौद्धिक विचारों का समर्थन:- मगध के लोगों ने ब्राम्हणवादी रुढियों का विरोध किया और नवीन धार्मिक चेतना का समर्थन किया |

6. शासकों के वैवाहिक सम्बन्ध:-

7.सम्राटों की दृढ़ इच्छा शक्ति:- बिम्बसार,अजातशत्रु,महापद्मानन्द जैसे शासकों ने मगध साम्रज्य का विस्तार किया और इसे शक्ति समृद्ध बनाया |

बिम्बसार

क्षेमन्द्र के राजा की लड़की

कौशल नरेश प्रसेनाजित की बहिन महाकौशला

लिच्छवी के प्रमुख चेटक की बहिन चेलना

वासवी विदेहकुमारी

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मगध के राज्यवंश

मगध साम्राज्य के उत्थान में तीन ऐतिहासिक राजवंशों ने महत्वपूर्ण योगदान दियाहर्यक वंश(543 ई.पू. से 407 ई.पू.) इस वंश में तीन प्रमुख शासक हुए 

  1. बिम्बसार - बिम्बसार हर्यकवंश का संस्थापक था। उसकी विशेष उपाधि 'सेनिया', यानी 'सेना रखने वाला' थी। वह पहला राजा था जिसने एक नियमित स्थायी सेना खड़ी की थी और इस सेना का किसी कबीले से सम्बन्ध नहीं था। बिम्बसार को श्रेणिक नाम से भी जाना जाता था। उसने राजनीतिक महत्व को बढ़ाने के लिए युद्ध तथा विवाह सम्बन्धों का सहारा लिया। पहले उसकी राजधानी गिरिव्रज थी, परन्तु बाद में उसने राजगृह नामक राजधानी बनाई। वह एक कुशल राजनीतिज्ञ था। अपनी कुशलता और क्षमता के बल पर मगध साम्राज्य की नींव डाली।

वैवाहिक सम्बन्ध - बिम्बसार ने साम्राज्य विस्तार के लिए विवाह सम्बन्धों की स्थापना की |

  • कौशल नरेश प्रसेनाजित की बहिन महाकौशला थी। कौशल की राजकुमारी से विवाह के फलस्वरूप काशी उसे दहेज में मिला।
  • दूसरी रानी वासवी विदेहकुमारी थी।
  • तीसरी रानी चेलना थी, जो लिच्छवी के प्रमुख चेटक की बहिन थी। वैशाली से विवाह सम्बन्ध स्थापित करके उसकी उत्तरी सीमा को सुरक्षित कर लिया और विदेहों से सम्बन्ध बनाकर उसने अंग देश को घेर लिया।
  • चौथी क्षेमन्द्र के राजा की लड़की थी।

 

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युद्ध विजय- बिम्बसार ने युध विजय के मध्यम से भी साम्राज्य का विस्तार किया उसने एक स्थायी सेना रखी थी मगध में हाथी पर्याप्त संख्या में उपलब्ध थे। अंग पर आक्रमण कर वहीं के राजा ब्रह्मदत्त को परास्त किया फलत: वह मारा गया और अंग मगध राज्य में मिला लिया गया। बिम्बसार ने अपने पुत्र अजातशत्रु को वहाँ का गवर्नर नियुक्त कर दिया। उस विजय से मगध की शक्ति तथा समृद्धि में बहुत वृद्धि हुई। अंग बहुत समृद्धशाली नगर था तथा दूरस्थ देशों तक उसका व्यापार था।

अजातशत्रु - अजातशत्रु का अर्थ होता है कि जिसका कोई शत्रु उत्पन्न नहीं हुआ हो। अजातशत्रु का प्रारंभिक नाम कुणिक था। प्रारंभ में इसे अंग की राजधानी चम्पा में शासक नियुक्त किया गया था। अनुश्रुति ने अनुसार, उसने बुद्ध के चचेरे भाई देवदत्त के कहने पर अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह किया था। उसने अपने पिता को कैद कर लिया, वहीं बिम्बसार की मृत्यु हो गई। उसे पितृहन्ता भी माना जाता है।

  • साम्राज्य विस्तार –
  • कौशल नरेश प्रसेनजित पर आक्रमण किया क्योकि उसने बिम्बसार को दहेज़ में दिया कशी वापस ले लिया था आरंभिक विजय के बाद अजातशत्रु को आत्म समर्पण करना पड़ा बाद में प्रसेनजित ने उसे माफ कर दिया और उसने अजातशत्रु से सन्धि करके अपनी पुत्री वाजिरा का विवाह उसके साथ कर दिया। इसके साथ ही उसने काशी पुन:मगध का अंग हो गया |

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वज्जिसंघ के लिच्छवी :- वज्जिसंघ को जीतने के लिए उसने कूटनीति का सहारा लिया। उसके मंत्री वस्सकार ने लिच्छवियों में फूट पैदा की | इसके साथ ही अजातशत्रु ने.राजगृह की किलेबन्दी की। अजातशत्रु ने रशमूसल और महाशिलाकंटक नामक भयंकर युद्ध-यंत्रों को था। वज्जिसंघ को जीतकर मगध साम्राज्य में मिला लिया

अजातशत्रु के राज्य में काशी, अंग तथा वैशाली राज्य सम्मिलित होने से इसका साम्राज्य बढ़ गया। मल्लों की पराजय से इसमें देवरिया के आस पास का क्षेत्र भी सम्मिलित हो गया। कौशल राज्य इसका मित्र हो गया। इस तरह मगध के राज्य ने एक विशाल राज्य का रूप लेना आरम्भ कर दिया।

अजातशत्रु का धर्म - अजातशत्रु बौद्ध धर्म का अनुयाई था था उसने बुद्ध के निर्वाण के बाद प्रथम बौद्ध संगीति का आयोजन करवाया था। पहले उसका शासन काल 491 ई.पू. से 459 ई.पू. तक था। अन्त में वह अपने पुत्र के हाथों मारा गया।

उदायिन - अजातशत्रु की मृत्यु के बाद संभवतः दर्शक गद्दी पर बैठा था। ई.पू. 445 में उदायिन (उदायी) मगध के सिंहासन पर बैठा। उसने अपनी राजधानी राजगृह से बदलकर पाटिलपुत्र को बनाया। उदायी ने अवंती को जीतकर मगध साम्राज्य का विस्तार किया। यह हर्यक वंश का अन्तिम प्रसिद्ध शासक था। उदायी के बाद इस वंश का पतन प्रारंभ हो गया।

नन्दीवर्द्धन 412 ई.पू. में गद्दी पर बैठा। इसके बाद उसका पुत्र को

महानन्दी गन्दी पर बैठा और यह हर्यकवंश का अंतिम शासक माना गया है।

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शिशुनाग वंश (407 ई.पू. से 377 ई.पू. तक)

  • इस वंश के दो प्रमुख शासकों के नाम मिलते हैं - शिशुनाग और कालाशोक।
  • शिशुनाग - शिशुनाग वंश का संस्थापक शिशुनाग था। उसने मगध की राजधानी बदलकर गिरिव्रज को पुनः राजधानी बनाई। पुराणों के अनुसार उसने अवन्ति को अन्तिम रूप से पराजित करके मगध में मिला लिया। शिशुनाग मध्यप्रदेश, मालवा और उत्तर के अनेक प्रदेशों का शासक बन गया था। उसने वत्स और कौशल राज्य को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया। यह मगध का पहला सम्राट था जिसे वास्तविक अर्थों में सम्राट कहा जा सकता है। उसकी मृत्यु 396 ई.पू. में हुई थी।
  • कालाशोक - काकवर्ण या कालाशोक शिशुनाग वंश का दूसरा शासक था । इसने पाटिलपुत्र को पुनः मगध की राजधानी बनाया। कालाशोक ने 36 वर्ष तक शासन किया। इसने कलिंग पर आक्रमण किया था और कश्मीर तक पंजाब को जीत लिया था, परन्तु उस्सने इन्हें मगध के साम्राज्य में शामिल नहीं किया। इसी के समय में बौद्धों की द्वितीय संगीति आयोजित की गई थी। इसकी हत्या कर दी गई थी। इसके बाद महापद्यनन्द ने नन्दवंश के नाम से शासन प्रारंभ किया।
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नन्दवंश (375 ई.पू. से 322 ई.पू. तक)

शिशुनाग वंश के अंतिम शासक कालाशोक की महापद्यनन्द ने हत्या करके नन्द वंश की स्थापना की। नन्द वंश में नौ राजा हुए जिनको नवनन्द कहते हैं। इनके नाम इस प्रकार बताये हैं- (1) उग्रसेन, (2) पन्डुक, (3) पण्डुगति, (4) भूतपाल, (5) रामपाल, (6) गोविषाणक, (7) दशसिद्धक, (8) कैवर्त और (9) धन। इनमें से प्रथम उग्रसेन को ही महापद्यनन्द के नाम से जाना जाता है।

महापद्यनन्द ने मगध अपनी विशाल सेना के माध्यम से मगध का विस्तार किया। |उसने भारत के 10 राज्यों इक्ष्वाकु, पांचाल, कुरु,हैहयआदि को मगध के राज्य में मिलाया था।

साम्राज्य विस्तार - पुराणों के अनुसार उसने वे इस प्रकार हैं(i) - कौशल नाम से जाना जाता था। अयोध्या जो अब तक स्वतन्त्र था। इसे नन्द

महापद्यनन्द के उत्तराधिकारी :- महापद्यनन्द के बाद उसके आठ बेटों ने शासन किया। उसके अन्तिम उत्तराधिकारी धननन्द था जो संभवतः सिकन्दर के आक्रमण के समय मगध का शासक था।

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नन्दवंश के पतन के कारण

  • महापद्यनन्द ने अपने विशाल सैन्य बल और कुशल सेनापतित्व के कारण सफलता प्राप्त की, लेकिन यह विजय स्थायी नहीं रही |
  • महापद्यनन्द क्षत्रियों और ब्राह्मणों से द्वेष करता था और ये दोनों की शक्तिशाली जातियाँ नन्द वंश की समाप्ति के लिए आतुर रहीं।
  • नन्द शासकों की सैनिक और आर्थिक नीतियाँ भी असंतोषजनक थीं।
  • उसके आठों पुत्र एकदम अयोग्य निकले।
  • धननन्द अत्याचारी, लोभी और अय्याश शासक था।
  • कौटिल्य का अपमान उसके पतन का महत्वपूर्ण कारण था।  

स्त्रोत :-

  1. जैन संजीव कुमार ,भारत का इतिहास प्रारंभ से 1200ई.(2015),कैलाश पुस्तक सदन,भोपाल
  2. दुबे सत्यनारायण, भारत का इतिहास प्रारंभ से 1200ई,शिवलाल एवं अग्रवाल कम्पनी इंदौर
  3. शर्मा रामशरण ,भारत का प्राचीन इतिहास ,ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस 2018