प्रो .सुरेश देवडा शा .महाविद्यालय सुवासरा
B A प्रथम वर्ष
प्रारंभिक जीवन
गौतम बुद्ध (563- )
गौतम के पिता शुद्धेदन शाक्य गण के 'राजन' थे और उनकी माता महामाया कोलियवंशी कोलियगण के 'राजन' अजन की पुत्री थी।
गौतम के जन्म पर कालदेवल तथा कौडिन्य नामक ज्योतिषियों ने यह भविष्यवाणी की थी कि बालक सिद्धार्थ आगे चलकर बुद्ध होंगे।
16 वर्ष की अवस्था में सिद्धार्थ का विवाह रामग्राम के कोलियगण की सुंदरी राजकुमारी यशोधरा से कर दिया गया|पुत्र जन्म का समाचार जब उन्हें मिला तो उनके मुँह से सहसा निकला 'राहु' (बंधन)। इसी के साथ नवजात शिशु का नाम राहुल पड़ा।
29 वर्ष की अवस्था में सिद्धार्थ (गौतम) ने गृहत्याग के लिए निश्चय किया। अपने घोड़े कंथक व सारथी छन्दक के साथ वन को प्रस्थान किया। गौतम के जीवन की यह घटना महाभिनिष्क्रमण कहलाती है।
35 वर्ष की अवस्था में निरंजन नदी के तट पर वटवृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई | सारनाथ में अपना पहला उपदेश दिया |
कुशीनारा में 80 वर्ष की आयु में 486 ई.पू. में गौतम बुद्ध ने शरीर त्याग दिया। बुद्ध के जीवन की यह घटना 'महापरिनिर्वाण' कहलाती है।
बौद्ध धर्म के सिद्धांत �
चार आर्य सत्य
1 दुख - संसार के समस्त प्राणी दुखों से दुखी हैं।‘’
2 दुख समुदाय – (कारण) बुद्ध ने सारे दुख का मूल कारण (समुदाय) तृष्णा को माना है। बुद्ध का कथन है कि “रूप, शब्द, गंध, रस, स्पर्श व मानसिक वितर्क एवं विचारों से मनुष्य जब आसक्ति करता है, तो तृष्णा का जन्म होता है।
3 . दुख निरोध - तृष्णा का अंत |तृष्णा के नाश से जन्म-मरण व संबंधित दुखों का अंत होता है।
4 दुख निरोध मार्ग - इस मार्ग के आठ अंग हैं। अतः यह अष्टांगिक मार्ग कहलाता है
अष्टांगिक मार्ग
दस शील आचरण
अहिंसा, 2. अस्तेय, 3. सत्य, 4.अपरिग्रह, 5. ब्रह्मचार्य, 6. नृत्यगान त्याग, 7. सुगंध मालादि त्याग, 8. असमय भोजन त्याग, 9. कोमल शय्या त्याग तथा 10. कामिनी कंचन त्याग।
इनमें से प्रथम पाँच गृहस्थ उपासक बौद्धों एवं सभी दस बौद्ध भिक्षुओं के लिए था।
दुखवाद
दुख बौद्ध धर्म का मूल है, जिनमें दुख और दुख निरोध धर्म के दो पाद हैं। बुद्ध ने कहा है कि भिक्षुओं को दो ही वस्तुएँ मैं सिखाता हूँ, 'दुख और दुख से विमुक्त ही बौद्ध धर्म का साध्य है और विमुक्त का मार्ग (आष्टांगिक मार्ग) उसका साधन है।'' इस प्रकार बुद्ध ने न केवल दुख का पता लगाया अपितु उसे दूर करने का उपाय भी बतलाया। अत: उनका दृष्टिकोण यथार्थवादी था।
अनात्मवाद :
बुद्ध आत्मा के विषय में मौन थे। भौतिक शरीर के नष्ट होने के बाद आत्मा जैसी स्थाई वस्तु में उनका विश्वास न था
जैसे कि गाड़ी कई पुर्जो के जोड़ने से बनती वैसे मनुष्य भी कई तत्वों के जोड़ से बनता है।
अनीश्वरवाद : बुद्ध ईश्वर के विषय में मौन थे। वे ईश्वर को सृष्टि के कर्ता के रूप में नहीं मानते थे। उनका कथन था कि सृष्टि की उत्पत्ति के लिए किसी कर्ता की आवश्यकता नहीं। यह तो कार्यकारण श्रृंखला से चलता रहा है।
पुनर्जन्मवाद : बौद्ध धर्म मानव के कर्मफल में विश्वास करता है। उसके अनुसार मनुष्य अपने अच्छे-बुरे कर्मों के फल से पुनर्जन्म पाता है। बौद्ध विचारानुसार पुनर्जन्म आत्मा का नहीं अनित्य अहंकार का होता है। जब मनुष्य के तृष्णा का संपूर्ण क्षय से उसका अहंकार नष्ट हो जाता है तो उसको निर्वाण प्राप्त हो जाता है।
कर्मवाद : बौद्ध धर्म कर्म प्रधान धर्म है। बुद्ध ने कर्म के आधार पर ही चतुर्वर्णा शुद्धि का प्रतिपादन किया था। उनका कथन था कि जो भी मनुष्य चाहे वह किसी भी वर्ण का हो, सम्यक् कर्म करेगा, वह मोक्ष का अधिकारी होगा।
कारणवाद- बौद्धमत के अनुसार संसार में जो धर्म है वह हेतु (कारण) से उत्पन्न होता है और हेतु का निरोध अष्टांगिक मार्ग से संभव है।
माध्यम मार्ग
अत्यधिक शारीरिक सुख व अत्यधिक शारीरिक दुख दोनों ही अतियाँ प्रव्रजित के लिए सेवन योग्य नहीं है। इन दोनों अत्तियों के बीच के मार्ग मध्यम प्रतिपदा (मध्यम मार्ग) को गौतम बुद्ध ने उपयुक्त बतलाया है।
निर्वाण - बौद्ध धर्म का चरम लक्ष्य है निर्वाण, जो उपरोक्त सिद्धांतों के अनुगमन पर प्राप्त किया जा सकता है। बौद्ध धर्म के अनुसार निर्वाण इसी जीवन से संभव है। निर्वाण का अर्थ है दीपक की तरह बुझ जाना। वासना व अंधकार के नष्ट होने पर निर्वाण प्राप्त होता है। इसी का दूसरा नाम विमुक्ति व अमृत।
बोद्ध संघ
बोद्ध धर्म में संघ का विशेष महत्त्व था |
सर्वप्रथम बुद्ध ने अपने 60 अनुयायियों को मिलकर संघ का निर्माण कर धर्म प्रचार का आदेश दिया |
बाद में स्थानीय संघ भी बने |
संघ की कार्य प्रणाली :-
कोई भी व्यक्ति संघ की सदस्यता ले सकता था |
बाद में सदस्यता के लिए कुछ नियम बनाये गए- 15 वर्ष की आयु एवम माता –पिता की अनुमति पर ही
चोर हत्यारे दागी ऋणी का प्रवेश नहीं
आरंभ में नारियो को प्रवेश नहीं ,बाद में कुछ शर्तो के साथ
उपसंपदा – संघ में प्रवेश
निस्साय – संघ में प्रवेश के बाद भिक्षु को किसी आचार्य के निरिक्षण में अध्ययन करना पड़ता था |
संघ की कार्य प्रणाली :-
सभी भिक्षु को सामान अधिकार
संघ के निर्णय के लिए भिक्षु का होना अनिवार्य था | कम से कम 20 भिक्षु |
कोई भी निर्णय बहुमत से होता था |
किसी मुद्दे पर विभिन्न रंग की शलाकाओ द्वारा मत विभाजन
विशेष परिस्थिति में उपसमिति भी मुद्दे पर विचार करती थी
इस प्रकार संघ ने भिक्षुओ को संगठन ,जीवन पद्धति ,निर्वाह का साधन और धर्म प्रचार का मार्ग दिया |
बौद्ध संगीतियाँ