BLESSINGS
ॐ ह्रीं अर्हम् नमः
श्रीसद्गुरुभ्यो नमः
ॐ ऐं नमः
SHREE MATI GYANAY NAMAH
SHREE SHRUT GYANAY NAMAH
SHREE AVADHI GYANAY NAMAH
SHREE MANAH - PARYAV GYANAY NAMAH
SHREE KEVAL GYANAY NAMAH
5 GYAN
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 15
Jay Viyaray Sootra
Inspired by:
Yugpradhan Acharyatulya P.P. Panyas Shree Chandrashekar Vijayji M.S.
P.P. Panyas Shree Yashobhushan Vijayji M.S.
P.P. Panyas Shree Manobhushan Vijayji M.S.
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 15
जयवीयराय सूत्र
जयवीयराय सूत्र (१ से ६ प्रार्थना)
जयवीयराय सूत्र का वाचन करते समय भक्त वीतराग भगवान के सामने तेरह विशिष्ट वस्तुओं को प्राप्त करने की उत्कट अभिलाषा रखता है, जो उसके लिए सर्वमंगलकारी हैं और समस्त कल्याणकारी है।
उस समय उसके मन में यह परम विश्वास रहता है कि ये विशिष्ट वस्तुएँ भगवान के प्रभाव से ही उसे प्राप्त हो सकती है।
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जयवीयराय सूत्र
भव निर्वेद (भव निव्वेओ)
तेरह वस्तुएँ इस प्रकार है
अज्ञानी मनुष्य इसमें लिप्त रहकर अपने आपको सुखी समझता है किन्तु वास्तविकता यह है कि यह सुख मनुष्य को अन्ततः रुलाता ही है। वास्तविक सुख तो संसार से मुक्त होने में है, भोगने में नहीं।
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जयवीयराय सूत्र
मार्गानुसारिता (मग्गाणुसारिआ)
२. मार्गानुसारिता (मग्गाणुसारिआ) भक्त की यह कामना रहती है कि उसकी धर्माराधना में रुचि बनी रहे।
धर्माराधना के लिए आप द्वारा निर्दिष्ट तत्त्व मार्ग ही इष्टमार्ग है।
आपके प्रभाव से ही मैं तत्त्व मार्ग पर सदा प्रवृत्त रह सकता हूँ।
जो तत्त्वमार्गी होता है यह कलह, निर्दयता, अनीति, ईर्ष्यादि दुर्गुणों से विमुक्त रहता हुआ मैत्री, दया-दान-नीति आदि को ग्रहण करता हुआ या शुभ इच्छा रखता हुआ अपना कल्याण तो करता ही है साथ ही दूसरे को भी कल्याण मौर्ग पर ले जाने का शुभ निमित्त बनता है।
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जयवीयराय सूत्र
इष्टफल सिद्धि
३. इष्टफल सिद्धि (इट्ठ-फल सिद्धि) भक्त प्रभु से इष्ट फल की सिद्धि की कामना करता है।
भक्त इस सत्य से भी भलीभाँति परिचित है कि इष्टफल की प्राप्ति प्रभु के प्रभाव के बिना असम्भव है।
अतः उसकी इच्छा रहती है कि वह सतत देवदर्शन करता रहे।
देवदर्शन से धर्म तो सधता ही है चित्त भी शान्त प्रशान्त रहता है।
ऐसी स्थिति में विपरीत से विपरीत परिस्थितियों मैं भी उसका मन समाधि में ही रमेगा, उसका मन प्रभु का स्मरण-चिन्तवन, व समाधि आदि में ही लगेगा।
उसकी आजीविका के समय में भी समाधि के भाव दिखाई देंगे। भक्त भगवान के मंगलदर्शन से कभी वंचित नहीं होना चाहता है।
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जयवीयराय सूत्र
लोगविरुद्धच्चाओ
४. लोक विरुद्ध त्याग (लोगविरुद्धच्चाओ) इसमें भक्त प्रभु के समक्ष खड़े होकर यह भावना भाता है कि हे प्रभु! आपके अचिन्त्य प्रभाव से लोक विरुद्ध जितने भी कार्य हैं उन सबसे मैं विरत रहें। मेरा ऐसे निन्द्रय कार्यों से सर्वथा के लिए त्याग रहे।
निन्दा, जुआ, खरकर्म, मस्करी आदि ऐसे ही कार्य हैं जो संसारी मनुष्य को अपयश आदि अशुभ परिणाम दिलाते हैं।
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जयवीयराय सूत्र
गुरुजणपूआ
५. गुरुजन पूजा (गुरुजणपूआ) गुरु की महिमा अपरम्पार है।
गुरु का अर्थ है लौकिक-अलौकिक सुशिक्षा देने वाला, धर्म को ज्ञान कैराने वाला, वृद्धजन, जन्म देने वाले माता-पिता आदि।
वीतराग भगवान के सामने भक्त यह कामना करता है कि वह गुरु के प्रति विनय भाव रखे. उनकी सेवा-सुश्रूषा करे तथा उनका आदर-सत्कार एवं उनकी आज्ञा पालन करने की प्रवृत्ति सदा उसमें बनी रहे। श्रवण कुमार द्वारा अपने अन्धे माता-पिता की सेवा और पुरुषोत्तम श्रीराम का अपने पिता राजा दशरथै की की आज्ञा को शिरोधार्य मानना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
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जयवीयराय सूत्र
परत्थकरणं
६. परार्थकरण (परत्थकरणं) भक्त भगवान के समक्ष यह भावना करता है कि जितना भी सम्भव हो, मैं दूसरों पर उपकार करूँ।
मेरा पुरुषार्थ दूसरों के दुःख-दर्द को मिटाने वाला हो।
मेरी प्रवृत्ति चारों प्रकार के दान-ज्ञान दान, आहार दान, अभय दान, औषधि दान में बनी रहे।
यदि निर्माण कार्य में मेरी रुचि हो तो वह जिनमंदिर, उपाश्रय, धर्मशालादि निर्माण कार्य में लगे।
इन कार्यों से चित शान्त व सन्तोषमय रहता है तथा संसारी वस्तुओं के प्रति आसक्ति या ममत्व भाव भी छूटता है जो मोक्ष का कारण बनता है।
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जयवीयराय सूत्र
सह गुरु जोगो
जयवीयराय सूत्र (७ से १३ प्रार्थना)
७. शुभ गुरु योग (सह गुरु जोगो) भक्त अपने आराध्य देव से यही कामना करता है कि हे प्रभु! आपके प्रभाव से मुझे शुभ गुरु का पावन सान्निध्य सदा प्राप्त होता रहे।
इस कलिकाल में सच्चे गुरु का मिलना कठिन हैं, सॅच्चे गुरु कंचन-कामिनी के त्यागी, पंच महाव्रतों के धारक, सच्चारित्र सम्पन्न गुरु है, जो संसारी मनुष्य को भव-भटकन से रोकते हैं। आपके प्रभाव से मुझे यह ज्ञात हो गया है कि सच्चे साधु का समागम, सच्चे भक्त को सम्यक्-दर्शन व सम्यग्ज्ञान की प्राप्ति कराएगा ।
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जयवीयराय सूत्र
तव्वयण सेवणा
८. गुरुवचन सेवा (तव्वयण सेवणा)-भक्त वीतराग भगवान के समक्ष यह कामना करता है कि हे जगदगुरु मुझे सच्चे गुरु के वचनामृत पालने का सदा सुयोग मिलता रहे।
गुरुवचन सेवा मुझे धर्म की और सदा प्रवृत्त बनाए रखेगी, ऐसा मेरा आत्मविश्वास है।
सच्चे गुरु सदैव अपने भक्त-शिष्यों को जिनभक्ति, सामायिक, सम्यक्तप, दान, दया तथा व्रतादि की ओर प्रेरित किए रहते हैं।
अतः हे जगद्गुरु ! जब तक मैं इस संसार में रहूँ तब तक मुझे गुरुवचनों की सेवा करने का सुयोग प्राप्त होता रहे।
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जयवीयराय सूत्र
नोंध:- 9. प्रभुचरण सेवा का चित्र बूक में नहीं है।
9. प्रभुचरण सेवा (सेवा)-भक्त यह स्वीकारता है कि हे प्रभु!! आप इस जगत के सबसे बड़े गुरु हैं।
आप हौ भवसागर से पार कराने वाले हैं।
अतः मुझे आपके चरणों की सेवा का शुभ अवसर मिलता रहे, यही आपके समक्ष कामना करता हूँ।
यद्यपि आपके आगम में राजा देव, धनवान आदि बनने की आशंसा करने का निषेध किया गया है फिर भी यह मेरी उत्कट आकांक्षा है कि जन्म-जन्मान्तर मुझे आपके चरणों की सेवा का सुयोग मिलता रहे, जिससे उत्तरोत्तर मेरा भव सुधरता जाए।
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जयवीयराय सूत्र
दुक्खक्खओ
१०. दुःखक्षय (दुक्खक्खओ) संसार दुःखों का आगार है। यहाँ व्यक्ति दुःखों से संतप्त रहता है।
इसलिए दुःखों को क्षय करने के लिए हे नाथ, मैं आपके समक्ष खड़ा हूँ।
यह सुनिश्चित है कि आपको प्रणाम करने से सांसारिक दुःखों से मुझे मुक्ति मिलेगी।
क्रोध-अभिमान आदि से उत्पन्न जो दुःख हैं उनकी समाप्ति समता-सौम्यता व मैत्री आदि से ही सम्भव है।
इसी प्रकार संसार में आधि-व्याधि की जो चिन्ता लगी रहती है उससे जो दुःख होता है उसके निवारण के लिए, एकमात्र साधन है जैनागम (जैनशास्त्रों) का नित्य स्वाध्याय करना।
इस प्रकार भगवान की वंदना करने से ही संसार के भयंकर से भयंकर कष्टों-दुःखों व असाध्य रोगों का निवारण सहज हो जाता है।
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जयवीयराय सूत्र
कम्मक्खओं
११. कर्मक्षय (कम्मक्खओं) संसारी मनुष्य कर्म-जाल में फँसा हुआ है। कर्म उसे भाँति-भाँति के दुःख-कष्ट पहुँचाते रहते हैं।
अतः कर्मक्षय हेतु भक्त भगवान से यह कामना करता है कि मुझमें इतनी शक्ति बनी रहे कि जो भी दुःख व कष्ट आएँ उन्हें मैं शान्त व साम्य भाव से सहन करता रहूँ जिससे मेरे सर्व कर्म कट सकें।
हे प्रभु! मुझे गजसुकुमाल, खंधक, शालिभद्र मुनि की भाँति सम्यक् परीषह-उपसर्ग सहन करने की शक्ति प्रदान करो जिससे कर्मक्षय हो सकें।
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जयवीयराय सूत्र
समाहिमरणं
१२. समाधिमरण (समाहिमरणं) जन्म-मरण संसार की दो शाश्वत घटनाएँ हैं।
भक्त, वीतराग भगवान के समक्ष यही भावना भाता है कि हे प्रभु! जीवन के अन्त समय मेरा ध्यान आर्त-रौद्र से हटकर परमेष्ठि के ध्यान में ही लगा रहे।
मेरी मृत्यु समाधिपूर्वक हो।
और यह तभी सम्भव है जब मेरे ऊपर आपका अचिन्त्य प्रभाव हो ।
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जयवीयराय सूत्र
बोहिलाभो
13. बोधिलाभ (बोहिलाभो) भक्त की प्रभु से यह कामना रहती है कि परलोक में भी उसे बोधिलाभप्राप्त होवे, बोधिलाभ का तात्पर्य हैं सम्यक दर्शन-ज्ञान-चारित्र स्वरूप जैनधर्म, जिनवचन, (जैनशास्त्र) व जैन साधना का समागम मिलता रहे।
इतना ही नहीं जब तक मोक्ष की प्राप्ति न हो तब तक प्रभु के चरणों की सेवा का लाभ भी अनवरत मिलता रहे।
इस प्रकार जयवीराय सूत्र के अन्तर्गत भक्त वीतराग प्रभु के समक्ष उपरोक्त तेरह वस्तुएँ पाने की अभिलाषा रखता है और जैन शासन की सदा जय बोलता है क्योंकि जैन शासन वीतराग भगवान द्वारा प्ररूपित है।
यह समस्त मंगलों में श्रेष्ठ, मंगलकारी, सर्वकल्याणकारी तथा सभी धर्मों में यह उत्तम धर्म है।