BLESSINGS
ॐ ह्रीं अर्हम् नमः
श्रीसद्गुरुभ्यो नमः
ॐ ऐं नमः
SHREE MATI GYANAY NAMAH
SHREE SHRUT GYANAY NAMAH
SHREE AVADHI GYANAY NAMAH
SHREE MANAH - PARYAV GYANAY NAMAH
SHREE KEVAL GYANAY NAMAH
5 GYAN
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 16
22 Abhakshya Part - 1
Inspired by:
Yugpradhan Acharyatulya P.P. Panyas Shree Chandrashekar Vijayji M.S.
P.P. Panyas Shree Yashobhushan Vijayji M.S.
P.P. Panyas Shree Manobhushan Vijayji M.S.
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 16
बाईस (२२) अभक्ष्य पार्ट - १
अभक्ष्य नं. १ से १३
बाईस (२२) अभक्ष्य पार्ट - १ अभक्ष्य नं. १ से १३
आहार का सम्बन्ध जितना शरीर के साथ है ठीक उतना ही मन एवम् जीवन के साथ भी है।
जैसा अन्न वैसा मन और जैसा मन वैसा ही जीवन। साथ ही जैसा जीवन वैसा ही मरण (मृत्यु)।
आहार शुद्धि से विचार शुद्धि और विचार शुद्धि से आचार शुद्धि आती है। दूषित अभक्ष्य आहार ग्रहण करने से मन और विचार दूषित होते हैं, साथ ही संयम की मर्यादा टूट जाती है, शरीर रोगग्रस्त हो जाता है।
मन विचारों का गुलाम और तामसी बन जाता है।
अतः भक्ष्य-अभक्ष्य आहार के गुण-दोषों का परिशीलन करना आवश्यक है।
अभक्ष्य आहार के दोष : कंदमूल आदि में अनंत जीवों का नाश होता है।
मक्खन, मदिरा, मांस, शहद और चलित रस आदि में अनगिनत त्रस जंतुओं का नाश होता है। मन विकारग्रस्त और तामसी बनता है।
शरीर रोग का केन्द्र स्थान बन जाता है। अशाता वेदनीय कर्मों का बंध होता है।
नरक गति, तिर्यंच गति, दुर्गतिमय आयुष्य का बंध होता हैं।
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बाईस (२२) अभक्ष्य पार्ट - १
अभक्ष्य नं. १ से १३
शुद्ध सात्विक भक्ष्य आहार: इसके भक्षण से जीव अनंत जीव एवम् त्रस जंतुओं के नाश से बाल-बाल बच जाता है।
शरीर निरोगी, सुन्दर और स्वस्थ बनता है। मन निर्मल... प्रसन्न... सात्विक बनता है। फलस्वरुप जीव कोमल एवम् दयालु बनता है। सद्विचार और सदाचार का विकास होता है। सद्गति सुलभ हो जाती है।
त्याग-तपादि संस्कारों का बीजारोपण होता है।
जीवन-मरण समाधिमय बन जाता है।
परिणामतः पुनः पुनः अधःपतन से आत्मा की सुरक्षा... बचाव के लिए बाईस अभक्ष्यों का परित्याग करना परमावश्यक है।
जीवन जीने के लिए मनुष्य को आहार की आवश्यक्ता रहती है।
शरीर टिकने का साधन आहार है।
लेकिन यही आहार जब आहार संज्ञा लालसा का रुप धारण कर लेता है तब वह आत्मा के लिए भारी नुकसान करता है।
इसलिए इस प्रकरण में हम आहार शुद्धि के बारे में विचार करेंगे।
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बाईस (२२) अभक्ष्य पार्ट - १
अभक्ष्य नं. १ से १३
आहार क्या ? आहार संज्ञा क्या? खाने जैसा क्या है? नहीं खाने जैसा क्या है? ये सारे विचार करना ही आहार शुद्धि कहलाती है।
शरीर के लिए उपयोगी और योग्य आहार की ही जरुरत है। उपयोगी आहार वह है जो शरीर को नुकसान न करें।
योग्य आहार वह है जो आत्मा और मन को नुकसान न करे।
आसक्ति एवं राग पूर्वक भक्ष्य-अभक्ष्य के विवेक बिना खाना आहार संज्ञा है।
अर्थात् खाने के लिए जीना आहार संज्ञा है।
आहार से शरीर स्वस्थ और अपने कार्य में समर्थ बनता है।
जबकि आहार संज्ञा से शरीर में रोग उत्पन्न होते हैं एवं मन में दोष उत्पन्न होते हैं। आहार संज्ञा के लोभ में जीव भक्ष्य (खाने योग्य) एवं अभक्ष्य (नहीं खाने योग्य) आहार का भी विचार नहीं करता तथा कर्मबंध कर नरक निगोद में दुःख भोगता है।
इस दुःख से मुक्त होने के लिए अभक्ष्य आहार को समझकर छोड़ना खूब जरुरी है।
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बाईस (२२) अभक्ष्य पार्ट - १
अभक्ष्य नं. १ से १३
(१ से ५) उर्दूबर-गूलर आदि फल: (१) वट वृक्ष (२) पीपल (३) पिलंखण (४) काला उर्दूबर और (५) गूलर इन पाँचों के फल अभक्ष्य हैं।
इन में अनगिनत बीज होते हैं।
असंख्य सूक्ष्म त्रस जीव भी होते हैं।
उन्हें खाने से न तृप्ति मिलती है, न शक्ति। और यदि इन फलों के सूक्ष्म जीव अगर मस्तिष्क में प्रवेश कर जाएँ तो मृत्यु भी हो सकती है।
इन जीव-जंतुओं के कारण रोगोत्पत्ति की तो शतप्रतिशत संभावना होती है। अतः इन पाँचों का त्याग करना चाहिए।
वट वृक्ष
पीपल
काला उर्दूबर
पिलंखण
गूलर
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अभक्ष्य नं. १ से १३
(६) शहद : कुत्ता, मक्खियाँ, भँवरे आदि की लार एवं वमन से शहद तैयार होता है।
मधु मक्खी फूलों से रस चूसकर उसका छत्ते में वमन करती है।
छत्ते के नीचे धुंआ कर के वहाँ से मधुमक्ख्यिों को उडाया जाता है।
तत्पश्चात् इस छत्ते को निचोड़कर शहद निकाला जाता है।
निचोड़ने की इस क्रिया में कई अशक्त मधुमक्खियाँ एवं उनके अंडे नष्ट हो जाते हैं और सभी की अशुचि शहद में मिल जाती है।
शहद
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बाईस (२२) अभक्ष्य पार्ट - १
अभक्ष्य नं. १ से १३
तथा उस में अनेक प्रकार के जीवों की भी उत्पत्ति होती है।
इस तरह शहद अनेक जीवों की हिंसा का कारण होने से खाने में उसका त्याग करना ही श्रेयस्कर है।
दवाई के प्रयोग में घी, दूध, शक्कर, मुरब्बा आदि से काम चल सकता है, अतः शहद का उपयोग दवा लेने तक में भी न करना हितावह है।
शहद
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अभक्ष्य नं. १ से १३
(७) शराब (मदिरा): मदिरा, बीयर, सुरा, ब्रांडी, भांग, वाईन आदि के नाम से पहचानी जाती है। शराब बनाने के लिए गुड़, अंगूर, महुडा आदि को सड़ाया जाता है।
उबाला जाता है।
इस तरह उस में उत्पन्न अनगिनत त्रस जीवों कीहिंसा होती है।
तथा शराब तैयार होने के बाद भी उसमें अनेक त्रस जीव उत्पन्न होते हैं और उसी में मरते हैं। शराब पीने के बाद मनुष्य अपनी सुध-बुध भी खो बैठता है।
धन की हानि होती है और काम क्रोध की वृद्धि होती है।
पागलपन प्रगट होता है। आरोग्य का विनाश होता है।
और अविचार, अनाचार, व्यभिचार का प्रादुर्भाव होता है। आयुष्य को धक्का लगता है।
विवेक, संयम, ज्ञानादि गुणों का नाश होता है। फलतः जीवन बरबाद होता है।
अतः उसका त्याग करना ही श्रेयस्कर है।
शराब
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बाईस (२२) अभक्ष्य पार्ट - १
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(८) मांस : यह पंचेन्द्रिय जीवों की हिंसा से प्राप्त होता है।
मांस में अनंतकाय के जीव, त्रस जीव एवं समुच्छिम जीवों की उत्पत्ति होती है।
इसके भक्षण से मनुष्य की प्रकृति तामसी बनती है और वह क्रूर बनता है।
केन्सर आदि भयंकर रोग भी होने की संभावना रहती है।
कोमलता एवं करुणा का नाश होता है।
मांस
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बाईस (२२) अभक्ष्य पार्ट - १
अभक्ष्य नं. १ से १३
पंचेन्द्रिय जीवों के वध से नरक गति का आयुष्य बंध होता है, मांस खाने के त्याग की तरह अंडे खाने का भी त्याग करना चाहिए, क्योंकि अंडे में पंचेन्द्रिय जीवों का गर्भ रस रुप में रहता है, अतः उसके खाने से भी मांस जितना दोष लगता है।
अंडे में कोलेस्टरोल से हृदय की बीमारी होती है, किडनी के रोग होते हैं, कफ बढ़ता है तथा टी. बी. संग्रहणी आदि रोगों का शिकार बनकर जीवनभर भुगतना पड़ता है।
और यह तर्क शुद्ध है कि अंडा निर्जीव नहीं होता, तथा वनस्पति जन्य भी नहीं होता। वह मुर्गी के गर्भ में रक्त व वीर्यरस से बढ़ता है।
अतः वह शाकाहार नहीं है।
अतः मांस भक्षण में अत्यंत जीवहिंसा जानकर उसका त्याग करना हितावह है।
आजकल जो वेजिटेरियन अंडे के नाम से जो झूठे विज्ञापन (Advt.) देते है वह भी मांसभक्षण ही है।
क्योंकि उसमें भी पंचेंद्रिय जीव जन्म ले चुका है।
अगर चु. अंडे है तो मशीन से क्यों नही बना सकते या सब्जी की तरह खेतों में क्यों नहीं उगा सकते ? मुर्गी ही क्यों अंडे देती है।
जरा सोचकर सावधान हो जाइए।
अंडे
मछली
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बाईस (२२) अभक्ष्य पार्ट - १
अभक्ष्य नं. १ से १३
मक्खन
(९) मक्खन : (बटर-पोलशन) मक्खन को छाछ में से बाहर निकालने के बाद उस में उसी रंग के त्रस जीव उत्पन्न हो जाते हैं।
मक्खन खाने से जीव विकार वासना से उत्तेजित होता है।
चारित्र की हानि होती है।
बासी मक्खन में हर पल जीवों की उत्पत्ति होती रहती है।
इसे खाने से अनेक बीमारियाँ भी हो जाती है।
अतः मक्खन खाने का त्याग करना ही श्रेयस्कर है। इस तरह शहद, मदिरा, मांस और मक्खन ये चारों महा विगई विकार भावों की वर्धक और आत्म गुणों की घातक है।
अतः इनका हमेशा के लिए त्याग करना ही चाहिए।
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बाईस (२२) अभक्ष्य पार्ट - १
अभक्ष्य नं. १ से १३
(१०) बर्फ (हिम) : छाने अनछाने पानी को जमाकर या फ्रीज में रखकर बर्फ बनाया जाता है।
जिस के कण-कण में असंख्य जीव हैं। बर्फ जीवन निर्वाह के लिए भी आवश्यक नहीं है।
अतः बर्फ से बननेवाले शर्बत, आइसक्रीम, आइसफुट आदि सभी पदार्थ अभक्ष्य हैं।
इसके भक्षण से मंदाग्नि, अजीर्ण आदि रोगों की उत्पत्ति होती है।
फ्रीज के पेय पदार्थ भी हानिकारक होते हैं। अतः इनका त्याग भी उपयोगी होता है।
बर्फ
बर्फ़ गोला
आइसक्रीम
कोल्ड ड्रिंक
फ्रीज
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अभक्ष्य नं. १ से १३
(११) जहर (विषय) : जहर खनिज, प्राणीज, वनस्पतिज और मिश्र, ऐसे चार-प्रकार का होता है। संखिया, बच्छनाग, तालपुट, अफीम, हरताल, धतुरा आदि सभी विषयुक्त रसायन हैं जिन्हें खाने से मनुष्य की तत्काल मृत्यु भी हो सकती है।
भ्रम, दाह, कंठशोष इत्यादि रोगों को उत्पन्न करते हैं। बीड़ी, तम्बाकू, गांजा, चरस, सिगरेट आदि में जो विष है, वह मनुष्य के शरीर में प्रवेश करके अल्सर, केन्सर, टी. बी. रोगों को उत्पन्न करता है।
जहर
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बाईस (२२) अभक्ष्य पार्ट - १
अभक्ष्य नं. १ से १३
(१२) ओला : ओले में कोमल और कच्चा जमा हुआ पानी है, जो वर्षाऋतु में गिरता है।
उस के खाने का कोई प्रयोजन नहीं है।
बर्फ में जितने दोष हैं, उतने ही इस में भी होते हैं, ऐसा जानकर उसका त्याग करना चाहिए।
ओला
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बाईस (२२) अभक्ष्य पार्ट - १
अभक्ष्य नं. १ से १३
(१३) मिट्टी : मिट्टी के कण कण में असंख्य पृथ्वीकाय के जीव होते हैं।
इस के भक्षण से पथरी, पांडुरोग, सेप्टिक, पेचिस जैसी भयंकर बिमारियाँ होती है।
किसी मिट्टी में मेंढक उत्पन्न करने की शक्यता होती है।
अतः उस से पेट में मेंढक उत्पन्न हो जाएँ तो मरणान्त वेदना सहन करनी पड़ती है।
मिट्टी