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हिंदी पाठ परियोजना (LESSON PLAN)

विषय - हिंदी कक्षा 12th समय 35 मिनट

उपविषय - घर की याद (कविता) कवि- भवानी प्रसाद मिश्र

शिक्षण सामग्री -संगणक ,पी पी टी ,पाठ्यपुस्तक ,छायाचित्र आदि

शिक्षण विधि -व्याख्यान विधि ,प्रश्नोत्तरी विधि ,शब्द काठिन्य निवारण विधि आदि

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प्रस्तोता - के. एल मीणा

पी.जी.टी हिंदी

जवाहर नवोदय विद्यालय -अटरू,जिला -बारां, (राजस्थान)

जयपुर - संभाग

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शिक्षण उद्देश्य

कविता का रसास्वादन करना।�रस अलंकार आदि से अवगत करना।�कठिन शब्दावली को सरलार्थ रूप में समझना।�भाषा के अंदर सक्रिय सत्ता सम्बन्ध की समझ पैदा करना।�वाचन कौशल का विकास करना।�शब्द भंडार में अभिवृद्वि करना।�

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भवानी प्रसाद मिश्र�

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जीवन परिचय

भवानी प्रसाद मिश्र का जन्म 1913 ई. में मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के टिगरिया गाँव में हुआ। इन्होंने जबलपुर से उच्च शिक्षा प्राप्त की। इनका हिंदी, अंग्रेजी व संस्कृत भाषाओं पर अधिकार था। इन्होंने शिक्षक के रूप में कार्य किया। फिर वे कल्पना पत्रिका, आकाशवाणी व गाँधी जी की कई संस्थाओं से जुड़े रहे। इनकी कविताओं में सतपुड़ा-अंचल, मालवा आदि क्षेत्रों का प्राकृतिक वैभव मिलता है। इन्हें साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश शासन का शिखर सम्मान, दिल्ली प्रशासन का गालिब पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इनकी साहित्य व समाज सेवा के मद्देनजर भारत सरकार ने इन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया। इनका देहावसान 1985 ई. में हुआ।

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प्रमुख रचनाएँ

सतपुड़ा के जंगल, सन्नाटा, गीतफ़रोश, चकित है दुख, बुनी हुई रस्सी, खुशबू के शिलालेख, अनाम तुम आते हो, इदं न मम् आदि। गीतफ़रोश इनका पहला काव्य संकलन है। गाँधी पंचशती की कविताओं में कवि ने गाँधी जी को श्रद्धांजलि अर्पित की है।

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और माँ बिन-पढ़ी मोरी,दु:ख में वह गढ़ी मेरी माँ कि जिसकी गोद में सिर, रख लिया तो दुख नहीं फिर,माँ कि जिसकी स्नेह-धारा, का यहाँ तक भी पसारा, उसे लिखना नहीं आता, जो कि उसका पत्र पाता।पिता जी जिनको बुढ़ापा,एक क्षण भी नहीं व्यापा,जो अभी भी दौड़ जाएँजो अभी भी खिलखिलाएँ,मौत के आगे न हिचकें,शर के आगे न बिचकें,बोल में बादल गरजता,काम में झझ लरजता,

घर की याद (कविता)

कवि- भवानी प्रसाद मिश्र

आज पानी गिर रहा है, बहुत पानी गिर रहा है, रात भर गिरता रहा है, प्राण-मन धिरता रहा है, बहुत पानी गिर रहा हैं,घर नजर में तिर रहा है, घर कि मुझसे दूर है जो,घर खुशी का पूर हैं जो,

घर कि घर में चार भाई,मायके में बहिन आई,बहिन आई बाप के घर,हाय रे परिताप के घर।घर कि घर में सब जुड़े हैं,सब कि इतने कब जुड़े हैं,चार भाई चार बहिन,भुजा भाई प्यार बहिन,

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पाँचवाँ मैं हूँ अभागा, जिसे सोने पर सुहागा, पिता जी कहते रहे हैं, प्यार में बहते रह हैं,आज उनके स्वर्ण बेटे,लगे होंगे उन्हें हेटे,क्योंकि मैं उन पर सुहागाबाँधा बैठा हूँ अभागा,

आज गीता पाठ करके,दंड दो सौ साठ करके,खूब मुगदर हिला लेकर, मूठ उनकी मिला लेकर,जब कि नीचे आए होंगे,नैन जल से छाए होंगे, हाय, पानी गिर रहा है, घर नजर में तिर रहा हैं,

चार भाई चार बहिनेंभुजा भाई प्यार बहिनेंखेलते या खड़े होंगे,नजर उनकी पड़े होंगे।पिता जी जिनको बुढ़ापा,एक क्षण भी नहीं व्यापा,रो पड़े होंगे बराबर,पाँचवें का नाम लेकर,

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पिता जी ने कहा होगा, हाय, कितना सहा होगा, कहाँ, मैं रोता कहाँ हूँ धीर मैं खोता, कहाँ हूँ हे सजील हरे सावन, हे कि मरे पुण्य पावन,तुम बरस लो वे न बरसेंपाँचवें को वे न तरसें,मैं मजे में हूँ सही है,घर नहीं हूँ बस यही है,किंतु यह बस बड़ा बस हैं,इसी बस से सब विरस हैं,

और माँ ने कहा होगा,दुख कितना बहा होगा, आँख में किसलिए पानी वहाँ अच्छा है भवानी वह तुम्हारी मन समझकर,और अपनापन समझकर,

गया है सो ठीक ही है,यह तुम्हारी लीक ही है,पाँव जो पीछे हटाता,कोख को मेरी लजाता,इस तरह होआो न कच्चे,रो पड़गे और बच्चे,

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हाय रे, ऐसा न कहना,है कि जो वैसा न कहना, कह न देना जागता हूँ, आदमी से भागता हूँ कह न देना मौन हूँ मैं,खुद न समझू कौन हूँ मैं,� �देखना कुछ बक न देना,उन्हें कोई शक न देना,हे सजीले हरे सावन,हे कि मरे पुण्य पावन,तुम बरस लो वे न बरसें,पाँचवें को वे न तरसों। 

किंतु उनसे यह न कहना,उन्हें देते धीर रहना, उन्हें कहना लिख रहा हूँ,उन्हें कहना पढ़ रहा हूँ, काम करता हूँ कि कहना,नाम करता हूँ कि कहना,मत करो कुछ शोक कहना,

  • और कहना मस्त हूँ मैं,कातने में व्यस्त हूँ मैं,वजन सत्तर सेर मेरा,और भोजन ढेर मरा,कूदता हूँ खेलता हूँ,दु:ख डटकर ठेलता हूँ,यों न कहना अस्त हूँ मैं,

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प्रसंग-प्रस्तुत काव्यांश पाठ्यपुस्तक आरोह भाग-1 में संकलित कविता ‘घर की याद’ से लिया गया है। इसके रचयिता भवानी प्रसाद मिश्र हैं। यह कविता जेल प्रवास के दौरान लिखी गई। एक रात लगातार बारिश हो रही थी तो कवि को घर की याद आती है तो वह अपनी पीड़ा व्यक्त करता है।

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व्याख्या

कवि बताता है कि आज बहुत तेज बारिश हो रही है। रातभर वर्षा होती रही है। ऐसे में उसके मन और प्राण घर की याद से घिर गए। बरसते हुए पानी के बीच रातभर घर कवि की नजरों में घूमता रहा। उसका घर बहुत दूर है, परंतु वह खुशियों का भंडार है। उसके घर में चार भाई हैं। बहन मायके में यानी पिता के घर आई है। यहाँ आकर उसे दुख ही मिला, क्योंकि उसका एक भाई जेल में बंद है। घर में आज सभी एकत्र होंगे। वे सब आपस में जुड़े हुए हैं। उसके चार भाई व चार बहने हैं। चारों भाई भुजाएँ हैं तथा बहनें प्यार हैं। भाई भुजा के समान कर्मशील व बलिष्ठ हैं तथा बहनें स्नेह की भंडार हैं।

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सावन की बरसात में कवि को घर के सभी सदस्यों की याद आती है। उसे अपनी माँ की याद आती है। उसकी माँ अनपढ़ है। उसने बहुत कष्ट सहन किया है। वह दुखों में ही रची हुई है। माँ बहुत स्नेहमयी है। उसकी गोद में सिर रखने के बाद दुख शेष नहीं रहता अर्थात् दुख का अनुभव नहीं होता। माँ का स्नेह इतना व्यापक है कि जेल में भी कवि उसको अनुभव कर रहा है। वह लिखना भी नहीं जानती। इस कारण उसका पत्र भी नहीं आ सकता। कवि अपने पिता के बारे में बताता है कि वे अभी भी चुस्त हैं। बुढ़ापा उन्हें एक क्षण के लिए भी आगोश में नहीं ले पाया है। वे आज भी दौड़ सकते हैं तथा खूब खिल-खिलाकर हँसते हैं। वे इतने साहसी हैं कि मौत के सामने भी हिचकते नहीं हैं तथा शेर के आगे डरते नहीं है। उनकी वाणी में ओज है। उसमें बादल के समान गर्जना है। जब वे काम करते हैं तो उनसे तूफ़ान भी शरमा जाता है अर्थात् वे तेज गति से काम करते हैं।

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  • कवि अपने पिता के विषय में बताता है कि आज वे गीता का पाठ करके, दो सौ साठ दंड-बैठक लगाकर, मुगदर को दोनों हाथों से हिलाकर व उनकी मूठों को मिलाकर जब वे नीचे आए होंगे तो उनकी आँखों में पानी आ गया होगा। कवि को याद करके उनकी आँखें नम हो गई होंगी। कवि को घर की याद सताती है। घर में चार भाई व चार बहनें हैं जो सुरक्षा व प्यार में बँधे हैं। उन्हें खेलते या खड़े देखकर पिता जी को पाँचवें की याद आई होगों और वे जिन्हें कभी बुढ़ापा नहीं व्यापा था, कवि का नाम लेकर रो पड़े होंगे।

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  • कवि कहता है कि वह उनका भाग्यहीन पाँचवाँ पुत्र है। वह उनके साथ नहीं है, परंतु पिता जी को सबसे प्यारा है। जब भी कभी कवि के बारे में चर्चा चलती है तो वे भाव-विभोर हो जाते हैं। आज उन्हें अपने सोने जैसे बेटे तुच्छ लगे होंगे, क्योंकि उनका सबसे प्यारा बेटा उनसे दूर जेल में बैठा है।

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  • माँ ने पिता जी को समझाया होगा। ऐसा करते समय उसके मन में भी बहुत दु:ख बहा होगा। वह कहती है कि भवानी जेल में बहुत अच्छा है। तुम्हें आँसू बहाने की जरूरत नहीं है। वह आपके दिखाए मार्ग पर चला है और इसे अपना उद्देश्य बनाकर गया है। यह ठीक है। यह तुम्हारी ही परंपरा है। यदि वह आगे बढ़कर वापस आता तो यह मेरे मातृत्व के लिए लज्जा की बात होती। अत: तुम्हें अधिक कमजोर होने की जरूरत नहीं है। यदि तुम रोओगे तो बच्चे भी रोने लगेंगे।

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  • माँ की बातें सुनकर पिता ने कहा होगा कि मैं रो नहीं रहा हूँ और न ही धैर्य खो रहा हूँ। यह बात कहते हुए उन्होंने सारी पीड़ा मन में समेटी होगी। कवि सावन को संबोधित करते हुए कहता है कि हे सजीले हरियाले सावन! तुम अत्यंत पवित्र हो। तुम चाहे बरसते रहो, परंतु मेरे माता-पिता की आँखों से आँसू न बरसें। वे अपने पाँचवें बेटे की याद करके दुखी न हों। वह मजे में है, इसमें कोई संदेह नहीं है। इसमें केवल इतना ही अंतर है कि मैं घर पर नहीं हूँ। वह घर के वियोग को मामूली मान रहा है, परंतु यह कोई साधारण घटना नहीं है। इस वियोग से मेरा जीवन दुखमय बन गया है। मैं अलगाव का नरक भोग रहा हूँ।

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  • कवि सावन से कहता है कि तुम मेरे माता-पिता से मेरे कष्टों के बारे में न बताना। तुम उन्हें धैर्य देते हुए यह कहना कि यह कहना जेल में भी पढ़ रहा है। साहित्य लिख रहा है। वह यहाँ काम करता है तथा परिवार, देश का नाम रोशन कर रहा है। उसे अनेक लोग चाहते हैं। उनसे शोक न करने की बात कहना। उन्हें यह भी बताना कि मैं यहाँ सुखी हूँ। मैं यहाँ सूत कातने में व्यस्त रहता हूँ। मेरा वजन सत्तर सेर है। मैं ढेर सारा भोजन करता हूँ, खेलता-कूदता हूँ तथा दुख को अपने नजदीक आने नहीं देता। मैं यहाँ मस्त रहता हूँ, परंतु उन्हें यह न कहना कि मैं डूबते सूर्य-सा निस्तेज हो गया हूँ।

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  • कवि सावन को सावधान करते हुए कहता है कि मेरे परिजनों को मेरी सच्चाई न बताना। उन्हें यह न बताना कि मैं देर रात तक जागता रहता हूँ, आम व्यक्ति से दूर भागता हूँ मैं चुपचाप रहता हूँ। यह भी न बताना कि चिंता में डूबकर मैं स्वयं को भूल जाता हूँ। तुम सावधानी से बातें कहना। उन्हें कोई शक न होने देना कि मैं दुखी हूँ। हे सावन! तुम पुण्य कार्य में लीन हो, तुम स्वयं बरसकर धरती को प्रसन्न करो, परंतु मेरे माता-पिता की आँखों में आँसू न बहने देना, उन्हें मेरी याद न आने देना।

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काठिन्य निवारण

गिर रहा-बरसना।

प्राण-मन

धिरना-प्राणों और मन में छा जाना।

तिरना-तैरना।

खुशी का पूर-खुशी का भडार।

परिताप-कष्ट।

गढ़ी-डूबी।

पसारा-फैलाव।

व्यापा-फैला हुआ।

खिलखिलाएँ-खुलकर हँसना।

हिचकें-संकोच करना।

बिचकें-डरें।

झांझा-तूफान।

लरजता-काँपता।

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दंड-व्यायाम का तरीका।

मुगदर-व्यायाम करने का उपकरण।

मूठ-पकड़ने का स्थान।

नैन-नयन।

व्यापा-फैला।

अभागा-भाग्यहीन।

सोने पर सुहागा-वस्तु या व्यक्ति का दूसरों से बेहतर होना।

प्यार में बहना-भाव-विभोर होना।

हेटे—तुच्छ।

लीक-परंपरा।

पाँव पीछे हटाना - कर्तव्य से हटना।

कोख को लजाना-माँ को लज्जित करना।

कच्चे-कमजोर।

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काव्य-सौंदर्य�

भाव-सौंदर्य- इस कविता में घर के मर्म का उद्घघाटन है। कवि को जेल-प्रवास के दौरान घर से विस्थापन की पीड़ा सालती है। कवि के स्मृति-संसार में उसके परिजन एक-एक कर शामिल होते चले जाते हैं। घर की अवधारणा की सार्थक और मार्मिक याद कविता की केंद्रीय संवेदना है। सावन के बादलों को देखकर कवि को घर की याद आती है। वह घर के सभी सदस्यों को याद करता है। उसे अपने भाइयों व बहनों की याद आती है। उसकी बहन भी मायके आई होगी। कवि को अपनी अनपढ़, पुत्र के दुख से व्याकुल, परंतु स्नेहमयी माँ की याद आती है। वह सावन को दूत बनाकर अपने माता-पिता के पास अपनी कुशलक्षेम पहुँचाने का प्रयास करता है ताकि कवि के प्रति उनकी चिंता कम हो सके।

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शिल्प-सौंदर्य

भाषा सहज व सरल है। भाषा में प्रवाह है।

  • ‘भुजा भाई’ में उपमा व अनुप्रास अलंकार है। ‘पुण्य पावन’ में अनुप्रास अलंकार है। सावन का मानवीकरण किया है। सावन’ के लिए सजीले, हरे, पुण्य, पावन आदि विशेषणों का प्रयोग है।‘बस’ शब्द में यमक अलंकार है। इसके दो अर्थ हैं-केवल व नियंत्रण। ‘बोल में बादल गरजता’ तथा ‘काम में झझा लरजता’ में उपमा अलंकार है।
  • खड़ी बोली में प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति है।
  • शांत रस है। वीर रस की अभिव्यक्ति है।
  • मुक्त छंद है।
  • बोल, हिचकना, बिचकना, लरजना स्थानीय शब्दों के साथ मौत, शेर आदि विदेशी शब्दों का प्रयोग किया गया है।
  • कवि अपनी व्यथा को अपने तक सीमित रखना चाहता है।
  • ‘आदमी से भागता हूँ में कवि की पीड़ा का वर्णन है।
  • ‘पाँचवें’ शब्द से अभिव्यक्त होने वाली करुणा मर्मस्पर्शी है।

‘बक’ व ‘शक’ शब्द भाषा को प्रभावी बनाते हैं।

  • पिता की भावुकता का सजीव वर्णन है। पिता के संस्कारी रूप, स्वस्थ शरीर व भावुकता का वर्णन है।
  • सावन को दूत बनाने की प्राचीन परंपरा को प्रयोग किया गया है।
    • संवाद शैली है। दृश्य बिंब है प्रसाद गुण है।चित्रात्मकता है।

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कविता का केंद्रीय भाव

  • इस कविता में घर के मर्म का उद्घघाटन है। कवि को जेल-प्रवास के दौरान घर से विस्थापन की पीड़ा सालती है। कवि के स्मृति-संसार में उसके परिजन एक-एक कर शामिल होते चले जाते हैं। घर की अवधारणा की सार्थक और मार्मिक याद कविता की केंद्रीय संवेदना है। सावन के बादलों को देखकर कवि को घर की याद आती है। वह घर के सभी सदस्यों को याद करता है। उसे अपने भाइयों व बहनों की याद आती है। उसकी बहन भी मायके आई होगी। कवि को अपनी अनपढ़, पुत्र के दुख से व्याकुल, परंतु स्नेहमयी माँ की याद आती है। वह पत्र भी नहीं लिख सकती।

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  • कवि को अपने पिता की याद आती है जो बुढ़ापे से दूर हैं। वे दौड़ सकते हैं, खिलखिलाते हैं। वो मौत या शेर से नहीं डरते। उनकी वाणी में जोश है। आज वे गीता का पाठ करके, दंड लगाकर जब नीचे परिवार के बीच आए होंगे, तो अपने पाँचवें बेटे को न पाकर रो पड़े होंगे। माँ ने उन्हें समझाया होगा। कवि सावन से निवेदन करता है कि तुम खूब बरसो, किंतु मेरे माता-पिता को मेरे लिए दुखी न होने देना। उन्हें मेरा संदेश देना कि मैं जेल में खुश हूँ। मुझे खाने-पीने की दिक्कत नहीं है। मैं स्वस्थ हूँ। उन्हें मेरी सच्चाई मत बताना कि मैं निराश, दुखी व असमंजस में हूँ। हे सावन! तुम मेरा संदेश उन्हें देकर धैर्य बँधाना। इस प्रकार कवि ने घर की अवधारणा का चित्र प्रस्तुत किया है।

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प्रश्न

1: पानी के रात भर गिरने और प्राण-मन के धिरने में परस्पर क्या संबंध है?

2: मायके आई बहन के लिए कवि ने घर को ‘परिताप का घर’ क्यों कहा है?

3: पिता के व्यक्तित्व की किन विशेषताओं को उकेरा गया है?