BLESSINGS
ॐ ह्रीं अर्हम् नमः
श्रीसद्गुरुभ्यो नमः
ॐ ऐं नमः
SHREE MATI GYANAY NAMAH
SHREE SHRUT GYANAY NAMAH
SHREE AVADHI GYANAY NAMAH
SHREE MANAH-PARYAV GYANAY NAMAH
SHREE KEVAL GYANAY NAMAH
5 GYAN
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 1
NAMASKAR MAHAMANTRA - NAVKAR
Inspired by:
Yugpradhan Acharyatulya P.P. Panyas Shree Chandrashekar Vijayji M.S.
P.P. Panyas Shree Yashobhushan Vijayji M.S.
P.P. Panyas Shree Manobhushan Vijayji M.S.
Learn & Turn Jainism Part -2 Lesson No. 1
NAMASKAR MAHAMANTRA - NAVKAR
प्रस्तावना
प्रश्न होता है कि एक पूरी माला में १०८ मनके कर्यों होते है?
इस प्रश्न के उत्तर में आचार्यों ने है कि
पंच परमेष्ठी के १०८ गुण होते है।
जैसे,
अरिहंत भगवान के १२, सिद्ध भगवान के ८, आचार्य भगवंत के ३६, उपाध्याय महाराज के २५ तथा साधु महाराज के २७ गुण।
इसलिए एक पूरी माला में १०८ मनकों का विधान मंत्रशास्त्र में किया गया है।
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अरिहंत भगवान के १२ गुण
अष्ट महाप्रातिहार्य, जैसे (A)
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अष्ट महाप्रातिहार्य, जैसे (B)
५. सिंहासन: भगवान के बैठने के लिए देवगण रत्नजडित सुवर्ण सिंहासन की रचना करते हैं।
६. भामंडल: भगवान के मस्तक के पीछे सूर्य किरणों के समान तेजस्वी भामंडल रहता है।
७. दुंदुभि: समवसरण के आसपास देवगण आकाश में दुंदुभि बजाकर लोगों को सूचना देते हैं।
८. तीन छत्र: भगवान के मस्तक पर चन्द्र समान उज्ज्वल मोतियों की झालर वाले स्वर्णमय तीन छत्रों की रचना देवगण करते हैं। ये आठ प्रातिहार्य हर समय प्रभु के साथ ही रहते हैं।
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१. ज्ञानातिशय: प्रभु केवल ज्ञान द्वारा हाथ की रेखाओं की तरह सम्पूर्ण लोक को देखते हैं।
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२. पूजातिशय: इन्द्र, देव, चक्रवर्ती, वासुदेव, बलदेव, मनुष्य आदि सभी प्रभु की पूजा करते हैं।
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३. वचनातिशय: प्रभु की वाणी ३५ गुणों युक्त होती है।
देव, मनुष्य, तिर्यंच सब अपनी-अपनी भाषा में उसको समझते हैं।
यह वाणी एक योजन प्रमाण क्षेत्र तक एक समान सुनाई देती है।
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४. अपायापगम अतिशय: भगवान जहाँ विचरते हैं उनके चारों तरफ २५-२५ योजन तक तथा साढ़े बारह योजन नीचे तथा उपर यों एक सो पच्चीस योजन तक स्वचक्र-परचक्र का भय, रोग, वैर, मारी, अतिवृष्टि, अनावृष्टि आदि नही होते।
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सिद्ध भगवान के ८ गुण प्रकट होते हैं- आठ कर्मों का सम्पूर्ण क्षय हो जाने से
१. अनन्त ज्ञान,
२. अनन्त दर्शन,
३. अनन्त चारित्र (वीतरागता)। ये तीनों गुण ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय तथा मोहनीय कर्म के क्षय से प्रगट होते हैं। ४. अनन्त वीर्य (स्वाभाविक अनन्त आत्मशक्ति),
५. अब्याबाध अनन्त आत्मिक सुख (वेदनीय कर्म के क्षय से),
६. अक्षर अजर-अमर स्थिति (आयुष्य कर्म के क्षय से),
७. अरूपी अवस्था नाम कर्म क्षय होने से सिद्ध भगवान वर्ण, गंध, रस, स्पर्श, रूप रहित होते हैं।
८. अगुरू-लघुता- गोत्र कर्म के क्षय से हलका-भारीपन, ऊँचा-नीचापन रहित अवस्था।
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आचार्यो के ३६ गुण - पाँच इन्द्रियों का संयम, नव गुप्ति से युक्त ब्रह्मचर्य का पालन व चार कषायों का नाश, पाँच आचार का शुद्ध पालन।
५ महाव्रतों का पालन, ५ समिति, ३ गुप्ति को धारण करना।
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उपाध्याय के २५ गुण - ११ अंग तथा १४ पूर्वो का अध्ययन स्वयं करते हैं तथा दूसरों को करवाते हैं।
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साधुजी के २७ गुण - ५ महाव्रत, छठा रात्रि भोजन त्याग, छह काया के जीवों की रक्षा, पाँच इन्द्रियों को जीतना, मन, वचन, काय के तीन योगों का संयम, क्षमाशीलता, लाभत्याग, भावों की निर्मलता, पडिलेहणा आदि में उपयोग रखना, संयम योग में युक्तता परीषह, उपसर्ग को सहन करना।
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