JEEVAK AYURVEDIC MEDICAL COLLEGE AND REASEARCH CENTRE�KAMALAPUR, AKAUNI CHANDAULI U.P.
Guided by:-
Dr.Amit kr. Singh(Associate professor and HOD)
Dr.Varsha Gupta (Assistant professor)
Department of Rachna sharir
Presented by :-
Piyush Singh
Roll no.
Batch :- BAMS 2023-24
Topic:-ऊर्ध्वजत्रुगत मर्म
INDEX
Marma/मर्म
चरक के अनुसार��मर्म शरीर के वे स्थान हैं जहाँ दर्द की अनुभूति शरीर के अन्य भागों की तुलना में अधिक तीव्रता से होती है। ऐसा चेतना या जीवन तत्व के इन बिंदुओं से जुड़े होने के कारण होता है।
इस प्रकार, चरक के अनुसार, मर्म शरीर का वह बिंदु है जो जीवन तत्व से जुड़ा है और दर्द के प्रति अधिक संवेदनशील है।
मर्माणि नाम मांससिरा स्नायुस्थि संधिसन्निपातः ।
तेषु स्वाभावत् एव विशेषेण प्राणः तिष्ठन्ति ॥ (सु. शा.6/16)
वाग्भट के अनुसार:-
मर्म का विभाजित शब्द मह या म प्राण या जीवन को दर्शाता है। म निवास को भी दर्शाता है। इसलिए, प्राण का निवास मर्म है। या, शरीर के जिस बिंदु या बिंदुओं में प्राण या जीवन तत्व रहता है उसे मर्म कहते हैं। मर्म को आगे उस स्थान या बिंदु के रूप में परिभाषित किया जाता है जहाँ चोट लगने पर विषम स्पंदन (अनियमित धड़कन), पीड़ा होती है |
सुश्रुत:
सुश्रुत में शल्यकर्मों का विवेचन करते हुए लिखा है कि मर्म स्थानों को बचाकर शल्य कर्म करना चाहिए। जिन स्थानों पर आघात के द्वारा जीवन का अन्त हो जाता हो ऐसे मर्म स्थानों को घाणेकर जी ने Vital Parts कहा है एवं देशपाण्डे जी ने Vital Weak Spot बताया है।
मर्म शब्द की व्युत्पत्ति�मर्म शब्द का अर्थ जीव स्थान है। अंग्रेजी में इन्हें Vital Parts कहते हैं। दोनों ही शब्दों का योगार्थ एक ही है। इस मर्म शब्द की व्युत्पत्ति अनेक विद्वानों ने इस प्रकार बताई है-�(1) मृ-मनिन्-जीवस्थाने, संधिस्थाने, तात्पर्ये च। (शब्दस्तोम)� यह मर्मन् शब्द के प्रथमा के एकवचन का रूप है जो जीव स्थान, सन्धि स्थान और तात्पर्य के अर्थ में व्यवहार में लाया जाता है तथा मृ-धातु में मनिन् प्रत्यय करने से बनता है।�(2) मारयन्तीति मर्माणि (डल्हण)��शरीर के वे स्थान जहां आघात या चोट के कारण मृत्यु हो जाए मर्म कहलाते हैं।
(3) अपि च मरणकारित्वान्मर्म (वाग्भट)��व्यवहार में शरीर के ऐसे सभी स्थान जिन पर आघात होने से मृत्यु हो जाए अथवा मृत्यु की सम्भावना हो वे मर्म कहलाते हैं।��(4) येष्वपहतेषु प्रियन्ते नरास्तानि मर्माणि।��शरीर के किसी अन्य भाग पर अधिक से अधिक आघात होने से जो परिणाम निकलता है वह मर्म स्थान पर थोड़े से आघात से ही हो जाता है। अतः मर्म स्थान
मर्मो की संख्या
मर्मों की कुल संख्या 107 है। जिन्हें निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है –�मर्मों की कुल संख्या 107 है। जिन्हें निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है –
1.षडंग शरीर के आधार पर�2. रचना / धातु भेद से�3. प्रभाव / परिणाम के आधार पर
षडंग शरीर के आधार पर
मर्मो के प्रकार
सप्तोत्तरं मर्मशतं, तानि मर्माणि पञ्चात्मकानि भवन्ति" ये मर्म पांच प्रकार की आत्मा वाले हैं। इनकी व्याख्या इस प्रकार है- "पञ्चविध आत्मा येषां तानि पञ्चात्मकानि।“
इन पञ्चात्मक मर्मों की संख्या इस प्रकार है-
सुश्रुत वाग्भट
मांस मर्म = 11 मांस मर्म = 10
सिरा मर्म. = 41 सिरा मर्म = 37
स्नायु मर्म = 27 स्नायु मर्म = 23
अस्थि मर्म = 08 अस्थि मर्म = 08� सन्धि मर्म = 20 सन्धि मर्म = 20� धमनी मर्म = 09�
= 107 = 107��
अन्ये विकल्पानि भवन्ति पंच सद्यानि कालान्तरप्राणहराणि।
विशल्यघ्नवैकल्यकरो तथैव रूजाकराणीति वदन्ति तज्ज्ञाः।।
परिणाम के अनुसार मर्म पांच प्रकार के होते हैं।.
1. सद्यः प्राणहर मर्म - 19
2. कालान्तर प्राणहर मर्म - 33
3. वैकल्यकर मर्म - 44
4. विशल्यघ्न मर्म - 03
5. रुजाकर मर्म - 08
कुल 107
ऊर्ध्वजत्रुगत मर्म
ऊर्ध्वजत्रुगत मर्म” का अर्थ है “ऊपर की ओर, जत्रु (कंधे) के पास स्थित मर्म बिंदु”. ये मर्म बिंदु गले के ऊपर, कंधे के पास स्थित होते हैं.
गर्दन के मर्म (14). सिर के मर्म (23)�नीला – 2. विधुर – 2 शंख – 2 �मन्या – 2. अपांग – 2 स्थपनी – 1�मातृकाएँ – 8. आवर्त – 2. श्रृंगाटक – 4 �कृकाटिका – 2. उत्क्षेप – 2. सीमन्त – 5 � फणा – 2 अधिपति - 1
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नीला मन्या:-
मर्म ये सिरा मर्म हैं एवं इनकी गणना वैकल्यकर मर्मों में है। ये कण्ठनाड़ी के दोनों ओर व्यतिक्रम से (अर्थात् एक नीला एवं एक मन्या एक ओर, और वैसे ही दूसरी ओर) दो नीला, दो मन्या नामक चार धमनियां हैं। नीला और मन्या के वेध से होने वाले सभी लक्षण वातिक (Nervous) प्रतीत होते हैं। ये वातिक लक्षण स्वर यन्त्र एवं जिह्वा की नाड़ियों के विकृत होने से या इनकी धमनियों का नाश होने से हो सकते हैं।
मातृका मर्म:-
ग्रीवा के दोनों ओर मातृका नामक चार-चार प्रत्येक पार्श्व में सिराएं हैं। ये सद्यः प्राणहर मर्म है। ग्रीवा के दोनों ओर कैरोटिड धमनी एवं इन्टर्नल जुगलर सिरा के अतिरिक्त कई अन्य सिरायें भी होती हैं। मातृकाओं से Internal & External Cartoid Arteries and Internal and External Jugular Veins का तथा मातृकाओं से ही ग्रीवा की उतान सिराओं का (Anterior Jugular Veins and Posterior, ExternalJugular Veins) तथा नीला मन्या की पेशियां Vagus Nerve and Phrenic Nerve एवं चेहरे की नाड़ी (Common Facial Vein) का बोध होता है। इस मर्म पर वेध होने से तत्काल मृत्यु हो जाती है।
कृकाटिका मर्म- यह वैकल्यकर एवं सन्धि मर्म हैं। संख्या में दो एवं शिर और ग्रीवा के जोड़ पर स्थित होते हैं। कृकाटिका, ग्रीवा और सिर के संयोग स्थान का पिछला भाग है। कृकाटिका पश्चात् कपाल एवं चूड़ावलया कसेरुका सन्धि स्थल (Articulation between the Occipital and Atlas) प्रतीत होता है। इसके अतिरिक्त इस मर्म के निर्माण में, उपर्युक्त सन्धि को बांधने वाले स्नायु (Ligament) एवं कला जैसे Atlanto-occipital Membrane और स्नायु (Lateral Atlanto-occipital Ligaments) होते हैं। इस मर्म पर अभिघात में सिर में कम्प हो जाता है।��जत्रूर्ध्व अन्य मर्मों का आगे सिर मर्म शीर्षक में वर्णन देखें।��विशेष – उपर्युक्त मर्म (नीलामन्या, मातृका एवं कृकाटिका) जत्रु के ऊपर, सिरा के नीचे के प्रदेश में अर्थात् ग्रीवा प्रदेश में स्थित है। परिणाम की दृष्टि से नीलामन्या को Superior Laryngeal, Glossopharyngeal, Hypoglossal का स्थान मानना, मातृका को (Carotid Arteries) मानना तथा कृकाटिका को उपर्युक्त सन्धिस्थल मानना अधिक युक्ति-युक्त प्रतीत होता है।
विधुर मर्म- यह स्नायु व वैकल्यकर मर्म है। ये दो होते हैं और कान के पीछे नीचे की ओर आश्रित होते हैं। इस मर्म के स्थान पर पश्चिम कर्णिका धमनी एवं सिरा (Posterior Auricular Arteries and Veins) होती है। अभिघात होने से सिरा के साथ कान का पर्दा (Tympanum) भी विहो सकता है साथ कर्णनाड़ी भी अभिहत हो सकती है। जिससे बाधिर्य होना सम्भव है। इस मर्म के अन्य महत्वपूर्ण अंग, कर्णपटल की कला (Tympanic Membrane), मध्यकर्ण की रचना (Structure in the Middle Ear) एवं आठवीं शीर्षण्य नाड़ी की शाखा (Branches of the 8th Cranial Nerve) होते हैं।
फण मर्म- इस मर्म की गणना वैकल्यकर ममर्मों में की जाती है ये संख्या में दो एवं नासा मार्ग के दोनों ओर भीतर स्रोतों मार्ग से बन्धे होते हैं। श्रोत्रपथ से अभिप्राय श्रुतिसुरंग का द्वार (Orifice of the Auditory Tube) से है। इस विवरण से फणों का स्थान नासा में भीतर और ऊपर स्रोत मार्ग तक होता है। इसके ऊपर के भाग में तथा उसके सामने की नासा प्राचीर में गन्ध नाडी (Olfactory Nerve) की शाखा प्रशाखायें फैली रहती है जिससे गन्ध ग्रहण होती है, इसे Olfactory Region of the Nasal Cavity कहते हैं। इस मर्म पर अभिघात से गन्धज्ञान नष्ट हो जाता है।
अपांग मर्म- यह सिरा व वैकल्यकर मर्म, भ्रूपुच्छों के अन्त में नीचे आंखों के बाहर की ओर स्थित होता है। इस मर्म का स्थान नेत्रगोलक के बहि:कोण पर (Outer Corner or Canthus of the Eye) है। यहां पर Zygomatic & Temporal Vessels रहती हैं। इसके अतिरिक्त दृष्टिनाड़ी एवं उसकी शाखाएं (Optic nerve and its Branches, Cilliary Nerve, 2nd Cranial Nerve), अश्रुपीठीय नाड़ी (Lacrymal Nerve from the Opthalmic Division of the 5th Cranial Nerve), एवं नेत्र पाश्विक नाड़ी भी इसके निर्माण में सहायता देती है। यहां पर अभिघात होने से अन्धापन या दृष्टि की क्षीणता होती हैं|
शंख मर्म- यह अस्थि मर्म सद्यः प्राणहर है और भौहों के पुच्छान्त के ऊपर, कान और ललाट के बीच होता है। यह मर्म शंखास्थि का वह भाग है जिसे कनपटी या शंखप्रदेश (Temporal Region) कहते हैं। इसके ऊपर अनुशंखा उत्ताना (Superfical Temporal) व शंखास्थि के भीतरी पृष्ठ भाग पर मस्तिष्क वृत्तिका मध्यमा (Middle Meningeal Artery) नाम की धमनियां होती हैं। अतः इस मर्म पर आघात से स्तब्धता के कारण मृत्यु हो सकती हैं|
उत्क्षेप मर्म- इस स्नायु एवं विशल्यघ्न मर्म में शंखस्थान की सावरण पेशी (Temporalis Muscle) का बोध होता है। इस मर्म की रचना में (Superficial Temporal Artery, Zygomatic Temporal Nerve) तथा Deep Temporal Artery and Vein होती हैं और मस्तिष्क व उसके आवरण शंखास्थि के निम्न प्रदेश में जुड़े रहते हैं। इस मर्म पर शल्य चुभे रहने पर जीवित रहता है किन्तु तुरन्त शल्य निकालने पर यह मारक है।
स्थपनी मर्म- यह सिरा, विशल्यघ्न मर्म है और दोनों भौहों के बीच स्थितहोता है। इस मर्म स्थान पर ललाटिका (Frontal Vein) सिरा और दोनों ओर की इनको जोड़ने वाली सिरा (Nasal Arch) होती है। स्थपनी के पीछे Frontal Sinus होता है जो उत्क्षेप मर्म पर विद्ध होने के समान परिणाम वाला होता है। यह भ्रूमध्य में होता है यहां पर Superior Sagittal Sinus तथा supratochlear vessels होती हैं|
सीमन्त मर्म:- यह कालान्तर प्राणहर मर्म है। सिर की खोपड़ी में विभाग करने वाली ‘सीमन्त’ नामक पांच सन्धियां सन्धिमर्म के नाम से प्रख्यात हैं। इस मर्म के निर्माण में एक मध्य कपालीय सीमन्त (Sagittal Suture) दो पार्श्व कपालीय सीमन्त (Parietal Suture), एक पश्चिम कपालीय सीमन्त (Occipital Suture) व एक पुरः कपालीय सीमन्त (Frontal Suture) सहायक होते हैं। इस मर्म पर आघात से उन्माद, भीति (भय), चित्तनाश से मृत्यु होती है|
श्रृंगाटक मर्म- ये सिरा मर्म, सद्यः प्राणहर हैं एवं संख्या में चार होते हैं। नाक, नेत्र, एवं जिह्वा को सन्तर्पण करने वाली सिराओं के मध्य में सिरा सन्निपात हैं। मस्तिष्क मूल में (Cavernous and Intercavernous Sinus) नामक सिरा सन्निपात है। यही इस मर्म का स्थान प्रतीत होता है। इसमें आंखों की सिरायें सीधी मिलती हैं एवं नासा कर्ण की अप्रत्यक्षतया मिलती है। इनका आकार भी त्रिकोण (सिंघाड़े की तरह) होता है। इस मर्म से मस्तिष्क के केन्द्र जैसे वाणी केन्द्र (Vocal Centre), श्रोत्र केन्द्र (Hearing Centre), स्वाद (रस) एवं गन्ध केन्द्र (Taste and Smell Centre) आदि सम्बन्धित होते हैं। अतः इस मर्म पर आघात से उक्त किसी केन्द्र के आहत होने पर समीपवर्ती मस्तिष्क धारीय नाड़ीचक्रों का आहत होना सर्वथा सम्भव है जिससे कि मनुष्य की मृत्यु या उस अंग विशेष में विशेष विकार हो जाता है।
अधिपति मर्म- यह सन्धि एवं सद्यः प्राणहर मर्म है। मस्तिष्क के भीतरी भाग पर होता है। यही अधिपति मर्म का स्थान है। इस मर्म से मस्तिष्क वृति में पीछे की ओर मिलने वाले सिरा-सरित्, सन्निपात (Confluence of Sinusesof Torcular Herophili) का बोध होता है। इसकी रचना, सुषुम्णा शीर्षक अपने प्राण केन्द्रों सहित, हार्दिक केन्द्र (Cardiac Centre), प्रश्वास केन्द्र (Respiratory Centre), से प्रचेष्टनी नाड़ी केन्द्र (Vasomotor Centre) अन्य केन्द्र एवं दस शीर्षस्थ नाड़ियों का मूल स्थान आदि के साथ ही पूर्ण मानी जाती है। इस मर्म पर अभिघात होने पर रक्तसंवहन, प्रश्वास एवं प्रचेष्टिनी नाड़ी केन्द्र की विकृति से सद्यः मृत्यु हो जाती है। अथवा इनसे प्रभावी अंगों में भी विकृति आ सकती है।�
त्रिमर्म
सप्तोत्तरं मर्मशतं यदुक्तं शरीरसंख्यामधिकृत्य तेभ्यः।
मर्माणि बस्तिहृदयं शिरश्च प्रधानभूतानि वदन्ति तज्ज्ञाः ।। 26/3�� शरीर के तीन प्रधान मर्मों का उल्लेख करते हुए लिखा है कि शारीर स्थान में 107 ममों का वर्णन किया गया है। उनमें बस्ति, हृदय तथा सिर ये प्रधान रूप से प्राण का आश्रय हैं। इसलिए इन्हें प्रधान मर्म जानना चाहिए। वातादि दोष इन तीन मर्म स्थानों में पीड़ा उत्पन्न करते हुए प्राणों को भी पीड़ित करते हैं। इसलिए इन मर्म स्थानों में होने वाले महारोगों का रक्षा विधान यत्नपूर्वक करना चाहिए।
मर्म चिकित्सा की विधि
Thank you