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नवोदय विद्यालय समिति, नोएडा

  • ई सामग्री
  • कक्षा – दसवीं
  • हिन्दी ‘ब’ पाठ्यक्रम

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पाठ 1- साखी  �

  • प्रस्तुतकर्ता
  • जय कुमार वर्मा
  • टी. जी. टी. हिन्दी
  • ज. न. वि. नेल्लूरु

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कवि परिचय

इनका जन्म 1398 में काशी में हुआ ऐसा माना जाता है। इनके गुरु रामानंद थे। ये क्रांतिदर्शी कवि थे जिनकी कविता से गहरी सामाजिक चेतना प्रकट होती है। इन्होने 120 वर्ष की लम्बी उम्र पायी। इन्होने अपने जीवन के कुछ अंतिम वर्ष मगहर में बिताये और वहीँ चिरनिंद्रा में लीन हो गए।

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साखी

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  • ' साखी ' वस्तुतः (एक तरह का ) दोहा छंद ही है जिसका लक्षण है 13 और 11 के विश्राम से 24 मात्रा अर्थात पहले व तीसरे चरण में 13 वर्ण व दूसरे व चौथे चरण में 11 वर्ण के मेल से 24 मात्राएँ। प्रस्तुत पाठ की साखियाँ प्रमाण हैं की सत्य को सामने रख कर ही गुरु शिष्य  को जीवन के व्यावहारिक ज्ञान की शिक्षा देता है। यह शिक्षा जितनी अधिक प्रभावशाली होगी, उतनी ही अधिक याद  रहेगी।

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साखी

ऐसी बाँणी बोलिये, मन का आपा खोइ।�अपना तन सीतल करै, औरन कौ सुख होइ।।

बाँणी - बोली�आपा - अहम् (अहंकार )�खोइ - त्याग करना�सीतल - शीतल ( ठंडा ,अच्छा )�औरन - दूसरों को�होइ -होना

 

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  • भावार्थ - कबीर कहते हैं की हमें ऐसी बातें करनी चाहिए जिसमें हमारा अहं ना झलकता हो। इससे हमारा मन शांत रहेगा तथा सुनने वाले को भी सुख और शान्ति प्राप्त होगी।

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कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूंढै वन माँहि। �ऐसैं घटि-घटि राँम है, दुनियाँ देखै नाँहि।।

  • कुंडली - नाभि�मृग - हिरण�घटि घटि - कण कण

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भावार्थ

यहाँ कबीर ईश्वर की महत्ता को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि कस्तूरी हिरन की नाभि में होती है लेकिन इससे अनजान हिरन उसकी सुगंध के कारण उसे पूरे जंगल में ढूंढ़ता फिरता है ठीक उसी प्रकार ईश्वर भी प्रत्येक मनुष्य के हृदय में निवास करते हैं परन्तु मनुष्य इन्हें वहाँ नही देख पाता। वह ईश्वर को मंदिर-मस्जिद और तीर्थ स्थानों में ढूंढ़ता रहता है।

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कस्तूरी हिरण (MUSK DEER)

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मैं - अहम् ( अहंकार )�हरि - परमेश्वर�अँधियारा - अंधकार

भावार्थ

यहाँ कबीर कह रहे हैं कि जब तक मनुष्य के मन में अहंकार होता है तब तक उसे ईश्वर की प्राप्ति नही होती। जब उसके अंदर का अंहकार मिट जाता है तब ईश्वर की प्राप्ति होती है। ठीक उसी प्रकार जैसे दीपक के जलने पर उसके प्रकाश से आँधियारा मिट जाता है। यहाँ अहं का प्रयोग अन्धकार के लिए तथा दीपक का प्रयोग ईश्वर के लिए किया गया है।�

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  • सुखिया सब संसार है, खायै अरु सोवै।�दुखिया दास कबीर है, जागै अरु रोवै।।

  • सुखिया - सुखी�सोवै - सोये हुए�दुखिया - दुःखी�रोवै - रो रहे

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  • �भावार्थ - कबीरदास के अनुसार ये सारी दुनिया सुखी है क्योंकि ये केवल खाने और सोने का काम करती है। इसे किसी भी प्रकार की चिंता नहीं है। उनके अनुसार सबसे दुखी व्यक्ति वो है जो प्रभु के वियोग में जागते रहते हैं। उन्हें कहीं भी चैन नही मिलता, वे प्रभु को पाने की आशा में हमेशा चिंता में रहते हैं।

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  • बिरह भुवंगम तन बसै, मन्त्र ना लागै कोइ।�राम बियोगी ना जिवै, जिवै तो बौरा होइ।।

  • बिरह - बिछड़ने का गम�भुवंगम -भुजंग , सांप�बौरा - पागल

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  • भावार्थ - जब किसी मनुष्य के शरीर के अंदर अपने प्रिय से बिछड़ने का साँप बसता है तो उसपर कोई मन्त्र या दवा का असर नही होता ठीक उसी प्रकार राम यानी ईश्वर के वियोग में मनुष्य भी जीवित नही रहता। अगर जीवित रह भी जाता है तो उसकी स्थिति पागलों जैसी हो जाती है।

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  • निंदक नेडा राखिये, आँगणि कुटी बँधाइ।�बिन साबण पाँणी बिना, निरमल करै सुभाइ।।

  • निंदक - निंदा करने वाला�नेड़ा - निकट�आँगणि - आँगन�साबण - साबुन�निरमल - साफ़�सुभाइ - स्वभाव

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  • भावार्थ - संत कबीर कहते हैं की निंदा करने वाले व्यक्ति को सदा अपने पास रखना चाहिए, हो सके तो उसके लिए अपने पास रखने का प्रबंध करना चाहिए ताकि हमें उसके द्वारा अपनी त्रुटियों को सुन सकें और उसे दूर कर सकें। इससे हमारा स्वभाव साबुन और पानी की मदद के बिना निर्मल हो जाएगा।

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  • पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुवा, पंडित भया ना कोइ।�ऐकै अषिर पीव का, पढ़ै सु पंडित होई।।

पोथी - पुस्तक�मुवा - मरना�भया - बनना�अषिर - अक्षर�पीव - प्रिय

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  • भावार्थ - कबीर कहते हैं कि इस संसार में मोटी-मोटी पुस्तकें पढ़-पढ़ कर कई मनुष्य मर गए परन्तु कोई भी पंडित ना बन पाया। यदि किसी मनुष्य ने ईश्वर-भक्ति का एक अक्षर भी पढ़ लिया होता तो वह पंडित बन जाता यानी ईश्वर ही एकमात्र सत्य है, इसे जानने वाला ही ज्ञानी है।

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  • हम घर जाल्या आपणाँ, लिया मुराड़ा हाथि। 

अब घर जालौं तास का, जे चले हमारे साथि।।

जाल्या - जलाया�आपणाँ - अपना�मुराड़ा - जलती हुई लकड़ी , ज्ञान�जालौं - जलाऊं�तास का - उसका

 

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  • भावार्थ - कबीर कहते हैं कि उन्होंने अपने हाथों से अपना घर जला लिया है यानी उन्होंने मोह-माया रूपी घर को जलाकर ज्ञान प्राप्त कर लिया है। अब उनके हाथों में जलती हुई मशाल है यानी ज्ञान है। अब वो उसका घर जालयेंगे जो उनके साथ जाना चाहता है यानी उसे भी मोह-माया के बंधन से आजाद होना होगा जो ज्ञान प्राप्त करना चाहता है।

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साखियों का सार

  • इन साखियों में कबीर ईश्वर प्रेम के महत्त्व को प्रस्तुत कर रहे हैं। पहली साखी में कबीर मीठी भाषा का प्रयोग करने की सलाह देते हैं ताकि दूसरों को सुख और और अपने तन को शीतलता प्राप्त हो। दूसरी साखी में कबीर ईश्वर को मंदिरों और तीर्थों में ढूंढ़ने के बजाये अपने मन में ढूंढ़ने की सलाह देते हैं। तीसरी साखी में कबीर ने अहंकार और ईश्वर को एक दूसरे से विपरीत (उल्टा) बताया है। चौथी साखी में कबीर कहते हैं कि प्रभु को पाने की आशा उनको संसार के लोगो से अलग करती है। पांचवी साखी में कबीर कहते हैं कि ईश्वर के वियोग में कोई व्यक्ति जीवित नहीं रह सकता, अगर रहता भी है तो उसकी स्थिति पागलों जैसी हो जाती है। छठी साखी में कबीर निंदा करने वालों को हमारे स्वभाव परिवर्तन में मुख्य मानते हैं। सातवीं साखी में कबीर ईश्वर प्रेम के अक्षर को पढने वाले व्यक्ति को पंडित बताते हैं और अंतिम साखी में कबीर कहते हैं कि यदि ज्ञान प्राप्त करना है तो मोह - माया का त्याग करना पड़ेगा।

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प्रश्न अभ्यास �

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए −

  • 1. मीठी वाणी बोलने से औरों को सुख और अपने तन को शीतलता कैसे प्राप्त होती है?��उत्तर��मीठी वाणी बोलने से सुनने वाले के मन से क्रोध और घृणा के भाव नष्ट हो जाते हैं। इसके साथ ही हमारा अंतःकरण भी प्रसन्न जाता है। प्रभावस्वरूप औरों को सुख और अपने तन को शीतलता प्राप्त होती है।�

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  • 2. दीपक दिखाई देने पर अँधियारा कैसे मिट जाता है? साखी के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।��उत्तर��यहाँ दीपक का मतलब भक्तिरूपी ज्ञान तथा अन्धकार का मतलब अज्ञानता से है। जिस प्रकार दीपक के जलने  अन्धकार समाप्त हो जाता है ठीक उसी प्रकार जब ज्ञान का प्रकाश हृदय में जलता है तब मन के सारे विकार अर्थात भ्रम, संशय का नाश हो जाता है।�

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  • 3. ईश्वर कण-कण में व्याप्त है, पर हम उसे क्यों नहीं देख पाते?��उत्तर��हमारा मन अज्ञानता, अहंकार, विलासिताओं में डूबा है। हम उसे मंदिर, मस्जिदों में  ढूंढ़ते हैं जबकि वह सब ओर व्याप्त है। इस कारण हम ईश्वर को नहीं देख पाते हैं।

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  • 4. संसार में सुखी व्यक्ति कौन है और दुखी कौन? यहाँ 'सोना' और 'जागना' किसके प्रतीक हैं? इसका प्रयोग यहाँ क्यों किया गया है? स्पष्ट कीजिए।�उत्तर�कवि के अनुसार संसार में वो लोग सुखी हैं, जो संसार में व्याप्त सुख-सुविधाओं का भोग करते हैं और दुखी वे हैं, जिन्हें ज्ञान की प्राप्ति हो गई है। 'सोना' अज्ञानता का प्रतीक है और 'जागना' ज्ञान का प्रतीक है। जो लोग सांसारिक सुखों में खोए रहते हैं, जीवन के भौतिक सुखों में लिप्त रहते हैं वे सोए हुए हैं और जो सांसारिक सुखों को व्यर्थ समझते हैं, अपने को ईश्वर के प्रति समर्पित करते हैं वे ही जागते हैं। वे संसार की दुर्दशा को दूर करने के लिए चिंतित रहते हैं।�

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  • 5. अपने स्वभाव को निर्मल रखने के लिए कबीर ने क्या उपाय सुझाया है?�उत्तर��अपने स्वभाव को निर्मल रखने के लिए कबीर ने बताया है कि हमें अपने आसपास निंदक रखने चाहिए ताकि वे हमारी त्रुटियों को बता सके। निंदक हमारे सबसे अच्छे हितैषी होते हैं। उनके द्वारा बताई गई त्रुटियों को दूर करके हम अपने स्वभाव को निर्मल बना सकते हैं।�

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  • 6. 'ऐकै अषिर पीव का, पढ़ै सु पंडित होई' −इस पंक्ति द्वारा कवि क्या कहना चाहता है?��उत्तर��इन पंक्तियों द्वारा कवि ने प्रेम की महत्ता को बताया है। ईश्वर को पाने के लिए एक अक्षर प्रेम का अर्थात ईश्वर को पढ़ लेना ही पर्याप्त है। बड़े-बड़े पोथे या ग्रन्थ पढ़ कर कोई पंडित नहीं बन जाता। केवल परमात्मा का नाम स्मरण करने से ही सच्चा ज्ञानी बना जा सकता है।

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  • 7. कबीर की उद्धृत साखियों की भाषा की विशेषता स्पष्ट कीजिए।��उत्तर��कबीर ने अपनी साखियाँ सधुक्कड़ी भाषा में लिखी हैं। इनकी भाषा मिलीजुली है। इनकी साखियाँ संदेश देने वाली होती हैं। वे जैसा बोलते थे वैसा ही लिखा है। लोकभाषा का भी प्रयोग हुआ है;जैसे- खायै, नेग, मुवा, जाल्या, आँगणि आदि । भाषा में लयबद्धता, उपदेशात्मकता, प्रवाह, सहजता तथा सरलता है।�

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(ख) भाव स्पष्ट कीजिए -��1. बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ।��उत्तर 

  • इस पंक्ति का भाव है कि जिस व्यक्ति के हृदय में ईश्वर के प्रति प्रेम रुपी विरह का सर्प बस जाता है, उस पर कोई मंत्र असर नहीं करता है। अर्थात भगवान के विरह में कोई भी जीव सामान्य नहीं रहता है। उस पर किसी बात का कोई असर नहीं होता ।

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  • 2. कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढै बन माँहि।��उत्तर��इस पंक्ति में कबीर कहते हैं कि जिस प्रकार हिरण अपनी नाभि से आती सुगंध पर मोहित रहता है परन्तु वह यह नहीं जानता कि यह सुगंध उसकी नाभि में से आ रही है। वह उसे इधर-उधर ढूँढता रहता है। उसी प्रकार अज्ञानी भी वास्तविकता से अनजान रहता है। वह आनंदस्वरूप ईश्वर को प्राप्त करने के लिए विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में लिप्त रहता है। वह आत्मा में विद्यमान ईश्वर की सत्ता को पहचान नही पाता।�

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  • 3. जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहि।��उत्तर��इस पंक्ति द्वारा कबीर का कहना है कि जब तक मनुष्य में अज्ञान रुपी अंधकार छाया है वह ईश्वर को नहीं पा सकता। अर्थात अहंकार और ईश्वर का साथ-साथ रहना नामुमकिन है। जब ईश्वर की प्राप्ति हो जाती है तब अहंकार दूर हो जाता है।�

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  • 4. पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ।��उत्तर��कबीर के अनुसार बड़े ग्रंथ, शास्त्र पढ़ने भर से कोई ज्ञानी नहीं होता। अर्थात ईश्वर की प्राप्ति नहीं कर पाता। प्रेम से ईश्वर का स्मरण करने से ही उसे प्राप्त किया जा सकता है। प्रेम में बहुत शक्ति होती है।�

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आभार

धन्यवाद

जय कुमार वर्मा

टी. जी. टी. हिन्दी

ज. न. वि. नेल्लूरु