BLESSINGS
ॐ ह्रीं अर्हम् नमः
श्रीसद्गुरुभ्यो नमः
ॐ ऐं नमः
SHREE MATI GYANAY NAMAH
SHREE SHRUT GYANAY NAMAH
SHREE AVADHI GYANAY NAMAH
SHREE MANAH - PARYAV GYANAY NAMAH
SHREE KEVAL GYANAY NAMAH
5 GYAN
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 32
11th Vrat : Paushadh Upvas Vrat
12th Vrat : Atithi Samvihag Vrat
Inspired by:
Yugpradhan Acharyatulya P.P. Panyas Shree Chandrashekar Vijayji M.S.
P.P. Panyas Shree Yashobhushan Vijayji M.S.
P.P. Panyas Shree Manobhushan Vijayji M.S.
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 32
Paushadh Upvas Vrat
पौषध का अर्थ है, उपाश्रय आदि धर्म स्थान में रहते हुए, एकासना आदि तप पूर्वक आत्म-चिन्तन आदि करते हुए आत्म आनंद करना।
संक्षेप में धर्म की पुष्टि करने वाली व्रत साधना पौषध है विशेषतः अष्टमी, चतुर्दशी इत्यादि पर्व तिथियों में सांसारिक कार्यों से निवृत्त होकर, धर्मस्थान में रहकर, आठ प्रहर (या चार प्रहर) के लिए आत्मा को धर्म ध्यान में लगाते रहना पौषध व्रत है।
यह एक प्रकार से सामायिक साधना है।
Paushad for 12 hours
or 24 hours
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 32
Paushadh Upvas Vrat
आवश्यक वृत्ति में पौषध के मुख्य रूप में चार भेद बताये हैं :
Not to Eat Food (Fasting)
(१) आहार पौषध - एक अहोरात्र के लिए चारों प्रकार के आहार का त्याग करना।
Not to Beautify Oneself
(२) शरीर पौषध - स्नान, उबटन, विलेपन आदि द्वारा शरीर की शोभा विभूषा का त्याग करना।
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 32
Paushadh Upvas Vrat
Celibacy
(३) ब्रह्मचर्य पौषध - आठ प्रहर के लिए सभी प्रकार के मैथुन (अब्रह्मचर्य) का त्याग करना।
Not to do any business
(४) अव्यापार पौषध - सभी प्रकार की सावद्य प्रवृत्तियों का त्याग करना।
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 32
Atithi Samvibhag Vrat
बारहवां व्रत - अतिथि संविभाग व्रत
श्रावक के चौथे शिक्षाव्रत तथा बारहवें व्रत का नाम है अतिथि संविभाग व्रत।
अगले दिन चौविहारा उपवास हो, अहोरात्र का पौषध हो, दूसरे दिन गुरु भगवंत को अथवा साधर्मिक बंधु की भक्ति करने के बाद, एकासना करना यही बारहवाँ अतिथि संविभाग व्रत है।
अतिथि शब्द पंच महाव्रतधारी संयमी साधु - साध्वी अथवा श्रावक - श्राविका के लिए प्रयुक्त होता है। श्रावक प्रतिदिन यह भावना करता है कि मेरे घर में मेरे लिए जो भोजन आदि बना है, मेरे उपयोग के लिए जो वस्त्र, पात्र, औषध आदि है, उनमें से कुछ अपने पूजनीय त्यागी श्रमणजनों को अथवा श्रावक - श्राविका को समर्पित करके फिर मैं उसका उपयोग करूँ ।
इस पवित्र भावनापूर्वक घर पर पधारे श्रमणजनों को निर्दोष, प्रासुक, एषणीय,
वस्त्र, पात्र, आहार, पानी आदि का दान करता है।
पाँच अतिचार - इस व्रत के पाँच अतिचार हैं
Atithi Samvibhag Vrat
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 32
To keep Sachit (living) things
under Achit (non living) food
(१) सचित्तपिधान - सचित्त वस्तु से ढँककर रखना।
To keep Sachit (living) things on Achit (non living) food
(२) सचित्त निक्षेपण - साधु को देने योग्य वस्तु को भूल से या गड़बड़ी से किसी सचित्त (लीलोती या कच्चा पानी आदि) पर रख देना
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 32
Atithi Samvibhag Vrat
To invite at ineligible time
Wrong statement
regarding self object
To give dishonorly
(३) परव्यपदेश - साधु द्वारा भिक्षा के लिए आने पर कृपणता आदि वश अपनी वस्तु को दूसरे की बताना या पराई वस्तु को अपनी बताना।
(४) मात्सर्य - ईर्ष्या, द्वेष, प व अहंकार की भावना से या लोक में बड़प्पन जताने की भावना से देना। थोड़ा देकर बहुत अधिक बताना इत्यादि।
(५) कालातिक्रम - साधुओं को भिक्षा, गोचरी का समय हो, उस समय को टालकर असमय में उनको भिक्षा के लिए आमंत्रण देना अथवा उनके भिक्षा काल से पहले ही भोजन करके समाप्त कर देना