�अध्याय 5 �मिठाईवाला�लेखक –भगवतीप्रसाद बाजपेयी �
प्रस्तुत कर्ता :-� सुनील कुमार सिंह (प्र०स्ना०शि०हिंदी)�जवाहर नवोदय विद्यालय अमृतसर पंजाब �(नवोदय विद्यालय समिति, चंडीगढ़ संभाग)
बहुत ही मीठे सुरों के साथ हुआ गलियों में घूमता हुआ कहता- “बच्चों को बहलानेवाला, खिलौनेवाला |” इस अधूरे वाक्य को वह ऐसे विचित्र, किंतु मादक-मधुर ढंग से गाकर कहता कि सुनने वाले एक बार स्थिर हो उठते |
बच्चे खिलौने देखकर पुलकित हो उठते |वे पैसे लाकर खिलौने का मोलभाव करने लगते | पूछते- “इछका दाम क्या है? औल इछका? औल इछका |” खिलौने वाला बच्चों को देखता और उनकी नन्ही-नन्ही उंगलियों से पैसे ले लेता और बच्चों की इच्छा अनुसार उन्हें खिलौने दे देता |
राय विजयबहादुर के बच्चे भी एक दिन खिलौने लेकर घर आए | वे दो बच्चे थे- चुन्नू और मुन्नू ! चुन्नू जब खिलौने ले आया तो बोला-“मेला घोला कैछा छुन्दल ऐ ! मुन्नू बोला “औल देखो, मेला कैछा छुन्दल ए !” दोनों अपने हाथी-घोड़े लेकर घर भर में उछलने लगे | इन बच्चों की मां रोहणी कुछ देर तक खड़े-खड़े उनका खेल निरखती रही | अंत में दोनों बच्चों को बुलाकर उसने पूछा- “अरे वो चुन्नू-मुन्नू, ये खिलौने तुमने कितने में लिए हैं |”
छह महीने बाद- नगर भर में दो-चार दिनों से एक मुरली वाले के आने का समाचार फैल गया | लोग कहने लगे- “भाई वाह ! मुरली बजाने में वह एक ही उस्ताद है | मुरली बजाकर, गाना सुनाकर वह मुरली बेचता भी है, तो भी दो-दो पैसे में | भला, इसमें उसे क्या मिलता होगा? मेहनत भी तो ना आती होगी !
प्रतिदिन इसी प्रकार उस मुरली वाले की चर्चा होती | प्रतिदिन नगर की प्रत्येक गली में उसका मादक, मृदुल स्वर सुनाई पड़ता- “बच्चों को बहलानेवाला मुरलियावाला |” रोहिणी ने भी मुरली वाले का यह स्वर सुना | तुरंत ही उसे खिलौनेवाले का स्मरण हो आया | उसने मन-ही-मन कहा खिलौनेवाला भी इसी तरह गा-गाकर खिलौने बेचा करता था |
विजय बाबू एक समाचार-पत्र पढ़ रहे थे | उसी तरह उसे लिए हुए वे दरवाजे पर आकर मुरली वाले से बोले- “क्यों भाई, किस तरह देते हो मुरली? किसी की टोपी गली में गिर पड़ी | किसी का जूता पार्क में ही छूट गया, और किसी की सोथनी (पाजामा) ही ढीली होकर लटक आई है | इसी तरह दौड़ते-हाँफते हुए बच्चों का झुण्ड आ पहुँचा | एक स्वर से सब बोल उठे- “अम भी लेंदे मुल्ली और हम वी लेंदे मुल्ली |”
विजय बाबू भीतर-बाहर दोनों रूपों में मुस्कुरा दिए | मन-ही-मन कहने लगे-कैसा है! देता तो सबको इसी भाव से है, पर मुझ पर उलटा एहसान लाद रहा है | फिर बोले- “तुम लोगों की झूठ बोलने की आदत होती है | देते होंगे सभी को दो-दो पैसे में, पर एहसान का बोझा मेरे ही ऊपर लाद रहे हो | मुरलीवाला एकदम अप्रतिभ हो उठा | बोला- “आपको क्या पता बाबूजी कि इनकी असली लागत क्या है! यह तो ग्राहकों का दस्तूर होता है कि दुकानदार चाहे हानि उठाकर चीज क्यों ना बेचे, पर ग्राहक यही समझते हैं- दुकानदार मुझे लूट रहा है | आप भला काहे को विश्वास करेंगे? लेकिन सच पूछिए तो बाबूजी, असली दाम दो ही पैसा है | आप कहीं से दो पैसे में यह मुरली नहीं पा सकते | मैंने तो पूरी एक हज़ार बनवाई थी, तब मुझे इस भाव पड़ी है |”
विजय बाबू बोले- “अच्छा, मुझे ज्यादा वक्त नहीं, जल्दी से दो ठो निकाल दो |” दो मुरलियाँ लेकर विजय बाबू फिर मकान के भीतर पहुंच गए | मुरलीवाला देर तक उन बच्चों के झुंड में मुरलियाँ बेचता रहा! उसके पास कई रंग की मुरलियाँ थी | बच्चे जो रंग पसंद करते, मुरलीवाला उसी रंग की मुरली निकाल देता | “यह बड़ी अच्छी मुरली है | तुम यही ले लो बाबू, राजा बाबू तुम्हारे लायक तो बस यह है |
तुमने अम्मा से ठीक तरह मांगे ना होंगे | धोती पकड़कर पैरों में लिपटकर, अम्मा से पैसे मांगे जाते हैं बाबू ! हां, फिर जाओ | अबकी बार मिल जाएंगी..| दुअन्नी है? तो क्या हुआ, ये लो पैसे वापस लो | ठीक हो गया ना हिसाब ?... मिल गए पैसे ? देखो मैंने तरकीब बताई ! अच्छा अब तो किसी को नहीं लेना है ? सब ले चुके ? तुम्हारी मां के पास पैसे नहीं हैं ? अच्छा, तुम भी यह लो | अच्छा, तो अब मैं चलता हूँ | इस तरह मुरलीवाला फिर आगे बढ़ गया |
आज अपने मकान में बैठी हुई रोहिणी मुरलीवाले की सारी बातें सुनती रही | आज भी उसने अनुभव किया, बच्चों के साथ इतने प्यार से बातें करनेवाला फेरीवाला पहले कभी नहीं आया | फिर वह सौदा भी कैसा सस्ता बेचता है ! भला आदमी जान पड़ता है ! समय की बात है, जो बेचारा इस तरह मारा-मारा फिरता है | पेट जो न कराए, तो थोड़ा ! इसी समय मुरलीवाले का क्षीण स्वर दूसरी निकट की गली से सुनाई पड़ा- “बच्चों को बहलानेवाला, मुरलियावाला |” रोहणी इसे सुनकर मन-ही-मन कहने लगी- और स्वर कैसा मीठा है इसका ! बहुत दिनों तक रोहिणी को मुरलीवाले का वह मीठा स्वर और उसकी बच्चों के प्रति वे स्नेहसिक्त बातें याद आती रही | महीने-के-महीने आए और चले गए | फिर मुरलीवाला न आया | धीरे-धीरे उसकी स्मृति भी क्षीण हो गई |
कठिन शब्दार्थ
१-क्षीण-कमजोर
प्रश्न-रोहिणी को किसकी याद आती रही ?
उत्तर :-मुरली वाले की |
आठ मास बाद-
सर्दी के दिन थे | रोहणी स्नान करके मकान की छत पर चढ़कर आजानुलंबित केशराशि सुखा रही थी | इस समय नीचे की गली में सुनाई पड़ा- “बच्चों को बहलानेवाला मिठाईवाला |” मिठाईवाले का स्वर उसके लिए परिचित था, झट से रोहणी नीचे उतर आई | उस समय उसके पति मकान में नहीं थे | हां, उनकी वृद्धा दादी थी | रोहणी उनके निकट आकर बोली- “दादी, चुन्नू-मुन्नू के लिए मिठाई लेनी है | जरा कमरे में चलकर ठहराओ | मैं उधर कैसे जाऊं, कोई आता ना हो | जरा हटकर में भी चिक की ओट में बैठी रहूंगी |
दादी उठकर कमरे में आकर बोलीं- “मिठाईवाले इधर आना |” मिठाईवाला निकट आ गया | बोला- “कितनी मिठाई दूँ माँ? ये नए तरह की मिठाइयां हैं- रंग-बिरंगी, कुछ-कुछ खट्टी, कुछ-कुछ मीठी, जायकेदार, बड़ी देर तक मुंह में टिकती हैं | जल्दी नहीं घुलती | बच्चे बड़े चाव से चूसते हैं | इन गुणों के सिवा यह खांसी भी दूर करती है! कितनी दूँ ? चपाती, गोल, पहलदार गोलियां है | पैसे की सोलह देता हूं|” दादी बोली- “सोलह तो बहुत कम होती है, भला पचीस तो देते |” मिठाईवाला- “नहीं दादी, अधिक नहीं दे सकता | इतना भी देता हूं, यह अब मैं तुम्हें क्या... खैर, मैं अधिक न दे सकूंगा |
कहते हुए दादी के पोपले मुंह से जरा सी मुस्कुराहट फूट निकली | रोहिणी ने दादी से कहा- “दादी, इससे पूछो, तुम इस शहर में और कभी भी आए थे या पहली बार आए हो ? यहां के निवासी तो तुम हो नहीं |” दादी ने इस कथन को दोहराने की चेष्टा की ही थी कि मिठाई वाले ने उत्तर दिया- “पहली बार नहीं और भी कई बार आ चुका हूं |” रोहणी चिक की आड़ से ही बोली- “पहले यही मिठाई बेचते हुए आए थे या और कोई चीज लेकर ?” मिठाईवाला हर्ष, संशय और विस्मयादि भावों में डूबकर बोला- “इससे पहले मुरली लेकर आया था और उससे भी पहले खिलौने लेकर | रोहिणी का अनुमान ठीक निकला | अब तो वह उससे और भी कुछ बातें पूछने के लिए अस्थिर हो उठी | वह बोली- “इन व्यवसायों में भला तुम्हें क्या मिलता होगा ?
वह बोला- “मिलता भला क्या है ! यही खाने भर को मिल जाता है | कभी नहीं भी मिलता है | पर हाँ, संतोष, धीरज और कभी-कभी असीम सुख जरूर मिलता है और यही मैं चाहता भी हूं |” सो कैसे? वह भी बताओ |” “अब व्यर्थ बातों की क्यों चर्चा करूँ ? उन्हें आप जाने ही दें | उन बातों को सुनकर आपको दुख ही होगा |” जब इतना बताया है, तब और भी बता दो | मैं बहुत उत्सुक हूं| तुम्हारा हरजा न होगा | मिठाई मैं और भी ले लूंगी |
कठिन शब्दार्थ
१-हर्ष-ख़ुशी
2-संशय-संदेह
3-अस्थिर-बेचैन
प्रश्न-रोहिणी ने क्या अनुमान लगाया ?
उत्तर:-रोहिणी ने अनुमान लगाया कि यह मिठाई बेचने वाला मुरली वाला ही है |
अतिशय गंभीरता के साथ मिठाईवाले ने कहा- “मैं भी अपने नगर का एक प्रतिष्ठित आदमी था | मकान, व्यवसाय, गाड़ी-घोड़े, नौकर-चाकर सभी कुछ था | स्त्री थी, छोटे-छोटे बच्चे भी थे | मेरा वह सोने का संसार था | बाहर संपत्ति का वैभव था, भीतर सांसारिक सुख था | स्त्री सुंदरी थी, मेरी प्राण थी | बच्चे ऐसे सुन्दर थे, जैसे सोने के सजीव खिलौने |उनकी अठखेलियों के मारे घर में कोलाहल मचा रहता था | समय की गति ! विधाता के लीला| अब कोई नहीं है| दादी, प्राण निकाले नहीं निकले| इसलिए अपने उन बच्चों की खोज में निकला हूँ | वे सब अंत में होंगे, तो यहीं कहीं | आखिर, कहीं न जनमे ही होंगे | उस तरह रहता, घुल-घुलकर मरता | इस तरह सुख संतोष के साथ मारूंगा | इस तरह के जीवन में कभी-कभी अपने उन बच्चों की एक झलक से मिल जाती है |
ऐसा जान पड़ता है, जैसे वे इन्हीं में उछल-उछलकर हंस-खेल रहे हैं | पैसों की कमी थोड़े ही है, आप की दया से तो पैसे काफी हैं| जो नहीं है, इस तरह उसी को पा जाता हूं |” रोहिणी ने अब मिठाई वाले की ओर देखा- उसकी आंखें आंसुओं से तर हैं | इसी समय चुन्नू-मुन्नू आ गए | रोहिणी से लिपटकर, उसका आंचल पकड़कर बोले- “अम्मा, मिठाई!” “मुझसे लो |” यह कहकर, तत्काल कागज की दो पुड़िया, मिठाइयों से भरी, मिठाईवाले ने चुन्नू-मुन्नू को दे दी | रोहिणी ने भीतर से पैसे फेंक दिए | मिठाईवाले ने पेटी उठाई और कहा- “अब इस बार ये पैसे ना लूंगा |” दादी बोली- “अरे-अरे न न अपने पैसे लिए जा भाई! तब तक आगे फिर सुनाई पड़ा उसी प्रकार मादक-मृदुल स्वर में- बच्चों को बहलानेवाला मिठाईवाला |”
कठिन शब्दार्थ
१-अतिशय-अधिक
2-वैभव-संपन्नता
3-मृदुल-कोमल
प्रश्न-मुरलीवाले का जीवन पहले कैसा था ?
उत्तर-मुरलीवाले का जीवन पहले भरा-पूरा परिवार व संपन्नता से भरा था |
धन्यवाद