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सरोजस्मृति एवं राम की शक्तिपूजा – सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

पवन कुमारी

असिस्टेंट प्रोफेसर

हिन्दी विभाग

हंसराज महिला महाविद्यालय

जालंधर

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सरोजस्मृति

  • सरोज स्मृति 1935 ई. में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला द्वारा लिखी लंबी कविता और एक शोकगीत है। निराला ने यह शोकगीत 1935 में अपनी 18 वर्षीया पुत्री सरोज के निधन के उपरांत लिखा था। इसका प्रथम प्रकाशन 1938 या 1939 में प्रकाशित "द्वितीय अनामिका" के प्रथम संस्करण में हुआ था।

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  • इस कविता में उन्होंने अपने शोक के साथ-साथ समाज के प्रति आक्रोश और व्यंग्य प्रकट किया है। इसकी तुलना रामविलास शर्मा ने विलियम शेक्सपीयर के किंग लियर से करते हुए लिखा है कि हिंदी में ही नहीं अंग्रेजी में भी ऐसे शोकगीत दुर्लभ है। यह कविता हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ शोकगीतों में से एक मानी जाती है। निराला ने इस कविता के विषय की गंभीरता के बावजूद इसके लेखन में हलके-फुल्के शब्दों का प्रयोग किया है।

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  • सरोज-स्मृति'। पुत्री सरोज के असामयिक निधन पर लिखी गई यह कविता एक ओर कवि का व्यक्तिगत जीवन और यथार्थ के चित्र अंकित करती है तो दूसरी ओर अपने युग की त्रासदी की गाथा प्रस्तुत करती है। कवि जीवन के कठोर अनुभव हैं तो प्रिया एवं पुत्री की स्मृतियों के चित्र भी चित्रित हैं। यहाँ एक मध्यवर्गीय निर्धन पिता के अंतर्मन की समूची वेदना अभिव्यक्त हुई है।अर्थ ही अनर्थ का मूल था। पूँजी का प्रभाव धीरे-धीरे बढ़ रहा था। पर निराला ने उससे अपने आपको अछूता रखा। फलतः वे स्वार्थ-समर में निरंतर पराजित हुए।

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  • राम विलास शर्मा के शब्दों में-

“जीवन द्रष्टा अनेक हुए हैं जीवन से निराश होकर मृत्यु का आमंत्रण करने वालों की भी कमी नहीं। जो मृत्यु का सामना करके मृत्यु का वरण करते हैं, उन विरले साधकों में थे निराला।”

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  • सरोज स्मृति’ कविता में कवि ने अपनी प्रिय पुत्री सरोज के बाल्यकाल से लेकर मृत्यु तक की घटनाओं को बङे प्रभावशाली ढंग से अंकित किया है। इसमें कवि ने सरोज की बाल्यावस्था, एवं तरुणाई के बङे ही मार्मिक और पवित्र चित्र अंकित किए हैं।
  • इस कविता में एक भाग्यहीन पिता का संघर्ष, समाज से उसके संबंध, पुत्री के प्रति बहुत कुछ न कर पाने की अकर्मण्यता का बोध प्रकट हुआ है। कविता के माध्यम से निराला का जीवन-संघर्ष प्रकट हुआ है।

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  • सरोज स्मृति कविता पुत्री सरोज के आसमयिक मृत्यु पर लिखी गई है। कवि कविता में यथार्थ जीवन को चित्रित करते हैं। कवि जीवन के दु:खों के साथ-साथ ही सरोज की स्मृतियों का चित्रण करते हैं।
  • सरोज-स्मृति में मुख्यतः तीन स्वर मुखरित हुए हैं। पहला कवि का विद्रोही और क्रांतिदशा, दूसरा पुत्री सरोज के प्रति पिता का वात्सल्य भाव और तीसरा जीवन में संघर्ष, अपमान तथा वंचना के फलस्वरूप व्यथा एवं निराशा की सघनता।

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  • वे कहते हैं- 

‘दुःख ही जीवन कथा रही, क्या कहूँ आज जो नहीं कही।’

इन पंक्तियों में कवि की वेदना व जीवन संघर्ष साफ झलकता है।��

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  • सरोज स्मृति’ हिंदी में अपने ढंग का एकमात्र शोक काव्य है। कवि निराला द्वारा अपनी पुत्री की मृत्यु पर लिखी इस कविता में करुणा भाव की प्रधानता है। विराग भाव के बीच नीति, शृंगार और कभी-कभी व्यंग्य और हास्यमूलक प्रसंगों को पिरोना इसकी अनोखी विशिष्टता है। यह अपने ढंग की अकेली कविता है जिसमें निराला का अपना जीवन भी आ गया है।

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  • ’सरोज स्मृति’ कवि ने अपनी प्रिय पुत्री सरोज के बाल्यकाल से लेकर मृत्यु तक की घटनाओं को बङे प्रभावशाली ढंग से अंकित किया है। इसमें कवि ने सरोज की बाल्यावस्था, एवं तरुणाई के बङे ही मार्मिक और पवित्र चित्र अंकित किए हैं। इस कविता में एक भाग्यहीन पिता का संघर्ष, समाज से उसके संबंध, पुत्री के प्रति बहुत कुछ न कर पाने का अकर्मण्यता बोध भी प्रकट हुआ है। इस कविता के माध्यम से निराला का जीवन-संघर्ष भी प्रकट हुआ है।

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  • विशेष: –�⇒ कविता के माध्यम से निराला का जीवन संघर्ष प्रस्तुत हुआ है।�⇒ ’’दुख ही जीवन की कथा रही,�क्या कहूँ आज, जो नहीं कही।’’�पंक्तियों में कवि की वेदना साफ झलकती है।

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  • सबसे बड़ी बात, शायद भारतीय भाषाओं के किसी भी साहित्य में किसी पिता ने अपनी पुत्री के सौंदर्य की तुलना अपनी पत्नी के सौंदर्य से नहीं की थी. ना कालिदास ने, ना व्यास ने, ना वाल्मीकि ने,  ना भवभूति ने। यह काम शायद निराला को ही करना था।
  • भाषा-खड़ी बोली हिंदी संस्कृतनिष्ठ शब्दावली का प्रयोग हुआ है।
  • मुक्त छंद तुकांत रचना है और माधुर्य-प्रसाद गुणों का मेल।
  • सुंदर अलंकरों का प्रयोग हुआ है। यथा- अलंकार-अनुप्रास – नत नयनों, मूर्ति-धीति ; पुनरूक्ति प्रकाश – अंग-अंग, थर-थर-थर
  • सजीव एवं मनोहारी वर्णन।

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  • भाषा-खड़ी बोली हिंदी का प्रयोग हुआ है।
  • संस्कृतनिष्ठ शब्दावली प्रयुक्त हुई है।
  • सामासिक पदों का सुंदर प्रयोग-
  • छायावादी, तुकांत मुक्त छंद।
  • माधुर्य और प्रसाद गुण।
  • अलंकार-अनुप्रास – नत नयनों, मूर्ति-धीति
  • अलंकार-पुनरूक्ति प्रकाश – अंग-अंग, थर-थर-थर
  • सबसे बड़ी बात, शायद भारतीय भाषाओं के किसी भी साहित्य में किसी पिता ने अपनी पुत्री के सौंदर्य की तुलना अपनी पत्नी के सौंदर्य से नहीं की थी. ना कालिदास ने, ना व्यास ने, ना वाल्मीकि ने,  ना भवभूति ने। यह काम शायद निराला को ही करना था।

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राम की शक्तिपूजा, सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा रचित काव्य है। निराला जी ने इसका सृजन 23 अक्टूबर 1936 को सम्पूर्ण किया था। कहा जाता है कि इलाहाबाद(प्रयागराज) से प्रकाशित दैनिक समाचारपत्र 'भारत' में पहली बार 26 अक्टूबर 1936 को उसका प्रकाशन हुआ था। इसका मूल निराला के कविता संग्रह 'अनामिका' के प्रथम संस्करण में छपा।

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  • यह कविता 312 पंक्तियों की एक ऐसी लम्बी कविता है, जिसमें निराला जी के स्वरचित छंद 'शक्ति पूजा' का प्रयोग किया गया है। चूँकि यह एक कथात्मक कविता है, इसलिए संश्लिष्ट होने के बावजूद इसकी सरचना अपेक्षाकृत सरल है

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इस कविता का कथानक प्राचीन काल से सर्वविख्यात रामकथा के एक अंश से है। इस कविता पर वाल्मीकि रामायण और तुलसी के रामचरितमानस से कहीं अधिक बांग्ला के कृतिवास रामायण का प्रभाव देखा जाता है।

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एक ओर जहां कृतिवास में कथा पौराणिकता से युक्त होकर अर्थ की भूमि पर सपाटता रखती है तो वही दूसरी ओर राम की शक्तिपूजा में कथा आधुनिकता से युक्त होकर अर्थ की कई भूमियों को स्पर्श करती है। इसके साथ साथ कवि निराला ने इसमें युगीन-चेतना व आत्मसंघर्ष का मनोवैज्ञानिक धरातल पर बड़ा ही प्रभावशाली चित्र प्रस्तुत किया है।

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  • यह कविता कथात्मक ढंग से शुरू होती है और इसमें घटनाओं का विन्यास इस ढंग से किया गया है कि वे बहुत कुछ नाटकीय हो गई हैं। इस कविता का वर्णन इतना सजीव है कि लगता है आँखों के सामने कोई त्रासदी प्रस्तुत की जा रही है।

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  • इस कविता का मुख्य विषय सीता की मुक्ति है राम-रावण का युद्ध नहीं। इसलिए निराला युद्ध का वर्णन समाप्त कर यथाशीघ्र सीता की मुक्ति की समस्या पर आ जाते हैं।

होगी जय, होगी जय, हे पुरूषोत्तम नवीन।”�कह महाशक्ति राम के वदन में हुई लीन।

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  • राम की शक्ति पूजा में भी उतने ही अनुच्छेद हैं जितने सरोज स्मृति में। इन अनुच्छेदों की कुल संख्या 11 है और ये प्रसंग के अनुकूल ही आकार में छोटे-बङे है। यह कविता 312 पंक्तियों की एक ऐसी लम्बी कविता है जिसमें शक्ति पूजा नामक छंद का प्रयोग है यह छंद निराला जी का अपना मौलिक छंद है।

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  • यह कविता चूँकि एक कथात्मक कविता है इसलिए संश्लिष्ट होने के बावजूद भी इसकी संरचना अपेक्षाकृत सरल है।

  • इस कविता का कथानक प्राचीन काल से सर्वविख्यात रामकथा के एक अंश से है।

 

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  • कृतिवास और राम की शक्ति पूजा में पर्याप्त भेद है पहला तो यह की एक ओर जहां कृतिवास में कथा पौराणिकता से युक्त होकर अर्थ की भूमि पर सपाटता रखती है तो वही दूसरी ओर राम की शक्ति पूजा नामक कविता में कथा आधुनिकता से युक्त होकर अर्थ की कई भूमियों को स्पर्श करती है। इसके साथ साथ कवि निराला ने इसमें युगीन-चेतना व आत्मसंघर्ष का मनोवैज्ञानिक धरातल पर बङा ही प्रभावशाली चित्र प्रस्तुत किया है।

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  • निराला यदि कविता के कथानक की प्रकृति को आधुनिक परिवेश और अपने नवीन दृष्टिकोण के अनुसार नहीं बदलते तो यह केवल अनुकरण मात्र रह जाती। लेकिन उन्होंने अपनी मौलिकता का प्रमाण देने के लिए ही इस रामकथा के अंश में कई मौलिक प्रयोग किये जिससे यह रचना कालजयी सिद्ध हुई।

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  • प्रतिकार्थ में शक्तिपूजा नैतिक शक्ति की सिद्धि का काव्य है। इस कविता का रचनाकाल पराधीन भारत का वह गाँधीवादी युग था जिसमें आततायी अंग्रेजी शासन के विरूद्ध नैतिक शक्ति का संबल लेकर भारतीय जनता अहिन्सात्मक संघर्ष कर रही थी।�

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  • निराला के सामने यह समस्या थी कि राम-रावण का युद्ध वर्णन करना है और उसके समानान्तर राम के भीतर चल रही है। लङाई वर्णन करना है, भीतर की लङाई यह है कि युद्ध लङा जाए या न लङा जाए। यदि लङा जाए तो कैसे ? लङने का साधन क्या हो। जीतेंगे इसमें भी संशय था, संकल्प की लङाई राम के भीतर चल रही है। राम द्वन्द्वातीत राम न होकर द्वन्द्व में फंसे राम हैं। राम-राम का द्वन्द्व राम-रावण के द्वन्द्व से महत्त्वपूर्ण हो गया है। निराला के राम आधुनिक मानव हैं जो न्याय के पक्षधर होते हुए भी टूटते हैं। संशय करते हैं यहाँ तक कि अपनी नियति को कोसते हैं-

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  • निराला की सर्जनात्मकता प्रतिभा में ढ़लकर वाल्मीकि और तुलसी के राम आधुनिक स्वाधीनता संग्राम के संवेदनशील मानव के रूप में मूर्तिमान हो उठे। उनकी ’जानकी’ मात्र ’प्रिया’ नहीं स्वाधीनता की देवी हैं, जिसकी मुक्ति के लिए वे व्याकुल हैं। एक निर्बल देश को सबसे अधिक ताकत की आवश्यकता थी, शक्ति अर्जित करने की आवश्यकता थी।

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  • शक्ति की उपासना, उपासना मात्र न रह सकी। अंदर की शक्ति को जागृत करने की आवश्यकता रह गयी है। निराला के मन में शक्ति की अवधारणा थी। शक्ति की कल्पना मुक्त होने और कराने के लिए जा रही थी। निराला मानव मुक्ति की कविता लिख रहे थे। जाम्बवान से परामर्श दिलाना भी कविता को नितान्त लौकिक धरातल पर लाना है। निराला रूपक के माध्यम से स्वाधीनता का एक चित्र प्रस्तुत करते हैं। रूपक की वास्तविकता और अप्रस्तुत की प्रतिध्वनि दोनों को निराला ने कलात्मक कौशल से साधा है।

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  • युद्ध का वर्णन अधिक न होकर संकेत भर है। भीतर का वर्णन अधिक है। प्रसाद भी प्रलय वर्णन को छोङ देते है। संकल्प और विकल्प की जो लङाई राम के भीतर चल रही थी उसके परिहार के लिए निराला साधना की जरूरत समझते हैं। निराला का लक्ष्य यह था कि उस बिन्दु को प्राप्त किया जाए जहाँ संकल्प बिन्दु को प्राप्त किया जा सके। इसी बिन्दु पर आकर कविता समाप्त हो जाती है। विजय वर्णन में निराला की कोई रूचि नहीं है, उस संघर्ष को उभारकर रखना उनका उद्देश्य था जो उस समय भारतीय मानस की लङाई थी।

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  • उस समय भारतीय जन-मानस की मूल समस्या थी। निराला दरअसल विजय का स्वाद जानते ही नहीं थे। इनका सारा का सारा काव्य संघर्ष का काव्य है।�प्रेरणा के रूप में तुलसीदास सर्वत्र विद्यमान है। यह कविता विलक्षण ढंग से ठेठ हिन्दी कविता है। अपनी छोटी-छोटी पंक्तियाँ में स्पंदन होने वाली कविता है। छंदो में रची गई है।

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सार्वभौमिकता का तत्व�

  • राम की शक्तिपूजा’ में देश, काल और अपने समाज का संदर्भ तो है ही, उसमें एक सार्वभौमिक सत्य भी छिपा है। हर बड़ी रचना के पीछे एक सार्वभौमिक सत्य भी होता है जो उसे अपने देश और काल से अतिक्रमित करा के बार-बार प्रासंगिक बनाता है। यह कविता इस मिथ्या चेतना को तोड़ती है कि कोई अवतारी देवता हमें मुक्ति दिलाता है, ‘संभवामि युगे युगे’ का उद्घोष एक झूठ है, सच्चाई यह है कि शोषित जनशक्ति ही संगठित हो कर अन्याय पर आधारित समाज व्यवस्था से मुक्ति दिलाती है और उसकी एक ऐतिहासिक प्रक्रिया है।

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धन्यवाद