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BLESSINGS

ॐ ह्रीं अर्हम् नमः

श्रीसद्गुरुभ्यो नमः

ॐ ऐं नमः

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SHREE MATI GYANAY NAMAH

SHREE SHRUT GYANAY NAMAH

SHREE AVADHI GYANAY NAMAH

SHREE MANAH - PARYAV GYANAY NAMAH

SHREE KEVAL GYANAY NAMAH

5 GYAN

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Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 44

14 Gunsthan

Inspired by:

Yugpradhan Acharyatulya P.P. Panyas Shree Chandrashekar Vijayji M.S.

P.P. Panyas Shree Yashobhushan Vijayji M.S.

P.P. Panyas Shree Manobhushan Vijayji M.S.

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Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 44

१४ गुणस्थानक

१४ गुणस्थानक

जैन दर्शन के अनुसार प्रत्येक आत्मा विकासशील है।

विकास तीन प्रकार का होता है-शारीरिक विकास, मानसिक विकास तथा आध्यात्मिक विकास आध्यात्मिक विकास का अर्थ है-आत्मा के भीतर रही हुई गुण शक्तियों का विकास। कम या अधिक मात्रा में प्रत्येक आत्मा में ये शक्तियाँ विद्यमान है।

इन शक्तियों पर कर्म का आवरण छाया है।

वह ज्यो ज्यो घटता है त्यो त्यो आत्मा विकास के मार्ग पर आगे बढ़ती है।

इस विकास के स्तर को अर्थात् आत्मिक गुणों के विकास की क्रमिक अवस्था को गुणस्थान कहा जाता है।

जैसे बादलों के कारण सूर्य का प्रकाश अवरुद्ध होता है, वैसे ही आत्मा के विकास को रोकने वाले पाँच मुख्य तत्त्व है- (1) मिथ्यात्व (2) अविरति (3) प्रमाद (4) कषाय और (5) योग- मोहनीय कर्म की तीव्रता व मन्दता के कारण ये पाँचों आवरण कभी सघन और कभी अल्प होते रहते हैं। इसी आधार पर चौदह गुणस्थान का निर्माण होता है। ये 14 गुणस्थान संक्षेप में इस प्रकार हैं

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१४ गुणस्थानक

१) मिथ्यादृष्टि

  1. मिथ्यादृष्टि गुणस्थान - मोहनीय कर्म की प्रबलता से आत्मा में सत्य को समझने व ग्रहण करने की दृष्टि नहीं रहती।

वह असत्य को सत्य तथा सत्य को असत्य मानने लगता है।

जैसे पीलिया रोगी को सफेद वस्तु भी पीली दीखती है तथा पित्तज्वर वाले को मीठी वस्तु भी कड़वी लगती है यह प्रथम गुणस्थान है। संसार के अधिकांश जीव इस में अनन्त काल तक रहते हैं।

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१४ गुणस्थानक

(२) सास्वादन

(२) सास्वादन गुणस्थान - जिसकी दृष्टि सम्यकत्व के किंचित स्वाद सहित होती है।

उस व्यक्ति के गुणस्थान को सास्वादन सम्यग्दृष्टि गुणस्थान कहा जाता है।

सम्यग्दृष्टि व्यक्ति उपशम सम्यक्त्व से च्युत होकर (वमन करके) जब तक पहले गुणस्थान को नहीं पहुंच पाता, तब तक की उस मध्यवर्ती अवस्था का नाम सास्वादन-सम्यगदृष्टि गुणस्थान है।

यह द्वितीय गुणस्थान है। इसकी उत्कृष्ट स्थिति छह आवलिका मात्र है।

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१४ गुणस्थानक

(३) मिश्र

(३) मिश्र गुणस्थान - यह शंका सहित आत्मा की दोलायमान अवस्था है। इसमें विचारधारा निश्चित नहीं होती है।

यह मिश्र गुणस्थान है।

पहले गुणस्थान वाले की दृष्टि तत्त्व के प्रति एकांत रूप से मिथ्या आग्रहयुक्त होती है और इस गुणस्थान वाले की संदिग्ध होती, इसकी उत्कृष्ट स्थिति अन्तर मुहूर्त की है।

जिनधर्म के प्रति न राग, न द्वेष, नालिकेर मनुष्य के समान

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(४) अविरत सम्यगदृष्टि

(४) अविरत सम्यगदृष्टि गुणस्थान - जिसे सम्यगदृष्टि प्राप्त हो जाती है, किन्तु किसी प्रकार का व्रत-नियम नहीं होता उस व्यक्ति के गुणस्थान को अविरत सम्यगदृष्टि गुणस्थान कहा जाता है।

इस अवस्था में दर्शन और ज्ञान तो शुद्ध रहता है परन्तु चारित्र या व्रत का ग्रहण नहीं हो सकता।

सुदेव, सुगुरु, सुधर्म, के प्रति श्रद्धा तथा मोक्ष की ओर अग्रेसर होने की चेष्टा होने लगती है।

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(५) देशविरति

(५) देशविरति गुणस्थान - जिस व्यक्ति के व्रत-अव्रत दोनों हो, जो पाप क्रियाओं से पूर्णत निवृत्त नहीं हो सका किन्तु यथाशक्ति व्रतों का पालन करता है, सर्वविरति की रुचि होती है। उसके गुणस्थान को देशविरति गणस्थान कहा जाता है।

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(६) प्रमत्त संयत

(६) प्रमत्त सर्वविरती (सयंत) संयत गुणस्थान - निद्रा आदि प्रमादों का सेवन करनेवाला पंच महाव्रतधारी साधु के गुणस्थान को प्रमत्त संयत गुणस्थान कहा जाता है।

इसमें सत्य के आचरण का पूर्ण संकल्प होता है।

जीवन त्यागमय साधनामय बन जाता है, किन्तु प्रमाद की विद्यमानता रहती है।

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१४ गुणस्थानक

(७) अप्रमत्त सयंत

(७) अप्रमत्त सर्वविरती (सयंत) गुणस्थान - जो निद्रा विषय कषाय आदि प्रमादों का सेवन नहीं करता, अपने स्वरूप में सदा जागरूक रहता है, उन अप्रमादी पंच महाव्रतधारी साधु के गुणस्थान को अप्रमत्त-संयत गुणस्थान कहा जाता है।

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(८) निवृतिकरण

(८) निवृतिकरण - अपूर्वकरण गुणस्थानक - आठवें गुणस्थान में 'मोहनीय कर्म का क्षय । उपशम करनेवाला जीव / आत्मा अनुक्रम से क्षपक अथवा उपशमक कहलाता है।

'निवृत्ति' अर्थात् भिन्नता और 'करण' अर्थात् अध्यवसाय ।

विभिन्न अध्यवसाय धारक जीव/आत्मा आठवें गुणस्थानक में, मोहनीय कर्म का क्षय अथवा उपशम आरम्भ करता है।

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१४ गुणस्थानक

(८) निवृतिकरण

अतः प्रस्तुत आठवें गुणस्थानक को निवृत्तिकरण गुणस्थानक कहा जाता है, या यों भी कह सकते हैं कि यहाँ पर मोहनीय कर्म की स्थिति एवम् रस का घात पूर्व के गुणस्थानकों में कदापि न हुआ हो वैसा होने से, साथ ही गुणश्रेणी, गुणसंक्रम और नवीन स्थितिबन्ध भी इससे पूर्व कभी न हुए हों वैसे अल्प प्रमाण में तथा निरंतर घटते रहने से, ऐसी पाँच अपूर्व प्रक्रियाएँ होने के कारण इसे अपूर्वकरण गुणस्थानक कहा जाता है।

इसकी कालावधि एक अन्तर्मुहूर्त की होती है।

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(९) बादर संपराय

(९) नौवाँ गुणस्थानक बादर संपराय - संपराय = चारित्र मोहनीय और बादर स्थूल।

दसवें गुणस्थानक में मोह के सूक्ष्म स्वरूप की अपेक्षा नौवें गुणस्थानक में उसका प्रमाण अधिक होने से इसका नाम बादर संपराय पड़ा है।

इसको अनिवृत्तिकरण भी कहते हैं।

आठवें गुणस्थानक की भाँति एक समय श्रेणी पर आरुढ होनेवाले जीवों के अध्यवसायों में अन्तर/भिन्नता नहीं होती।

इसका काल भी एक अन्तर्मुहूर्त का ही होता है।

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(१०) सूक्ष्म सम्पराय

(१०) सूक्ष्म सम्पराय गुणस्थाने - सम्पराय का अर्थ है- कषाय, जिसमे लोभ कषाय सूक्ष्म अंश में विद्यमान हो उसके गुणस्थान को सूक्ष्म-सम्पराय गुणस्थान कहा जाता है।

क्रोध, मान माया-ये तीन कषाय तो पहले ही उपशांत या क्षीण हो चुके हैं।

इसमें सिर्फ लोभ कषाय अल्प मात्र में रहता है। LEARN AND TURN उपशम श्रेणी वाला ११ गुणस्थान तक जाकर वापस लौट आता है। क्षपक श्रेणी वाला १०वें से सीधा १२ वें गुणस्थान में जाकर ऊपर चढ़ता है। इसकी स्थिति अन्तमुहूर्त की होती है।

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(११) उपशांत मोह

(११) उपशांत मोह गुणस्थान - जिसका मोहनीय कर्म अंतमुहूर्त तक उपशात हो जाता है उसके गुणस्थान को उपशात-मोह गुणस्थान कहा जाता है।

इस अवस्था में अवशिष्ट लोभ का उपशम होता है, किन्तु समूल विच्छेद नहीं।

वह राख से ढकी हुई आग की तरह पुन भभक जाता है। इस अवस्था में कषाय का उदय नहीं रहता।

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१४ गुणस्थानक

(११) उपशांत मोह

अतः इसे उपशान्त कषाय वीतराग छद्‌मस्थ भी कहा जाता है।

इसकी उत्कृष्ट स्थिति अन्तमुहूर्त प्रमाण मानी गई है।

इस गुणस्थान वाला जीव उपशम श्रेणी वाला होता है।

अतः वह क्षपक श्रेणी नहीं चढ़ सकता। इस गुणस्थान का समय पूरा होने से पहले ही जो जीव आयुक्षय होने से काल कर जाता है, वह अनुत्तर विमान में उत्पन्न होता है।

जो जीव इस गुणस्थान से नीचे गिरता है वह पुनः उन्हीं स्थानों का स्पर्श करता हुआ कोई छठे गुणस्थान तक आता है, कोई पाँचवें चौथे अथवा दूसरे पहले तक आ सकता है।

उपशम श्रेणी वाला जीव क्षपक श्रेणी प्राप्त किये बिना मोक्ष नहीं जा सकता।

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१२) क्षीण मोह

१२) क्षीण मोह गुणस्थान - मोहनीय कर्म सर्वथा क्षीण हो जाता है, उसके गुणस्थान को क्षीण-मोह गुणस्थान कहा जाता है।

पूर्व-अवस्था में संज्वलन लोभ का अस्तित्व शेष रह गया था, इस अवस्था में वह भी पूर्ण रूप से समाप्त हो जाता है।

आत्मा पूर्ण वीतराग हो जाती है।

किन्तु केवल ज्ञान प्राप्त नहीं होने से छद्‌मस्थ वीतराग कहलाते हैं।

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(१३) सयोगी-केवली

(१३) सयोगी-केवली गुणस्थान - जो केवली मन, वचन और काया योग की प्रवृत्ति से युक्त होता है, उसका गुणस्थान सयोगी-केवली गुणस्थान है।

इस अवस्था में ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय-ये घाति कर्म भी सर्वथा क्षीण होते हैं। मोहनीय कर्म तो पहले ही क्षीण हो चुका होता है।

आत्मा सर्वज्ञ, सर्वदर्शी और अन्तराय रहित हो जाती है। कालावधि जघन्य अंतमुहूर्त से उत्कृष्ट देशोन पूर्व कोटी वर्ष।

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१४ गुणस्थानक

(१४) अयोगी-केवली

(१४) अयोगी-केवली गुणस्थान - इस अवस्था में केवली मन, वाणी और काया की प्रवृत्ति का निरोध कर अयोगी बन जाता है।

वह अनादिकालीन कर्म-बन्धन को तोड़कर सर्वथा मुक्त और स्वतन्त्र हो जाता है।

आत्मा पहले मनोयोग का, उसके बाद वाक्योग का और उसके बाद काययोग का निरोध कर अयोगी अवस्था को प्राप्त कर लेता है।

यह आत्मा की पूर्ण शुद्ध व संसार-मुक्त अवस्था है।

पाँच ह्रस्वाक्षर अ इ उ ऋ एवम् लू के उच्चारण में जितनी अवधि लगे उतनी चौदहवें गुणस्थान की अवधि को पूर्ण कर अस्पृशद्‌गति से सिद्धशिला के लोकाग्र पर आरुढ होता है।

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१४ गुणस्थानक

(१४) अयोगी-केवली

अन्ततोगत्वा वह सिद्ध भगवान के रूप में पहचाना जाता है। अक्षय स्थिति का अक्षय / अनंतकाल तक उपभोग करता हैं। इसमें किसी प्रकार का कोई अन्तर अथवा परिवर्तन नहीं होता। फलतः इसे आदि अनंत स्थिति की संज्ञा दी गयी है।

यहाँ किसी तरह के दुःख/शोक, रोग / पीडा, आधि/व्याधि/उपाधि, क्षुधा, तृषा, बेचैनी, औत्सुक्य आदि कुछ भी नहीं होते। अनंतज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत सुख, अनंत वीर्य आदि चतुष्टय-गुणों में सदा-सर्वदा । अहर्निश सिद्धात्मा ओतप्रोत रहते है। यही वह अवस्था है जहाँ जीव में से शिव अवस्था की उत्पति है।

संसार = कर्मवश जीव की अशुद्ध अवस्था / स्थिति । मोक्ष = कर्मक्षय के कारण जीव की शुद्ध-विशुद्ध अवस्था / स्थिति ।

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