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BLESSINGS

ॐ ह्रीं अर्हम् नमः

श्रीसद्गुरुभ्यो नमः

ॐ ऐं नमः

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SHREE MATI GYANAY NAMAH

SHREE SHRUT GYANAY NAMAH

SHREE AVADHI GYANAY NAMAH

SHREE MANAH - PARYAV GYANAY NAMAH

SHREE KEVAL GYANAY NAMAH

5 GYAN

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Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 23

12 Tap

Inspired by:

Yugpradhan Acharyatulya P.P. Panyas Shree Chandrashekar Vijayji M.S.

P.P. Panyas Shree Yashobhushan Vijayji M.S.

P.P. Panyas Shree Manobhushan Vijayji M.S.

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Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 23

१२ तप

६ बाह्य, ६ अभ्यन्तर

१२ तप, ६ बाह्य भाग १

जिस प्रकार सोना अग्नि में तपकर कुन्दन (सुवर्ण) बन जाता हैं, मैला वस्त्र साबुन आदि लगाकर धोने से उज्जवल हो जाता है, उसी प्रकार 'तप' रूपी अग्नि में कर्मरूपी मैल जलने से आत्मा पवित्र तथा शुद्ध बन जाता है।

तप की सामान्य परिभाषा हैं - इन्द्रियों एवं मन को अपने वश में करने का प्रयत्न तप हैं। तप किये बिना आज तक किसी भी आत्मा ने मुक्ति प्राप्त नहीं की। सर्व ऋद्धि-सिद्धि का मूल 'तप' है।

मुख्य रूप में तप के दो भेद हैं - बाह्य तप और अभ्यन्तर तप। जिस तप साधना की असर, शरीर से अधिक प्रतीत होती हो, उसे बाह्य तप कहते हैं। बाह्य तप होने पर अभ्यन्तर तप की साधना सहज हो जाती है. इसलिए अभ्यंतर तप को सुदृढ बनाने के लिए बाह्य तप अत्यन्त आवश्यक है।

बाह्यतप - अणसण मूणोयरिया वित्तिसंखेवण रसच्चाओ। कायकिलेसो संलीणया य बज्झो तवो होईं। अनशन, ऊणोदरी, वृत्तिसंक्षेप, रस-परित्याग, कायक्लेश तथा संलीनता बाह्य तप के छह भेद हैं।

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१२ तप

६ बाह्य, ६ अभ्यन्तर

(१) अनशन - 'अशन' का अर्थ है खाद्य पदार्थ। आहार आदि खाद्य पदार्थों का त्याग करना 'अनशन तप' है। इसके मुख्य रूप में दो भेद हैं –

(क) इत्वरिक - कुछ थोडे काल के लिए अथवा किसी निश्चित समय के लिए आहार आदि का त्याग करना।

(ख) यावत्कथिक - जीवनपर्यंत के लिए आहार त्याग करना.

(क) इत्वरिक तप - इत्वरिक तप के अनेक भेद हैं। नवकारसी, पोरसी, एकाशन, आयम्बिल, उपवास आदि ओलीतप, सिद्धितप, २० स्थानक तप आदि सभी प्रकार के तप इत्वरिक तप में गिने जाते हैं।

(ख) यावत्कथिक तप - आगमों में इसके मुख्य दो भेद बतलाये हैं

(१) पादपोगमन तथा (२) भक्तप्रत्याख्यान।

अनशन

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१२ तप

६ बाह्य, ६ अभ्यन्तर

आहार आदि का जीवन पर्यन्त त्याग तो दोनों तप में होता हैं, परन्तु भक्तप्रत्याख्यान तप में चारों आहार का त्याग करके साधक जीवन-मरण में अनासक्त रहकर, आत्म-शुद्धि में प्रयत्नशील रहता हैं। पादपोगमन अनशन में साधक शरीर के प्रति भी निश्चेष्ट होकर, कटे वृक्ष की भाँति स्थिर होकर शुभध्यान मग्न रहता हैं।

अनशन

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१२ तप

६ बाह्य, ६ अभ्यन्तर

(२) ऊणोदरी तप - पेट की भूख से कम खाना ऊनोदरी तप हैं।

परन्तु 'द्रव्य ऊनोदरी', 'भाव ऊनोदरी' के भेदों से उपकरण, भोजन आदि द्रव्य तथा कषाय आदि वृत्तियों का संकोच करना यह सभी भाव ऊनोदरी तप है।

ऊनोदरी तप की साधना सरल भी हैं और जीवन के लिए बहुत ही उपयोगी, लाभप्रद है।

प्रत्येक प्रकार का साधक इसकी आराधना कर सकता हैं।

ऊणोदरी

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१२ तप

६ बाह्य, ६ अभ्यन्तर

(३) वृत्तिसंक्षेप तप - वृत्ति, इच्छा, संक्षेप कम करना, भिक्षाचरी में विविध नियमो का पालन करते हुए अभिग्रह धारण करना, दोषों से रहित शुद्ध भिक्षा ग्रहण करना इस तप का मुख्य रूप हैं।

वृत्तिसंक्षेप

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१२ तप

६ बाह्य, ६ अभ्यन्तर

(४) रस परित्याग तप - दूध, दही, घी, तेल, गुड और तली हुई वस्तु ये छह लघु विगय हैं, इनके सेवन में यथाशक्य संयम करना तथा मदिरा, मांस, मधु, मक्खन ये चार महाविगय हैं, इनका सर्वथा त्याग करना।

रस परित्याग

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१२ तप

६ बाह्य, ६ अभ्यन्तर

(५) कायक्लेश तप - काया अर्थात शरीर। शरीर को कष्ट देना या शारीरिक कष्ट सहन करना, पादविहार, केशलुंचन, शीत, ताप आदि परीषह सहना यह सभी कायक्लेश तप है।

ज्ञान व विवेकपूर्वक, आत्म-शुद्धि तथा इन्द्रिय विजय की भावना रखते हुए शारीरिक वेदना, उपसर्ग, परीषह आदि सहना, उनमें समभाव रखना, कायक्लेश तप है।

इस तप से काया पर विजय प्राप्त होती हैं।

कायक्लेश

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१२ तप

६ बाह्य, ६ अभ्यन्तर

(६) संलीनता तप - शरीर, इन्द्रिय, मन तथा कषाय आदि का संयम करना, शरीर आदि की चंचलता कम करना, शरीर इन्द्रिय आदि का संवरण करना संलीनता तप है।

संलीनता

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१२ तप

६ बाह्य, ६ अभ्यन्तर

६ अभ्यन्तर तप भाग – २

इसका अर्थ यह है कि जो बाहर में शरीर पर विशेष दिखाई नहीं दे, किन्तु आन्तरिक वृत्तियों का नियंत्रण करता है, वह अभ्यंतर तप है। इसके भी निम्नलिखित छह भैद हैं-

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१२ तप

६ बाह्य, ६ अभ्यन्तर

(१) प्रायश्चित तप :- पाप की शूद्धि कराने वाली क्रिया प्रायश्चित है।

भूल हो जाना सामान्य बात है, परन्तु उस भूल को भूल समझना और फिर उसको सुधारने के लिए भूल को स्वीकारना, मन में पश्चाताप करना तथा गुरूजनों के समक्ष जाकर उसकी शुद्धि करने का संकल्प करना, यह सामान्य बात नहीं, बहुत बड़ी बात है।

भूल अनेक प्रकार की होती हैं, कोई भूल बहुत ही सामान्य होती है, जबकि कोई-कोई भूल व्यक्ति के समूचे चारित्र को प्रभावित करने वाली होती है। इस दृष्टि से प्रायश्चित भी छोटा, बडा अनेक प्रकार का होता है।

शास्त्र में प्रायश्चित के १० भेद बताये हैं.

प्रायश्चित

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१२ तप

६ बाह्य, ६ अभ्यन्तर

प्रायश्चित तप का मुख्य प्रयोजन यह है कि दोष का सेवन करना एक प्रकार से धर्म की विराधना है, विराधक आत्मा दुर्गति में जाता हैं, दोष-शुद्धि कर लेने पर आराधक हो जाता हैं, वह सद्गति का अधिकारी बन जाता हैं।

प्रायश्चित

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१२ तप

६ बाह्य, ६ अभ्यन्तर

(२) विनय तप :- गुरूजनों को नमस्कार करना, बडों का आदर-सन्मान करना, जिनेश्वर प्रतिमा आदि के समक्ष नमन वन्दन करना, गुरुदेवों का - ज्ञानियों का बहुमान करना विनय तप हैं। 'विनय' मनुष्य को ऊँचा उठाता हैं।

विनय

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१२ तप

६ बाह्य, ६ अभ्यन्तर

(३) वैयावच्च तप - इसका अर्थ है सेवा। गुरू, तपस्वी, वृद्धजन, रोगी, असहाय तथा श्रमण-श्रमणियों की सेवा करना, उनको सुखसाता पहुँचाना तथा उनके संयमी जीवन की यात्रा में सहयोगी बनना।

वैयावच्च के १० प्रकार है, जैसे आचार्य, उपाध्याय, तपस्वी, वृद्ध, संघ आदि की सेवा करना। सेवा करने वाला उत्कृष्ट भाव आने पर तीर्थंकर नामकर्म भी बाँध लेता हैं।

वैयावच्च

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१२ तप

६ बाह्य, ६ अभ्यन्तर

(४) काउस्सग्ग (कायोत्सर्ग) तप - कायोत्सर्ग का सीधा अर्थ है- काया (शरीर) के प्रति ममत्व भाव का त्याग करना, अर्थात् शरीर की, मन की, वाणी की चंचलता का त्याग करके काया को स्थिर करना।

वाणी का संयम, मौन रखना, मन को एकाग्र करके जिनेश्वर देव की स्तुति, चिन्तन, तथा आत्मा और शरीर की भिन्नता का अनुभव करना, यह सब काउस्सग्ग के अन्तर्गत है। कायोत्सर्ग खड़े-खड़े करना चाहिए। इसके मुख्यतः दो भेद हैं

(१) द्रव्य व्युत्सर्ग - शरीर, उपधि, आहार आदि का ममत्व छोडनाः

(२) भाव व्युत्सर्ग - कषाय व मोह को शांत करना।

काउस्सग्ग

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१२ तप

६ बाह्य, ६ अभ्यन्तर

(५) ध्यान तप - ध्यान का अर्थ हैं एकाग्रचित होना।

किसी एक आलम्बन पर जैसे नाक की सीधी दंडी पर, ललाट पर, जिन प्रतिमा पर या किसी विशेष वस्तु पर दृष्टि को स्थिर करना, मन को केन्द्रित करना, ध्यान के चार भेद हैं, जैसे शुभ ध्यान के दो भेद हैं-

धर्म ध्यान और शुक्ल ध्यान। अशुभ ध्यान भी दो प्रकार का हैं- आर्त ध्यान, रौद्र ध्यान। अशुभध्यान से आत्मा का पतन होता है, शुभ ध्यान से आत्मा बहुत शीघ्र निर्मल और विशुद्ध बनता है। ईससे अनेक प्रकार के मानसिक तथा शारिरीक रोग भी अपने आप दूर होकर तन-मन की शुद्धि होती है।

ध्यान

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१२ तप

६ बाह्य, ६ अभ्यन्तर

(६) स्वाध्याय तप - स्वाध्याय बहुत बडा तप हैं। यह सभी तपों में सबसे सरल और सहज भी हैं। हर कोई इस तप का लाभ उठा सकता हैं।

ऐसा आध्यात्मिक साहित्य पढ़ना चाहिए, जिसके पढ़ने से आत्मज्ञान में वृद्धि हो, मन के भीतर भक्ति, दया, करूणा, उदारता, वैराग्य भावना, वीतरागता आदि सात्विक भावों का संचार हो। उत्तम श्रेष्ठ साहित्य को पढ़ना, नमस्कार मंत्र तथा भक्ति स्तोत्रों का पाठ करना, धर्मकथा करना, धार्मिक उपदेश व शिक्षा देना, श्रेष्ठ साहित्य का निर्माण करना यह सभी स्वाध्याय तप के अन्तर्गत हैं।

१२ भेदों में जिस भेद की आराधना की जा सके उसकी आराधना करने का प्रयत्न करना और आत्मा को निर्मल पवित्र बनाना यही 'तप' का लक्ष्य हैं।

स्वाध्याय

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