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कक्षा-ग्यारहवीं

विषय- हिन्दी(केंद्रिक)�पूरक पाठ्य-पुस्तक–वितान (भाग-1)� अध्याय -1

भारतीय गायिकाओं में बेजोड़- लता मंगेशकर

लेखक– कुमार गंधर्व

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लेखक परिचय-

प्रसिद्ध शास्त्रीय संगीत गायक कुमार गंधर्व का जन्म सन् 1924 में मध्य प्रदेश के धारवाड़ नामक स्थान पर हुआ था ।

इनका मूल नाम शिवपुत्र सढ़िदारमैया कामकली था । मात्र 10 वर्ष की उम्र में इन्होंने गायकी की । इनके संगीत की मुख्य विशेषता मालवा लोकधुनों और हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का सुन्दर सामंजस्य है , जिसका अद्भुत नमूना कबीर के पदों का उनके द्वारा गायन है । कुमार गन्धर्व ने लोक में रचे - बसे लुप्तप्रायः पदों का संग्रह किया और इन्हें स्वरों में बाँधा । इस से इन्हें अन्तर्राष्ट्रीय पहचान मिली । इन्हें कालिदास सम्मान तथा " पद्मविभूषण ' सहित अनेक सम्मानों से अलंकृत कियागया । इनका निधन सन् 1992 में हुआ ।

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भारतीय गायिकाओं में बेजोड़ लता मंगेशकर ' नामक व्यक्ति -वृत्त प्रसिद्ध गायक कुमार गन्धर्व द्वारा लिखित है ।

1. अजब गायिका –

बरसों पहले एक बार जब लेखक बीमार पड़ा , तो उसने एक दिन रेडियो लगाया । उस पर लेखक ने एक अद्वितीय स्वर सुना । वह उस गीत को तन्मयता से सुनता रहा । गीत की समाप्ति के बाद गायिका का नाम घोषित होने पर वह जान सका कि यह कोमल स्वर सुप्रसिद्ध गायक हृदयनाथ मंगेशकर की बेटी लता मंगेशकर का है । उसे ज्ञात हुआ कि वह गीत बरसात से पहले बने किसी चित्रपट का था । लता से पहले चित्रपट संगीत में प्रसिद्ध गायिका नूरजहाँ का नाम था , परन्तु लता उससे कहीं आगे निकल गई , जो चमत्कार जैसा ही था ।

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2. लता के गायन का प्रभाव –

भारतीय गायिकाओं में लता की जोड़ की कोई गायिका नहीं है । लता के कारण चित्रपट संगीत को विलक्षण लोकप्रियता मिलने के साथ ही लोगों का शास्त्रीय संगीत की ओर दृष्टिकोण भी बदला । लता के गायन के कारण ही आज नन्हे - मुन्ने भी सुरीले स्वर में गाने लगे हैं । चित्रपट संगीत के कारण लोगों का विविध प्रकार के संगीत से परिचय हो रहा है । उनका स्वर - जान बढ़ रहा है । संगीत की लोकप्रियता , प्रसार और अभिरुचि का विकास , सबका श्रेय लता को ही है ।

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3. लता का गायन –

शास्त्रीय गायकी और लता की गायकी में से श्रोता लता की गायकी को ही अधिक पसन्द करते हैं । इसका कारण है लता का गानपन , उसके स्वरों की निर्मलता , मादकता और सुरीलापन । श्रोता को रागों से नहीं । सुमधुर गानपन से मतलब होता है। लता के स्वर में शत - प्रतिशत गानपन है । यही लता की लोकप्रियता का मुख्य मर्म है । लेखक बताता है कि नूरजहाँ के गायन में मादक उत्तान होती थी , वहीं लता के स्वर में एक कोमलता और मुग्धता है । संगीत दिग्दर्शकों को उस निर्मलता का जितना उपयोग कर लेना चाहिए था , वे उतना नहीं कर सके । नादमय उच्चार लता के गायन की एक और विशेषता है ।

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4. संगीत निर्देशकों के प्रयास –

ऐसा माना जाता है कि लता के गीतों में करुण रस प्रभावशाली रीति से व्यक्त होता है , परन्तु लेखक का मत है कि लता ने मुग्ध श्रृंगार की अभिव्यक्ति करने वाले मध्य या द्रुतलय के गीत बड़ी उत्कटता से गाये हैं । गाने में संगीत - निर्देशक उनसे ऊँची पट्टी में गवाते हैं और उनके साथ अन्याय करते हैं ।

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5. शास्त्रीय संगीत में लता का स्थान

- शास्त्रीय संगीत में लता के स्थान के बारे में पूछना प्रयोजनहीन है क्योंकि चित्रपट और शास्त्रीय संगीत की तुलना नहीं की जा सकती । दोनों की ताल में अन्तर होता है । चित्रपट संगीत में आधे तालों का प्रयोग किया जाता है । चित्रपट संगीत वाले को शास्त्रीय संगीत की उत्तम जानकारी होनी चाहिए जो कि लता के पास निःसंशय है ।

शास्त्रीय गायक की तीन घण्टे की महफिल का सारा आनन्द लता की तीन मिनट की ध्वनिमुद्रिका से लिया जा सकता है । लता के एक गाने में स्वर , लय और शब्दार्थ का त्रिवेणी संगम होता है और महफिल की बेहोशी उसमें समायी रहती है । वस्तुतः गाने का महत्त्व इस बात पर होना चाहिए कि उसमें रसिक को आनन्द देने की सामर्थ्य कितनी है । गाने की सारी मिठास , सारी ताकत उसकी रंजकता पर अवलम्बित रहती है

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6.खानदानी गायिका का स्थान

संगीत के क्षेत्र में लता का स्थान अव्वल दर्जे के खानदानी गायक के समान ही है । यद्यपि खानदानी गवैयों का मानना है कि चित्रपट संगीत के कारण लोगों की अभिरुचि बिगड़ गई है , परन्तु लेखक के अनुसार चित्रपट संगीत ने लोगों के कान खराब नहीं किये हैं , उल्टे सुधार दिये हैं।

7. चित्रपट संगीत का महत्व -लेखक बताता है कि शास्त्रीय गायकों ने संगीत के क्षेत्र में अपनी हुकूमतशाही स्थापित कर रखी है तथा शास्त्र - शुद्धता को अत्यधिक महत्त्व दे रखा है । लोगों को शास्त्र - शुद्ध और नीरस गानों के स्थान पर सुरीला और भावपूर्ण गीत चाहिए । चित्रपट - संगीत यह क्रान्ति लाया है । इससे लोगों की संगीत - विषयक अभिरुचि में प्रभावशाली मोड़ आया है । इस संगीत की लचकदारी उसकी एक और सामर्थ्य है । चित्रपट - संगीत का तन्त्र ही अलग है । वास्तव में संगीत का क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत है । इसके अब तक अलक्षित , असंशोधितऔर अदृष्टिपूर्व बड़े प्रान्त की खोज और उपयोग चित्रपट के लोग करते आ रहे हैं । इससे चित्रपट - संगीत दिनोंदिन विकसित होता जा रहा है ।

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8. लता चित्रपट - संगीत की साम्राज्ञी

अत्यधिक विस्तृत चित्रपट - संगीत क्षेत्र की लता अनभिषिक्त साम्राज्ञी है । अनेक गायक - गायिकाओं के मध्य लता की लोकप्रियता सर्वोपरि है । उनकी लोकप्रियता के शिखर का स्थान अव्वल है और अबाधित है । देश में ही नहीं , परदेस में भी उनके गीत सुनकर लोग झूम उठते हैं । शताब्दियों में शायद एक बार पैदा होने वाला ऐसा कलाकार हमारी आँखों के सामने है , हमारे बीच में है । यह हम सबका परम सौभाग्य है ।

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  • कठिन शब्दार्थ
  • सहज-स्वाभाविक!
  • कलेजा-हृदय।
  • संगति-साथ।
  • गायकी-अनोखी गायन शैली।
  • चित्रपट-सिनेमा।
  • सितारिये-सितारवादक।
  • स्वर मालिकाएँ-स्वरों के क्रमबद्ध समूह
  • संस्कारित-सुधरा हुआ
  • ध्वनि मुद्रिका-स्वरलिपि
  • मालकोस-भैरवी घाट का राग जिसमें ‘रे’ व ‘प’ वर्जित हैं।
  • गानपन-आम आदमी को भावविभोर करने वाला गाने का अंदाज
  • नादमय उच्चार-गूंज भरा उच्चारण
  • पार्श्व गायिका-परदे के पीछे गाने वाली स्त्री।

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  • द्रुतलय-तेज धुन।
  • उत्कटता-तेजी, व्यग्रता।
  • ऊँची पट्टी-ऊँचे स्वरों का प्रयोग।
  • जलदलय-तेज लय
  • परिष्कृत-सँवारा हुआ।
  • आघात-चोट।
  • खानदानी-पुश्तैनी।
  • सुभाषित-सूक्ति।
  • रंजकता-रिझाने की शक्ति।
  • ताल त्रिताल-यह सोलह मात्राओं का ताल है जिसमें चार-चार
  • मात्राओं के चार विभाग होते हैं।

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