सरोजस्मृति एवं राम की शक्तिपूजा – सूर्यकांत त्रिपाठी निराला
पवन कुमारी
असिस्टेंट प्रोफेसर
हिन्दी विभाग
हंसराज महिला महाविद्यालय
जालंधर
सरोजस्मृति
“जीवन द्रष्टा अनेक हुए हैं जीवन से निराश होकर मृत्यु का आमंत्रण करने वालों की भी कमी नहीं। जो मृत्यु का सामना करके मृत्यु का वरण करते हैं, उन विरले साधकों में थे निराला।”
‘दुःख ही जीवन कथा रही, क्या कहूँ आज जो नहीं कही।’
इन पंक्तियों में कवि की वेदना व जीवन संघर्ष साफ झलकता है।��
राम की शक्तिपूजा, सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा रचित काव्य है। निराला जी ने इसका सृजन 23 अक्टूबर 1936 को सम्पूर्ण किया था। कहा जाता है कि इलाहाबाद(प्रयागराज) से प्रकाशित दैनिक समाचारपत्र 'भारत' में पहली बार 26 अक्टूबर 1936 को उसका प्रकाशन हुआ था। इसका मूल निराला के कविता संग्रह 'अनामिका' के प्रथम संस्करण में छपा।
इस कविता का कथानक प्राचीन काल से सर्वविख्यात रामकथा के एक अंश से है। इस कविता पर वाल्मीकि रामायण और तुलसी के रामचरितमानस से कहीं अधिक बांग्ला के कृतिवास रामायण का प्रभाव देखा जाता है।
एक ओर जहां कृतिवास में कथा पौराणिकता से युक्त होकर अर्थ की भूमि पर सपाटता रखती है तो वही दूसरी ओर राम की शक्तिपूजा में कथा आधुनिकता से युक्त होकर अर्थ की कई भूमियों को स्पर्श करती है। इसके साथ साथ कवि निराला ने इसमें युगीन-चेतना व आत्मसंघर्ष का मनोवैज्ञानिक धरातल पर बड़ा ही प्रभावशाली चित्र प्रस्तुत किया है।
होगी जय, होगी जय, हे पुरूषोत्तम नवीन।”�कह महाशक्ति राम के वदन में हुई लीन।
सार्वभौमिकता का तत्व�
धन्यवाद