13. ओलंपिक खेलों का अपना एक ध्वज है। यह सफेद रंग का है। इस ध्वज में पाँच छोटे-छोटे गोल घेरे होते हैं। ये पाँच घेरे विश्व के पाँच महाद्वीपों एशिया, अफ्रीका, यूरोप, आस्ट्रेलिया और अमेरिका का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन गोल घेरों का आपस में जुड़े होना इस भावना का प्रतीक है कि ये पाँचों महाद्वीप एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। ओलंपिक खेल आरंभ होने से पहले एक मशाल जलाकर लाई जाती है। इस मशाल को ओलंपिया से चलते हुए उस नगर में लाया जाता है जहाँ ओलंपिक खेल हो रहे हैं। इस ओलंपिक मशाल को जहाँ तक संभव हो दौड़ते हुए ही ले जाया जाता है। मेजबान देश का सर्वोच्च अधिकारी इन खेलों का उद्घाटन करता है। इसके पश्चात् सभी देशों के खिलाड़ियों का मार्च पास्ट होता है। मार्च पास्ट में सबसे आगे एक खिलाड़ी ओलंपिक ध्वज लिए हुए चलता है। ओलंपिक ध्वज के पीछे खेलों में भाग लेने वाले देश के प्रमुख खिलाड़ी अपने-अपने देश का राष्ट्रीय ध्वज लिए हुए चलते हैं। यहाँ ओलंपिक मशाल जलाई जाती है तथा खेल संबंधी नियमों की शपथ ली जाती है। इसके पश्चात् खेल आरंभ होता है।
प्रश्नः1.गद्यांश का मूलभाव स्पष्ट कीजिए।�उत्तरः गद्यांश का मूलभाव है-ओलंपिक खेलों के ध्वज से परिचित कराते हुए खेलों के उद्घाटन और इसकी महत्ता से परिचित करवाना।
प्रश्नः2 ‘मेज़बान’, ‘आरंभ’-शब्दों का अर्थ लिखिए।�उत्तरः मेजबान-आयोजन करने वाला देश/व्यक्ति आरंभ-शुरुआत
प्रश्नः3.ओलंपिक खेलों में इसके ध्वज की महत्ता स्पष्ट कीजिए।�उत्तरः ओलंपिक खेलों में इसका ध्वज अपना विशेष महत्त्व रखता है। सफेद रंग के इस ध्वज पर पाँच छोटे-छोटे घेरे बने हैं, जो विश्व के पाँचों महाद्वीपों का प्रतिनिधित्व करते हुए उनका एक साथ जुड़ा होना दर्शाते हैं।
प्रश्नः4.ओलंपिक खेलों का उद्घाटन किस तरह किया जाता है?�उत्तरः इस खेल के आरंभ में एक मशाल जलाई जाती है। इसे ओलंपिया से उस देश में लाया जाता है जहाँ ओलंपिक खेलों का आयोजन हो रहा है। इसके बाद मेजबान देश का सर्वोच्च अधिकारी इन खेलों का उद्घाटन करता है।
प्रश्नः5.विश्व के लिए ओलंपिक खेलों का क्या महत्त्व है?�उत्तरः ओलंपिक खेलों में विश्व के अनेक देशों के विभिन्न खेलों के खिलाड़ी जुटते हैं। वे खेल संबंधी नियमों की शपथ लेते हैं। इससे उनके बीच मेल-जोल बढ़ता है। यह मेल-जोल केवल खिलाड़ियों तक सीमित न होकर देशों के बीच हो जाता है।
14. हमारा यह कर्तव्य है कि हम विकलांगों के प्रति अपना दृष्टिकोण बदलें। उनके प्रति मानवीय दृष्टि का परिचय दें। उनमें निहित हीन भावना को दूर कर उनमें आत्म-विश्वास जगाएँ। उनके पुनर्वास के लिए प्रयत्नशील रहें। उन्हें यह अनुभव कराया जाए कि वे भी समाज का एक महत्त्वपूर्ण अंग हैं। उन्हें भी एक सामान्य व्यक्ति के समान अधिकार प्राप्त हैं। वे भी मतदान करके राष्ट्र के निर्माण में सहायक बन सकते हैं। वे भी अपनी उपलब्धियों का पुरस्कार पाने के अधिकारी हैं। विकलांगों के पुनर्वास के लिए यह ज़रूरी है कि उन्हें दूसरों के समान रोज़गार, वेतन आदि दिए जाएँ। ऐसा करना कठिन अवश्य है, क्योंकि पढ़े-लिखे सामान्य युवकों के लिए तो रोज़गार उपलब्ध नहीं, फिर भी इनके लिए कुछ स्थान निश्चित किए जा सकते हैं। इनके लिए सरकार रोज़गार के विशेष साधन उपलब्ध कराए। वे जो-जो कर सकते हैं, उन्हें उन कामों में लगाया जाए। बहरा व्यक्ति कई काम कर सकता है। लंगड़ा व्यक्ति हाथों की सहायता से काम कर सकता है। अंधा व्यक्ति सूत कात सकता है। कुछ ऐसे भी काम हैं, जिन्हें विकलांग एक-दूसरे की सहायता से भी कर सकते हैं।
प्रश्नः 1.उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक लिखिए।�उत्तरःगद्यांश का उपयुक्त शीर्षक है-विकलांगों के प्रति हमारा कर्तव्य।
प्रश्नः 2.विकलांग राष्ट्र निर्माण में किस तरह सहायता कर सकते हैं?�उत्तरः विकलांग व्यक्ति मतदान करके राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दे सकते हैं।
प्रश्नः 3.आज विकलांगों के प्रति हमारा कर्तव्य किस तरह बदल गया है और क्यों?�उत्तरः आज यह आवश्यक हो गया है कि हम विकलांगों के प्रति अपना दृष्टिकोण बदलें, उनमें निहित हीन भावना दूर कर उनमें आत्मविश्वास जगाएँ और उनके साथ मानवीय व्यवहार करें, क्योंकि वे भी हमारे समाज के अंग हैं।
प्रश्नः 4.विकलांगों का पुनर्वास करने के लिए क्या किया जाना चाहिए? यह कार्य कठिन क्यों है?�उत्तरः विकलांगों के पुनर्वास के लिए उन्हें भी दूसरों के समान रोज़गार, वेतन आदि दिया जाना चाहिए। यह कार्य इसलिए कठिन है क्योंकि हमारे देश में पढ़े-लिखे सामान्य लोगों के लिए ही रोज़गार के अवसरों की कमी है।
प्रश्नः 5.विकलांगों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए क्या-क्या ध्यान रखना चाहिए?�उत्तरः विकलांगों को आत्मनिर्भर बनाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि उन्हें रोज़गार के विशेष अवसर उपलब्ध करवाते हुए उनसे वे ही काम करवाए जाने चाहिए जिनके योग्य वे हैं, जैसे-पैर से अपंग व्यक्ति हाथ से कई काम कर सकता है।
15. परिश्रम उन्नति का द्वार है। मनुष्य परिश्रम के सहारे ही जंगली अवस्था से वर्तमान विकसित अवस्था तक पहुँचा है। उसी के सहारे उसने अन्न उपजाया, वस्त्र बनाए, घर, मकान, भवन, बाँध, पुल, सड़कें बनाईं। तकनीक का विकास किया, जिसके सहारे आज यह जगमगाती सभ्यता चल रही है। परिश्रम केवल शरीर की क्रियाओं का ही नाम नहीं है। मन तथा बुद्धि से किया गया परिश्रम भी परिश्रम कहलाता है। हर श्रम में बुद्धि तथा विवेक का पूरा योग रहता है। परिश्रम का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे लक्ष्य प्राप्त करने में सहायता मिलती है। परिश्रम करने वाला मनुष्य सदा सुखी रहता है। उसे मन-हीमन प्रसन्नता रहती है कि उसने जो भी भोगा, उसके बदले उसने कुछ कर्म भी किया। परिश्रमी व्यक्ति का जीवन स्वाभिमान से पूर्ण होता है, वह अपने भाग्य का निर्माता होता है। उसमें आत्म-विश्वास होता है। परिश्रमी व्यक्ति किसी भी संकट को बहादुरी से झेलता है तथा उससे संघर्ष करता है। परिश्रम कामधेन है जिससे मनुष्य की सब इच्छाएँ पूरी हो सकती हैं। मनुष्य को मरते दम तक परिश्रम का साथ नहीं छोड़ना चाहिए। जो परिश्रम से इनकार करता है, वह जीवन में पिछड़ जाता है।
प्रश्नः 1.गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक लिखिए।�उत्तरः गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक है-परिश्रम की महत्ता।
प्रश्नः 2.विलोम लिखिए-परिश्रम, उन्नति।�उत्तरः परिश्रम – आलस्य, उन्नति – अवनति।
प्रश्नः 3.आज की चमकती सभ्यता में परिश्रम का योगदान स्पष्ट कीजिए।�उत्तरः मनुष्य अपने परिश्रम से ही आदिमानव की जंगली अवस्था त्यागकर सभ्य बना है। उसने परिश्रम से अन्न उपजाया, वस्त्र बनाए, घर मकान, भवन बाँध और पुल बनाए जिससे स यता इस चमकती अवस्था तक पहुंची है।
प्रश्नः 4.परिश्रम करने से क्या लाभ है?�उत्तरः परिश्रम करने से व्यक्ति को लक्ष्य प्राप्त होता है। ऐसा व्यक्ति सुखी और प्रसन्नचित्त रहता है, क्योंकि उसने जो कुछ पाया है, उसके लिए परिश्रम किया है।
प्रश्नः5.परिश्रम को कामधेनु क्यों कहा गया है? परिश्रम न करनेका क्या परिणाम होता है?�उत्तरः परिश्रम को कामधेनु इसलिए कहा गया है, क्योंकि परिश्रम से व्यक्ति हर प्रकार की मनोवांछित सफलता प्राप्त कर सकता है। इसके विपरीत परिश्रम न करने वाला व्यक्ति सफलता से कोसों दूर रहता है और पिछड़ता जाता है।
16. ओजोन की परत को अच्छा करने में प्रत्येक व्यक्ति कई तरीकों से योगदान कर सकता है। हम लोग ओजोन हितैषी उपभोक्ता बन सकते हैं। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हम जो भी उत्पाद खरीदते हैं; वे सी.एफ.सी. और ओ.डी.एस. से मुक्त हैं। हमें यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि फ्रिज, वातानुकूलक वायु विलयक डिब्बे और अग्निशामक यंत्रों पर स्पष्ट रूप में लिखा होना चाहिए कि वे ओजोन हितैषी हैं। हमें ओ.डी.एस वाले पुराने फ्रिज और अग्निशामकों को हटा देना चाहिए। किसानों को ओजोन हितैषी पीड़कनाशियों का उपयोग करना चाहिए। फ्रिज ठीक करने वाले मिस्त्रियों को सभी प्रकार के रिसाव जल्दी ठीक करने चाहिए और यह देखना चाहिए कि मरम्मत किए गए प्रशीतकों में टूट-फूट नहीं हैं और उनमें रिसाव भी नहीं है।प्रशीतकों की पुनर्णाप्ति और पुनश्चक्रण के कार्यक्रम शुरू किए जाने चाहिए। दफ्तरों में भी ओ.डी.एस. का उपयोग करने वाले उपकरणों के स्थान पर उपयुक्त ओजोन हितैषी विकल्पों को स्थान देना चाहिए। विद्यार्थियों को भी पोस्टरों दवारा, वाद-विवाद प्रतियोगिताओं का आयोजन करके और ब्लॉग लेखन द्वारा जागरूकता पैदा करने वाले कार्यक्रम शुरू करने चाहिए। यही नहीं उन्हें अपने परिवार, मित्रों और पड़ोसियों को भी ओजोन हितौषी पदार्थों के विषय में बताना चाहिए। ऐसे कई गैर-सरकारी संगठन हैं जो जागरूकता अभियान में सहयोग दे सकते हैं। ओजोन बचाओ, पृथ्वी पर जीवन बचाओ।
प्रश्नः 1.उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक लिखिए।�उत्तरःगद्यांश का शीर्षक है-ओजोन बचाओ, जीवन बचाओ।
प्रश्नः 2.‘वातानुकूलक’ ‘पुनाप्ति’ में संधि विच्छेद कीजिए।�उत्तरःवातानुकूलक = वात + अनुकूलक पुनर्घाप्ति = पुनः + प्राप्ति
प्रश्नः 3.हम ओजोन हितैषी उपभोक्ता कैसे बन सकते हैं?�उत्तरःओजोन हितैषी उपभोक्ता बनने के लिए हमें सी.एफ.सी. और ओ.डी. एस. मुक्त उपकरण खरीदने चाहिए। इसके अलावा ऐसे उपकरण खरीदना चाहिए, जिन पर लिखा हो कि वे ओजोन हितैषी हैं। इसके अलावा हमें पुराने उपकरणों को बदल देना चाहिए।
प्रश्नः4.ओजोन परत बचाने में किसान और मिस्त्री किस प्रकार अपना योगदान दे सकते हैं?�उत्तरःओजोन परत बचाने के लिए किसानों को उन पीड़क नाशकों का प्रयोग करना चाहिए, जिनका ओजोन पर कोई दुष्प्रभाव न हो। इसी प्रकार मिस्त्रियों को यह देखना चाहिए कि प्रशीतकों में कोई टूट-फूट और रिसाव न हो।
प्रश्नः 5.विद्यार्थियों को ओजोन की परत बचाए रखने के लिए क्या-क्या करना चाहिए?�उत्तरःविद्यार्थियों को चाहिए कि वे ओजोन बचाने संबंधी पोस्टर बनाए, वाद-विवाद आयोजित करें और ब्लॉग लिखकर लोगों में जागरुकता करनी चाहिए। उन्हें अपने इष्ट, मित्रों, परिवार और पड़ोसियों को भी ओजोन हितैषी पदार्थों के�बारे में बताना चाहिए।
17. भोजन का असली स्वाद उसी को मिलता है जो कुछ दिन बिना खाए भी रह सकता है। ‘त्यक्तेन भुजीथा,’ जीवन का भोग त्याग के साथ करो, यह केवल परमार्थ का सही उपदेश नहीं है, क्योंकि संयम से भोग करने पर जीवन से जो आनंद प्राप्त होता है, वह निरा भोगी बनकर भोगने से नहीं मिल पाता। बड़ी चीजें बड़े संकटों में विकास पाती हैं, बड़ी हस्तियाँ बड़ी मुसीबतों में पलकर दुनिया पर कब्जा करती है। अकबर ने तेरह साल की उम्र में अपने बाप के दुश्मन को परास्त कर दिया था, जिसका एकमात्र कारण यह था कि अकबर का जन्म रेगिस्तान में हुआ था, और वह भी उस समय जब उसके बाप के पास एक कस्तूरी को छोड़कर और कोई दौलत नहीं थी। महाभारत में देश के प्रायः अधिकांश वीर कौरवों के पक्ष में थे। मगर फिर भी जीत पांडवों की हुई, क्योंकि उन्होंने लाक्षागृह की मुसीबत झेली थी, क्योंकि उन्होंने वनवास के जोखिम को पार किया था। श्री विंस्टन चर्चिल ने कहा है कि जिंदगी की सबसे बड़ी सिफत हिम्मत है। आदमी के और सारे गुण उसके हिम्मती होने से ही पैदा होते हैं।
प्रश्नः 1.गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक लिखिए।�उत्तरः गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक है-‘हिम्मत और जिंदगी’।
प्रश्नः 2.शब्दार्थ लिखिए-परास्त करना, जोखिम।�उत्तरः परास्त करना-हरा देना।�जोखिम-खतरा।
प्रश्नः 3.जिंदगी का वास्तविक आनंद किस प्रकार लिया जा सकता है?�उत्तरः जिंदगी का वास्तविक आनंद संयमपूर्वक भोग करके लिया जा सकता है। इसका कारण यह है कि संयम से भोग करने पर जीवन का जो आनंद प्राप्त होता है, वह निरा भोगी बनकर भोगने से नहीं मिल सकता है।
प्रश्नः 4.गद्यांश में अकबर का उल्लेख किस संदर्भ में किया गया है? उसने कौन-सा साहसी काम किया था?�उत्तरः गद्यांश में अकबर का उल्लेख इसलिए किया गया है, क्योंकि अकबर ने विपरीत परिस्थितियों में अपने पिता के शत्रु को हराया। उस समय उसकी उम्र मात्र तेरह साल थी और वह धनहीन भी था।
प्रश्नः 5.गद्यांश में पांडवों की विजय का क्या कारण बताया गया है?�उत्तरः गद्यांश में पांडवों की जीत का कारण यह बताया गया है कि उन्होंने लाक्षागृह की बाधाओं पर विजय पाई थी और वनवास की राह में आए सभी खतरे एवं संकटों का सामना किया था।
18. भारत के वे असली सपूत थे, इसका सबूत उन्होंने पदारूढ़ होने के एक दिन पहले तब दिया जब वे दिल्ली में शृंगेरी के जगद्गुरु स्वामी शंकराचार्य से भेंट करने गए। जगद्गुरु के सामने पुष्प और फल रखते हुए उन्होंने कहा था- आपका आशीर्वाद चाहिए और शंकराचार्य ने राष्ट्रपति के सिर पर हाथ रख कर उन्हें आशीर्वाद दिया था। ऐसी ही एक और घटना याद आती है। उपराष्ट्रपति-निवास के अहाते में एक दिन सवेरे घूम रहे थे तो देखा कि माली के घर में कीर्तन हो रहा है। फिर क्या था, टहलते हुए उधर चले गए और उसके साथ एक कोने में दरी पर बैठ गए। जब कुरसी लाने के लिए कहा गया तो बोले, “भगवान के घर में सब बराबर होते हैं।”-और दरी पर ही बैठे रहे। पटियाला में पंजाबी विश्वविद्यालय में गुरु गोबिंद सिंह के संस्थान की नींव रखने को आपसे कहा गया तो बोले, “आपने मुझसे इस पवित्र संस्थान की नींव रखने को कहा है। इससे मुझे याद आता है कि अमृतसर से दरबार साहब की नींव डालने के लिए भी एक मुसलमान को ही बुलाया गया था,” और यह कहते-कहते उनका गला भर आया, आँखों से आँसू बहने लगे। बड़े-बड़े योद्धा सिख सरदार श्रोताओं की भी उस समय आँखें भर आईं।
प्रश्नः1.‘जगद्गुरु’ ‘आशीर्वाद’-संधि-विच्छेद कीजिए।�उत्तरः जगद्गुरु = जगत + गुरु आशीर्वाद = आशीः + वाद
प्रश्नः2.गद्यांश का मूलभाव क्या है?�उत्तरः गद्यांश का मूलभाव है-डॉ० जाकिर हुसैन की धार्मिक उदारता।
प्रश्नः3.पदारूढ़ होने से पहले डॉ० ज़ाकिर हुसैन कहाँ गए और क्यों?�उत्तरः पदारूढ़ होने से पहले डॉ० जाकिर हुसैन दिल्ली में शृंगेरी के जगद्-गुरु शंकराचार्य के पास गए। वे उपराष्ट्रपति जैसा महत्वपूर्ण पद संभालने से पहले उनका आशीर्वाद लेना चाहते थे।
प्रश्नः4.डॉ० जाकिर हुसैन ने अपने धार्मिक उदारता का परिचय माली के घर कैसे दिया?�उत्तरः माली के यहाँ कीर्तन होने की बात सुनकर जाकिर हुसैन वहाँ गए और सबके साथ दरी पर बैठे। उन्होंने कुरसी पर बैठने से यह कहकर इनकार कर दिया कि भगवान के घर में सभी बराबर होते हैं। यह उनकी धार्मिक उदारता थी।
प्रश्नः5.पंजाबी विश्वविद्यालय की नींव रखने के समय डॉ० ज़ाकिर हुसैन भावुक क्यों हो गए?�उत्तरः पंजाबी विश्वविद्यालय की नींव रखने के समय डॉ. जाकिर हुसैन इसलिए भावुक हो गए थे क्योंकि एक मुसलमान होने के बाद भी उन्हें संस्थान की नींव रखने का पुनीत काम करने का अवसर दिया गया था।
19. गुरु नानकदेव का आविर्भाव आज से लगभग पाँच सौ वर्ष पूर्व हुआ। भारतवर्ष की मिट्टी में युग के अनुरूप महापुरुषों को जन्म देने का अद्भुत गुण है। आज से पाँच सौ वर्ष पहले का देश उनके कुसंस्कारों में उलझा था। जातियों, संप्रदायों, धर्मों और संकीर्ण कुलाभिमानों से वह खंड-विच्छिन्न हो गया था। देश में नये धर्म के आगंतुकों के कारण एक ऐसी समस्या उठ खड़ी हुई थी, जो इस देश के हजारों वर्षों के लंबे इतिहास में अपरिचित थी। ऐसे ही दुर्घट काल में इस देश की मिट्टी ने ऐसे अनेक महापुरुषों को उत्पन्न किया, जो सड़ी रूढ़ियों, मृतप्राय आचारों, बासी विचारों और अर्थहीन संकीर्णताओं के विरुद्ध प्रहार करने में कुंठित नहीं हुए और इन जर्जर बातों से परे सबमें विद्यमान सबको नई ज्योति और नया जीवन प्रदान करनेवाले महान् जीवन-देवता की महिमा प्रतिष्ठित करने में समर्थ हुए। इन संतों की ज्योतिष मंडली में गुरु नानकदेव ऐसे संत हैं, जो शरत्काल के पूर्णचंद्र की तरह ही स्निग्ध, उसी प्रकार शांत-निर्मल, उसी प्रकार रश्मि के भंडार थे। कई संतों ने कस-कस के चोटें मारी; व्यंग्य-बाण छोड़े, तर्क की छुरी चलायी, पर महान् गुरु नानकदेव ने सुधा-लेप का काम किया। यह आश्चर्य की बात है कि विचार और आचार की दुनिया में इतनी बड़ी क्रांति ले आनेवाला यह संत इतने मधुर, इतने स्निग्ध, इतने मोहक वचनों का बोलनेवाला है। किसी का दिल दुखाये बिना, किसी पर आघात किए बिना, कुसंस्कारों को छिन्न करने की शक्ति रखनेवाला, नई संजीवनी धारा से प्राणिमात्र को उल्लसित करनेवाला यह संत मध्यकाल की ज्योतिष्क मंडली में अपनी निराली शोभा से शरत् पूर्णिमा के पूर्णचंद्र की तरह ज्योतिष्मान् है।
प्रश्नः 1.गुरु नानकदेव का संबंध किस काल से है?�उत्तरःगुरु नानकदेव का संबंध मध्यकाल से है।
प्रश्नः 2.उल्लसित, कुलाभिमान-संधि विच्छेद कीजिए।�उत्तरःउल्लसित = उत् + लसित�कुलाभिमान = कुल + अभिमान
प्रश्नः 3.दुर्घटकाल किस समय को कहा गया है और क्यों?�उत्तरःआज से करीब पाँच सौ साल पहले के काल को दुर्घटकाल कहा गया है, क्योंकि उस समय देश कुसंस्कारों में उलझकर जाति, धर्म, संप्रदाय आदि के नाम पर लड़ रहा था। उस समय नए धर्मांगतुकों का आगमन समस्या बन रहा था।
प्रश्नः 4.समाज को सुधारने में संतों का क्या योगदान रहा है?�उत्तरःसंतों ने समाज में फैली रूढ़ियों, मृतप्राय आचार-विचारों और संकीर्णताओं पर प्रहार किया और सबमें विद्यमान और सबको नया जीवन देने वाले जीवन-देवता की महिमा प्रतिष्ठित करके समाज का कल्याण किया।
प्रश्नः 5.नानकदेव अन्य संतों से किस तरह भिन्न थे?�उत्तरःअन्य संतों ने लोगों के बुराइयों से बचाने के लिए चोटें मारी, व्यंग्यवाण छोड़े, तर्क के कटु वचन कहे, वहीं गुरुनानक देव ने मधुर, स्निग्ध मोहक वचनों में बिना किसी का दिल दुखाए नई संजीवनीधारा लोगों को प्रदान की।
20. मानव जाति अपने उद्भवकाल से ही प्रकृति की गोद में और उसी से अपने भरण-पोषण की सामग्री प्राप्त की। सभी प्रकार के वन्य या प्राकृतिक उपादान ही उसके जीवन और जीविका के एकमात्र साधन थे। प्रकृति ने ही मानव जीवन को संरक्षण प्रदान किया। रामचंद्र, सीता व लक्ष्मण सभी ने पंचवटी नामक स्थान पर कुटिया बनाकर वनवास का लंबा समय व्यतीत किया था।वृक्षों की लकड़ी से मानव अनेक प्रकार के लाभ उठाता है। उसने लकड़ी को ईंधन के रूप में प्रयुक्त किया। इससे मकान व झोंपड़ियाँ बनाईं। इमारती लकड़ी से भवन-निर्माण, कृषि यंत्र, परिवहन, जैसे-रथ, ट्रक तथा रेलों के डिब्बे तथा फर्नीचर आदि बनाए जाते हैं। कोयला भी लकड़ी का प्रतिरूप है। वृक्षों की लकड़ी तथा उसके उत्पाद; जैसे-नारियल का जूट, लकड़ी का बुरादा, चीड़ की लकड़ी आदि का प्रयोग फल, काँच के बरतन आदि नाजुक पदार्थों की पैकिंग में किया जाता है।
प्रश्नः 1.लकड़ी और कोयले में क्या संबंध है?�उत्तरःलकड़ी और कोयले में यह संबंध है कि कोयला लकड़ी का ही बदला हुआ रूप है।
प्रश्नः 2.‘भरण-पोषण’ और ‘भवन-निर्माण’ का विग्रह करके समास का नाम बताइए।�उत्तरः भरण-पोषण = भरण और पोषण – द्वंद्व समास� भवन निर्माण = भवन और निर्माण – संबंध तत्पुरुष समास
प्रश्नः 3.आदिमानव के लिए वन किस तरह लाभदायी रहे हैं?�उत्तरः आदिमानव ने वनों की गोद में जन्म लिया, वहीं पला-बढ़ा और अपने लिए भोजन प्राप्त किया। वन और उसके उत्पाद ही आदिमानव के जीने का सहारा थे। वनों ने ही आदिमानव को संरक्षण दिया।
प्रश्नः 4.वर्तमान में मनुष्य वृक्षों से किस तरह लाभ उठा रहा है?�उत्तरः वर्तमान में मनुष्य वनों से प्राप्त लकड़ी को ईंधन के रूप में प्रयोग कर रहा है। इनसे वह मकान बनाने, कृषि यंत्र, रथ, ट्रक तथा रेल के डिब्बे तथा अन्य बहुत-सी वस्तुएँ बना रहा है।
प्रश्नः 5.लकड़ी के अलावा वृक्षों के उत्पाद क्या हैं? मनुष्य इनका उपयोग किन कार्यों में कर रहा है?�उत्तरः लकड़ी के अलावा वृक्षों के अन्य उत्पाद हैं-नारियल का जूट, लकड़ी का बुरादा, चीड़ की लकड़ी आदि। इनका प्रयोग वह कल, काँच के बरतन आदि नाजुक सामानों की पैकिंग जैसे कामों में कर रहा है।