नवोदय विद्यालय समिति, नोएडा
पाठ 1- साखी �
� कवि परिचय
इनका जन्म 1398 में काशी में हुआ ऐसा माना जाता है। इनके गुरु रामानंद थे। ये क्रांतिदर्शी कवि थे जिनकी कविता से गहरी सामाजिक चेतना प्रकट होती है। इन्होने 120 वर्ष की लम्बी उम्र पायी। इन्होने अपने जीवन के कुछ अंतिम वर्ष मगहर में बिताये और वहीँ चिरनिंद्रा में लीन हो गए।
साखी
साखी
�ऐसी बाँणी बोलिये, मन का आपा खोइ।�अपना तन सीतल करै, औरन कौ सुख होइ।।
बाँणी - बोली�आपा - अहम् (अहंकार )�खोइ - त्याग करना�सीतल - शीतल ( ठंडा ,अच्छा )�औरन - दूसरों को�होइ -होना
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कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूंढै वन माँहि। �ऐसैं घटि-घटि राँम है, दुनियाँ देखै नाँहि।।�
भावार्थ
यहाँ कबीर ईश्वर की महत्ता को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि कस्तूरी हिरन की नाभि में होती है लेकिन इससे अनजान हिरन उसकी सुगंध के कारण उसे पूरे जंगल में ढूंढ़ता फिरता है ठीक उसी प्रकार ईश्वर भी प्रत्येक मनुष्य के हृदय में निवास करते हैं परन्तु मनुष्य इन्हें वहाँ नही देख पाता। वह ईश्वर को मंदिर-मस्जिद और तीर्थ स्थानों में ढूंढ़ता रहता है।
कस्तूरी हिरण (MUSK DEER)
मैं - अहम् ( अहंकार )�हरि - परमेश्वर�अँधियारा - अंधकार
भावार्थ
यहाँ कबीर कह रहे हैं कि जब तक मनुष्य के मन में अहंकार होता है तब तक उसे ईश्वर की प्राप्ति नही होती। जब उसके अंदर का अंहकार मिट जाता है तब ईश्वर की प्राप्ति होती है। ठीक उसी प्रकार जैसे दीपक के जलने पर उसके प्रकाश से आँधियारा मिट जाता है। यहाँ अहं का प्रयोग अन्धकार के लिए तथा दीपक का प्रयोग ईश्वर के लिए किया गया है।��
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पोथी - पुस्तक�मुवा - मरना�भया - बनना�अषिर - अक्षर�पीव - प्रिय
अब घर जालौं तास का, जे चले हमारे साथि।।
जाल्या - जलाया�आपणाँ - अपना�मुराड़ा - जलती हुई लकड़ी , ज्ञान�जालौं - जलाऊं�तास का - उसका
साखियों का सार
प्रश्न अभ्यास �
(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए −
(ख) भाव स्पष्ट कीजिए -��1. बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ।��उत्तर
आभार
धन्यवाद
जय कुमार वर्मा
टी. जी. टी. हिन्दी
ज. न. वि. नेल्लूरु