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BLESSINGS

ॐ ह्रीं अर्हम् नमः

श्रीसद्गुरुभ्यो नमः

ॐ ऐं नमः

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SHREE MATI GYANAY NAMAH

SHREE SHRUT GYANAY NAMAH

SHREE AVADHI GYANAY NAMAH

SHREE MANAH-PARYAV GYANAY NAMAH

SHREE KEVAL GYANAY NAMAH

5 GYAN

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Inspired by:

Yugpradhan Acharyatulya P.P. Panyas Shree Chandrashekhar Vijayji M.S.

P.P. Panyas Shree Yashobhushan Vijayji M.S.

P.P. Panyas Shree Manobhushan Vijayji M.S.

AADINATH BHAGWAN PART – 4

Learn & turn part – 2 story NO 32

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  1. एक बार भरत राजा से मिलने के लिए दो दूत आए, एक ने खबर दी कि प्रभु ऋषभदेव को केवलज्ञान प्राप्त हुआ है

और दूसरे ने कहा कि शस्त्रागार में एक प्रकाशित चक्र प्रकट हुआ है।

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२) अपने आत्मा का विशेष हित सोचकर भरत राजा,

दादी मरुदेवी और विशाल राज परिवार के साथ प्रभु ऋषभदेव को वंदना करने चले गए।

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३) पुत्र विरह में रोते रोते मरुदेवी माता को दिखना बंद हो गया था। जब जुलूस समवसरण के नजदीक पहुँचा,

तो भरत राजा ने ऋषभदेव की दिव्यता का वर्णन दादी मरुदेवी के पास किया।

यह सुनकर मरूदेवी माता की आंख में हर्ष के आँसु आये, माता अब सब कुछ देख सकती थी

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४) मन की पवित्रता, शुभ ध्यान और तीव्र एकाग्रता के कारण,

माता मरुदेवी ने केवलज्ञान प्राप्त किया और उसी समय मोक्ष में चली गईं।

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५) सर्वज्ञ प्रभु ऋषभदेव ने अपनी पहली देशना दी और चतुर्विध संघ (साधु, साध्वी, श्रावक, और श्राविका) की स्थापना की।

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६) प्रभु ऋषभदेव के केवल ज्ञान का महोत्सव मनाने के बाद,

भरत राजा अपने नगर के शस्त्रागार में गए और अत्यंत प्रकाशित चक्र की पूजा की।

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७) उस चक्र को साथ में लेकर भरत राजा एक विशाल सेना के साथ ६ खण्डों को जीतने निकल पड़े।

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८) वर्षों बाद, विजयी भरत राजा वापस अयोध्या लौटे।

प्रजाने विजय का महोत्सव मनाया, लेकिन चक्रने उनके शस्त्रागार में प्रवेश नहीं किया। क्योकि ९९ भाईयो को नहीं जीता था।

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९) देवों के कहने पर, भरत ने अपने ९९ भाइयों के पास दूत भेजे।

या तो उनकी बात मान ले (उनकी शरण स्वीकारें) या युद्ध के लिए तैयार रहे।

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१०) दूत की बात सुनकर बाहुबली को छोड़कर सभी ९८ भाइयों प्रभुजी के पास समाधान के लिए गए।

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